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ISSN 2292-9754

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12.04.2014


तुलसीदास एवं भानुभक्त कृत रामचरितमानस में समानता

प्रस्तुत लेख का उद्देश्य है हिन्दी भाषा के प्रख्यात कवि तुलसीदास एवं नेपाली भाषा के प्रख्यात कवि भानुभक्त का जीवन परिचय एवं उनके द्वारा रचित रामचरितमानस एवं रामायण का तुलनात्मक अध्ययन।

तुलसीदास

हिन्दी साहित्य के महाकवि तुलसीदास के जन्म काल के विषय में एकाधिक मत हैं, बेनीमाधव दास द्वारा रचित गोसाई चरित एवं महात्मा राघबदास कृत तुलसी चरित दोनों के अनुसार तुलसीदास का जन्म 1497 ई. में हुआ था। शिवसिंह सरोज के अनुसार लगभग 1526 ई. में, पं. रंगुलम द्विवेदी के अनुसार जन्म 1532 ई. मानते हैं। यह निश्चित है कि तुलसीकस 16वीं शताब्दी के विद्वान थे।

तुलसीदास का बचपन घोर दरिद्रता एवं असहायवस्था में बीता था। उन्होंने लिखा है, “माता-पिता ने दुनिया में पैदा करके मुझे त्याग दिया, विधाता ने भी मेरे भाग्य में कोई भलाई नहीं लिखी”।

“मातु पिता जग जय तज्यो, विधि हु न लिखी कछु भाल भलाई।

जैसे कुटिल कीट को पैदा करके छोड़ देते हैं वैसे की मेरे माँ-बाप ने मुझे त्याग दिया।।

यह मान्य है कि तुलसीदास की मृत्यु 1623 ई. में हुई।

उनके जन्म स्थान के विषय में भी काफी विवाद है, कोई उन्हें सोरो का बताता है, कोई राजपुर का और कोई अयोध्या का, ज़्यादातर लोगों का झुकाव राजपुर की ही ओर है। उनके जीवन का पर्याप्त समय व्यतीत हुआ अयोध्या, काशी, चित्रकूट में जिस कारण उनकी रचनाओं में इन स्थानों का वर्णन बहुत हुआ है।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 12 ग्रंथ प्रामाणिक माने जाते हैं-

1. दोहवाली 2. कवितावाली 3. गीतावाली 4. रामचरितमानस 5. रामाज्ञाप्रश्न 6. विनयपत्रिका 7. रामललनहाछू 8. पार्वतीमंगल 9. जानकीमंगल 10. बरवै रामायण 11. वैराग्य संदीपिनी 12. श्री कृष्णगीतावाली।

आचार्य भानुभक्त

आचार्य भानुभक्त का जन्म ब्राह्मन परिवार में 1814 ई. को चंदिरंघा गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम धन्जय आचार्य एवं माता का नाम धर्मवती देवी था। उनका देहावसान 1868 ई. को हुआ। वे गरीब परिवार में जन्म लेने के कारण घास काटकर अपना गुजर बसर करते थे।

साधारणतः देखा जाए तो भानुभक्त की कविताओं से सिंचित होकर नेपाली भाषा एवं साहित्य आज फलने फूलने लगी है, जिस कारण आप आदि कवि न होकर भी ‘आदि कवि’ के सम्मान से सुशोभित हैं। अपने हाथों में कलम लेकर पूरी नेपाली भाषा एवं साहित्य को विश्व के साहित्य में स्थान दिलाने वाले भानुभक्त हमेशा नेपालवासी एवं नेपाली साहित्य में स्मरणीय एवं वंदनीय रहेंगे। नेपाली समाज में एक घास काटने वाले ने विश्व साहित्य में पूजनीय संस्कृत रामायण का नेपाली भाषा में अनुवाद एवं नेपाली साहित्य में महान कार्य किया और इस कारण ही वे इतने लोकप्रिय एवं धन्य हैं।

परिचय

गोस्वामी तुलसीदास रामचरित मानस

रामचरित मानस अवधी भाषा में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा 16वीं सदी में रचित एक महाकाव्य है। श्री रामचरित मानस भारतीय संस्कृति में एक विशेष स्थान रखती है। उत्तर भारत में इसे रामायण के रूप में कई लोगों द्वारा प्रतिदिन पढ़ा जाता है। श्री रामचरित मानस में इस ग्रंथ के नायक को एक महाशक्ति एवं पुरुषोतम के रूप में दर्शाया गया है। आज रामचरितमानस को हिन्दी साहित्य की एक महान कृति माना जाता है। रामचरितमानस को समान्यतः तुलसी रामायण या तुलसीकृत रामायण भी कहा जाता है। त्रेता युग में हुए ऐतिहासिक राम-रावण युद्ध पर आधारित एवं हिन्दी की ही एक लोकप्रिय भाषा में रचित रामचरितमानस को विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय काव्यों में 46वां स्थान दिया गया है।

रामचरितमानस को गोस्वामी तुलसीदास ने सात कांडों में विभक्त किया है – बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकांड, किष्किंधाकांड, सुंदरकांड, लंकाकाण्ड, और उतरकाण्ड। छंदों की संख्या के अनुसार अयोध्याकाण्ड और सुंदरकांड क्रमशः सबसे बड़े और छोटे कांड हैं। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में हिन्दी के अलंकारों का बहुत सुंदर प्रयोग किया है। विशेषकर अनुप्रास अलंकार का। रामचरितमानस पर प्रत्येक हिन्दू की अनन्य आस्था है और इसे हिंदुओं का पवित्र ग्रंथ माना जाता है।

संक्षिप्त मानस कथा

तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस की कुछ चौपाइयों को लेते हैं; बात उस समय की है जब मनु और सतरुपा परमब्रह्म की तपस्या कर रहे थे। कई वर्ष तपस्या करने के बाद शंकर भगवान ने स्वयं पार्वती से कहा कि मैं, ब्रह्मा और विष्णु कई बार मनु और सतरुपा के पास वर देने के लिए गए, जिसका उल्लेख तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस में इस प्रकार मिलता है। - “विधि हरि हर ताप देखि अपारा, मनु समीप आए बहु बारा”। जैसा कि उपरोक्त चौपाई से पता चलता है कि ये लोग तो कई बार आए यह कहने कि जो वर तुम माँगना चाहते हो माँग लो; पर मनु सतरुपा को तो पुत्र रूप में स्वयं परमब्रह्म को ही माँगना था फिर ये कैसे उनसे यानी शंकर, ब्रह्म और बिष्णु से वर माँगते? हमारे प्रभु श्रीराम तो सर्वज्ञ हैं। वे भक्त के हृदय की अभिलाषा को स्वतः ही जान लेते हैं। जब 23 हज़ार वर्ष और बीत गए तो प्रभु श्रीराम के द्वारा आकाशवाणी होती है – “प्रभु सर्बज्ञ दास निज जानी, गति अन्नन्य तपस नृप रानी। मंगु मंगु बरु भई नभ बानी, परम गंभीर कृपमृत सानी”। इस आकाश वाणी को जब मनु सतरुपा सुनते हैं तो उनका हृदय प्रफुल्लित हो उठता है। और जब स्वयं परमब्रह्म राम प्रकट होते हैं तो उनकी स्तुति करते हुए मनु और सतरुपा कहते हैं – “मनु सेवक सुरतरु सुरधेनु, बिधी हरि हर बंदित पद रेणु। सेवाट सुलभ सकाल सुखदायक, प्राणतपाल सचराचर नायक”। अर्थात जिनके चरणों की वंदना विधि हरि और हर यानी ब्रह्म, विष्णु और महेश तीनों ही करते हैं, तथा जिनके स्वरूप की प्रशंसा सगुण और निर्गुण दोनों करते हैं: उनसे वे क्या वर माँगें? इस बात का उल्लेख करके तुलसी बाबा ने उन लोगों को भी राम की ही आराधना करने की सलाह दी है जो केवल निराकार को ही परमब्रह्म मानते हैं।

आचार्य भानुभक्त रामचरित मानस

नेपाली साहित्य के क्षेत्र में प्रथम महाकाव्य रामायण के रचनाकार भानुभक्त का उदय सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना है। पूर्व से पश्चिम तक नेपाल का कोई ऐसा गाँव अथवा कस्बा नहीं है जहाँ उनकी रामायण की पहुँच नहीं हो। भानुभक्त कृत रामायण वस्तुतः नेपाल का रामचरित मानस है नेपाली साहित्य में भानुभक्त कृत रामायण को सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। नेपाल के लोग इसे ही अपनी आदि रामायण मानते हैं। यद्यपि भानुभक्त के पूर्व भी नेपाली राम काव्य परंपरा में गुमनी पंत और रघुनाथ भक्त का नाम उल्लेखनीय है। रघुनाथ भक्त कृत रामायण सुंदर कांड की रचना उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में हुई थी।

भानुभक्त कृत रामायण की कथा अध्यात्म रामायण पर आधारित है। इसमें उसी की तरह सात कांड है, बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किंधाकांड, सुंदरकांड, युद्ध और उत्तरकांड।

भानुभक्त की रामायण में बालकांड का आरंभ शिव-पार्वती संवाद से हुआ है। तदुपरान्त ब्रह्मादि देवताओं द्वारा पृथ्वी का भार हरन के लिए विष्णु की प्रार्थना की गई है। पुत्रेष्ठीयज्ञ के बाद राम जन्म, बाल लीला, विश्वामित्र आगमन, ताड़का वध, अहिल्योधार, धनुष यज्ञ और विवाह के साथ परशुराम प्रसंग रूपायित हुए हैं।

अयोध्याकांड में नारद आगमन, राज्याभिषेक की तैयारी, कैकई को, राम वनवास, गंगावतरण, राम का भारद्वाज और वाल्मीकि से मिलन, सुमंत की अयोध्या वापसी, दशरथ का स्वर्गवास, भरत आगमन। भरत चित्रकूट गमन, गुह और भारद्वाज से भरत की भेंट, राम-भरत मिलन, भरत की अयोध्या वापसी और राम के अत्री आश्रम गमन का वर्णन हुआ है।

अरण्यकांड से विराध वध, शरभंग, सुतीक्ष्ण और आगस्त्य से राम की भेंट, पंचवटी निवास, शरूपनखा-विरूपकरण,मारीच वध, तारा विलाप, हरण और राम विलाप के साथ जटायु, कमबद्ध और शबरी उद्धार की कथा है। किष्किंधाकांड में सुग्रीव मिलन, बाली वध, तारा विलाप, सुग्रीव अभिषेक, क्रिया योग का उपदेश, राम वियोग, लक्ष्मण का किष्किंधा गमन, सितान्वेषण और स्वायप्रभा आख्यान के उपरांत संपती की आत्मकथा का उद्घाटन हुआ है।

सुंदरकांड में पवन पुत्र का लंका गमन, रावण-सीता संवाद, सीता से हनुमान की भेंट, अशोक वाटिका विध्वंस, ब्रह्मपाश, हनुमान-रावण संवाद, लंका दहन, हनुमान से सीता का पुनर्मिलन और हनुमान की वापसी की चर्चा हुई है।

युद्धकांड में वानरी सेना के साथ राम का लंका प्रायण, विभीषण शरनगटी, सेतुबंध, रावण-शुक संवाद, लक्ष्मण-मूर्छा, लक्ष्मनोद्धार, कुंभकर्ण एवं मेघनाद वध, रावण-यज्ञ विध्वंस, राम-रावण संग्राम, रावण वध, विभीषण का राज्याभिषेक, अग्नि परीक्षा, राम का अयोध्या प्रत्यागमन, भरत मिलन और राम राज्य अभिषेक का चित्रण हुआ है।

उतरकाण्ड में रावण, बाली एवं सुग्रीव का पूर्व चरित, राम-राज्य, सीता वनवास, राम गीता,लवण वध, अश्वमेघ यज्ञ, सीता का पृथ्वी प्रवेश और राम द्वारा लक्ष्मण के परित्याग के उपरांत उनके महाप्रस्थान के बाद कथा की समाप्ति हुई है।

कुछ समीक्षकों का कहना है कि भानुभक्त कृत रामायण अध्यात्म रामायण का अनुवाद है किन्तु यह यथार्थ नहीं है। तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि भानुभक्त कृत रामायण में कुल 1317 पद हैं, जबकि अध्यात्म रामायण में 4268 श्लोक है। आधुयात्म रामायण के आरंभ में मंगल श्लोक के बाद उसके धार्मिक महत्व पर प्रकाश डाला गया है, किन्तु भानुभक्त कृत रामायण सीधे शिव-पार्वती संवाद से शुरू हो जाती है। इस रचना में वे आदि से अंत तक अध्यात्म रामायण की कथा का अनुसरण करते प्रतीत होते हैं, किन्तु उनके वर्णन में संक्षिप्ता है और यह उनकी अपनी भाषाशैली में लिखी गई है। यही उनकी सफलता और लोकप्रियता का आधार है।

भानुभक्तिय रामायण एवं गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

रामचरितमानस छन्द

तुलसीदास रचित रामचरितमानस आख्यात्मक महाकाव्य है। इसमे शास्त्रीय छन्द एवं लोकछन्द दोनों का ही प्रयोग किया गया है। आख्यात्मक काव्य होने के कारण दोहा एवं चौपाई का प्रयोग मानस के अंदर यथावत आख्यात्मक प्रसंग में तुलसी द्वारा किया गया है। रससिद्ध कवि के लिए छन्द-बन्धन अनिवार्य नहीं होती, फिर भी छन्द गति की मर्यादा होती है। गति सजीवता का द्योतक है, तथापि तुलसीदास ने अपने काव्य में छन्द का समुचित निर्वाह किया है। उन्होंने बीच-बीच में प्रसंगानुसार अन्य छन्द का भी प्रयोग किया है, जिसके अनुसार मात्रिक छन्द में चौपाई, तोमर, कवित, छप्पय, डिल्ला, त्रिभंगी, हरिगीतिका आदि एवं वर्णिक छन्द में इंद्रवज्रा, टोतक, भुजंगप्रयात, मालिनी, वसंततिलका, वंशस्थ, शार्दूलविकृडित,स्रगधरा, अनुष्टुप, जैसे छन्द हैं।

छंद प्रयोग में तुलसीदास अत्यंत सचेत दिखते हैं, क्योकि उन्होंने कथाप्रवाह, अनुभूतिगत आवेग, पात्र की गरिमा तथा नाद-सौन्दर्य के साथ छन्द-सामंजस्य में पूरा-पूरा ध्यान दिया हैं। छन्द परिवर्तन करने में भी वे पूरी तरह निपुण थे, उनके द्वारा काव्य में सभी जगह छन्द में परिवर्तन देखने को मिलता है। छन्द परिवर्तन करते समय वे पूर्वर्ती छन्द में वर्णित उक्ति के अंतिम अंश से परवर्ती छन्द-रचना को आरंभ किया है। इस तरह के प्रयोग से उन्होंने काव्य को खंडित होने से सर्वथा बचाया है।

“कहि न जाई सब भांति सुहावा। बाजि बेषु जानु काम बनावा।।
जानु बाजि बेषु बनाई मनसिजु राम हित अति सोहाई”।

इस प्रकार देखने पर तुलसीदास छन्द के प्रयोग में पूर्ण सतर्क रहे हैं। उन्होंने सूक्ति-कथन के लिए दोहा एवं सोरठा – अद्भुत, भयानक, वीभत्स रस के लिए कवित, छप्पय एवं दांडिक: स्तुति के लिए इंद्रवज्रा, टोतक, भुजङ्ग्प्रयात, मालिनी जैसे वर्णिक छन्द तथा काव्य के क्रमबद्ध प्रवाह के लिए चौपाई का समुचित प्रयोग देखने को मिलता है।

भानुभक्तिय छन्द

आचार्य भानुभक्त ने अध्यात्म रामायण के छंदो का प्रयोग न कर उनके पूर्वती कवि वसंत जैसी के द्वारा प्रयोग की गई शादुर्लविकृडित छन्द एवं उनके द्वारा बाल्यकाल में प्रयोग की गई शिखरिणी छन्द का अधिक प्रयोग किया गया है। इन दोनों में भी सबसे ज्यादा अधिकतर स्थानों में शादुर्लविकृडित छन्द का प्रयोग दिखता है। ये छन्द नेपालियों के द्वारा प्रयोग किए गए सबसे लोकप्रिय छन्द के रूप में परिचित है। रामायण को मुखाग्र कर मेला-पात, भात-भन्सा, ढिकी-जाँतो, बिहा-बदुलों आदि आज नेपाल के हरेक क्षेत्र एवं गानों में इन छंदों का प्रयोग अधिकतर किया जाता है। इस प्रकार देखने पर भानुभक्त रामायण में शार्दूलविकृडित छन्द का प्रयोग अधिकतम रूप में आया है। इस छंद के प्रयोग ने काव्य को अतिरुचिकर बनाने के साथ सरसता भी प्रदान की है एवं अधिकतर करुणरस प्रधान घटनाओं में छंद का प्रयोग देखने को मिलता है।

“गयो खन्या बेला मकान त मिलयों राज्य बनको
भरत्ले राज पाया यहि बसि गरुण राज्य जनको।
बिदा बकस्या जावम खुशिसित म जाण्याछू वनमा
म चांडे फिन्यार्छु बिरह नहवस कति मनमा”।

भानुभक्त रामायण में प्रस्तुत में स्रगधरा छन्द का भी प्रयोग हुआ है। इसमें इक्कीस अक्षर में एक पाउ एवं चार पाउ का एक श्लोक होता है। गण समूह में म एवं भ न य य य होना एवं प्रत्येक सात अक्षर में विश्राम होने वाले इस छन्द का प्रयोग बाल्यकाण्ड एवं अरण्यकन्ड में हुआ है।

“डेरा देखि भरतजी तहीं नजिक गया पाउका छाप देख्या
श्रीराम का पाउका छाप चिन्हिकन खुशीले मथले ताही टेकया”।

पन्द्रह अक्षर के एक पाउ होने एवं चार पाउ के एक श्लोक होने वाले मालिनी छन्द के गण समूह में न न म य य होता है तो प्रत्येक पाउ के सतवा एवं अथवा पद में विश्राम होता है। यह छन्द विशेष कर सुंदरता के वर्णन में प्रयोग किया जाता है। भानुभक्त ने भी लंका शहर के सुंदरता के वर्णन में इस छन्द का प्रयोग किया है।

“घर पनि सुनकै छन गल्ली जो छन सुनकै।
मंजिडित हुनाले झन असल छन कुनैका”।।

एकाध पदों में गण समूह में त त ज गु गु होने पर पाँचवाँ एवं छठा पद में विश्राम होने वाले इंद्रवज्रा छन्द का प्रयोग किया गया है।

“ईश्वर तिमी हौ रघुनाथ ई भाई।
लक्ष्मण त शेष हुन करून जनाई।।
भूभार हरनाकन जन्म लियौ।
यो रूप भज्न गर्न बनाइदीयौ”।।

छन्द प्रयोग के दृष्टि से देखने पर भानुभक्त रामायण में वर्णिक छन्द का मात्र प्रयोग हुआ है, जबकि रामचरितमानस में वर्णित मात्रिक दोनों प्रकार के छंदों का प्रयोग हुआ है। भानुभक्त ने सभी प्रसंगो में वर्णिक छन्द का प्रयोग किया है तो तुलसीदास ने भगवत स्तुतियों में मात्र वर्णिक छन्द का प्रयोग कर अन्य सभी प्रसंगों में प्रचलित एवं लोकप्रिय उपरयुक्त मात्रिक छंदों का प्रयोग किया है। तुलसीदास द्वारा संस्कृत भाषा में प्रयुक्त वर्णिक छन्द में कहीं भी छन्द भंग नहीं हुआ है, पर भानुभक्त द्वारा नेपाली भाषा में प्रयुक्त वर्णिक छन्द में कहीं-कहीं छन्द भंग हुआ है। फिर भी भानुभक्त की छन्द संबंधी सचेतता प्रशंसनीय है।

रामचरितमानस रस

अशोक वाटिका में हनुमान सीता से मिलने के पश्चात उनकी करुण अवस्था का वर्णन इस प्रकार किया है-

“देखि मनहि महूँ कीन्ह प्रणाम। बैठेही बीती जात नीसी जामा।
कृस तनु सिस जटा एक बेनी। जपति हृदय रघुपति गुण श्रेणी”।।

अर्थात हनुमान सीता को देखकर प्रणाम करते हैं। वहाँ सीता चारों पहर जागकर ही बिताती थी। उनका शरीर सूख गया है एवं बालों में जटाएँ पड़ चुकी हैं। सीता हमेशा मन ही मन श्री राम का जप किया करती हैं।

उपर्युक्त उदाहरण में करुण रस एवं भक्ति रस दोनों रस समाहित हैं। रागात्मक तल्लीनता यहाँ प्रचुर मात्र में प्रयोग होने के कारण इसे भक्ति परक काव्य की संज्ञा भी दी जा सकती है।

भानुभक्तिय रस

रामायण विभिन्न रसों से आप्लावित एवं पुरुषोतम राम के गान के कारण यहाँ भाव का बोध हुआ है। भानुभक्त की रामायण में जितनी भी रस योजना एवं रसानुभूति हुई है वह सभी मूल रामायण से ही आई है। यहाँ वीरता प्रदर्शन कार्य के कारण वीर एवं रौद्र रस का विशेष स्थान पाना स्वाभाविक जान पड़ता है। इस काव्य में भक्ति के साथ-साथ करुण रस को महत्वपूर्ण स्थान दिया जा सकता है। विशेषतः सुंदरकाण्ड में करुण रस का सुंदर प्रयोग हुआ है। रावण के भय से ग्रस्त सीता के करुणाजनक मूर्ति एवं वेदनापूर्ण अवस्था का चित्रण भानुभक्त ने इस प्रकार किया है -

“भोकी कैली निन्यौरिन त कपाल कोर्याकि सबकेश उसै।
लट्टा मात्रधर्याकी खालि भूमिमा रुदै बस्याकी यसै”।।

भरत विलाप एवं मिलाप, दशरथ की मनोदशा, कौशल्या, तारा और मंदोदरी के मनोभावों के प्रसंग में कवि ने करुण रस को अभिव्यक्ति किया है। भयानक, वीभत्स, अद्भुत, एवं वत्सल रस भी काव्य में यत्र-तत्र देखने को मिलता है। कहीं-कहीं हास्य रस की भी झलक मिल जाती है। समग्र में भक्ति रस, करुण रस, एवं वीर रस मूल रस के रूप में एवं अन्य रस सहायक रस के रूप में देखा जाता है।

रामचरितमानस अलंकार

तुलसीदास ऐसे रचनाकार हैं, जिन्होंने राम-नाम, राम-प्रताप, राम-महिमा, राम-कीर्तन, राम-चरित्र आदि का वर्णन करना ही अपने काव्य का लक्ष्य माना था, फिर भी रामचरितमानस में काव्य-कला के सम्पूर्ण तत्वों का सहज सन्निवेश उनके द्वारा देखने को मिलता है। शब्दचयन, वाक्यसंघटन, उक्ति तथा मुहावरों का सुंदर प्रयोग, भावनुकूल भाषा का प्रयोग, संवाद-योजना, अलंकार-योजना आदि सभी दृष्टिकोण से यह काव्य बेजोड़ है। अलंकार प्रयोग में चाहे वह उपमा हो या रूपक, उत्प्रेक्षा हो या निदर्शना, सहोक्ति हो या विनोक्ति, उदाहरण हो या दृष्टांत, मानस महाकाव्य सभी तरह से अनुपम है।

“रामकथा सुंदर कर तारी। संशय विहग उड़ाव निहारी।।
रामकथा कलि विटप कुठारी। सादर सुनू गिरिराजकुमरी”।।

अर्थात श्री राम की कथा हाथ की सुंदर ताली है, जो संदेहरूपी पक्षी को उड़ा देती है, उसी प्रकार श्री राम की कथा एक ऐसी कुल्हाड़ी है, जिससे कलयुगरूपी वृक्ष को काटना होगा। इसलिए हे पार्वती? उदारतापूर्वक रामकथा सुनो। कवि तुलसीदास द्वारा अलंकारो का प्रयोग करने का उद्देश्य अलंकारों को चमत्कारित न कर, सीता के अलौकिक सौन्दर्य की व्यंजना प्रस्तुत करना है। वास्तव में अलंकार का प्रयोग करने का मतलब चमत्कार दिखाना नहीं, क्योंकि अलंकार साधन मात्र है, साध्य चाहे अलंकार्य हो। सीता के सौन्दर्य का वर्णन करने के क्रम में तुलसीदास के द्वारा प्रयोग किया गया एक अतुलनीय अलंकारों का नमूना इस प्रकार है-

“जौ छवि सुधा प्योनिधि होई। परम रूप-मय कच्छप सोई।
सोभा रजु मंदरू सिंगारु। मथै पाणि-पैकज निज मारू”।।

भानुभक्तिय अलंकार

मूलतः अलंकार को शब्दालंकार एवं अर्थालंकार में विभाजन कर अध्ययन किया जाता है। भानुभक्त रामायण में शब्दालंकार के अंत्यानुप्रास अलंकार का यत्र-तत्र प्रयोग सर्वत्र किया गया है। उनकी रामायण की प्रमुख आलंकारिक विशेषता ही अंत्यानुप्रास का सुंदर प्रयोग है। इसके अलावा कहीं-कहीं छेकानुप्रास का प्रयोग भी देखने को मिलता है-

“भ्रमरहरु लताका फूलमा हल्ली हल्ली।
घुनुनु धुनुनु गर्दै हिंडछन बल्ली बल्लि”।।

उपर्युक्त कवितांश के पहले एवं दूसरे पद के श्यामाँकित पदों में अर्थलंकार में उपमा अलंकार को प्रकट किया गया है, तो चौथे पद के श्यामाँकित पद में रूपक अलंकार मुखरित हुआ है-

“यस्ता बात गरि राम गया भनि सबै विस्तार सुनाया जैसे।
कौसल्या दशरथजीलाई रिसले वक-वाण बजारिन तैसे”।।

तुलना

1. तुलसीदास कृत रामायण एक पूर्ण मौलिक काव्य है, वहीं भानुभक्त कृत काव्य अर्ध मौलिक।
2. तुलसी कृत रामायण अलंकारित तथा मिथकधर्मीय भाषा में है, जबकि भानुभक्त कृत सरल भाषा में है।
3. तुलसी ने अध्यात्म एवं अन्य राम कथाओं का प्रयोग किया, जबकि भानुभक्त ने अध्यात्म रामायण का अनुवाद किया है।
4. तुलसी कृत रामचरितमानस खास करके हिन्दी समाज में लोकप्रिय है जबकि भानु कृत नेपालीभाषी समाज में लोकप्रिय है।
5. तुलसीदास ने यहाँ निर्गुण एवं सगुण का समन्वय हुआ है, भानुभक्त ने भी सगुण एवं निर्गुण दोनों का समन्वय किया है।
6. तुलसी ने पूर्वी काव्य सिद्धान्त का पूरा पालन किया है, जबकि भानुभक्त ने पूर्वी काव्य सिद्धान्त का अपूर्ण पालन किया है।
7. तुलसी एवं भानुभक्त दोनों ने राम के आदर्श रूप का सम्प्रेषण किया है।
8. तुलसी कृत रामचरित मानस करीब तीन सौ वर्ष पहले लिखा गया है, जबकि भानुभक्त का रामायण तीन सौ वर्ष बाद लिखा गया।
9. दोनों के ही द्वारा अपनी अपनी रामायण की रचना करते समय बाल्मीकि कृत अध्यात्म रामायण का अनुसरण किया गया है।

उपसंहार

रामचरितमानस एवं भानुभक्त कृत रामायण दोनों सगुण भक्ति धारा का काव्य है। भारतीय साहित्य में भक्ति कालीन साहित्य की बहुत बड़ी भूमिका देखी गई है, तो नेपाली साहित्य में भी इसका कम महत्व नहीं है। अध्यात्म रामायण को नेपाली में रूपान्तरण करने वाले भानुभक्त नेपाली भक्ति साहित्य के केन्द्रीय कवि कहे जाते हैं, तो दूसरी तरफ रामचरितमानस के रचना करने वाले तुलसीदास भारतीय भक्तिसाहित्य के केन्द्रीय एवं महत्वपूर्ण कवि हैं। उनका रामचरितमानस नाना प्रकार के पुराण निगमागाम के सार को एकत्रित कर भक्ति, ज्ञान एवं कर्म का समन्वयात्मक त्रिवेणी प्रवाहित करने में सफल हुए हैं। भानुभक्तीय रामायण अत्यंत सरल और सुबोध शैली में लिखा गया है तो तुलसी कृत रामायण की भाषा शैली आलंकारिक एवं मिथकधर्मी है। दोनों रामायण में निर्गुणत्व एवं सगुणत्व के सुंदर समन्वय के साथ-साथ दोनों के राम, आदर्श पुरुष के रूप में दिखाए गए हैं। भानुभक्त पर तुलसीदास का प्रभाव होने के कारण दोनों की रामायण में समानता होनी स्वाभाविक मानी जा सकती है। साथ ही ये दोनों रामायण तत्कालीन भक्ति साहित्य का बेजोड़ काव्य माना जाता है।

संदर्भ ग्रंथ

1. तुलसीदास और भानुभक्त : सामाजिक और सांस्कृतिक परिदृश्य – डॉ. सत्य प्रकाश तिवारी
2. तुलनात्मक साहित्य : हिन्दी और उड़िया के परिप्रेक्ष्य में – डॉ. अरुण होता
3. कथा रामकै गूढ : विश्वविद्यालय प्रकाशन(वाराणसी) – डॉ. रामचन्द्र तिवारी
4. तुलसीदास, टीकाकार हनुमान प्रसाद पोद्दार
5. नेपाली साहित्यकोश, भक्ति रस, नेपाल – राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान
6. समकालीन समालोचना सिद्धान्त र प्रयोग : नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान

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