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03.15.2014


कुवैत- जश्न ए आज़ादी

कांधों पे हवा के चल रही है मसर्रत
छा गया खुशबू से तर अब्र-ए-रहमत
साहिल पे आके मौज भी देने लगी सदा
कर रही फज़ाएं हैं इज़हार-ए-मुहब्बत

तुलू हुआ है आफताब लेकर नई ज़िया
जाम यूं आज़ादी का मौसम ने है पिया

दरिया के दोनों पार तिजारत है पुरानी
हिन्द और कुवैत की निसबत की निशानी
आज भी रिश्ते की वो ताक़त है नुमाया
आते हैं हिन्दी करते हैं निसार जवानी

यूँ तो रिज़्क मिलना कुदरत का है कमाल
दौलत-उल-कुवैत है ज़रिया बना फिलहाल

बुलन्दी पे हमेशा कुवैती रहे दीनार
कुशादगी की बस यहाँ उड़ती रहे गुबार
बाकी रहे अवाम के दिलों में मुहब्बत
शेख की तसवीर से सजती रहे दी दीवार

बरकत रहे हमेशा हो बहार ही बहार
कील भी ठोकें तो उड़े तेल की फुहार

नारे लगाएँ कह के हम कुवैत ज़िदाबाद
कुवैत को देदें चलो मिलकर मुबारकबाद
दुश्मन की बद नज़र भी पड़ सके न दोबारा
आज़ादी में अमां में रहें शाद और आबाद

रहेंगे जिस ज़मीन पर वफा निभाएँगे
माँ की नसीहत को हम सर पर उठाएँगे !!!


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