अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
07.24.2014


ख़ाक

जाए नज़र जहाँ तक ख़ाक ही ख़ाक है
ज़र्रों के हर निशाँ तक ख़ाक ही ख़ाक है
जिससे भी मिले ख़ाक कर दे उसे भी ख़ाक
मुर्दों से लेके जाँ तक ख़ाक ही ख़ाक है

मिट्टी की शक्ल है बस हरम या देर है
क्या है वजूद-ए-आलम ख़ाक का ढेर है

ज़िन्दगी लेती है मज़ा भी ख़ाक पे
मिलती है हर गुनाह की सज़ा भी ख़ाक पे
ख़ाक पर सफ़र है मंज़िल भी ख़ाक ही
रिज़्क भी लिखा है कज़ा भी ख़ाक पे

क्या अर्श पे भी लेते हैं नाम ख़ाक का?
या ज़मीं पे ही चलता है निज़ाम ख़ाक का?

शहीद सब जबीं पर मल कर ग़ुज़र गए
कमज़र्फ तो बस ख़ाक को छाने ही मर गए
क़ीमत जिन्होने जानी ज़रखेज़ ख़ाक की
मेहनतकशी से हीरा बनकर निखर गए

हर ज़र्फ की है होती पहचान ख़ाक पे
शायर लिखे तो कम है दीवान ख़ाक पे

जाँ निसारों में कर मुझको मेरे खुदा
यूँ ख़ाक से मिलकर करूँ में उसका हक़ अदा
ख़ुश होके बाहें खोलकर लेले मुझे ज़मीं
खाकी ये बदन हो ख़ाक से न फिर जुदा

सजदे में कैसी शान से हुसैन (इमाम) मर गए
ख़ाक को भी खाकीशिफा वो कर गए!!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें