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ISSN 2292-9754

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10.19.2017


सच्चे लोकहितैषी थे गोस्वामी तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास ने भूतल पर जनमानस के कल्याण के लिए अपनी तपस्या व साधना को समर्पित किया। मानव के जीवन में कोई कष्ट न हो, किसी प्रकार की अज्ञानता न रहे और प्रेम की अविरल धारा निरंतर प्रवाहित होती रहे, वह भी बिना भेदभाव व बिना ऊँच-नीच के। इसी कारण गोस्वामी जी ने मानस में अज्ञानता व ज्ञान चरित्र व चरित्रहीनता आचरण व नैतिकता के साथ साथ सामाजिक आर्थिक राजनीतिक व न्यायिक दृष्टि कोण का सूक्ष्म चिंतन व इनके व्यवहार पर गंभीर प्रस्तुतीकरण किया है।

जीवन के सभी अंधकार ज्ञान से दूर होते हैं। ज्ञान की प्राप्ति केवल गुरु की कृपा से होती है। वे गुरु की महत्ता भगवान् से प्रतिष्ठित करते हैं। उनकी दृष्टि में गुरु भगवान् शिव के समान हैं।

“वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकर रूपिणं।
यमाश्रितो हि वक्रोपि चंद्र सर्वत्र वन्दयते।”

अर्थात ज्ञानमय नित्य शंकर रूपी गुरु की मैं वन्दना करता हूँ। जिनके आश्रित होने से ही टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दित होता है।

वहीं-

वंदऊ गुरू पद कंज कृपा सिंधु नर रूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु वचन रविकर निकर॥”

लोक कल्याण के लिए उन्होंने सर्वत्र महिमा मंडित ही किया है। वे कहते हैं कि गुरु कृपा के समुद्र और नर रूप में श्री हरि ही हैं जिनके वचन महामोह रूपी घने अंधकार का नाश करने के लिए सूर्य के किरणों के समान है। ब्राह्मणों की भी उन्होंने वन्दना की जो अज्ञान से उत्पन्न संदेहों को हरने वाले हैं। इस प्रकार विप्र वन्दन के द्वारा गोस्वामी जी ने जगत में आदरणीय जनों को समुचित स्थान दिलाने का प्रयास किया। संतों को भी पूजित बताया कि वे स्वयं दुख सहकर दूसरे के दुखों को ढँकते हैं।

“साधु चरित सुभ चरित कपासू, निरस विसद गुनमय फल जासू।
जो सहि परिछिद्र दुरावा, वंदनीय जेहि जग जस गावा॥”

उनकी दृष्टि में संत चलते फिरते तीर्थ हैं।

“मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथ राजू।
रामभक्ति जहं सुरसरि धारा। सरसई वरह्म विचार प्रचारा॥”

जीवन के झंझटों से मुक्ति व आत्मा को शांति के लिए सत्संग आवश्यक है। गोस्वामी जी की दृष्टि में सत्संग से मानव के सभी प्रकार के विकार नष्ट हो जाते हैं तथा उनमें मानवीय गुणों का भंडार संचित हो जाता है।

“बिनु सत्संग विवेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।”

अर्थात सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और श्रीराम की कृपा बिना सत्संग के नहीं होती है।

“सतसंगत मुदमंगल मूला, सोई फल सिधि सब साधन फूला।”

सतसंगति ही आनंद व कल्याण की जड़ है। सत्संग की प्राप्ति ही फल है और सब साधन तो फूल हैं।

सभी तरह के व्यक्तियों सज्जन व दुर्जन सभी का कल्याण सत्संग से ही संभव है।

“सठ सुधरहि सतसंगत पाई। पारस परस कुघात सुहाई॥”

क्योंकि यदि दुर्भाग्य वश सज्जनों को कुसंगति मिल भी जाती है तो भी वे वहाँ साँप की मणि के समान अपने गुणों का ही अनुसरण करते हैं। यह सब सत्संग का ही प्रभाव है।

मार्ग निर्देशन के क्रम में गोस्वामी जी ने बेहिचक यह बताया कि दुष्टों से सावधान रहना चाहिए।

“बहुरि बंदि खलगन सतिभाए। जे बिनु काज दाहिनेहु बाए॥”

श्री रघुनाथजी जी का स्मरण समस्त पापों को हरने वाला है। ऐसा बताकर गोस्वामी जी ने मानव के आत्मिक शांति का मार्ग प्रशस्त किया है। बाल कांड में विद्या की देवी सरस्वती की महिमा और उनकी आवश्यकता मानव समाज के लिए स्थापित किया।

“भगति हेतु विधि भवन विहाई। सुमिरत सारद आवति धाई॥”

यह निश्चित है कि प्रबल इच्छाशक्ति और आस्था से सुमिरन करने से माँ शारदा अपने साधक पर अवश्य कृपा करती हैं। कवि के स्मरण पर वे ब्रह्म लोक को छोड़कर दौड़ पड़ती हैं। मानव के मोक्ष की सफलता का प्रमुख कारक श्रीराम से नाता जोड़ना भी प्रमुख है। इस बिंदु पर गोस्वामी जी बिल्कुल एक सच्चे लोकहितैषी एवं मार्ग दर्शक की भूमिका में परिलक्षित होते हैं। क्योंकि मानव जीवन का प्रमुख लाभ यही है कि वह सत्कर्म को करते हुए मोक्ष की प्राप्ति कर सके। इस बिंदु पर गोस्वामी जी किसी एक धर्म की सीमा से परे समस्त मानव जाति के कल्याण की कामना करते हुए चराचर जगत का भ्रमण करते दीखते हैं।

“रामनाम मनिदीप धरू, जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहरेहु, जौं चाहसि उजियार॥”

हे मनुष्य? यदि तू भीतर व बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है तो मुखरूपी द्वार की देहली पर रामनाम रूपी मणि दीपक को रख। प्रकृति व अध्यात्म का संयोग भरत जी के प्रयाग पहुँचने पर दिखाई देता है। जब वे गंगा जी के लहरों को देखते हैं तो उनका शरीर पुलकित हो उठता है और माँ गंगा से भीख माँगते हैं।

“अरथ न धरम न काम रूचि गति न चहहू निरवान।
जनम जनम रति राम पद यह वरदान न आने।”

(204/अयोध्या कांड)

प्रेम वह भी भाई के प्रति, भरत जी चित्रकूट के लिए पैदल ही चल देते हैं।

“नहिं पद तान सीस नहिं छाया।
पेमु नेमु ब्रत धरमु अमाया॥”

(अयोध्या कांड)

अधिकार न्याय व प्रेम का अनूठा उदाहरण कैवट द्वारा पाँव पखारने के बाद ही नाव पर चढ़ाने की विनती करने पर प्रभु स्वीकार करते हैं। केवट कहता है कि

“बरु तीर मारहुं लखनु पै जब लगि न पांव पखारिहौं।”

वहीं जब प्रभु श्री राम उतराई देना चाहते हैं तो केवट पाँव पर लोट जाता है। शील व लज्जा का अनुपम उदाहरण माँ जानकी के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है जब गाँव की महिलाएँ उनका परिचय पूछती हैं। मानस में माता का स्थान सर्वोपरि है और पिता की आज्ञा का पालन करना भी आवश्यक है। इस लोकहितैषी व अक्षुण्ण नीति को गोस्वामी जी ने सुन्दर ढंग से बताया है। उन्होंने अहंकार को हमेशा त्याज्य बताया है। दोहावली में लिखा है -

“हम हमार आचार बडि भूरि भार धरि सीस।
हठि सठि परबस परत जिमि कीर कांस कृमि कीस॥”

उन्होंने इन्द्रियों के उचित व्यवहार पर भी ज़ोर दिया है-

“कहिबे कहि रसना रची सुनिबे कहं किए कान।
धरिबे कहं चित सहित परमारथहि सुजान॥”

आज के परिवेश में जब लोग धन ऐश्वर्य को देखकर ईर्ष्या करते हैं एक दूसरे के खून के प्यासे हैं आतंकवाद भ्रष्टाचार नैतिक मूल्यों में गिरावट का दौर शुरू हो गया है गोस्वामी जी के चिंतन बिंदु निश्चित रूप से शांति स्थापित करने में सहायक है। उन्होंने समाज की वास्तविक संरचना संचालन नैतिकता आदर्श न्याय आदि के सर्वोत्तम मानदंडों के आधार पर संपूर्ण मानव के कल्याण का रास्ता दिखाया है। जो आज की विषम परिस्थितियों से उबारने में सहायक होगे। इस प्रकार गोस्वामी जी निश्चित रूप से लोक हित कामना से सराबोर संत हैं


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