अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
07.27.2014


राग-विराग में नारी चित्रण

 पुस्तक : राग विराग
लेखक : श्रीलाल शुक्ल
प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन
दिल्ली-१०० ००२
पृष्ठ - ११२
मूल्य : १०० रुपए

श्रीलाल शुक्ल हिन्दी साहित्य जगत के ऐसे मूर्धन्य साहित्यकार हैं जिन्होंने कथा, लेख, उपन्यास सभी विद्या में स्वयं को सिद्ध किया है। "राग-विराग" उनकी सोच को सार्थक करती हुई ऐसी कहानी है जिसमें प्रेम की गति, शंका और उस पर वातावरण के पड़ने वाले प्रभाव को रेखांकित किया गया हैं। कहानी ऐसे पात्र के ईद-गिर्द घूमती है जो एक-दूसरे के प्रेम पाश में सम्मोहित है। सम्मोहित शब्द का उपयोग इसलियें किया जा रहा है कि शंकर और सुकन्या दोनों के बीच प्रेम है परन्तु कुछ विषमता है जिसको लेखक ने महत्व देकर उभारा है। मतलब शंकर जो आज विख्यात डॉक्टर है परन्तु उसके लक्ष्यों में नित-परिवर्तन होते हैं वह अपने अतीत के झरोखे से आज भी बँधा हुआ है। योग्यता से परिपूर्ण होने के बाद भी उसकी गतिविधि ऐसी है कि सुकन्या उसे व उसके परिवेश से को लेकर भ्रमित हो जाती हैं। उसे यह महसूस होने लगता है कि वह शंकर के साथ शहरी जीवन व्यतीत कर सकती है। परन्तु शंकर की बूढ़ी माँ और सूरज भाई जैसे व्यक्तित्व के साथ वह कभी भी सांमजस्य नहीं बना पाएगी। और शंकर भी तो आखिर उसी परिवेश का है तो उस ग्रामीण वातावरण, वहाँ का संस्कार शंकर के व्यवहार में भी होगा। यद्यपि शंकर पर उसके ग्रामीण परिवेश या कहे तो देशी-देहाती प्रभाव दिखायी नहीं देता हैं परन्तु उसके ग्रामीण परिवेश में चिकित्सीय कार्य करने की इच्छा, चाहे-अनचाहे उसके ग्रामीण अंचल की चाहत का प्रदर्शन कर देती है। सुकन्या दिल्ली शहर की पढ़ी-लिखी लड़की है जिसे शंकर के ग्रामीण जीवन की झॉकी भयभीत कर देती है। शंकर क्षमतावान युवक है जो आज सफल डॉक्टर हैं परन्तु है वह "बेसिक कल्चर" का हिमायती।

सुकन्या, शंकर से उसके अतीत के बारे में जानकर डरी हुई हैं। किस तरह शंकर के घर पर गरीबी का साया था, जब उसके पिता मृत्यु शैय्या पर होकर भी उसकी माँ को अश्लील गालियाँ देते हैं, और प्रत्यक्ष रूप में जब वह सूरज भाई को किसी को जूते मारने की बात कहती हुई सुनती है तो सुकन्या के प्रेम की दिशायें किस तरह बदलती हैं, का जीवंत वर्णन श्री लाल शुक्ल ने किया है। उन्होंने यह चित्रित करने का प्रयास किया है कि किस तरह आधुनिक परिवेश की पढ़ी-लिखी लड़की सुकन्या प्रेम तो करती है। परंतु उस प्रेम में सर्वस्व की कमी है। प्रेम करना और प्रेम हासिल करना चाहती है परन्तु अपनी शर्तों पर। वह प्रेम के साथ अपनी ही पसंद को तवज्जो देती है। वह उस परिवेश में रहने और संपर्क में जाने से ही घबरा जाती है, जिससे शंकर का अतीत घिरा हुआ है। वर्तमान का सारा चित्रण भौतिकवादी हैं परंतु कही-न-कही सुकन्या शंकर के अतीत से बाहर नहीं आ पाती है। एक दिन प्रेम का रिश्ता भी दम तोड़ देता है। जिसका वर्णन शुक्ल जी ने इस तरह किया है:-

"शंकर लाल सुकन्या को उसके पिता से अलग करके नहीं देख पा रहा है। सुकन्या शंकर लाल को उसके पिता से अलग करके नहीं देख पाती है, जिसके मरते वक्त भी ओंठों पर अश्लीलता थी। दोनों जानते हैं कि यह दुराग्रह है, फिर भी वे उसकी त्रासदी मौजूदगी से उबर नहीं रहे हैं। दोनों ही इसके ख़िलाफ़ अपने विवेक का हथियार इस्तेमाल करना चाहते हैं, पर उनका विवेक ऐसी म्यानबंद तलवार हो गया है जो म्यान में फंसकर रह गई है, बहुत ज़ोर लगाने पर भी बाहर नहीं निकल पाती और डर है कि और ज़्यादा ज़ोर लगा तो उसकी मूठ उखड़कर उनके हाथ में आ जाएगी। शंकर और सुकन्या दोनों की स्थिति उनके पिताओं की देन है। बचपन में पिता की मृत्यु के समय सुकन्या के डॉक्टर पिता का दुर्व्यवहार आज शंकर की सभी यादों और उस रात की भयावहता को जागृत कर देता है। वही सुकन्या के लिये अप्रत्यक्ष रूप से ग्रामीण परिवेश चिंता का सबब बन गयी हैं।" श्री शुक्ल जी ने ग्रामीण परिवेश की गरीबी को बखूबी चित्रित किया है।

"पीछे वाली कोठरी ढह गयी है और उसके खंडहर में अडूसा और नीम के पौध उग आए है। उसकी अंदर वाली दीवार पर एक छप्पर है, फिर आंगन है। एक और कच्ची दहलीज है। वहाँ बापू खटिया में पड़े हैं उसके पीछे एक लंबी, अंधेरी कोठरी जिसमें गिरस्ती का कबाड़ रखा जाता है, यहाँ पीढ़ियों से लेबर रूम, डिलीवरी रूम का काम देती है। उसकी जरूरत पड़ती ही रहती है यही असली घर हें आंगन से मिला एक चबूतरा है उस पर भी छप्पर पड़ा है। बस इतना ही। सामने बाहर की दीवार पर घर का तीसरा और सामने से पहला छप्पर है जिसमें भीतर प्रवेश करने के लिये एक दरवाजा है। दरवाजा यानी लकड़ी का चौखटा। जिसमें किवाड़े नहीं है। उनकी जगह बांस का एक टट्र है, जिसे रस्सी के सहारे अटकाया गया है चौखट को किवाड़े कभी नसीब नहीं हुए।"

सुकन्या के अंतर्द्वंद्व को प्रदर्शित करने में यह चित्रण सहायक रहा। क्योंकि उसके लिये यह स्थिति भयावह है न कि मार्मिक। इसलिये इसे भयानक नाम दिया गया है क्योंकि यह आधार है जिसने सुकन्या को शंकर से अलग करने में सहायता की। हरचंदपुर गाँव की स्थिति वातावरण को सुनकर और सूरज भाई को देखकर सुकन्या शंकर की माँ का भी चित्रण करने में सफल हो जाती है। उसके घर में काम करने वाली घसियारिन को देखकर वह कल्पना कर लेती है कि शंकर की बूढ़ी माँ भी ऐसी ही होगी।

"रूखे, मटमैले बाल, फटी धोती, ध्वस्त चेहरा, बिना बटन की कमीज से दिखते हुए निचुड़े हुए निरर्थक स्तन।"

यही छवि बनती है सुकन्या के मन में शंकर मे माँ की।

प्रेम की कल्पना और उसकी यर्थाथता को चित्रित करने में श्री शुक्ल बेजोड़ हैं। उन्होंने भाव प्रणवता को भावहीन कर देने की कला का उद्बोधन किया है। जब शंकर लाल कीचड़ से धिरे हुए टापू में सुकन्या को विवाह को प्रस्ताव देता है और सुकन्या के द्वारा यह कह दिया जाना कि "किसी दिन सुबह की रोशनी में बात करेंगे।" इस जवाब में ही इंकार का स्वर गुंजायमान हो जाता है और शंकर लाल इसे समझ भी जाता है क्योंकि वह रोशनी वाला दिन उसके बाद आता ही नहीं है दोनों के जीवन में। औपचारिकता के वशीभूत किसी तरह बिना तनाव के रिश्तों में दूरी आ जाने का चित्रण इस उपन्यास की प्रमुख विशेषता है। जिसमें न शिकायत है न धोखा है और न ही भविष्य की तलाश। देश और विदेश की दूरी उनके रिश्तों को इतने दूर ले जाती है कि कई साल गुज़र जाते है। तब सुकन्या की शादी, सुवीर और उसकी समस्या, उनका तलाक सब कुछ चित्रित हो जाता है। वह अस्पताल की अधिक्षिका भी बन जाती है।

शुक्ल जी ने मौसी को समाज की प्रमुख विचार श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत किया है जो अपने अनुभव और दुनियादारी की समझ देते हुए सुकन्या के मन की बात जानने का प्रयास करती हैं और उसे वर्ग भेद, जाति भेद से परे जाकर निर्णय लेने के लिये प्रोत्साहित करती हैं। वह सुकन्या को शंकर के अतीत में न देखकर उसके साथ भविष्य की राह से देखने के लिये कहती है परंतु उच्च शिक्षित सुकन्या के लिये नींव ज़्यादा महत्वपूर्ण थी और इमारत नहीं। उसके तर्क मौसी को विचलित कर देते हैं परंतु वह स्वयं भी प्रेम को खुद से अलग कर संभ्रांतता को महत्व देने की वकालत करने लगी।

प्रेम पर कुलीनता का प्रभाव हावी हो जाता है। प्रेम दरकिनार हो जाता है और अभिजात्यतता उस पर शासन करने लगती है। प्रेम का एक दूसरा चित्रण सुकन्या और सुवीर के मध्य में किया गया है। जिसमें शराबखोर लेकिन संभ्रांत वर्ग का सुवीर उसे प्रेम वश तलाक ही नहीं देना चाहता है इसके लिये वह तरह-तरह के हथकण्डे अपनाता है यहाँ तक कि वह आत्महत्या भी कर लेता है। पर तब भी सुकन्या का प्रेमरूपी दामन खाली ही रह जाता है।

प्रेम जिसे उसने संभ्रातता के लिये छोड़ दिया था आज वह संभ्रात मानव भी प्रेम हीनता के लिये त्यज्य हो जाता है।

श्री लाल शुक्ल जी ने ग्रामीण परिवेश की स्पष्टता हेतु भाषा शैली में भी प्रयोग किये है। गिरस्ती, (गृहस्थी) बापू (पप्पा), गबखन आदि शब्द ग्राम्य धर्म को उद्दीप्त करते है।

अधीक्षिका के पद पर रहते हुए जब सुकन्या भी भेट सूरज भाई से होती है जो अपनी बहू के प्रसव हेतु अस्पताल आए हुए है तक शंकर के बेसिक कल्चर की अवधारणा का अहसास सुकन्या को होता है। सूरज भाई निपट देहाती, अर्द्धसुसंस्कृत परंतु अपनी बहु के लिये संवेदनशील। जिसके प्राणों की रक्षा के लिये वे हर परिस्थिति को सहन करने के लिये तैयार खड़े हैं। पर किसी भी कीमत में अपनी बहू को नहीं खोना चाहते हैं। तब सुकन्या समझ जाती है कि "बेसिक कल्चर" है क्या। जिसे वह पिछले 17-18 सालों में नहीं समझ सकी थी। समाज का एक वर्ग जो लड़की के पैदा होने पर शोकाकुल हो जाता है उसे प्रताड़ित करने के तरह-तरह के उपाय सोचता है और ये एक निपट देहाती वर्ग जो दूसरे घर से ब्याहकर लायी हुए बहू के लिये चिंतित है। सभ्रांत और देहाती समाज का एक अंतर इसमें दिखायी देता है।

कहानी उस मोड़ पर आकर संवेदनशील हो जाती है जबकि सत्रह वर्षों के बाद शंकर और सुकन्या का सामना कॉलेज के एक समारोह मे होता है। एक टीस दोनों के मन में होती है, परंतु आज भी सुकन्या उन परिस्थितियों के जनित होने के पहले ही देहारादून चली जाती है। शंकर उसके होने के अहसास का भ्रम लिये उस स्थान पर चला जाता है जहाँ पर सुकन्या से वह वर्षों पहले मिलता था। तब और अब के उस वातावरण में बदलाव आ गया है और रिश्तों में भी। मलेरिया की बीमारी पर शोध को बढ़ाने के लिये वह मच्छरों का संग्रहण करने लगता है लालसा अभी भी एक ही बनी हुई है कि सुकन्या यहाँ पर उसके साथ होती। हिन्दी फिल्मों की तरह एक सुखद अंत की कल्पना पाठकों को होती है और कहानी के अंत में यही लगता है कि सुकन्या उस स्थान पर आएगी। शंकर और सुकन्या के मिलन की काल्पनिक व्यथा में कहानी समाप्त हो जाती है क्योंकि हम सदा सुखद अंत की आस रखते हैं।

परंतु शुक्ल जी ने इसे एक विचार के रूप में अंत दिया है जिसे पाठक उदात्तभाव से समझ सकें।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें