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03.15.2014


दहेज

शर्म और बड़ी ही ये दु:ख की बात है
बेटों को बेच खाए कैसी वो ज़ात है
रस्म-ए-दहेज कहना तौहीन रस्म की है
फकीर मैं कहूँगा पाता ज़कात है

लानत है जो है खाता रोटी हराम की
बहू को समझता है बेटी ग़ुलाम की

मुसकान है लबों पर या ग़म जदीद है
बेटी पे हो रहा क्या सितम शदीद है
खैर और खबर क्यूँ लेता नहीं तू बाबुल
क्या बेटियाँ घरों में होतीं मज़ीद है

दोज़ख में कैसी तौबा रुखसत हुई है बच्ची
हँसती न बोलती है हाय बुत हुई है बच्ची

समाज में जो थोड़ी भी होती समझदारी
मर्ज़-ए-दहेज की ये होती न महामारी
बेटी को माँगना तब मिन्नत की रस्म होती
लिल्लाह कोख में तो हरग़िज़ न जाती मारी

दहेजखोरों पे तो दफा लगाई जाए
ज़िन्दान में भेज कर ही व्फ़ा निभाई जाए

पैसे की क्या है क़ीमत तौक़ीर गर्द की है
ख़ुद्दारी भी सिफ़त कुछ होती मर्द की है
माल-ए-मुफ़्त की ही नीयत रखे हमेशा
निशानी तुम ही कह दो कहाँ ये मर्द की है

दिखा दे मर्द बनकर जगा ज़मीर अपना
ख़ून में ख़ुदी का उठा ख़मीर अपना !!!


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