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ISSN 2292-9754

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01.17.2018


आदिवासी साहित्य की अवधारणा

साहित्य समाज का नव सृजन करता है। समाज को नयी दशा व दिशा प्रदान करता है। बीसवीं सदी के अंत में भारत में नए सामाजिक आंदोलन दृष्टिगत हुए। दलितों, स्त्रियों, आदिवासियों व जनजातीय समुदायों ने नई एकजुटता के माध्यम से अपने प्रति शोषण का विरोध किया और संपूर्ण समुदाय की मुक्ति हेतु सामूहिक अभियान चलाया। सामाजिक राजनीतिक आंदोलन के साथ-साथ साहित्यिक आंदोलन भी इस अभियान का मुख्य हिस्सा था। दलित विमर्श और स्त्री विमर्श इसी का परिणाम है। आज़ादी के पश्चात् प्रकाश में आए अस्मितावादी विमर्शों में दलित विमर्श एवं स्त्री विमर्श के बाद सबसे नया विमर्श आदिवासी विमर्श है। अब आदिवासी चेतना से युक्त आदिवासी साहित्य हिंदी साहित्य पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है। आज आदिवासी साहित्य हिंदी के अलावा लगभग 100 आदिवासी भाषाओं में प्रचुर मात्रा में लिखा जा रहा है। दशकों के संघर्ष और प्रतिरोध के पश्चात् आज आदिवासी साहित्य को स्वायत्त विषय के रूप में केन्द्रीय परिधि में लाया जा रहा है, आदिवासी समाज व साहित्य पर निरन्तर पर चर्चा की जा रही है। किंतु आदिवासी समाज की तरह आदिवासी साहित्य का संघर्ष आज भी जारी है। आज भी आदिवासी साहित्य अनेक समस्याओं एवं चुनौतियों से जूझ रहा है। इसका प्रमुख कारण आदिवासी समाज, जीवन से बाहरी समाज का अपरिचय और उपेक्षापूर्ण रवैया है। आदिवासी समाज से संवाद करने का आदिवासी साहित्य महत्त्वपूर्ण ज़रिया हो सकता है, बशर्तें उसका सही मूल्यांकन किया जाये इस हेतु इसके बुनियादी तत्वों की समझ होना अपरिहार्य है। आदिवासी साहित्य की उचित धारणाएँ एवं मापदण्ड होने आवश्यक हैं।

इक्कीसवीं सदी के विमर्शों में आदिवासी विमर्श केन्द्र में है। जहाँ कुछ विमर्श राजनीति में पले तो कुछ अस्मिता व अस्तित्व को लेकर वाद-विवाद के विषय रहें, वहीं आदिवासी विमर्श में राजनीति और अस्मिता दोनों का समावेश है। आज आदिवासी साहित्य रचना के नाम पर लेखकों में प्रतिस्पर्धा हो रही है। ग़ैर-आदिवासी रचनाकारों द्वारा आदिवासी संस्कृति, जीवन और समाज पर आदिवासी साहित्य रचा जा रहा है, जबकि उन्हें आदिवासी दर्शन और संस्कृति की पर्याप्त जानकारी तक नहीं है। ऐसी रचनाओं को आदिवासी साहित्य कहकर प्रचारित, पाठित व वाचित किया जा रहा है, तथ्यों को नकारात्मक रूप में पेश किया जा रहा है। ऐसा साहित्य आदिवासी साहित्य को लेकर अधिकांशतः भ्रामक ही सिद्ध हुआ है। ग़ैर-आदिवासी प्रतिमानों द्वारा आदिवासी साहित्य को मूल्यांकित किया जा रहा है। दलित साहित्य की तर्ज़ पर ही आदिवासी साहित्य की सैद्धांतिकी निर्मित करने के प्रयास जारी हैं। ग़ैर-आदिवासियों का आदिवासी विषयक साहित्य भी साम्राज्यवाद विरोधी अभियान में आदिवासियों को महज़ आर्थिक संघर्ष के रूप में देखता है। सांस्कृतिक तौर पर भी आदिवासी दर्शन व साहित्य को आर्य संस्कृति में समाहित करने का प्रयास करता है। इस रचाव-बचाव के दौर में कुछ ‘आदिवासी’ साहित्यकार और बुद्धिजीवी, जिनका सामाजिक वर्ग बदल रहा है या बदल चुका है, ग़ैर-आदिवासी विश्वव्यवस्था की वर्चस्ववादी संस्कृति की शब्दावलियों का इस्तेमाल कर विमर्श को बहुत ही सूक्ष्म ढंग से आदिवासियों के ही ख़िलाफ़ ले जाने की कोशिश में लग गये हैं। व्यवस्था के पद-प्रतिष्ठा और पुरस्कारों से लदे ये बुद्धिजीवी आदिवासियों को अविकसित एवं पिछड़ा बताकर व्यवस्था के साथ सामंजस्य बनाने का सुझाव दे रहे हैं। उनके अनुसार आदिवासी समाज और साहित्य तथाकथित मुख्यधारा से अनुकूलन करके ही आधुनिक सभ्यता का लाभ उठा सकता है। इस परिदृश्य में आदिवासी साहित्य की अवधारणा एवं उसकी मूल दार्शनिक आधारभूमि को मज़बूती से रेखांकित करना अति आवश्यक है। आदिवासी साहित्य के बारें में सही समझ, सही धारणाएँ निर्मित करना आवश्यक है।

यद्यपि आदिवासी साहित्य की अवधारणा या सैद्धांतिकी पूर्णतः विकसित नहीं हुई है, इसकी प्रस्थापनाएँ अभी विमर्श के दौर से गुज़र रही हैं। आदिवासी साहित्य को समझने के लिए आदिवासियों की वाचिक परंपरा को समझना होगा, जो अत्यधिक समृद्ध है। यूँ तो स्वयं आदिवासी जीवन और समाज किसी प्रकार के शास्त्र या सिद्धांतों का बंधन नहीं मानता, परंतु आदिवासी साहित्य के बारें में भ्रमित तथ्यों एवं प्रतिमानों के समाधान हेतु कुछ बुनियादी तत्त्वों पर चर्चा करना ज़रूरी है। आदिवासी साहित्य के पाठ और समझ को नए सिरे से देखने एवं समझाने के लिए इसकी अंतर्वस्तु एवं स्वरूप की समझ होनी आवश्यक है। इस पर विचार करते समय सबसे पहले प्रश्न उठता है कि आदिवासी साहित्य किसे कहेंगे? आदिवासी दर्शन क्या है और आदिवासी साहित्य में इसका क्या महत्त्व है? आदिवासी साहित्य के अंतर्गत किन-किन रचनाकारों को रखा जाये? क्या आदिवासी साहित्य की विश्व के शेष साहित्य से कोई पृथक संकल्पना है? साथ ही यह प्रश्न कि साहित्य परम्परा में क्या आदिवासी साहित्य को पर्याप्त स्थान दिया गया है? क्या इस साहित्य को तथाकथित मुख्यधारा के साहित्य के समान्तर या विविधता के स्तर पर देखा समझा जा सकता है? उपर्युक्त सभी प्रश्न आदिवासी साहित्य की अवधारणा या स्वरूप से जुड़े हुए हैं। स्पष्ट है आदिवासी साहित्य यानी आदिवासियों द्वारा लिखा गया जिसमें आदिवासी संस्कृति, दर्शन, जीवन-शैली, प्रकृति और उनकी समस्याओं का चित्रण हो। उसे हम आदिवासी साहित्य कह सकते हैं। आदिवासी साहित्य स्वांतः सुखाय नहीं लिखा जाता। यह प्रतिबद्ध साहित्य है और बदलाव के लिए कटिबद्ध है। आदिवासी साहित्य से अभिप्राय उस साहित्य से है जिसमें आदिवासियों का जीवन व समाज उनके दर्शन के अनुरूप व्यक्त हुआ है।

कुछ आदिवासी साहित्यकारों व लेखकों ने आदिवासी साहित्य को निम्न प्रकार परिभाषित किया है-

प्रसिद्ध मराठी आदिवासी साहित्यकार डॉ. विनायक तुमराम कहते हैं - “आदिवासी साहित्य वन संस्कृति से संबंधित साहित्य है। आदिवासी साहित्य वन जंगलों में रहने वाले उन वंचितों का साहित्य है, जिनके प्रश्नों का अतीत में कभी उत्तर ही नहीं दिया गया। यह ऐसे दुर्लक्षितों का साहित्य है, जिनके आक्रोश पर मुख्यधारा की समाज-व्यवस्था ने कान ही नहीं धरे। यह गिरि-कन्दराओं में रहने वाले अन्याय ग्रस्तों का क्रांति साहित्य है। सदियों से जारी क्रूर और कठोर न्याय-व्यवस्था ने जिनकी सैंकड़ों पीढ़ियों को आजीवन वनवास दिया, उस आदिम समूह का मुक्ति-साहित्य है आदिवासी साहित्य। वनवासियों का क्षत जीवन, जिस संस्कृति की गोद में छुपा रहा, उसी संस्कृति के प्राचीन इतिहास की खोज है यह साहित्य। आदिवासी साहित्य इस भूमि से प्रसूत आदिम-वेदना तथा अनुभव का शब्दरूप है।”1

प्रसिद्ध आदिवासी एक्टीविस्ट व कवयित्री रमणिका गुप्ता कहती हैं - “मैं आदिवासी साहित्य उसी को मानती हूँ जो आदिवासियों ने लिखा और भोगा है। उसे आदिवासी समस्याओं, सांस्कृतिक, राजनीतिक व आर्थिक स्थितियों तथा उनकी जीवन-शैली पर आधारित होना होगा। अर्थात् आदिवासियों द्वारा आदिवासियों के लिए आदिवासियों पर लिखा गया साहित्य आदिवासी साहित्य कहलाता है।”2 वैसे जो आदिवासी समर्थक साहित्य के रचनाकार होते हैं, वे भी आदिवासियों की समस्याओं के हल हेतु कंधे से कंधा मिलाकर खडे़ होते हैं।

आदिवासी कथाकार रूपलाल बेदिया के अनुसार - “अगर आदिवासी विषय, दर्शन, संस्कृति के अनुकूल साहित्य ग़ैर-आदिवासी लेखक भी लिखते हैं तो उसे आदिवासी साहित्य मानना चाहिए। हमारी वाचिक परम्परा में जो समिद्ध साहित्य है उससे बहारी समाज के लेखक परिचित नहीं है। उन्हें लिखित रूप में सामने लाने की ज़रूरत है।”3

प्रो. व्यंकटेश आजाम लिखते हैं - “जो आदिवासी जीवन से प्रेरणा लेकर लिखा हुआ है, वह आदिवासी साहित्य है।”4

आदिवासी लेखिका वंदना टेटे की स्थापना है कि “ग़ैर-आदिवासियों द्वारा आदिवासियों पर रिसर्च करके लिखी जा रही रचनाएँ शोध साहित्य है, आदिवासी साहित्य नहीं। आदिवासियत को नहीं समझने वाले हिंदी-अंग्रेज़ी के लेखक आदिवासी साहित्य लिख भी नहीं सकते। सुनी-सुनाई बातों से आदिवासी जीवन का सच प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।”5

आदिवासी साहित्य की अवधारणा को लेकर आदिवासी एवं ग़ैर-आदिवासी दृष्टि में तीन तरह के मत हैं –

1. आदिवासी विषय पर लिखा गया साहित्य आदिवासी साहित्य है। यह अवधारणा ग़ैर-आदिवासी लेखकों की है। संजीव, राकेश कुमार सिंह, महुआ माजी, रमणिका गुप्ता, बजरंग तिवारी आदि इसके समर्थक रहे हैं।

2. आदिवासियों द्वारा लिखा गया साहित्य आदिवासी साहित्य है। इस अवधारणा से संबंधित साहित्यकार/लेखक जन्मना एवं स्वानुभूति के आधार पर आदिवासियों द्वारा लिखे गए साहित्य को ही आदिवासी साहित्य मानते हैं।

3. ‘आदिवासियत’ अर्थात् आदिवासी दर्शन के तत्त्वों वाला साहित्य ही आदिवासी साहित्य है। इस अवधारणा को आदिवासी साहित्य की परिभाषा के सर्वाधिक नज़दीक माना जा सकता है।

उपर्युक्त परिभाषाओं एवं मतों के आधार पर निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि जिसमें आदिवासी दर्शन होगा, वही सच्चे मायनों में आदिवासी साहित्य होगा। आदिवासी साहित्य जीवनवादी साहित्य है। आदिम समूहों में वर्गरहित, भेदभाव रहित, जाति रहित समाज-व्यवस्था करना ही आदिवासी साहित्य का उद्देश्य है। आदिवासी साहित्य की बुनियादी शर्त उसमें आदिवासी दर्शन के तत्त्वों का होना है।

सवाल उठता है कि ‘आदिवासियत’ या आदिवासी दर्शन का स्वरूप क्या है और आदिवासी साहित्य में इसकी पहचान कैसे करेंगे? इसके जवाब में कह सकते हैं कि आदिवासियों के जीवन व समाज से संबंधित प्रत्येक विशेषता, परम्पराएँ जैसे-प्रकृति के सान्निध्य में रहना, मानवेतर प्राणी जगत के साथ सह-अस्तित्व, अपने आप में खुलापन, सामूहिकता, सहभागिता, आदिवासी संस्कृति, जीवन-शैली, उनकी अपनी समस्याएँ, स्वतंत्रता, जल, जंगल, ज़मीन, अपनी मातृभाषा, अपना इतिहास, लोककथाएँ, मुहावरे, मिथक, विकास की अपनी परिभाषा इत्यादि सब आदिवासी दर्शन के अंतर्गत निहित है। जल, जंगल, ज़मीन आदिवासियों के मूल आधार हैं और आदिवासी साहित्य के मूल तत्त्व भी यहीं होने चाहिएँ। इन तत्त्वों के आधिकारिक अनुभव के साथ जो साहित्य लिखा जा रहा है, उसे हम आदिवासी साहित्य कहेंगे, किंतु जो आधिकारिक अनुभव पर आधारित नहीं है, विशुद्ध काल्पनिक है, जिसे केवल रोमांटिक नज़रिये से देखा गया है, वह आदिवासी साहित्य नहीं है। आदिवासी जीवन की गहन अनुभूति के आधार पर रचा जाने वाला साहित्य ही आदिवासी साहित्य होगा।

समतापूर्ण विश्वास, श्रम, संगीत व जीवनराग से उपजा दर्शन ही आदिवासी दर्शन है। आदिवासी दर्शन में श्रेष्ठ और निकृष्ट का कोई विभाजन नहीं है। सुंदर-असुंदर जैसी कोई मान्यता नहीं है। आदिवासी दर्शन में प्रत्येक चीज़ अभिराम है। वह सहजीविता, समानता, प्रकृति प्रेम व श्रेष्ठ जीवन मूल्यों पर आधारित है। आदिवासी संस्कृति आदिवासी जीवन और समाज का संस्कार है। इसमें प्रकृतिगत समता, उन्मुक्तता, निश्छलता, सहजता, सामूहिकता एवं शोषण मुक्तता की विशाल हृदयता है। इस संस्कृति में कोई आडम्बर एवं भेदभाव नहीं है। आदिवासी साहित्य की मूल प्रेरणा स्त्रोत् ‘प्रकृति’ निसर्ग है। आदिवासी जीवन दर्शन में सत्ता रूपी साहित्य के लिए कोई स्थान नहीं है। आदिवासी समाज रचनात्मक है तो उसका साहित्य भी सृजनात्मक है। आदिवासी जीवन दृष्टि में मनुष्य का जितना महत्त्व है, उतना ही पशु-पक्षियों, नदियाँ-पहाड़, वनस्पति, कीट-पंतग, नालों, वृक्षों, प्रकृति की प्रत्येक जड़-चेतन रचना का है।

अनिता हेड्स से अपने लेख ‘द स्ट्रेंथ ऑफ अस ऐज वूमैन: ब्लैक वूमैन स्पीक’ में आदिवासियत पर अपना विचार रखती है कि “आदिवासियों के आदिवासियत को न तो आप वर्गीकृत कर सकते हैं, न ही किसी मानक से नाप सकते हैं, क्योंकि यह तो विरासत में मिला हुआ वह गुण है जिसे कोई भी अस्वीकार व ख़ारिज नहीं कर सकता है। किसी व्यक्ति की आदिवासियत को आप इस बात से भी तय नहीं कर सकते कि उसमें आदिवासी खून कितना है?”6

आदिवासी साहित्य का स्वरूप व्यापक है। इस साहित्य में विद्रोह है, वेदना है, अभिव्यक्ति है, नकार है। आदिमों के सर्वांगीण विकास के प्रश्न को लेकर यह स्थापित समाज व्यवस्था को ललकारता है। जो जीवन मूल्य आदिवासियों के नहीं है या विरोधी है, यह साहित्य उन्हें अस्वीकारता हैं। आदिवासी लेखन तथाकथित मुख्यधारा के रंगभेद व नस्लीय छद्म साहित्य के मानदंडों को नकारते हुए धीरे-धीरे स्वयं के प्रतिमान गढ़ रहा है। इसकी अपनी भावभूमि है, सौंदर्य बोध है, विश्वदृष्टि है। सामूहिक मूल्यों एवं सहअस्तित्व में अटूट विश्वास ही उसकी विशेषता है। आदिवासी दर्शन में प्रकृति और पुरखों के प्रति आभार का भाव निहित होता है। यह साहित्य समूचे जीव-जगत को समान महत्त्व देकर मनुष्य की श्रेष्ठता के दंभ को ख़ारिज करता है। आदिवासी साहित्य की कोई केन्द्रीय विधा नहीं है। अन्य साहित्यों की तरह उसमें आत्मकथात्मक लेखन भी उपलब्ध नहीं होता क्योंकि आदिवासी समाज ‘मैं’ में नहीं ‘हम’ में विश्वास करता है। उसकी अभिव्यक्ति प्रतीकों के माध्यम से होती है। वह सामूहिकता की बात करता हैं ‘हम’ की चिंता करता है। इसलिए आदिवासी लेखकों ने अपने संघर्ष में कविता को मुख्य हथियार बनाया है। आदिवासी साहित्य अपने दायरे में अन्य उत्पीड़ित अस्मिताओं के प्रति संवेदनशील है। इसके अंतर्गत शब्द, नृत्य, गीत, संगीत, चित्र, प्रकृति और समूची समष्टि समाहित है। साहित्य समुच्च्य है इन सभी अभिव्यक्तियों का। आदिवासी समाज में सृष्टि ही सर्वोच्च नियामक है। उसके दर्शन में सत्य-असत्य,सुंदर-असुंदर, अच्छा-बुरा, छोटा-बड़ा, दलित-ब्राह्मण, मनुष्य-अमनुष्य जैसी कोई विशिष्ट अवधारणा नहीं है।

आदिवासी दर्शन और साहित्य की अवधारणा है - “सृष्टि सर्वोच्च नियामक सत्ता है। संपूर्ण सजीव और निर्जीव जगत तथा प्रकृति सबका अस्तित्व एक समान है। मनुष्य का धरती, प्रकृति और सृष्टि के साथ सहजीवी संबंध है।”7

“आदिवासी साहित्य मूलतः वाचिकता है। वाचिकता में ही आदिवासी दर्शन का प्रवाह है। आदिवासी दर्शन के प्रवाह को संरक्षित, प्रसारित और साझा करने वाला तथा अपनी मूलभाषाओं में व्यक्त होने वाला साहित्य ही आदिवासी साहित्य है। आदिवासी दर्शन और उसकी वाचिकता को जाने-समझे बग़ैर, आदिवासी भाषा-संस्कृति की अज्ञानता के साथ रचा जा रहा साहित्य आदिवासी साहित्य नहीं है। दर्शन, वाचिकता और भाषा के अनुपस्थित होते ही आदिवासी दुनिया भी ‘अदृश्य’ हो जाती है।”8 आदिवासी दर्शन सहानुभूति या स्वानुभूति की बजाय सामूहिक अनुभूति में विश्वास करता है। उनके जीवन दर्शन में श्रम की महत्ता है, नैतिकता है, न्याय है, सामुदायिक एकता है। चूँकि आदिवासियों का प्राचीन साहित्य अलिखित है जो मौखिक परंपरा के अंतर्गत आता है। इसी साहित्य में उनका जीवन दर्शन निहित है जिसे लिखित होने के अभाव में कभी देखने का प्रयास नहीं किया गया। इसी मौखिक परंपरा का पुनर्पाठ करने की ज़रूरत है। आदिवासी दर्शन यह बतलाता है कि प्रकृति का उतना ही उपभोग करो जितना जीवन के लिए ज़रूरी है, विकासात्मक प्रक्रिया की होड़ में और अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के लिए प्रकृति को नष्ट मत करो। यदि इसी प्रकार प्रकृति का अँधाधुँध दोहन होता रहा तो शीघ्र ही मानव सभ्यता अपने विनाश के कगार पर पहुँच जायेगी और इस संकट से संपूर्ण विश्व को आदिवासी दर्शन ही बचा सकता है। आदिवासी दर्शन कहता है - प्रकृति का संरक्षण करो। प्रकृति बची रहेगी तो तुम भी बचे रहोगे। आदिवासी सामूहिक जीवन को महत्त्व देता है जबकि अन्य संस्कृतियाँ व्यक्तिवादी हैं। उनमें हड़पने या धोखा देने की प्रवृत्ति लेशमात्र नहीं है। वे मूल्यों से भी लैस है और असीम भी। उनका लोक साहित्य मुख्यधारा के साहित्य से कही विशाल व विशद् है। नाच-गान, प्रकृति इसका नैसर्गिक पहलू है। आदिवासी लेखक अपनी आदिवासियत की बहुमूल्य शैली के प्रति रूझान रखकर ही आदिवासी साहित्य का सृजन कर सकता है। उसे अपने साहित्य के लिए आदिवासी जीवन मूल्यों व कथन, भाषा शैली, आदिवासियत तत्त्वों को सायास ढूँढने की ज़रूरत नहीं होगी, वे स्वतः उसके लेखन में आ जाएँगे।

आदिवासी साहित्य आदिवासियों को सम्मान से जीने, अपनी पहचान बनाने, अपनी लड़ाई खुद लड़ने, अपनी बात कहने एवं संगठित होने के लिए प्रेरित करता है। अर्थात् अप्प दीपों भव। यह सूत्र हाशिए के संपूर्ण साहित्य पर लागू होता है। अपने अंदर की सामाजिक व्यवस्था और बाहर से थोपी जा रही संस्कृति के बीच भी आदिवासी साहित्य सजग है। यह अपनी सामुदायिक अस्मिता, अस्तित्व, संस्कृति, संघर्ष के लिए तो जागृत है ही, परंपरागत अधिकारों की प्राप्ति हेतु जारी संघर्ष की भी पुरज़ोर अभिव्यक्ति है। आदिवासी साहित्य पर संकीर्णता के आरोप लगाना व्यर्थ है क्योंकि वह मानव जीवन की मुक्ति या जीवन के यथार्थ से कट नहीं जाता, अपितु अब तक उपेक्षित मानव मुक्ति के संघर्ष को स्पष्ट रूप से देखने का प्रयास करता है। आदिवासी साहित्य अब तक के अनदेखे मानवीय संघर्ष, आकांक्षा, व्यथा के रंग, रूप, आकार, एवं मानव गंध को देखने, महसूसने की दिशा में अगला क़दम है। यह मानव सभ्यता एवं संस्कृति के विकास में बलपूर्वक अनुपस्थित दर्ज किए गये आदिवासियों एवं जनजातीय समूहों की अपस्थिति को रेखांकित करने वाला साहित्य विमर्श है। तथाकथित सभ्य ज्ञान या अनुभव संसार एवं संस्कार से इस साहित्य को तौलना व्यर्थ है। यह मुट्ठीभर रचनाकारों की साहित्यिक कुंठा का विस्फोट भर नहीं है, बल्कि समस्त मानव की मुक्ति का साधन है। साहित्य जीवन को देखने का अलग दृष्टिकोण एवं अनुभव देकर मनुष्य को दृष्टिसंपन्न बनाता है, आदिवासी साहित्य का भी यही उद्देश्य है लेकिन आदिवासी वातावरण में विकसित अपने नज़रिये से। अतः सभ्य समाज के बनाए मापदण्डों से इसको मापना एवं परिभाषित करना सर्वथा ग़लत है।

आदिवासियों को ग़ैर-आदिवासियों द्वारा जंगली, बर्बर, मूर्ख, भोला या बुद्धू की संज्ञा देकर उनमें हीन भावना विकसित कर दी कि वे पिछड़े हैं तथा किसी क़ाबिल नहीं हैं। आदिवासी साहित्य उन्हें इस हीनग्रंथि से मुक्त कराने का हथियार है, चेतना जागृत करने का प्रमुख स्त्रोत् है, आत्मविश्वास जगाने का ज़रिया है। आदिवासियों में स्वायत्त प्रतिरोध की संस्कृति है, सामाजिक स्वायत्तता भी है। यह संगठन के स्तर पर, राजनीतिक स्वायत्तता के स्तर पर दिखती है। उसका एक ढाँचा है जिसे आदिवासी परंपरा से जीता चला आ रहा है। इस परंपरा से छेड़छाड करने वालों का आदिवासी प्रखर विरोध करते हैं। आदिवासियों में प्रतिरोध की परंपरा यहीं से विकसित होकर चली आ रही है। आदिवासी समाज के जीवन दर्शन और मुख्यधारा के दर्शन में कोई समानता नहीं है। वह अर्थ केंद्रित और शास्त्र शासित समाज भी नहीं है। आदिवासी साहित्य तथाकथित मुख्यधारा में न अपना और न ही दुनिया का कोई भविष्य देखता है। दोनों दो सामाजिक-आर्थिक अवस्थाओं के प्रतिनिधि हैं। अतः अभिव्यक्ति व साहित्य के स्वरूप और अवधारणाएँ कैसे एक हो सकती हैं। हर समाज के पास अपनी कलात्मक अभिव्यक्तियाँ होती हैं, अपने प्रतिमान होते हैं और होने भी चाहिएँ जिनके आधार पर उनका स्पष्ट व निष्पक्ष मूल्यांकन हो सके। चूँकि आदिवासी समाज का दुःख, समस्या का संदर्भ अलग है, इसलिए आदिवासी साहित्य की धारा भी अलग है। इस साहित्य को आदिवासी विशेषताओं का संशोधन ही समझना चाहिए। सिर्फ साहित्य का नहीं बल्कि आदिवासी समूह और जीवन का संशोधन।

आदिवासी साहित्य की मुख्य विशेषता है ग़ैर-आदिवासी साहित्यकारों के घेरे में कैद आदिवासी साहित्य विमर्श को ‘आदिवासियत’ के खुले और उन्मुक्त प्राकृतिक सांस्कृतिक स्थल में ले आना, ग़ैर-आदिवासी साहित्यिक प्रवक्ताओं द्वारा लिखित भ्रामक कथ्य-तथ्य से असहमति व्यक्त करना एवं आदिवासी साहित्य व समाज के कोरस को आदिवासी विश्वदृष्टिकोण से दुनिया के साथ साझा करना। अनुभव की प्रामाणिकता से युक्त आदिवासी अभिव्यक्ति का यह पाठ उस साहित्य के पुनर्पाठ का भी निकष बनता है, जिसकी रचना आदिवासी रचनाकारों से इतर लेखकों ने की है। अभिप्राय यह है कि आदिवासी विमर्श उन ग़ैर-आदिवासी लेखकों को ख़ारिज नहीं कर सकता जिन्होंने आदिवासी समाज और जनजातियों के वास्तविक जीवन यथार्थ को साहित्य का विषय बनाया। फिर भी दोनों प्रकार के लेखकों में कुछ बुनियादी अंतर है।

वरिष्ठ आदिवासी चिंतक रोज केरकेट्टा आदिवासी एवं ग़ैर-आदिवासी लेखकों के साहित्य में अंतर स्पष्ट करती हुई कहती है - “ग़ैर-आदिवासी द्वारा रचित आदिवासी विषयक साहित्य में शिल्प है परन्तु आदिवासी आत्मा नहीं है। उसमें सर्जक अपनी दृष्टि से अच्छाई-बुराई का कलात्मक विवरण रखता है, लेकिन आदिवासियों का सच उससे अलग है।”9

वंदना टेटे अपनी पुस्तक ‘आदिवासी साहित्यः परंपरा और प्रयोजन’ में आदिवासी साहित्य संबंधी प्रचलित तीन धारणाओं - उसके लोक साहित्य होने, अनगढ़ होने और प्रतिरोध का साहित्य होने का खंडन करती हैं तथा आदिवासी संस्कृति, जीवन-दर्शन व उनके विश्व दृष्टिकोण के प्रति एक नई आत्मीय दृष्टि की माँग करती हैं। उनकी स्थापना है कि दलित साहित्य की तर्ज़ पर आदिवासी साहित्य वेदना और प्रतिरोध का साहित्य नहीं है। वे लिखती हैं - “आदिवासी साहित्य मूलतः सृजनात्मकता का साहित्य है। यह इंसान के उस दर्शन को अभिव्यक्त करने वाला साहित्य है जो मानता है कि प्रकृति और सृष्टि में जो कुछ भी है, जड़-चेतना, सभी कुछ सुंदर है। ....... वह दुनिया को बचाने के लिए सृजन कर रहा है। उसकी चिंताओं में पूरी सृष्टि, समष्टि और प्रकृति है।”10 वे कहती हैं कि प्रतिरोध का साहित्य वर्तमान सत्ता के ख़िलाफ़ लड़ने वालो की ‘सत्ता’ स्थापित करना चाहता है लेकिन आदिवासी साहित्य में ऐसी कोई कामना दूर-दूर तक नहीं है। टेटे आदिवासी साहित्य की प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में चर्चित है।

आदिवासी साहित्य संबंधी एक भ्रामक तथ्य यह भी है कि आदिभाषाओं में रचित साहित्य को आदिवासी साहित्य मानें या नहीं। इस संदर्भ में तर्क यह है कि अव्वल तो हिंदी आदिवासियों की मातृभाषा नहीं है, द्वितीय आदिवासी साहित्य की परंपरा मूलतः मौखिक रही है, जिसे पुरखौती साहित्य कहा जाता है। इसकी भाषा-शैली आदिवासियों की अपनी भाषा रही है। इसके माध्यम से ही वे स्वयं को अभिव्यक्त करते रहे हैं। आदिवासी भाषाओं में लिखित साहित्य आदिवासी साहित्य श्रेणी में ही आयेगा। केवल हिंदी में लिखित साहित्य को आदिवासी साहित्य मानना निराधार है। डॉ. विनायक तुमराम का कथन है कि - “सही अर्थ में आदिवासी साहित्य का प्रेरणा स्त्रोत् उनकी संस्कृति और बोली (भाषा) है। अतः भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक विशेषताओं समेत आदिवासियों की विविध बोली भाषाओं में अभिव्यक्त लोक साहित्य और लिखित साहित्य ही सही अर्थ में आदिवासी साहित्य होगा।”11 आदिमों की लोकभाषा, उसकी शब्द-संपत्ति और अर्थ-वैभव आदिवासी साहित्य के शक्ति - स्त्रोत् है। इस साहित्य में आदिमों की विविध बोलियों (भाषाओं), उनके पुरखौती साहित्य, आदिम गीतों, उनकी लोककलाओं जैसे नृत्य, गायन, वादन, उनके प्रश्न, समस्याओं, सुख-दुःख, आशा-आशंका, व्यथा-वेदना का लेखन है तो आदिम-संस्कृति को नष्ट करने के लिए रचे गए षड्यंत्रों का भी चित्रण मिलता है। आदिवासी जीवन की प्रभावी अभिव्यक्ति उनकी मातृभाषाओं में ही बेहतर हो सकती है। आदिवासी रचनाकार अपने लेखन में भोगा हुआ सत्य व यथार्थ और साथ ही अपने समाज की वैयक्तिक-सामाजिक जीवन संघर्ष की समस्याओं को चिन्हित करता है। आदिवासी दर्शन व साहित्य के शिल्प एवं सौंदर्य बोध को बेहतर रूप से जानने समझने, उससे संवाद करने के लिए आदिवासी समाज की लंबी परंपरा, संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, उसका अतीत, वर्तमान, संपूर्ण जीवन, भविष्य की अपेक्षाओं व आकांक्षाओं को समझना और सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त होना अत्यंत आवश्यक है।

आदिवासियों का कोई लिखित इतिहास नहीं रहा है। उनका अपना सारा साहित्य हमेशा उनकी बोलियों में उनके कहानी-क़िस्सों में, उनके नृत्य-संगीत में, उनके वादन में पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा है। वास्तविकता यही है कि यह सदैव ग़ैर-आदिवासियों द्वारा ही लिखा जाता रहा है और तोड़ा-मरोड़ा गया है। आदिवासियों की अपनी अलग संस्कृति, परम्परा, रहन-सहन रहा है। इनकी लड़ाई हमेशा जल, जंगल, ज़मीन की लड़ाई रही है। आदिवासियों द्वारा लिखा जा रहा साहित्य मात्र समाजशास्त्रीय क़िस्म का लेखन या सब्लार्टन लेखन का विस्तार भर नहीं हैं, बल्कि कहा जा सकता है कि वंचितों, अपेक्षितों के मुँह खोलने से भारतीय समाज की अधूरी अभिव्यक्ति अब पूर्णता प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर हो रही है। जनतांत्रिक देश में अपने भाषाई एवं सांस्कृतिक अधिकारों के अस्तित्व का संघर्ष एवं विचार विमर्श तो होना ही चाहिए ताकि समाज की विभिन्न परतों को समझा जा सके और उनका विकास किया जा सके। आदिवासी साहित्य में तिरस्कार शोषण, भेदभाव के विरोध एवं ग़ुस्से का ही स्वर उभर रहा है। विकास के तथाकथित दैत्य से दो-दो हाथ हो लेने का जज़्बा भी इसमें है। चूँकि भेदभाव से पूर्ण, असंतुलित विकास का सबसे बुरा असर आदिवासी समाज पर हो रहा है इसलिए इसकी सार्थक अभिव्यक्ति भी यहीं से होगी, क्योंकि आदिवासी समाज आज किसी भी भारतीय समाज के मुक़ाबले हर तरह से जीवन के समस्त मोर्चों पर अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है। आदिवासी साहित्य में जितनी तरह के विविधतापूर्ण मानवीय समस्याओं एवं जिजीविषा के प्रश्न उठाए जा रहे हैं, उतने कहीं नहीं। इसलिए आशा की जानी चाहिए कि आदिवासी साहित्यकार इन प्रश्नों, समस्याओं एवं मुद्दों को अधिक से अधिक क़लमबद्ध करें। यह साहित्य समाज में, इतिहास में अपने अस्तित्व की रक्षा के अतिरिक्त यह प्रश्न करता है कि साहित्य में उसकी मुक्ति का संघर्ष कहाँ है? साहित्य के दर्पण में उसका चेहरा कहाँ और कैसा है? सभ्य समाज के लोग अधिकतर आदिवासी समाज को अपने रंगीन चश्में से ही देखना पसंद करते हैं, लेकिन आदिवासी रचनाकार स्वयं को कैसा देखना चाहता है? साहित्य में कैसा दिखना चाहता है? इस प्रश्न से जूझना आदिवासी साहित्य का संघर्ष है, ऐसे में आदिवासी रचनाकार की भूमिका चुनौतियों से भरी पड़ी है। सदियों पुराना आदिवासी साहित्य जो लोक कला एवं परम्परागत लोकगाथाओं के रूप में सदा विद्यमान रहा है, उसकी रक्षा का दायित्व आदिवासी साहित्यकारों को ही वहन करना है।

चूँकि लिखित मुख्यधारा के साहित्य-समाज में आदिवासियों की अभिव्यक्ति को अल्प स्तर पर रखा गया है, तो यहाँ स्वानुभूति बनाम सहानुभूति की बहस से इतर अनुभव की आधिकारिकता का प्रश्न उठता है। इस संदर्भ में हरिराम मीणा जी का कथन उल्लेखनीय है - “कोई लेखक जन्मना आदिवासी है कि नहीं यह महत्वपूर्ण है, लेकिन यदि कोई ग़ैर-आदिवासी लेखक अपने आदिवासी जीवन के आधिकारिक अनुभव के आधार पर साहित्य रच रहा है तो ऐसी साहित्यिक अभिव्यक्ति आदिवासी साहित्य की श्रेणी में आयेगी इसलिए हमारा यह आग्रह नहीं है कि जो जन्मना आदिवासी नहीं है वो आदिवासी साहित्य नहीं रच सकता। सवाल आधिकारिक अनुभव का है, आधिकारिक अनुभव का मतलब है उसके भौतिक जीवन, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पहलू की अभिव्यक्ति क्या है? उसकी मानसिकता, भौगोलिक अंचल, परिवेश किस तरह के हैं? उसका ज़मीन, आसमान, हवा, पानी जंगल, पहाड़, नदियों संपूर्ण प्रकृति के साथ संबंध क्या है? तब उस रचनाकार को आदिवासी जीवन का आधिकारिक अनुभव होगा।”12

कहा गया साहित्य समाज का दर्पण होता है लेकिन जब मुख्यधारा के साहित्य को देखते है तो यह अर्द्धसत्य प्रतीत होता है। क्योंकि हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य में आदिवासी समाज-जीवन न के बराबर है। निस्संदेह आज के लिखित आदिवासी साहित्य में मूल स्वर विद्रोह (असहमति) का है। परंतु कुछ ग़ैर-आदिवासी रचनाकारों के साथ आदिवासी रचनाकारों के साहित्य में ‘वेदना’ पर ज़ोर है। औपनिवेशिक काल से अब तक लिखित व मौखिक आदिवासी साहित्य में असहमति का स्वर ही निरंतर तीखा हुआ है। आदिवासी बाहरी समाज के जटिल पेंचों को बख़ूबी नहीं समझ पाए। इसलिए आदिवासी साहित्य के नाम पर बाहरी लोग मज़े लूट रहे हैं। आदिवासी साहित्य चौतरफ़ा हमलों की चपेट में है। आदिवासी समुदाय में नवीन साहित्य की अवधारणा की निर्मिति के पीछे मुख्य वजह है आदिवासियों के विश्वास के साथ छलावा। वे सदैव प्रपंचों, शोषण, अन्याय का शिकार होते रहे हैं। अपने ही जल, जंगल, ज़मीन से प्रतिबंधित किया जाना, सभ्य समाज द्वारा शोषण, विकास के नाम पर विस्थापन, उनकी सभ्यता संस्कृति को मिटा देने का प्रयास आदि को आदिवासी बुद्धिजीवी वर्ग धीरे-धीरे समझने लगा है। इन सबका विरोध कर असहमति व्यक्त करने एवं जन-जन तक अपनी बात पहुँचाने के लिए आदिवासी भाषाओं में लिखित साहित्य को अपना माध्यम व आधार बना रहे हैं। आदिवासी साहित्य लेखन से आदिवासी लोगों में चेतना जागृत हुई और ग़ैर-आदिवासी रचनाकारों के साथ-साथ आदिवासी साहित्यकार भी विविधतापूर्ण लेखन कार्य कर पारंपरिक आलोचकों और बुद्धीजीवियों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। शिक्षा के कारण उनमें चेतना विकसित हुई है। नब्बे के दशक के पश्चात् हिंदी एवं आदिभाषी भाषाओं में लेखकों की उल्लेखनीय संख्या दिखाई देती है। रामदयाल मुंडा, मंजू ज्योत्सना, हेराल्ड एस तोपनो, वाल्टर भेंगरा ‘तरूण’, मंगल सिंह मुंडा, सिकरादास तिर्की (मुंडारी भाषा), निर्मला पुतुल, बाबूलाल मुर्मू आदिवासी, शिशिर टुडु, आदित्य मित्र ‘संताली’ (संताली भाषा), रोज केरकेट्टा, वंदना टेटे, सरोज केरकेट्टा, जोवाकिम टोपनो, ग्लोरिया सोरेंग (खड़िया भाषा), एलिस एक्का, पीटर पॉल एक्का, जेम्स टोप्पो, महोदव टोप्पों, ग्रेस कुजुर (कुडुख भाषा), भुजंग मेश्राम, वाहरू सोनवणे, विनायक तुमराम, महादेव हांसदा (मराठी), निर्मल मिंज, दयामनी बारला, इग्नाशिया टोप्पो, वासवी कीड़ो, लटारी कवडू मडावी, परिमल हैम्ब्रम, जेवियर कुजुर, जसिंता केरकेट्टा, सुनील मिंज, अनुज लुगुन, ग्लैडसन डुंगडुंग, फिलिप कुजुर, सुषमा असुर, दमयन्ती सिंकू, फ्रांसिस्का कुजुर, शांति खलखो, बिटिया मुर्मू, हरिराम मीणा, शंकर लाल मीणा, लक्ष्मण गायकवाड़ इत्यादि आदिवासी रचनाकार अपनी मातृभाषा के साथ हिंदी में भी विविधतापूर्ण लेखन कार्य कर आदिवासी जीवन के संघर्ष व प्रतिरोध को स्वर प्रदान कर रहे हैं।

आज भाषा के आधार पर आदिवासी साहित्य तीन स्तर पर लिखा जा रहा है। पहला अंग्रेज़ी दूसरा हिन्दी या अन्य आधुनिक भारतीय भाषाओं और तीसरा आदिवासी भाषाओं में। किन्तु इसमें दो राय नहीं कि अपनी मातृभाषा में ही श्रेष्ठ लेखन किया जा सकता है। आदिवासी साहित्य का भविष्य निराशाजनक नहीं है क्योंकि इसमें जल, जंगल, जीवन एवं ज़मीन से जुड़ी भावनाएँ स्थानीयता को समझने की वैश्विक दृष्टिकोण एवं समझदारी तो देती ही हैं, इसके विपरीत वैश्विक दृष्टिकोण को समझने की स्थानीयता भी। इसलिए एक अनजान आदिवासी गाँव से चलकर पूरे विश्व में फैल जाने की विस्तृत मानवीय संवेदना, आकांक्षा और संभावना आदिवासी साहित्य में सिमटी पड़ी है, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता।

डॉ. गंगासहाय मीणा के अनुसार - “आदिवासी साहित्य अपनी रचनात्मक ऊर्जा आदिवासी विद्रोह की परंपरा से लेता है। 1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण की नीतियाँ तेज़ हुई। आदिवासी शोषण की प्रक्रिया के प्रतिरोध स्वरूप आदिवासी अस्मिता और अस्तित्व की रक्षा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पैदा हुई रचनात्मक ऊर्जा आदिवासी साहित्य है। इसमें सैंकड़ों भाषाएँ बोलने वाले देश भर के आदिवासी रचनाकार बढ़-चढ कर हिस्सा ले रहे है। इसका भूगोल, समाज, भाषा, संदर्भ से शेष साहित्य से उसी तरह पृथक है जैसे स्वयं आदिवासी समाज यह आदिवासी साहित्य की अवधारणा के निर्माण का दौर है। आदिवासी साहित्य अस्मिता की खोज, दिकुओं द्वारा किये जा रहे शोषण के विभिन्न रूपों के उद्घाटन तथा आदिवासी संकटों और उसके ख़िलाफ़ हो रहे प्रतिरोध का साहित्य है।”13 परंपरा और आधुनिकता का, विकास और विनाश का, मुख्यधारा की संस्कृति और आदिवासी मूल्यबोध का, अस्तित्व, पहचान और अस्मिता के द्वन्द्व के बीच आदिवासी साहित्य, संस्कृति, राजनीति की नई स्थापना बन रही है। आदिवासी साहित्य की कसौटी प्रचलित सौंदर्यशास्त्र के आधार पर तय नहीं की जा सकती। इसलिए आदिवासी साहित्यकारों को ही नई अवधारणा विकसित करनी होगी। इस दृष्टि से 14-15 जून को रांची (झारखण्ड) में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार ‘आदिवासी दर्शन और समकालीन आदिवासी साहित्य’ उल्लेखनीय व महत्त्वपूर्ण है, जहाँ संपूर्ण भारत के आदिवासी लेखकों एवं साहित्यकारों ने आदिवासी साहित्य की अवधारणा के ठोस रूप में 15 सूत्रीय घोषणा-पत्र प्रस्तुत किया, जिसे ‘आदिवासी साहित्य का रांची घोषणा-पत्र’ के तौर पर जाना जा रहा है। इसके अनुसार आदिवासी दर्शन युक्त साहित्य ही आदिवासी साहित्य है। आदिवासी साहित्य की अवधारणा निर्मिति में यह एक महत्त्वपूर्ण कदम है। इस घोषणा-पत्र के सूत्र निम्नलिखित है:-
1. प्रकृति की लय-ताल और संगीत का जो अनुसरण करता हो।
2. जो प्रकृति और प्रेम के आत्मीय संबंध और गरिमा का सम्मान करता हो।
3. जिसमें पुरखा-पूर्वजों के ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल और इंसानी बेहतरी के अनुभवों के प्रति आभार हो।
4. जो समूचे जीव जगत की अवहेलना नहीं करें।
5. जो धनलोलुप और बाज़ारवादी हिंसा और लालसा का नकार करता हो।
6. जिसमें जीवन के प्रति आनंदमयी अदम्य जिजीविषा हो।
7. जिसमें सृष्टि और समष्टि के प्रति कृतज्ञता का भाव हो।
8. जो धरती को संसाधन की बजाय माँ मानकर उसके बचाव और रचाव के लिए ख़ुद को उसका संरक्षक मानता हो।
9. जिसमें रंग, नस्ल, लिंग, धर्म आदि का विशेष आग्रह न हो।
10. जो हर तरह की ग़ैर-बराबरी के ख़िलाफ़ हो।
11. जो भाषाई और सांस्कृतिक विविधता और आत्मनिर्णय के अधिकार पक्ष में हो।
12. जो सामंती, ब्राह्मणवादी, धनलोलुप और बाज़ारवादी शब्दावलियों, प्रतीकों, मिथकों और व्यक्तिगत महिमामंडन से असहमत हो।
13. जो सहअस्तित्व, समता, सामूहिकता, सहजीविता, सहभागिता और सामंजस्य को अपना दार्शनिक आधार मानते हुए रचाव-बचाव में यक़ीन करता हो।
14. सहानुभूति, स्वानुभूति की बजाय सामूहिक अनुभूति जिसका प्रबल स्वर-संगीत हो।
15. मूल आदिवासी भाषाओं में अपने विश्वदृष्टिकोण के साथ जो प्रमुखतः अभिव्यक्त हुआ हो।

वरिष्ठ आलोचक प्रो. वीरभारत तलवार ने 1978 में अपने एक लेख में यह प्रश्न उठाया था कि समाज और इतिहास को तथा घटनाओं को देखने की, साहित्य को देखने की क्या कोई आदिवासी विश्वदृष्टि है? उन्होंने यह प्रश्न साहित्य के संदर्भ में ही नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक राजनैतिक संदर्भ में उठाया था जिसका कोई उत्तर नहीं मिला। किंतु आदिवासी साहित्य की अवधारणा के संदर्भ में आज इस सवाल को पुनः उठाया जा रहा है। उनकी दृष्टि में आदिवासी साहित्य की चार श्रेणियाँ बनाई जा सकती हैं। प्रथम श्रेणी में आदिवासियों के प्रति उद्धारक दृष्टिकोण रखने वाले लेखक व उनका साहित्य आता है जो आदिवासी समाज के बारे में बहुत सतही जानकारी रखते हैं तथा सवर्ण हिंदु संस्कारों, सामाजिक सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हैं और उसी को चित्रित करते हैं। यह आदिवासी चित्रण की सबसे घटिया क़िस्म की दृष्टि है। दूसरी श्रेणी के लेखक वे हैं जो लम्बी अवधि से उनके क़रीब रहते आए हैं, पर साथ नहीं। इसलिए इस साहित्य में आदिवासी समाज की प्रमुख प्रवृत्तियाँ, उनके प्रति सहानुभूति, दमन, शोषण, उत्पीड़न का चित्रण व अन्य समस्याओं का चित्रण तो अवश्य मिलता है लेकिन समाज का अंदरूनी चित्र, उनका सांस्कृतिक मानस, उनके अंतर्द्वंन्द्व और तनाव इसमें नदारद या बहुत कम मिलते हैं। तीसरी श्रेणी में उन लेखकों का साहित्य है जिन्होंने लम्बे समय तक आदिवासियों के बीच उनके साथ रह कर उनकी प्रवृत्तियों, परम्पराओं, अच्छी बुरी स्थितियों, जीवन मूल्यों, मानसिक सांस्कृतिक अंतर्द्वंन्द्व व तनावों को समझने का प्रयास किया है और इसी का चित्रण अपने साहित्य में किया है। अंतिम श्रेणी में ख़ुद आदिवासियों द्वारा लिखा गया साहित्य आता है। फिर चाहे अपनी मूल भाषाओं में लिखा गया साहित्य हो या हिंदी या अन्य किसी भाषा में। आदिवासी समाज और जीवन के सच्चे व विश्वसनीय चित्र इसी साहित्य में मिलते हैं। आदिवासी समाज का अंदरूनी चित्र है, उनका जो सांस्कृतिक मानस और उसकी बनावट हैं, उनके अपने जो तनाव और अंतर्द्वंन्द्व है, वे आपको आदिवासियों की रचनाओं में ही मिलेगें। यह आदिवासी साहित्य की सर्वोत्तम व गुणवत्तापूर्ण श्रेणी है।

आदिवासी साहित्य मुख्यधारा की संस्कृति के दायरे से बाहर रहकर आदिवासियों के जीवन को व्यक्त करने वाला, उनकी संस्कृति, परम्पराएँ, संघर्ष, इतिहास को एक स्तर से ऊपर उठाने वाला साहित्य है। यह ग़ैर-आदिवासी समाज से पृथक है। इसे मात्र आदिवासी दृष्टिकोण से ही जाना-समझा जा सकता है। ग़ैर-आदिवासी समाज जब आदिवासी जीवन को आधार बनाकर साहित्य रचता है तो उसके विचार एवं संस्कार के संक्रमण का भय बना रहता है। इसे मात्र अध्ययन के द्वारा समझना संभव नहीं है, इसके लिए आदिवासी समाज के साथ रहना और जीना आवश्यक है। इसके बिना आदिवासी जीवन पर साहित्यिक मूल्यांकन करना कोरा बुद्धिविलास ही होगा।

संदर्भ सूची:-

1. सं. रमणिका गुप्ता, आदिवासी साहित्य यात्रा, संस्करण 2016, पृ.सं. 24
2. सं. डॉ. उषाकीर्ति, डॉ. सतीश पाण्डेय, डॉ. शीतलाप्रसाद दुबे,आदिवासी केन्द्रित हिंदी साहित्य, प्रथम संस्करण 2012, पृ.सं. 30
3. सं. वंदना टेटे, आदिवासी दर्शन और साहित्य, संस्करण 2016, पृ.सं. 24
4. सं. खन्नाप्रसाद अमीन, आदिवासी साहित्य, पृ.सं. 24
5. आदिवासी साहित्य पर जे.एन.यू. में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिये गये व्याख्यान से
6. आदिवासी साहित्य विकीपीडिया पेज से
7. सं. वंदना टेटे, आदिवासी दर्शन और साहित्य, संस्करण 2016, पृ.सं. 34
8. वही., पृ.सं. 49
9. सं. वंदना टेटे, एलिस एक्का की कहानियाँ, राधाकृष्ण प्रकाशन, प्र.सं. 2015, पृ.सं. 22
10. वंदना टेटे, आदिवासी साहित्य: परम्परा और प्रयोजन, प्रथम संस्करण 2013, पृ.सं. 87
11. सं. रमणिका गुप्ता, आदिवासी साहित्य यात्रा, संस्करण 2016, पृ.सं. 29
12. सं. रमणिका गुप्ता, हरिराम मीणा जी का साक्षात्कार, युद्धरत आम आदमी, अंक 13, नव. 2014, पृ.सं. 64
13. सं. खन्नाप्रसाद अमीन, आदिवासी साहित्य, पृ.सं. 93

सम्पर्क -

मोनिका मीना
monumeena8010@gmail.com
शोधार्थी
हिंदी विभाग
राजस्थान विश्वविद्यालय,
जयपुर


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