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ISSN 2292-9754

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12.15.2017


कबीर के साहित्य साधना में सामाजिक विमर्श

शोध सार :

संत कबीर मध्य कालीन भारत में उस समय अवतीर्ण हुए थे जब पूरे देश में ग़रीबी, अशिक्षा, छुआछूत, भेदभाव, जाति-पांति, ऊँच-नीच तमाम सामाजिक बुराइयों के अलावा अंधविश्वास व धार्मिक कट्टरता का बोलबाला था जिसका उन्होंने गंभीर रूप से चिंतन किया और अनपढ़ होकर भी साहित्य साधना का एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हुए प्रेम व एकता का संदेश दिया जो आज भी उतना ही ज़रूरी है जितना तब था क्योंकि प्रेम व एकता की ज़रूरत सर्व कालिक है॥

 

भारतीय संस्कृति के मध्यकालीन युग में अनेक संत कवियों का आविर्भाव हुआ जिन्होंने समाज में फैली अनेक विद्रूपताओं का कड़वा अनुभव किया। मूलतः संत स्वभाव और समाज को एक नवीन ऊर्जा देने की सदियों से संत परम्परा रही है लेकिन प्राचीन वीरगाथा काल या आदिकाल की रचनाओं से ऊब चुके जनमानस को नवीन व मनोरंजक भावों की तलाश थी जिससे भारतीय जनमानस चाटुकारिता, राष्ट्रीय भावना के अभाव, मारकाट की रक्तरंजित रचनाओं से ऊबर सके। यह एक संयोग ही रहा कि मध्य काल में संत कवियों का आविर्भाव हुआ उनमें संत कबीर ने अपने साहित्य साधना से समाज को अपने लोक की भाषा में गोता लगाने को मजबूर कर दिया। इस काल में लोग गाँव गाँव में ऊनकी ठेठ देशज भाषा को अपने आम जीवन में प्रयोग करने लगे थे। हालाँकि कबीर साहब ने जो देखा वही लिखा और सच यानी कड़वा कहा: मैं कहता अंखियन देखी (बीजक)1। समाज की गंभीर जटिलताओं व समस्याओं, कुरीतियों पर उन्होंने अपनी देशज साहित्य में जमकर प्रहार किया। सभी को लताड़ दिया क्योंकि वे जानते थे कि खुलकर आलोचना करने से ही अंधविश्वास, बाह्यआडंबर और अहंकार का सफ़ाया हो सकता है।

समाज के विकास, सामाजिक संरचना की व्यवस्था, ज्ञान की महत्ता, गुरु की महत्ता, दिखावे का विरोध, मानव की महत्ता और ब्रह्म ज्ञान आदि अनेक बिन्दुओं पर उनकी साहित्य साधना भारतीय साहित्य की अनमोल धरोहर है।

साहित्य साधना के बहाने ही सही उन्होंने समाज के सामने ज्ञान दाता एवम् अँधेरे से प्रकाश की ओर उन्मुख करने वाले गुरु की महान् महत्ता का प्रतिपादन उपनिषदों के बाद सबसे पहले किया -

सतगुरु की महिमा अनत, अनत किया उपगार,
लोचन अनत उघाड़िया, अनत दिखावनहार॥2

 

"गुरु बिन कौन बतावै बाट।
भ्रांति पहाड़ी नदिया बिच में, अहंकार की लाट॥
काम क्रोध दो पर्वत ठाढे, लोभ चोर संघात॥
मद मत्सर का मेघा बरसत, माया पवन बड ठाट।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, क्यों तरना यह यह घाट॥3

अर्थात कबीर ने साफ़ कहा कि अभिमान और ईर्ष्या के अनवरत बरस रहे बादलों के बीच संसार सागर से कैसे पार होंगे तो साफ़ जबाब है कि उसका रास्ता सच्चा गुरु ही बता सकता है।

जबतक सद्गुरु से स्वरूप ज्ञान नहीं मिलता तबतक जीव संसार में भटकता रहता है -

बिन सतगुरु नर फिरत भुलाना॥
केहरि सुत इक लाय गडरिया पाल पोष के कियो सयाना।
रहत अचेत फिरत अजयन संग अपना हाल कछू नहिं जाना॥4

अज्ञानी पुरुष की दशा मृग के समान है -

"मिरगा नाभि बसै कस्तूरी वह मूरख ढूँढत चौगाना।5

ज्ञान रूपी जड़ी को उन्होंने अमृत माना है -

"गुरू मोहि दीन्हीं अजब जड़ी।
सोई जड़ी मोहि प्यारी लगत है अमृत रसन भरी॥6

अर्थात ज्ञान का प्रकाश पुंज सिर्फ़ गुरू ही दे सकता है।

तत्कालीन समाज ज्ञान के माध्यम से समाज को उच्चता पर स्थापित करने का यह प्रयास सफल रहा क्योंकि यह साहित्य, ठेठ लोक साहित्य में किया गया प्रयास था जिसे जन-जन ने अपने अनपढ़ लोकसंत की वाणी से साक्षात्कार किया था।

मूलतः वे स्कूली व किताबी ज्ञान से अनभिज्ञ रहे फिर भी ज्ञान का मूल माध्यम गुरू को ही महिमामंडित किया। उनके विचार हमारे भारतीय साहित्य को प्रेम का संदेश दिखाते संपूर्ण साहित्य में दिखाई देते हैं -

पोथी पढ़ि पढ़ि युग मुआ पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय॥7

समाज के स्वस्थ विकास में प्रेम अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस विचार पर भी कबीर साहित्य अपने उद्देश्यों में सफल रहा है क्योंकि प्रेम के अभाव में किसी भी स्वस्थ समाज की आधारशिला सफल नहीं हो सकती है। प्रेम की अभिव्यंजना करने वाले तमाम परवर्ती साहित्य के साधक भी लगभग इसी प्रेम विषयक सागर में गोते लगाते दिखाई देते हैं।

सामाजिक भेदभाव मिटाने के लिए उन्होंने वर्ण व्यवस्था को साफ़ नकार दिया क्योंकि सभी लोग केवल मनुष्य हैं- ना कोई बाभन ना कोई सूदा॥

हिन्दू मुस्लिम सभी एक ही परमात्मा के द्वारा उत्पन्न किए गए हैं ऊँच-नीच भेदभाव व धार्मिक कट्टरता के प्रबल विरोधी कबीर ने समाज को एक होकर रहने व समरसता का संदेश अपनी वाणी में दिया।

कहा भी -

जो तुम बाम्हन बाम्हनी जाया
आन बाट ह्वै क्यों नहीं आया॥8

उन्होंने शूद्रों को भी महिमा मंडित किया और कहा कि उनसे श्रेष्ठ कौन है?

काहें को कीजे पाण्डे छोति विचारा
छोतहि से उपजा संसारा
हमारे कैसे लहू तुम्हारे कैसे दूध
तुम कैसे ब्राह्मण पाण्डे हम कैसे सूद
छोति छोति करत तुम्हहीं जाय
तौं ग्रभवास काहें को आए।9

यही नहीं हिंदू मुस्लिम दोनों धर्मों के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास भी किया -

ना जाने तेरा साहिब कैसा है।
मसजिद भीतर मुल्ला पुकारै
क्या साहिब तेरा बहिरा है
चिउंटी के पग नेवर बाजे,
सो भी साहिब सुनता है
पंडित होय के आसन मारे
लम्बी माला जपता है
अंदर तेरे कपट कतरनी
सो भी साहब सुनता है॥10

संत कबीर हालाँकि वैष्णव धर्म से भी प्रभावित थे फिर भी उसके दोषों को नहीं छोड़ा -

वैष्नो भया तो क्या भया बुझा नहीं विवेक
छापा तिलक बनाई कर दग्ध्या लोक अनेक॥

इस प्रकार सामाजिक बुराइयों का निर्भीकता पूर्वक उन्होंने विरोध किया। उनका संदेश है कि हमें अहंकार छोडकर आत्मज्ञान का सौदा करना चाहिए -

मन समुझि के लादौं लदनियां हो।
काहेक रटुआ काहेक पाखर,
काहेक भरी गौनिया हो।
मन के टटुआ सुरति के पाखर
काहेक भरी गौनिया हो।11

आत्मज्ञानी ही संतुष्ट होता है वह भी सत्संग से -

जनम जनम के दाग चुनर के सत्संग जल से छुड़ा धुबिया॥

इसी में अमृत बरसता है -

मूरख जन कोई सार न जाने सत्संग में अमृत बरसै हो॥12

हिंसा का पुरज़ोर विरोध

कबीर हिंसा के पुरज़ोर विरोधी थे उनका कहना था कि चेतन प्राणी की हत्या करके जो जड़, देवता को ख़ुश करने का प्रयास करते हैं ईश्वर जीव हत्या से ख़ुश होता है यह एक पागलपन है -

इक बकरी का बच्चा लाए, ताहि खिलावत दाना
शीश काटि धरनी धरि देवे, फिर माँगे वरदाना॥13

सर्व सुख और कल्याण के लिए सत्य व धर्म का अनुसरण

मनुष्यों को सत्य व धर्म का मर्म भी समझाया - वे कहते हैं कि मेरे समान कौन लम्बा परिवार वाला है? देखो सत्य मेरा पिता है, धर्म मेरा भाई है, लज्जा मेरी माता है, शील मेरी बहन है, संतोष मेरा पुत्र है, क्षमा मेरी पुत्री है और मैं सुखी हूँ।

"हम सम कौन बड़ा परिवारी।
सत्य है पिता धर्म है भ्राता लज्जा है महतारी।
शील बहन संतोष पुत्र है क्षमा हमारी नारी॥14

साधना की ओर उन्मुख होने और वासना से दूर रहने की नसीहत भी देते हैं. जो जितना तब प्रासंगिक था आज की मारकाट और आतंक व व्यभिचार के दौर में यह विचार मनुष्य को स्वस्थ समाज के निर्माण में शक्ति प्रदान करता है-

इस नगरी में दस दरवाजा, खिड़की जामें नयी बनी
नया दुवार नयी है खिड़की अंत समय में सुधा बरसी।15

बेईमानी, धोखा, या दूसरे का धन हड़पना कबीर जी को कत्तई पसंद नहीं है -

"पर धन हरयो जमीन गनि गाड़ेब जोरयो हैं दिन राती।
अपने मन से चतुर बनेब है साहेब मन नहिं भाती॥16

जीवन अभ्युदय के लिए कबीर दृष्टि काफ़ी पैनी थी उन्होंने काम वासनाओं व दुर्व्यवसनों से बचने की सलाह देते हुए ज्ञानी बनकर जीवन जीने की सलाह देते कहा कि यही रास्ता सही है जिससे मानव का दोनों लोक सुधर जाता है-

"माई मैं दूनों कुल उजियारी।
सासु ननद पटिया मिलि बंधलों, भसुरहिं परलों गारी
जोरों मांग मैं तासु नारी की, जिन सरवर रचल धमारी॥
जना पांच कोखिया मिलि रखलों, और दुई औ चारी
पार पड़ोसिन करौं कलेवा संगहिं बुधि महतारी॥17

सच्ची मनुष्यता

कबीर दास ने दया का परिणाम विनम्रता पूर्वक भक्ति करने को माना है। ध्यान की प्रगाढ़ता से आत्मा का साक्षात्कार होता है और भक्ति से मन शुद्ध होकर ध्यान जमता है। वे कहते हैं कि सच्चा गुरु वही है जो पराए की पीर समझे। दया धर्म का मूल है, अभिमान पाप का मूल है। क्षमा और दया के आचरण से चलना ही सच्ची मनुष्यता है।18

ज्ञान के सामाजिक व्यवहार का उन्होंने गंभीर चिंतन व सतर्क करने का रास्ता भी दिया- “वही विद्याओं का ज्ञाता, प्रवक्ता, जीवित तथा बुद्धि मान है स्वरूप स्थिति के महारस को पीता है। परंतु ऐसे महापुरुष कम मिलते हैं। मनुष्य के आकार में सच्चा मनुष्य वही है जिसके पास विवेक-विचार है। इसके बिना तो मनुष्य मूढ़ पशु है।19

इस प्रकार हम देखते हैं कि भक्तिकालीन साहित्य में जिन संत कवियों ने हिंदी साहित्य के माध्यम से लोकमानस की समस्याओं, परिस्थितियों व विकट बाह्यआडम्बरों का गहन दर्शन, मनन किया और मानव के लौकिक पारलौकिक सभी तरह के लाभों के लिए सुगम मार्ग प्रस्तुत किया उनमें संत कबीर प्रमुख भक्तिकालीन साहित्यकार के रूप में अग्रणी हैं।

मोहन पाण्डेय
प्राध्यापक
श्रीनाथ संस्कृत महाविद्यालय,
हाटा कुशीनगर, उ.प्र.
(भारत)

संदर्भ ग्रंथ

1.कहत कबीर, सटीक कबीर भजनावली
संत कबीर पारख संस्थान कबीर मार्ग प्रीतम नगर
इलाहाबाद लेखक अभिलाष दास
2. संत कबीर और उनके उपदेश, लेखक अभिलाष दास
3. कबीर अमृत वाणी अभिलाष दास
4. कबीर दर्शन - अभिलाष दास


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