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ISSN 2292-9754

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05.11.2016


मुक्तिबोध और उनका मानवतावाद

"मुक्तिबोध सरल कवि नहीं हैं और लोकप्रियता के दावेदार भी नहीं, पर उनके काव्य का आशय कालजयी है, जीवन रस से आप्लावित, मानवीय चिन्ता से सम्पन्न, मूल्यों का आग्रही।"1

निःसन्देह प्रयोगवाद का प्रवर्तन करने वाले काव्यसंग्रह ‘तार सप्तक’ के पहले कवि के रूप में मुक्तिबोध ने हिन्दी-काव्य जगत में प्रवेश किया था, किन्तु उनकी सृजनात्मकता की वास्तविक पहचान उनकी मानवतावादी दृष्टि के कारण ही स्थापित हुई। अपार संघर्षों के बावजूद उनकी अडिग-आस्था ने उन्हें सबसे विरल व्यक्तित्व दिया। आभिजात्य वर्ग के होकर भी सामान्य-अति सामान्य जनों के लिये उनकी चिन्ता ने उनकी संवेदना को विशुद्ध मानवीय रूप प्रदान किया। ‘सत्य के गरबीले अन्याय न सह’ शीर्षक कविता की निम्नलिखित पंक्तियों में शोषित और उपेक्षित जनों के प्रति उनकी मानवीय संवेदना दृष्टव्य है -

"तेरे जैसे पीड़ित कि शोषित असंख्य जन
कब से खड़े हैं, मित्र तेरे इन्तजार में,
बाँहों में भर ले तू, छाती में डुबो ले आज
उनके अपार प्यार भरे मन, यों अपने को उबार ले।
उनके सहयोग से तू, उनके ही साथ-साथ
खींच चित्र मानव के, प्राणों के रुधिर की लकीरों से,
मिथ्या की हत्या कर, बुद्धि के विष भरे तीरों से।"

विद्वज्जनों ने उन्हें कबीर, निराला और नागार्जुन की परम्परा का स्वीकार किया है। सत्य की पक्षधरता, अन्याय-शोषण का विरोध और ओजस्विता जैसी विशेषताएँ उनकी सृजनात्मकता को इस परम्परा का प्रमाणित करने में सक्षम भी हैं। आलोचकप्रवर रामस्वरूप चतुर्वेदी ने ठीक ही कहा है- "मुक्तिबोध का ठाठ किसी से मिलता है तो सिर्फ कबीर से। वैसी ही बेचैनी और कभी-कभी वैसी ही कोमलता और वैसा ही फक्कड़पन।"2

यह सत्य है कि अपने जटिल युगबोध को अभिव्यक्त करते हुए क्लिष्टता उनकी कविताओं में पर्याप्त मिलती है, किन्तु पूर्ण सत्य नहीं है। उनकी एक नहीं, अनेक कविताएँ सहज-सरस एवं गेयगुण से युक्त हैं। वस्तुतः वर्ण्यविषय के अनुसार उनमें भाषा-शैलीगत परिवर्तन मिलता है। यथा भावपूर्ण व कोमल व्यंजना के सटीक उदाहरण के रूप में ‘हे महान’ कविता की ये पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं -

"हे महान! तव विस्तृत उर से
दृढ़ परिरम्भण की क्षमता दो,
तव स्नेहोष्ण हृदय का स्पन्दन
सुन पाने की आकुलता दो ।
जिससे विवश रहस्य खोल दे
सत्य कि विद्युत् विह्वलता दो !
जो तुझसे संघर्ष कर सके
ऐसी उर में कोमलता दो !"

सम्भवतः मुक्तिबोध की काव्य-सर्जना के इसी वैविध्य एवं वैशिष्ट्य को ध्यान में रखते हुए शमशेरबहादुर सिंह ने यह टिप्पणी की थी - "मुक्तिबोध हमेशा एक विस्तृत कैन्वास लेता है: जो समतल नहीं होता: जो सामाजिक जीवन के ‘धर्मक्षेत्र’ और व्यक्ति चेतना की रंगभूमि को निरन्तर जोड़ते हुए समय के कई काल-क्षणों को प्रायः एक साथ आयामित करता है।"3

व्यष्टि-समष्टि, अन्याय-अत्याचार, शोषण-भ्रष्टाचार, धर्म-समाज और राजनीति हर विषय पर उनकी क़लम चली। जो मानवीय हित में बाधक है, जो मानव विरोधी है, ऐसे हर विषय पर उन्होंने सशक्त प्रहार भी किये। राजनीतिक तानाशाही पर तथा राजनीतिक कुचक्रों पर उन्होंने निर्भीक भाव से उँगली रखी। इसके लिए बहुत अपमानित भी हुए, किन्तु सच्चाई से पीछे नहीं हटे। यों भी मुक्तिबोध का संघर्ष द्वि-आयामी रहा है। एक ओर बाह्य विडम्बनाओं के विरुद्ध वे जूझते रहे, तो दूसरी ओर उनका आत्मसंघर्ष उनके अन्तर्मन को निरन्तर मथता रहा। इसी कारण प्रायः एक उद्वेलन उनकी काव्यसर्जना में मिलता है। किन्तु ये तथ्य भी उल्लेखनीय है कि सारे विक्षोभ, सारे उद्वेलन के पश्चात भी अपनी सर्जना की आधारभूत विधा कविता पर उन्हें अटूट विश्वास रहा है, तभी तो उन्होंने कहा-

"नहीं होती कहीं भी खत्म कविता नहीं होती
कि वह आवेग त्वरित कालयात्री है,
व मैं उसका नहीं कर्ता
कि वह कभी दुहिता नहीं होती
परम स्वाधीन है, वह विश्वशास्त्री है।"

किन्तु यह भी सत्य है कि अपनी काव्य-अभिव्यक्तियों से वे सन्तुष्ट नहीं थे, अन्त तक वे अपनी वास्तविक सार्थक व श्रेष्ठ काव्याभिव्यक्ति को खोजते रहे। उनकी ‘अँधेरे में’ कविता की सारी फैंटेसी (सारा कल्पना-वितान) इसी सच्ची काव्याभिव्यक्ति की खोज पर टिकी है, जो खो गयी है, किन्तु जो स्वयं की सृष्टि है। वह है तो, पर व्यक्त नहीं हो पा रही। अप्रत्यक्ष रूप से जैसे मुक्तिबोध कहना चाहते हैं कि एक सर्जक का मुख्य दायित्व यही खोज है, जिसके द्वारा मानवीय सृष्टि का उन्नति-पथ प्रशस्त होता है, वरन् इसी से उसकी सार्थकता है -

"अनखोजी निज-समृद्धि का वह परम-उत्कर्ष,
परम अभिव्यक्ति - - -
मैं उसका शिष्य हूँ
वह मेरी गुरू है,
गुरू है !!
- - - - -
परम अभिव्यक्ति
लगातार घूमती है जग में
पता नहीं जाने कहाँ, जाने कहाँ
वह है।
इसीलिए मैं हर गली में
और हर सड़क पर
झाँक-झाँक देखता हूँ हर एक चेहरा,
प्रत्येक चरित्र
व हर एक आत्मा का इतिहास
हरेक देश व राजनैतिक परिस्थिति
प्रत्येक मानवीय स्वानुभूत आदर्श
विवेक प्रक्रिया, क्रियागत परिणिति !!
खोजता हूँ पठार - - - पहाड़ - - - समुन्दर
जहाँ मिल सके मुझे
मेरी वह खोयी हुई
परम अभिव्यक्ति अनिवार
आत्म-सम्भवा ।"

भावानुभूति, वैचारिकता और अनूठे शिल्प के कारण ‘अँधेरे में’ कविता ने आधुनिक हिन्दी काव्य में एक क्रान्ति की थी। पुराने प्रतिमान धराशायी हुए थे और नये प्रतिमान स्थापित हुए थे। महत्वपूर्ण यह भी हुआ था कि यह सारी अभिनवता हमारे आस-पास के जीवन के बीच से उपजी थी। आलोचक नामवर सिंह के शब्दों में - "इस कविता का मूल कथ्य है अस्मिता की खोज; किन्तु कुछ अन्य व्यक्तिवादी कवियों की तरह इस खोज में किसी प्रकार की आध्यात्मिकता या रहस्यवाद नहीं, बल्कि गली-सड़क की गतिविधि, राजनीतिक परिस्थिति और अनेक मानव-चरित्रों की आत्मा के इतिहास का वास्तविक परिवेश है। आज के व्यापक सामाजिक सम्बन्धों के संदर्भ में जीने वाले व्यक्ति के माध्यम से ही मुक्तिबोध ने ‘अँधेरे में’ कविता में अस्मिता की खोज को नाटकीय रूप दिया है।"4

उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि मुक्तिबोध की सृजनात्मकता में अन्तर्निहित मानवीय संवेदन का यह रूप केवल उनकी काव्य-सृष्टि में ही नहीं है, उनके गद्य में भी इसकी उपस्थिति है। उनके निबन्ध, उपन्यास, कहानियाँ और आलोचनाएँ भी इस वैशिष्ट्य से युक्त हैं। आलोचक नामवर सिंह जी के विविध अवसरों पर दिये गये व्याख्यानों को पुस्तक रूप में सन 2012 में प्रकाशित किया गया। डॉ. आशीष त्रिपाठी सम्पादित ‘साहित्य की पहचान’ शीर्षक इस पुस्तक की भूमिका में आशीष त्रिपाठी ने बताया है कि मुक्तिबोध की कृति ‘एक साहित्यिक की डायरी’ के अंश पहले हरिशंकर परसाईं सम्पादित ‘वसुधा’ पत्रिका में एक स्तम्भ के तहत प्रकाशित हुए थे। बाद में 1964 में पुस्तक के अन्तर्गत इनका प्रकाशन हुआ। इस कृति पर लिखी नामवर जी की समीक्षा काफी चर्चित हुई थी। उसमें मुक्तिबोध के सहज-सरल, सामान्य जनप्रेमी एवं चिन्तनशील व्यक्तित्व को विशेष रूप से रेखांकित किया गया था। उसके दो अंश उद्धृत हैं।

1- "कुछ लोग दुनिया से बहस करते हैं तो कुछ सिर्फ अपने से, किन्तु थोड़े-से लोग ऐसे भी होते हैं, जो दुनिया से बहस करने की प्रक्रिया में अपने-आप से भी बहस चालू रखते हैं। मुक्तिबोध ऐसे ही थोड़े लोगों में थे और उनकी ‘एक साहित्यिक की डायरी’ ऐसी ही जीवन्त बहस का सर्जनात्मक दस्तावेज है, जिसमें भाग लेने का लोभ संवरण करना कठिन है। अपने-आप से या किसी दूसरे से बात करते हुए मुक्तिबोध पाठक को कुछ इस प्रकार उस वार्तालाप का साझीदार बना लेते हैं कि निःसंग रहना कठिन हो जाता है। यह अपनापा संक्रामक है: स्वयं से अस्वयं होना है।"

2- "जो व्यक्ति एक साधारण आदमी की तरह अपने आसपास के सामाजिक परिवेश में हिस्सा लेता है और हर परिचित-अपरिचित को सहचर की तरह स्वीकार करते हुए हमेशा उन्मुक्त विचार-विनिमय के लिए प्रस्तुत रहता है, उसी के लेखन में सम्प्रेषण और सम्भाषण का यह गुण आता है। और साफ दिखाई पड़ता है कि - ‘एक साहित्यिक की डायरी’ ऐसी ही सामाजिक जीवन-प्रक्रिया की उपज है।"5

निःसन्देह उनकी इस रचना में सामान्य जन से सम्वादात्मकता, रचनात्मकता, सामाजिकता जैसी विशेषताएँ ही उभरकर सामने आती हैं। उनकी कहानियों को भी इसी रचना-क्रम की कड़ी के रूप में पाते हैं। उनमें भी आम आदमी और उसके हृदयगत संसार को प्रत्यक्ष करने का प्रयास हुआ है। उनकी कहानियों के ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ शीर्षक संग्रह का सम्पादन किया है रोहिणी अग्रवाल ने। इस पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा है - "मुक्तिबोध की जिजीविषा-जड़ी कहानियाँ आत्माभिमान को बनाए रखने वाले आत्मविश्वास और आत्मबल को जिलाए रखने का सन्देश देती हैं - भीतर के मनुष्य से साक्षात्कार करने के अनिर्वचनीय सुख से सराबोर करने के उपरान्त।"6

संग्रह की पहली कहानी ‘मैत्री की माँग’ से ही सम्पादिका के उपर्युक्त अभिमत की पुष्टि हो जाती है। कहानी में कुल चार प्रमुख पात्र हैं- रामराव, उसकी पत्नी सुशीला, उसकी माँ तथा पढ़ा-लिखा व्यक्ति माधवराव सामान्य मध्यवर्गीय जीवन स्तर है इन लोगों का। सुशीला को शिक्षा पाने की बड़ी ललक रही थी, किन्तु विवाह कर दिया गया। पति रामराव शिक्षित है। सुशीला को पढ़ाना भी चाहता है, पर स्थितियाँ अनुमति नहीं देतीं। घर में बूढ़ी माँ भी है। सारा दिन घर के काम-काज में निकल जाता है। ऐसे ही दिन बीत रहे थे कि मुहल्ले में एक टिप-टॉप व पढ़ा-लिखा व्यक्ति आता है और सुशीला की चाहत ज़ोर मारती है। परिचय होने पर वह उससे मैत्री की माँग करती है, किन्तु पुरुष मानसिकता से ग्रस्त माधवराव उसे ग़लत समझता है, उसका पति भी माधवराव से उसकी बोलचाल को ग़लत अर्थ में लेता है। माधवराव की वह कुत्सित मानसिकता और झूठ बोलना सुशीला को बहुत दुखी करता है। वह कहती है - "पुरुष कैसे होते हैं, जो अपना वचन नहीं रख सकते।" इसी कारण तथा अपने पति की खुशी के लिए भी वह माधवराव से तटस्थ हो गयी। किन्तु कहानी का अंत संवेदनात्मकता का एक सुंदर उदाहरण प्रत्यक्ष करता है। लेखक के शब्दों में- ‘’माधवराव को लादे ताँगा पत्थरों पर खड़खड़ाता हुआ आगे चलने लगा कि यकायक रामराव के रसोईघर की खिड़की खुली और वही स्तब्धपूर्ण मुख, आँखों में न्याय मैत्री की माँग करने वाला करुण दुर्दम चेहरा वही स्तब्ध मूर्त भाव। माधवराव के हृदय की मानो खड़ाखड़-खड़ाखड़ (खिड़कियाँ) खुल गयीं और एक बेरोक प्रकाश का तूफान अन्दर घुस गया और छाने लगा।"

यहाँ स्त्री को मनुष्य नहीं, मात्र देह समझने वाले माधवराव के मन के संकीर्णता रूपी सारे अन्धकार के समाप्त होने को खिड़कियों के खुलने व ज्ञानरूपी प्रकाश के तूफान के अन्दर घुसने के माध्यम से बहुत ही कलात्मक ढंग से मुक्तिबोध ने दर्शाया है। मुक्तिबोध की मानवीय संवेदना की सच्ची परिचायक है ये कहानी।

अतएव भावपक्ष हो या कलापक्ष, अनूठी भाव व्यंजना हो अथवा प्रभावशाली शिल्प योजना, कवि मुक्तिबोध का मानवतावादी संवेदन सदैव सर्वोपरि रहा है। इस सन्दर्भ में डॉ. बच्चन सिंह की निम्नलिखित पंक्तियाँ निश्चय ही उद्धरणीय है- "मुक्तिबोध आत्ममंथन के कवि हैं। इस मन्थन में कालकूट भी निकलता है और अमृत भी। कालकूट वह स्वयं पीते हैं और अमृत दूसरों को बाँटते हैं। इस मन्थन में उनका आत्मालोचन, सभ्यता-समीक्षा, आधुनिक बोध, रचना-प्रक्रिया, मानवीय अभिप्राय, क्रान्तिकारी परिवर्तन आदि सभी कुछ सम्मिलित हैं। किसी एक कविता को उठा लीजिए, उसमें यह सब कुछ मिलेगा - किसी में कुछ तत्वप्रधान हैं तो किसी में कुछ। इसीलिए कहा जाता है कि उन्होंने समग्रतः एक ही कविता लिखी है- अनेक कविताओं को मिलाकर भी एक कविता।"7

सन्दर्भ:

1. डॉ. प्रेमशंकर; रचना और राजनीति; वाणी प्रकाशन-नयी दिल्ली; प्रथम संस्करणः 1999; पृ. 79;
2. रामस्वरूप चतुर्वेदी; हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास; लोकभारती प्रकाशन-इलाहाबाद;
तेरहवाँ संस्करणः 2000; पृ. 201
3. मुक्तिबोध; चाँद का मुँह टेढ़ा है; ‘एक विलक्षण प्रतिभा’ शीर्षक भूमिका से; भारतीय ज्ञानपीठ - नयी दिल्ली; उन्नीसवाँ संस्करणः 2009; पृ. 21
4. नामवर सिंह; कविता के नए प्रतिमान; राजकमल प्रकाशन-नयी दिल्ली; नौवीं आवृत्ति: 2010; पृ. 221
5. सम्पादक आशीष त्रिपाठी; साहित्य की पहचान; भूमिका से राजकमल प्रकाशन प्रा.लि. नयी दिल्ली; पहला संस्करण: 2012; पृ. अप दृ अपप
6. सम्पादक रोहिणी अग्रवाल; मुक्तिबोध की प्रतिनिधि कहानियाँ; राजकमल पेपरबैक्स संस्करण-नयी दिल्ली; पहला संस्करण: 1996; पृ. 08
7. बच्चन सिंह; हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास; राधाकृष्ण प्रा.लि.-नयी दिल्ली; प्रथम संस्करणः 1996; पृ. 462

विभागाध्यक्ष, हिन्दी
अधिश्ठाता, कला संकाय
इ.क.सं.वि.वि., खैरागढ़ (छ.ग.)


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