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ISSN 2292-9754

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01.12.2016


नुक्कड़ नाटक की अध्येता और आलोचक डॉ. प्रज्ञा से बातचीत

(नुक्कड़ नाटक की वर्तमान स्थिति और भविष्य में उसके अस्तित्व के संदर्भ में नुक्कड़ नाटक की अध्येता और आलोचक डॉ. प्रज्ञा से शोधार्थी मोनिका नांदल की बातचीत)
 
मोनिका: डॉ. प्रज्ञा आप लंबे अर्से से नुक्कड़ नाटक के शोध, अध्ययन, अध्यापन, निर्देशन से जुड़ी रही हैं, मैं जानना चाहती हूँ कि नुक्कड़ नाटक की पहचान एक जनपक्षीय कला के रूप में रही है। आपके अनुसार आज के समय में यह अपनी इस पहचान को क़ायम रखने में कहाँ तक सफल है?
डॉ. प्रज्ञा: देखिए मोनिका, नुक्कड़ नाटक जनांदोलनों से उपजी विधा है। जनता के आंदोलनों और उसकी बेहतरी की दिशा से ही नुक्कड़ नाटक की जनपक्षीय भूमिका तय होती है। आप अगर इसके इतिहास पर दृष्टि डालें तो आरंभिक नुक्कड़ नाटकों को ही देखिए मसलन ‘गिरगिट’,‘कुकड़ूं कूं’, ‘जनता पागल हो गयी है’ फिर ‘मशीन’ आदि सभी आम जनता के संघर्ष समस्याओं की कहानियाँ ही हैं। चाहे जन विरोधी सत्ता की अनीति हो, सत्ता का बेहतर विकल्प हो, श्रमशील जनता, मज़दूरों का शोषण और उनकी मज़दूरी से जुड़ा हुआ मुद्दा ही क्यों न हो। इस तरह नुक्कड़ नाटक एक राजनीतिक नाटक है और जनपक्षधर होना इसका मूल स्वभाव है। जहाँ तक आज के संदर्भ में हम इस नाटक की बात करते हैं तो आज लगभग चौवालीस साल की अपनी यात्रा पूरी करने के बाद इसकी छवि जनपक्षीय ही है। इसे आप नाटकों के कथ्य और रूप दोनों ही स्तरों पर देख सकती हैं। सामंती-पूंजीवादी चक्की में पिसती औरत के संघर्ष की बात हो, उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के दुष्चक्र में पीसते लोगों की कहानी हो, बंधुआ मज़दूरी का सवाल हो या फिर आम जनता से नफ़रत करने वाली शासन व्यवस्था का ही सवाल क्यूँ न हो। यही नहीं हमारी रोज़मर्रा की तकलीफ़ों-स्वास्थ्य, पानी, बिजली, पोषण और महँगाई सभी मुद्दों पर नुक्कड़ नाटक लिखे-खेले जा रहे हैं। आठवें दशक से आरंभ हुई नुक्कड़ नाटक की यात्रा से लेकर आज भी इसकी पहचान आंदोलनधर्मिता से ही जुड़ी हुई है।
मोनिका: आलोचना की किताब ‘नुक्कड़ नाटकः रचना और प्रस्तुति’ के बाद आपका संग्रह ‘जनता के बीचःजनता की बात’ नुक्कड़ नाटकों के स्क्रिप्ट के अभाव को दूर करता है। आज के समय में ऐसे संग्रहों की आवश्यकता को आप कितना ज़रूरी मानती हैं?
डॉ. प्रज्ञा: ‘जनता के बीचः जनता की बात’ बारह नुक्कड़ नाटकों का संग्रह है जिसे मैंने संपादित किया और जो वाणी प्रकाशन से 2008 में प्रकाशित हुआ। पर इससे पहले सन् 2006 के विश्व पुस्तक मेले में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से मेरी पहली किताब ‘नुक्कड़ नाटकः रचना और प्रस्तुति’ प्रकाशित हुई थी। किताब का लोकार्पण करते हुए आदरणीय नामवर जी ने नुक्कड़ नाटक के संग्रहों की बेहद कमी की ओर इशारा किया। फिर नाट्यालोचक देवेंद्रराज अंकुर ने भी इस विषय में चिंता ज़ाहिर की। दिल्ली विश्वविद्यालय से ‘हिंदी के नुक्कड़ नाटकों में जनवादी चेतना’ विषय पर शोध करते हुए भी मैंने इस कमी को महसूस किया था। हालाँकि चंद्रंश जी की ‘नुक्कड़ नाटक’ नाम से 1983 में चार नुक्कड़ नाटकों पर आधारित किताब प्रकाशित हुई थी और 1982 में सव्यसाची के संपादन में निकलने वाली ‘उत्तरा़र्द्ध’ पत्रिका का नुक्कड़ नाटक अंक भी प्रकाशित हुआ था और बाद में कई पत्रिकाएँ नाटक प्रकाशित करती रहीं। पर किताब के रूप में नाटक संग्रहों की कमी थी। इस कमी ने ही मुझे प्रेरित किया और किताब की योजना को कार्यरूप मैंने दिया। पर अभी भी ऐसे संग्रहों की बेहद ज़रूरत है। न केवल इसलिए कि नुक्कड़ नाटक करने वाली मंडलियों को सशक्त स्क्रिप्ट मिले बल्कि इनमें से कई इम्प्रोवाइज़ेशन की तकनीक से निकले नाटकों का समयानुसार दस्तावेज़ीकरण हो और ऐतिहासिक रचना के तौर पर संरक्षण भी। ‘जनता के बीचः जनता की बात’ के बावजूद ऐसे बहुत सारे संग्रहों की ज़रूरत है और बनी रहेगी।
मोनिका: नुक्कड़ नाटक संग्रह ‘जनता के बीचः जनता की बात’ के नाटकों के चयन में आपने क्या रणनीति अपनाई?
डॉ. प्रज्ञा: मोनिका, 2007 में इस किताब की योजना मैंने बनाई तब एक बात बिल्कुल साफ़ थी मेरे ज़ेहन में कि मुझे न सिर्फ़ महत्त्वपूर्ण और प्रासंगिक नाटकों को इस किताब में शामिल करना है बल्कि एक ऐसी सूची भी बनानी है जिसमें आरंभ से लेकर एकदम नये नुक्कड़ नाटक जगह पा सकें। एक विचार यह भी जन्मा कि नुक्कड़ नाटक लिखने वाले लेखकों के साथ नुक्कड़ नाटक मंडलियों के नाटक भी शामिल किए जाएँ और तीसरी सबसे बड़ी बात ये थी कि मैं उन नाटकों का चुनाव करूँ जो जनता के बीच वैश्विक राजनीति से लेकर घरों में सामंती शोषण तक के विविध पहलुओं को सामने लाते हों। संग्रह के सभी नाटक सामाजिक सरोकारेां, समस्याओं से सीधे तौर पर जुड़े हैं। ये हमारे समय के शोषित, उत्पीड़ित और हाशिये में डाल दिए गए तबक़ों की आवाज़ें हैं। सवाल दलित जातियों के अपमान का हो, धर्म और मज़हब के नाम पर फैलाए जा रहे साम्प्रदायिक वैमनस्य का हो, जातिवादी राजनीति का या मानवीय समाज का (रमेश उपाध्याय का ‘हरिजन दहन’ और ‘राजा की रसोई’ असगर वजाहत का ‘सबसे सस्ता गोश्त’ और ‘देखो वोट बटोरे अंधा’, स्वयं प्रकाश का ‘नयी बिरादरी’) बाज़ारवादी नवसाम्राज्य के कसते शिकंजे के विरुद्ध आवाज़ और श्रमिकों के मौलिक हितों को छीनने का विरोध हो (जन नाट्य मंच का ‘संघर्ष करेंगे जीतेंगे और निशांत का ‘अंग्रेज़ी की गुलामी हमें मंजूर नहीं) आधी आबादी की समानता का हो, न्याय का हो (शिवराम का ‘दुलारी की मां और जनम का ‘वो बोल उठी’) स्थानीय बाज़ार को नियंत्रित करने वाले व्यापारी वर्ग की कालाबाज़ारी और भ्रष्टाचार को उजागर करना हो (स्वयं प्रकाश का ‘सबका दुश्मन’)। इस तरह ‘जनता के बीचः जनता की बात’ संग्रह तैयार हुआ जिसमें असगर वजाहत, रमेश उपाध्याय, स्वयं प्रकाश और शिवराम जी के दो-दो नाटकों के साथ ‘जन नाट्य मंच’ ऑैर ‘निशांत नाट्य मंच’ के दो-दो नाटकों को मैंने शामिल किया। सबसे बड़ी बात कि सबकी सहर्ष सहमति मुझे मिली और सबसे अधिक प्रोत्साहन आदरणीय अंकुर जी से मिला जिन्हें ये संग्रह समर्पित है।
मोनिका: आपकी पहली किताब है - ‘नुक्कड़ नाटकः रचना और प्रस्तुति’ तो आपके अनुसार नुक्कड़ नाटक की रचना और प्रस्तुति में क्या नए प्रयोग किए जाने चाहिएँ जिससे इनकी प्रासंगिकता बनी रहे।
डॉ. प्रज्ञा: मोनिका, नुक्कड़ नाटक एक प्रयोगधर्मी विधा है इसलिए इसकी रचना और प्रस्तुति में निरंतर प्रयोगशीलता अपेक्षित है। अपनी किताब: ‘नुक्कड़ नाटकः रचना और प्रस्तुति’ में मैं इस बात से जूझी हूँ। जहाँ तक रचना का सवाल है तो समसामयिक मुद्दों और तात्कालिक मुद्दों के आधार पर नाटकों की रचना होगी। आपात्काल के गर्भ से निकले इन नाटकों ने भारतीय समाज में सक्रिय साम्प्रदायिकता, जातिवाद, अशिक्षा, असमानता, शोषण, बेरोज़गारी,युद्ध और हिंसा जैसी अनेक मानवविरोधी ताक़तों का जमकर विरोध किया है। फासीवादी संस्कृति और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के परिप्रेक्ष्य में गुजरात के दंगों को लेकर कई नाटक लिखे-खेले गए। ‘प्रेरणा’ पटना के ‘चेहरे पर चेहरा’ के 80 से अधिक शो हुए। जनम का इसी विषय पर ‘ये दिल माँगें मोर गुरूजी’ बाल यौन शोषण पर ‘आर्त्तनाद’, खाप पंचायतों की अमानवीयता पर जनम का ही ‘जब चले खाप पर लट्ठ’ और निजीकरण पर ‘प्राइवेट पानी’ जैसे नाटक हैं। एक जनवादी कला माध्यम के रूप में इसने अपनी सशक्त पहचान बनाई है। दूसरे विषय की विविधता के अतिरिक्त रचना के स्तर पर कई प्रयोग किए गए हैं और किए जा रहे हैं मसलन नाटक शोधपरक ढंग से विभिन्न तथ्यों की रोशनी में लिखे जाएँ। ये नाटक इम्प्रोवाइज़ेशन की पद्धति से पूरी मंडली द्वारा तैयार किए जाएँ या फिर गीतों पर आधारित हों, असमानता या युद्ध के मुद्दे पर देशी-विदेशी कवियों की कविताओं को आधार बनाकर तैयार किए जाएँ। विश्वप्रसिद्ध कहानियों के नाट्य रूपांतर हों और भी बहुत कुछ। दूसरे जहाँ तक प्रस्तुति का पक्ष है तो वह कथ्य के अनुरूप आएगी ही। अपने एक लेख ‘नुक्कड़ नाटकः गतिशील सौंदर्य के तकाज़े’ मे मैंने साफ़ तौर पर लिखा है - कला समाज के लिए सिद्धांत को लेकर चलने वाले ये नाटक कलात्मक भी हैं। कला के स्तर पर इनमें विविध प्रयोग देखने को मिलते हैं। गीत, नृत्य, दृश्य संयोजन, फैंटसीपरकता, क़िस्सागोई, नट-नटी संवाद, मदारी-जमूरा संवाद, क़व्वाली का अंदाज़, फ़िल्मी धुनों का प्रयोग, लोक गीतों का प्रयोग, कोरस, कविताएँ, शेरो-शायरी से भरपूर। हास्य-व्यंग्य की धार, नयी-पुरानी कहानियों के कोलॉज की शक्ल, प्ले कार्ड, नक़ाब, मुखौटों की सहायता से नवीनता लाना, मुहावरेदारी, प्रॉपर्टी के विविध प्रयोग। कितना ही कुछ है जिसे किया भी जा चुका है और नित नया करने की संभावना बरक़रार है। नुक्कड़ नाटक एक स्थायी सौंदर्यशास्त्र का विषय नहीं है ये गतिशील सौंदर्यशास्त्र का विषय है तो प्रयोग निरंतर होंगे ही। हाँ दुहरावों से बचना भी ज़रूरी है।
मोनिका: नुक्कड़ नाटक के सौंदर्यशास्त्र के बारे में आपका क्या कहना है?
डॉ. प्रज्ञा: सौंदर्यशास्त्र को लेकर मैं अपनी बात साफ़ कह ही चुकी हूँ कि नुक्कड़ नाटक जागृत सौंदर्यबोध की विधा है। इसके राजनीति आदर्श कलात्मक आर्दश भी हैं। ये कोरे प्रचार का या नारेबाज़ी का नाटक नहीं है और दूसरे ये कलाविहीन नाटक भी नहीं है जैसा कि इस पर आरोप लगाए गए। समय ने ख़ुद इन आरोपों को बेबुनियाद सिद्ध किया है। एक बात ये भी है कि नुक्कड़ नाटक गतिशील सौदंर्यशास्त्र की विधा है। इसका कोई परंपरागत या निर्धारित तय रूप नहीं है। इसका सौंदर्यशास्त्र किसी बँधे-बँधाए ढर्रे या तयशुदा ढाँचे का सौंदर्यशास्त्र नहीं है। पिछले चार दशक से अधिक की यात्रा में कथ्य और रूप के स्तर पर इन नाटकों में विविध प्रयोग देखने को मिलते हैं जिनका ज़िक्र मैं पहले कर ही चुकी हूँ। बदलाव की ओर अग्रसर विधा है यह जो सामाजिक प्रतिबद्धता और राजनीतिक समझ से लैस है। व्यापक सामाजिक, राजनीतिक सांस्कृतिक बदलाव इसके कथ्य और रूप को परिवर्तित करते चलेंगे।
मोनिका: व्यावसायिकता के दौर में नुक्कड़ नाटक की जन-जागरूक छवि धुँधली पड़ती जा रही है, इसे केवल प्रचार का साधन माना जा रहा है। आपका इस बारे में क्या कहना है?
डॉ. प्रज्ञा: देखिए मोनिका, नुक्कड़ नाटक जागरूकता के साथ बेहतर विकल्प की दिशा मेंभी अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अपनी आरंभिक यात्रा में नाटक के क्षेत्र में कड़ी आलोचना का शिकार होने के बाद आज नुक्कड़ नाटक अपनी सशक्त पहचान बना चुका है। इस सकारात्मक प्रभाव के साथ नकारात्मक असर भी हुआ है। राजनीतिक रूप से जनवादी उद्देश्य को लेकर चलने वाले इस कला आंदोलन की लोकप्रियता को लोगों ने प्रभावित किया है। स्कूलों-कॉलेजों में इसकी ख्याति दिनों-दिन बढ़ रही है और अब व्यावसायिक हितों के लिए इसका इस्तेमाल हो रहा है। कई कंपनियाँ अपने सामान की बिक्री और प्रोमोशन के लिए नुक्कड़ नाटकों का इस्तेमाल कर रही हैं पर इस तरह के कथ्यरहित, राजनीति और जनपक्षधरता रहित नाटक भीड़ को आकृष्ट करने के गुलगपाड़े, फूहड़ नृत्य, शोरप्रधान संगीत और फिल्मी पैरोडी के भद्दे कलाहीन प्रयोग हैं जो नुक्कड़ नाटक के केवल खोल का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये न केवल नुक्कड़ नाटक के लिए घातक और ख़तरा हैं बल्कि जनता के बीच इस विधा के उद्देश्य को लेकर एक बड़ा घाल-मेल पैदा करता है। कई एन.जी.ओ. भी यही काम कर रहे हैं। आप ज़रा उनके नाटक देखें और पढ़ें। कलाहीन क़िस्म के खोखले कथ्य के नाटक हैं वे। मसलन यदि महिलाओं के अल्प पोषण पर नाटक है तो ये कहकर समाप्त हो जाता है कि पौष्टिक खाना खाओ, दवाई खाओ पर ये समस्या की तह में कभी नहीं जाएगा कि आधी आबादी को कितने पूर्वाग्रहों की वज़ह से पूरा भोजन मयस्सर नहीं, बेरोज़गारी, अशिक्षा, निजी क्षेत्र में असमान वेतन और शोषण की दास्तानें, यहाँ तक कि शौचालयों और साफ़ पानी की कमी। इन समस्याओं को ये नाटक कभी नहीं उठाएँगे। उठा ही नहीं सकते क्योंकि ये सीधे-सीधे संघर्ष और चुनौतियों की बातें हैं जबकि व्यावसायिकता विशुद्ध मनोरंजन की मुद्दारहित बात करेगी।
मोनिका: दिल्ली विश्वविद्यालय में डेढ़ दशक से अधिक का अनुभव होने और नाट्य कार्यशालाओं तथा रंगमंच पढ़ाने का तर्जुबा होने के साथ आपने कुछ समय पूर्व ‘आह्वान’ नाम की नाट्य संस्था की शुरूआत की है जो कॉलेज के विद्यार्थियों को नाटक से व्यावहारिक तौर पर जोड़ती है। इन विद्यार्थियों की नुक्कड़ नाटक से क्या अपेक्षाएँ होती हैं?
डॉ. प्रज्ञा: 2010 में किरोड़ीमल कॉलेज, जहाँ मैं पढ़ाती हूँ वहाँ मैंने हिंदी साहित्य पढ़ने वाले बच्चों के सहयोग से ‘आह्वान’ नाट्य संस्था शुरू की थी जो आज भी सक्रिय है। इस संस्था में बी.ए. प्रथम वर्ष से लेकर एम.ए. और कई पासआउट लोग भी शामिल हैं। स्कूल और कॉलेज के स्तर पर ऐसी अधिकांश संस्थाएँ प्रदर्शनकारी विधा के तौर पर ही सक्रिय रहती हैं। वहाँ बच्चा नाटक से जुड़ने का सपना लेकर आता है। और चूँकि नुक्कड़ नाटक सीमित साधनों की लोकप्रिय विधा है तो वह इससे जुड़ना पसंद करता है। हमारी संस्था में कई बच्चों की शुरूआत में कुछ अलग-सी अपेक्षाएँ थीं। बहुत से नए लोग आज भी थियेटर को मुंबई की पहली सीढ़ी मानते हैं। फिर कई को बड़े नाट्य संस्थानों में प्रवेश के लिए नाट्य प्रस्तुति के प्रमाणपत्र भी चाहिए होते हैं। बहुत से इसकी राजनीतिक माँग को नहीं समझते। ऐसे में सवालों से जूझते-टकराते हम कुछ बातों पर सहमत हैं किे साहित्य पढ़ते हुए नाटक जैसी दृश्य विधा को उसकी सम्पूर्णता में समझने के लिए नाटक करना ज़रूरी है। फिर अभिव्यक्ति की आज़ादी, साहित्य से जुड़ाव, नए प्रयोग और नए-पुराने नाटकों का मंचन, निर्देशन और एक ट्रेनिंग। इन सबके साथ हम सामाजिक-राजनीतिक सरोकारों पर भी बात करते हैं।
मोनिका: आज प्रतियोगिता के दौर में नाटक से जुड़े विद्यार्थियों का भविष्य आप किस रूप में देखती हैं?
डॉ. प्रज्ञा: मोनिका जी, जब मैंने तीसरी कक्षा में जीवन का पहला किरदार निभाया था तो मेरे मन में यही था कि बस एक्टिंग करनी है। आज भी स्कूल-कॉलेज के बच्चे की सहज और पहली प्रतिक्रिया यही है कि एक्टिंग करनी है। पर नाटक तो एक सम्पूर्ण विधा है। यहाँ बात केवल अभिनय तक सीमित नहीं। आप नाटककार बन सकते है, अच्छे स्क्रिप्ट राइटर भी बन सकते हैं, निर्देशक, गीतकार इसके अलावा बैक स्टेज के ढेर सारे काम हैं जिनके लिए देश में कई प्रशिक्षण केंद्र भी हैं। जहाँ से प्रशिक्षण लिया जा सकता है। संगीत, प्रकाश, कॉस्ट्यूम डिज़ाइनिंग बहुत से पक्ष हैं जिनसे जुड़ा जा सकता है। दूरदर्शन और आकाशवाणी के कई कार्यक्रमों में भागीदारी कर सकते हैं। वॉयस ओवर भी एक विकल्प हैं। नाटक की विधिवत् शिक्षा के बाद नाटक पढ़ाना और सिखाना भी एक बेहतर विकल्प है। आज कल शिक्षण संस्थानों में पर्फ़ोमिंग आर्ट के तहत इसकी बड़ी माँग है। ग्रीष्मकालीन नाट्य शिविरों से लेकर साल भर चलने वाली कार्यशालाओं की भी बड़ी माँग है। फिर शोध का मंच भी है। इन सबके अलावा अगर दूर के भविष्य की जगह पास के वर्तमान को देखें तो मुझे एक बातचीत के दौरान हबीब साहब (रंगकर्मी हबीब तनवीर) की बात याद आती है ‘‘नाटक हमें जीवन की सलाहियत और आज़ादी देता है।’’ मेरे ख़्याल से यही सबसे ज़्यादा ज़रूरी हैं।
मोनिका: वर्तमान संदर्भ में नुक्कड़ नाटक के औचित्य को आप किस रूप में देखती हैं?
डॉ. प्रज्ञा: आज नुक्कड़ नाटक ने वह मक़ाम हासिल कर लिया है कि नाटक का कोई भी अध्येता या विश्लेषक इसके अस्तित्व को नकार नहीं सकता। दूसरे जब पूंजीवादी नव साम्राज्यवाद को विकल्पहीन बताया जा रहा है तब विकल्पों की खोज अनिवार्य बन जाती है। देखिए मोनिका जैसे-जैसे जनसंघर्ष तीव्र होंगे नुक्कड़ नाटकों की ज़रूरत बढ़ती जाएगी। दरअसल नुक्कड़ नाटक वैकल्पिक राजनीति का सांस्कृतिक हथियार है। इतिहास गवाह है चाहे रूस का ब्लू ब्लाउज़ थियेटर हो, यूरोप का यूनिटि थियेटर या हमारे यहाँ इप्टा ओदोलन और आपात्काल का समय। जब भी परिर्वन और वैकल्पिक राजनीति की ज़रूरत सामने आएगी नुक्कड़ नाटक एक कला माध्यम के रूप में परवान चढ़ेगा।

साक्षात्कारकर्ता
मोनिका नांदल
शोधार्थी
मो. (9555245086)


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