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ISSN 2292-9754

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06.30.2014


नागार्जुन : एक दृष्टिकोण

वैसे तो कला की कोटि को क्रमबद्ध करने की कसौटी कला-मीमांसक अपने काल, रुचि एवं आवश्यकता के आधार पर तय करते हैं, लेकिन यदा-कदा कुछ कलाकारों की कलाकृतियाँ ऐसी भी होती हैं, जो अपनी कसौटी स्वयं निर्मित करती हैं। ऐसी यदा-कदा सृजित कलाएँ ही चिरंतनता के सीमांत तक पहुँचती हैं और स्वयं के लिए ऐसा ओहदा तय करती हैं, जो अगली परंपरा के लिए मिसाल बन जाता है। कवि नागार्जुन (वैद्यनाथ मिश्र) हिंदी साहित्य में ऐसे ही ओहदे पर हैं।

नागर्जुन उन इक्के-दुक्के कवियों में हैं, जिन्होंने रचना-कर्म को अपना जीवन-कर्म बना लिया है। जीवन के विविध अनुभव-चित्रों के संग्रह ने उनके रचना को विशाल बना दिया है, जिसमें संवेदना के विविध रंग ऊब-डूब करते रहते हैं। अक्सर उनकी रचनाओं में आए विविध रंग सामयिक साहित्यिक फैशन से बाहर के हैं। वे हमेशा लीक से हटकर रहने वाले कवि रहे हैं। उनका रचनाकाल सन् 1929 से 1997 तक रहा है। सक्रिय साहित्य शिल्पी के रुप में 68 वर्षों का समय कोई छोटा समय नहीं होता क्योंकि इतने वक्त में या तो जीवन-गति उनका साथ नहीं देती या उनमें रचना-ऊर्जा बाकी नहीं रहती। किन्तु इस नज़रिए से नागार्जुन अदम्य जिजिविषा के कवि हैं। लम्बे रचनाकाल का एक खतरा यह भी है कि यह वक्त रचनाकार के जीवन को बहुधा भटका देता है। मैथिलीशरण गुप्त, सुमित्रानन्दन पंत सरीखे कवियों के साथ ऐसा ही हुआ है। लेकिन नागार्जुन डटे रहे। ‘लीक’ से हटकर लिखा तो बहुत पर ‘अपनी लीक’ छोड़ी नहीं। लेकिन तब भी कुछ लोगों को उनके साहित्य में अंतर्विरोध दिखायी पड़ता है। नागार्जुन ने इसके जवाब में कहा है कि- “अंतर्विरोध किसमें नहीं होते? परिवर्तन केवल जड़-जीवों में नहीं दिखाई देता। हर सोचने विचारने वाला आदमी अपने को बदलता रहता है। हारिल की तरह किसी जड़ीभूत सिद्धांत की लकड़ी पकड़ने वाले लोग सुखी रहते हैं। मैं वैसा सुखी अब नहीं हूँ। मैं आपसे पूछता हूँ पहले के मार्क्स और पीछे के मार्क्स में अंतर है या नहीं। क्या लेनिन ने मार्क्स को नया अर्थापन नहीं किया? ग्राम्शी तो अधिरचनावादी है। हिंदी के सबसे बड़े समीक्षक डॉ. रामविलास शर्मा ने भी अपने मत में परिवर्तन किया है। वे जगह-जगह मार्क्सवाद के नाम पर प्रचलित सिद्धांतों को भी खण्डित करते हैं। ब्रेश्ट प्रतिबद्धता के रूढ़ सिद्धांतों का भी खण्डन करते हैं। ब्रेश्ट प्रतिबद्धता के रूढ़ सिद्धांतों में पूरा बँधने से इंकार करता है। भारतेंदु, प्रेमचंद और निराला में कम अंतर्विरोध हैं क्या? इससे उनकी प्रतिबद्धता पर आँच नहीं आती और न उनकी महिमा घटती है।” बहुत पहले कबीर ने कहा था-

“मेरा तेरा मनुआ कैसे होई एक रे।
मैं कहता हूँ, आँखिन देखी, तू कहता कागद की लेखी॥”

नागार्जुन के अंतर्विरोध को भी इसी के तर्ज पर देखा-समझा जा सकता है। उन्होंने हमेशा कागद-लेखी से ज्यादा आँखिन-देखी को अहमियत दी है। नागार्जुन की रचना में कहीं कोई उलझाव नहीं, सबकुछ एकदम सीधा और साफ है। दूध का दूध, पानी का पानी। नागार्जुन ने खुद ऐलान किया-

“जनता मुझसे पूछ रही है
क्या बतलाऊँ?
जन कवि हूँ मैं साफ कहूँगा
क्यों हकलाऊँ।”

यही नागार्जुन की बेबाक प्रवृत्ति और जनवादी प्रतिबद्धता है। परिपाटी के स्तर पर देखा जाय तो जिस तरह सूरदास ने काव्य को ‘वात्सल्य’ दिया उसी तरह नागार्जुन ने काव्य को ‘विक्षोभ’ दिया है। अपनी रचनाओं एवं वक्तव्यों के ज़रिए विक्षोभ की धारणा का साफ-साफ ख़ाका उन्होंने पेश करने की कोशिश की यद्यपि सौंदर्यवादी एवं समकालीन कवि-आलोचकों ने इसे स्वीकृत एवं प्रतिष्ठित नहीं होने दिया। उन्होंने विक्षोभ की धारणा स्पष्ट करते हुए अपने निबंध विषकीट में लिखा है- “भारतीय काव्य समीक्षा में नौ रस माने गए है। परन्तु अपनी कटु-तिक्त चरपरी रचना के सिलसिले में मुझे एक और ही रस की अनुभूति होने लगी है यह है विक्षोभ रस।” वे आगे और कहते हैं- “मेरे अंदर विक्षोभ तब फूटता है, जब लगातार बढ़ती हुई मँहगाई के मारे लोगों को परेशान पाता हूँ......परम मेधावी बालक और बालिकाएँ गरीबी के चलते अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ने को बाध्य हो जाते हैं, धूर्तों की जमात वर्ष दो वर्ष के भीतर ही लाखों की रकम बटोर लेती है, मेहनत मशक्कत की कमाई खानेवाला रिक्शा मजदूर महीनों फटी बनियान पहनता है........किसान, खेतिहर, टीचर, किरानी कौन नहीं है संकट का शिकार। ये वे नहीं हैं जो कवि सम्मेलनों की अगली कतार में बैठते हैं। यह भी विक्षुब्ध हैं।” नागार्जुन जिसे विक्षोभ रस कह रहे हैं, उसके मूल में तीन भाव का योग होता है। ये भाव है करुणा, क्रोध और घृणा। मैनेजर पाण्डेय के अनुसार इन तीनों का स्वभाव प्रायः सामाजिक होता है। एक स्थिति में ये तीनों एक साथ क्रियाशील हो सकते हैं। अपने देश-समाज की साधारण जनता की भीषण गरीबी के प्रत्यक्ष्य-बोध से विक्षोभ पैदा होगा, उसमें गरीबों के प्रति करुणा होगी, गरीबी से घृणा होगी और गरीबी के कारणों के प्रति क्रोध होगा। नागार्जुन की कविताओँ में ‘प्रतिहिंसा ही स्थायी भाव’ है। इसी शीर्षक से लिखित अपनी कविता की शुरुआत में वे कहते हैं-

“नफ़रत की अपनी भट्टी में
तुम्हें गलाने की कोशिश ही
मेरे अंदर बार-बार ताकत भरती है
प्रतिहिंसा ही स्थायी भाव है अपने ऋषि का
वियत् काङ के तरुण गुरिल्ले जो करते थे।
मेरी प्रिया वही करती है......
नव-दुर्वासा, शबर-पुत्र मैं,
शबर-पितामह
सभी रसों को गला गलाकर
अभिनव द्रव तैयार करुँगा
महासिद्ध मैं, मैं नागार्जुन...॥”

नागार्जुन की विचारधारा और रचना हिंदी साहित्य के बुद्धिबोझिल-रुपवादी ढाँचे को तोड़ने वाली है। अपनी इस खासियत के लिए वे कबीर, भारतेंदु, प्रेमचंद, निराला की फेहरिस्त में खड़े दिखाई पड़ते हैं। उनका देखा हुआ अनुभव-सच उनके काव्य में अनभय-सच के रुप में प्रकट हुआ है। ‘वह तो था बीमार’ कविता में उन्होने सरकार के आचार की धज्जियाँ उड़ा दी है-

“मरो भूख से फौरन आ धमकेगा थानेदार
लिखवा लेगा घरवालों से- वह तो था बीमार
अगर भूख की बातों से तुम
कर न सके इनकार
फिर तो खायेंगे घरवाले हाकिम की फटकार
ले भागेगी जीप लाश को सात समुंदर पार
अंग-अंग की चीर फाड़ होगी फिर बारंबार
मरी भूख को मारेंगे फिर सर्जन के औजार
जो चाहेगी लिखवा लेगी डॉक्टर से सरकार”

सावन के अंधे को सबकुछ हरा ही दिखता है- ऐसी एक कहावत है। साहित्यिकों एवं कलाकारों के लिए यह नौबत तब आती है, जब वो किसी वाद के छाया-क्षेत्र में आते हैं। लेकिन नागार्जुन कभी किसी वाद के अंधे नहीं हुए। उनके अंदर सामाजिक-राजनीतिक समझ थी; गहरी और पैनी। इसी कारण उनका विक्षोभ बड़ा तिक्त हो गया है। कवि ने अपनी आँखों से सबकुछ देखा और जो देखा, उसे अपनी जुबाँ से कहा। वह स्वयं को जनकवि कहने वाले हिंदी के अकेले रचनाकार हैं और सम्भवतः देश-दुनियाँ के व्यक्तियों पर केन्द्रित सबसे ज्यादा कविता लिखने वाले कवि भी अकेले नागार्जुन ही हैं। उनकी कविताओं में बुद्ध, सम्राट अशोक, मुहम्मद ईसा, रावण, कंस, मार्क्स, लेनिन, गाँधी, नेहरु, लाला लाजपत राय, भगत सिंह, सुभाष, तिलक, खुदीराम बोस, चर्चिल, स्टालिन, त्रात्सकी, इंदिरा, फूलन देवी, मायवती, मुलायम सिंह, नरसिम्हा राव, बाल ठाकरे, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवानी सरीखे अनेकानेक व्यक्ति शामिल हैं। इन्होंने सबसे ज्यादा कविता नेहरु पर लिखी। तथ्य यह भी है कि नेहरु पर कविता लिखनेवाले कवियों में निराला के बाद नागार्जुन हैं। इनकी कविताओं में नेहरु का जिक्र अनेक संदर्भों में हुआ है। शुरुआती दौर में इनकी कविता में नेहरु जन-नेता, समाज-सुधारक और प्रगतिशील लीडर के रुप में सामने आए। बाद में नेहरु के विचारों के परिवर्तन को भी उन्होंने लक्ष्य किया और तब नेहरु के नक़ाबी चेहरे का जमकर पर्दाफाश भी किया। नेहरु के विचारधारा परिवर्तन पर उन्होंने मैथिली में बड़े मार्मिक ढंग से लिखा है-

“पहिलहु सब संकल्प बिसरला
मंत्री बनितहि नेहरु भाई।”

इतना ही नहीं कल जो नेहरु के दुश्मन थे वे आज दोस्त बन गए- “काल्हुक दुश्मन, आजुक मीत।” भारतीय संविधान बनने से पहले उन्होने इंग्लैण्ड व अमेरिका से नेहरु के रिश्ते पर करारा व्यंग्य भी किया-

“वतन बेचकर पंडित नेहरु
फूले नहीं समाते हैं।
बेशर्मी की हद है
फिर भी बातें बड़ी बनाते हैं।
अंग्रेजी अमरिकी जोंको की
जमात में हैं शामिल
फिर भी बापू की समाधि पर
झुक-झुक फूल चढ़ाते है।”
छोटे बाबू (1949) कविता में उन्होंने लिखा है-
“चाहे तो नेहरु जी पहने
कागज की इन मुद्राओं का भारी ओवरकोट”

इसके अलावा एक और कविता में वे कहते हैं-

“नेहरु भइया है बेमान
कि दिल है इंसान गेह विमान।”

यहाँ नेहरु के साथ जी और भइया संबोधन वैसे ही व्यंग्य है जैसे निराला के ‘काले-काले बादल छाए न आए वीर जवाहरलाल’ के वीर में है।

उनके लिए नेहरु सिर्फ एक व्यक्ति नहीं रह गए बल्कि राजनीति में वंश परंपरा के प्रतीक बन गए। छोटे नेहरु, बड़े नेहरु, भाई नेहरु, बहन नेहरु, पिता नेहरु, पुत्री नेहरु आदि कहकर वे नेहरु के जरिए उन्होंने उस वंश परंपरा पर व्यंग्य किया है, जिसने भारतीय राजनीति, प्रशासन एवं समाज तीनों को अपनी मल्कियत समझ कर मनमाना व्यवहार किया है। ‘शासन की बंदूक’ में इंदिरा के इमर्जेंसी काल के दौर का व्यंग्यात्मक गायन करते हैं-

“खड़ी हो गई चाप कर, कंकालो की हूक,
नभ में विपुव विराट-सी, शासन की बंदूक।
उस हिटलरी गुमान पर, सभी रहे हैं थूक,
जिसमें कानी हो गई, शासन की बंदूक।
बढ़ी बधिरता दस गुनी, बने बिनोवा मूक,
धन्य-धन्य वह धन्य वह, शासन की बंदूक।
सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक,
जहाँ-तहाँ दगने लगी, शासन की बंदूक।
जली ठूँठ पर बैठकर, गई कोकिला कूक,
बाल न बाँका कर सकी, शासन की बंदूक।”

बात चाहे नेहरु की हो या इंदिरा की या किसी और ही नेता की नागार्जुन ने हमेशा नेताओं को आड़े हाथों लिया है। यथा-

“मिनिस्टर तो फूँकेंगे अंधाधुंध रकम
सुना करेगी आवाम बक-बक बकम
वतन चुकाएगा जहालत की फीस
इन पर तो फबेगी खादी नफीस
धंधा पॉलिटिक्स का सबसे चोखा है
बाकी तो ठगैत है, बाकी तो धोखा है।”

नागार्जुन के इसी मिजाज पर आलोचक जीवन सिंह ने उन्हें योद्धा कवि कह दिया है- “नागार्जुन की कविता पढ़ते हुए निरंतर यह अनुभूति होती रहती है कि हम किसी युद्ध के मैदान में लड़ते हुए किसी योद्धा को देख रहे हैं। एक सैनिक कवि है, जो युद्ध के मोर्चे पर सबसे आगे जाकर स्वयं लड़ता है। वे सेनापति कवि नहीं जो खुद पीछे रहकर दूसरों को लड़ने का हुक्म देता है। वैसे आजादी के बाद दो दशकों तक हिंदी कविता में घनघोर रुप से एक नकली घमासान युद्ध खूब मचा है। जिससे लगता है कि हिंदी का कवि दुर्वासा या परशुराम हो गया है। लेकिन इसमें ज्यादातर लकड़ी के तलवार से लड़ा गया नाटकीय युद्ध नज़र आता है। इसमें सच्चे मन से उतरने वाला एक अकेला ही योद्धा कवि है- बाबा नागार्जुन।” नामवर जी का भी विचार है कि कबीर के बाद हिंदी का सबसे बड़ा व्यंग्यकार कवि नागार्जुन ही हैं। उनका व्यंग्य चुटीला होने के साथ चुभीला भी है। यथा-

“बापू के भी ताऊ निकले
तीनो बंदर बापू के
सरल सूत्र उलझाऊ निकले
तीनो बंदर बापू के
सेठों के हित साध रहे हैं
तीनो बंदर बापू के
युग पर प्रवचन लाद रहे हैं
तीनो बंदर बापू के
करे रात-दिन टूर हवाई
तीनो बंदर बापू के
बदल-बदल कर चखे मलाई
तीनो बंदर बापू के”

इसी तरह बुजुर्ग सत्ताधीशों को बूढ़ा शेर कहते हुए एक व्यंग्य चित्र खींचा है-

“परसो था जंगल का राजा
कल का घायल बूढ़ा शेर
आज मगर वह झीख रहा है
जुग का कायल बुढ़ा शेर
दाँत झड़े नाखून घिस गए
अकुलाता है बूढ़ा शेर
विगत सुखों की याद आ रही
पछताता है बूढ़ा शेर”

नागार्जुन की इस व्यंग्यशीलता पर वरिष्ठ आलोचक ने टिप्पणी की है कि व्यंग्य की इस विदग्धता ने ही नागार्जुन को कालजयी बना दिया है, जिसके कारण वे कभी बासी नहीं हुए। नागार्जुन की कविता में व्यक्तियों के इतने व्यंग्यचित्र है कि उनका एक विशाल अलबम तैयार किया जा सकता है। डा. बरसानेलाल चतुर्वेदी ने इनकी कविताओं को आग के गोले व दाहक और दंशक भी कह दिया है।

नागार्जुन कभी वाद के अंधे नहीं हुए। इस बात का अंदाज इससे भी लगाया जा सकता है कि उन्होंने जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति का जितना पक्ष लिया, उसके दिग्भ्रमित होने से उसपर उतनी ही तीखी प्रतिक्रिया भी व्यक्त की। उन्होंने कविता भी लिखी- ‘खिचड़ी विप्लव देखा हमने।’ इतना ही नहीं कम्युनिस्ट देश चीन के आक्रमण के समय में उन्होंने ‘तप्त लहू की धार’, ‘कामरेड उवाच’, ‘कम्युनिज्म के पंडे’, ‘जी हाँ’, ‘फाह्यान के वंशधर और आओ’, ‘इसे जिंदा ही गाड़ दे’ आदि कविताएँ भी लिखी। ‘पुत्र हूँ भारत माता का’ कविता में उन्होंने लिखा-

“कल था वामपंथी कम्युनिस्ट
आज हूँ कम्युनिस्ट दक्षिण पंथी
माओ शाओ चाओ चे
कल तुम साथी थे
लगते थ सहज सहोदर
आज तुम शत्रु हो।”

नागार्जुन ने कभी वाद या खेमे में बँध कर उसका फायदा लेने की चिंता नहीं की। उनकी प्रतिबद्धता, आबद्धता और संबद्धता किसी दल विशेष से नहीं थी। उनके समक्ष भारत की करोड़ो भूखी, नंगी, गरीब, पीड़ित शोषित जनता थी (रविभूषण) वे दलितों का जगरण चाहते थे-

“दिल ने कहा दलित माँओ के
सब बच्चे अब बागी होंगे
अग्नि पुत्र होंगे वे अंतिम
विप्लव में सहभागी होंगे।”

किसानों और मजदूरों पर जो उन्होंने लिखा उसे नारेबाजी या पोस्टरबाजी कत्तई नहीं कहा जा सकता। कलकत्ता के ट्राम में बैठे मजदूरों पर लिखते हुए कैसे वे श्रमिक संवेदना से जुड़ गए यह द्रष्टव्य है-

“पूरी स्पीड में है ट्राम,
खाती है दचके पे दचका
सटता है बदन से बदन पसीने से लथपथ
छूती है निगाहों को कत्थई
दाँतो की मोटी मुस्कान
बेतरतीब मूछों की थिरकन
सच सच बतलाओ
घिन तो नहीं आती है
जी तो नही कुढ़ता है?”

उनके जमाने के ही कुछ एक प्रतिष्ठित कवि ऐसे भी मिल जाएँगे जिनकी रचना में भी संवेदनशीलता एवं पक्षधरता के नमूने दिखाई पड़ जाएँगे। पर हकीकत यह है कि इसमें से अधिकांश मात्र विचार-विलास अथवा उधार की संवेदना भर है। नागार्जुन की पक्षधरता इतनी मजबूत इसलिए दिखाई देती है क्योंकि इन्होंने जिसे लिखा है, उस जिंदगी को जिया है। स्वयं उनकी जुबान से-

“पैदा हुआ था मैं
दीन-हीन अपठित किसी कृषक-कुल में
आ रहा हूँ पीता अभाव का
आसव ठेठ बचपन से
कवि मैं रुपक हूँ दबी हुई दूब का
हरा हुआ नहीं कि चरने को दौड़ते
जीवन गुजरता प्रतिपल संघर्ष में
मुझको भी मिली है प्रतिभा की प्रसादी
मुझे भी शोभित है प्रकृति का अंचल
पर न हुआ मान कभी
किया न अनुमान कभी”

यह बात उन्होंने रविंद्रनाथ को संबोधित करते हुए अपनी कविता रवि ठाकुर से कही थी। जीवन सिंह ने इस कविता को महाकवि से भविष्य के महाकवि का संवाद कहा है। नागार्जुन की कविताओं में दीन-दुखियों की पीड़ा बड़े यथार्थ रुप में प्रकट हुई है क्योंकि वे भी स्वयं उसी यथार्थ का हिस्सा थें-

“मेरा क्षुद्र व्यक्तित्व
रुद्ध है, सीमित है
आटा-दाल, लकड़ी-नमक के जुगाड़ में
पत्नी और पुत्र में
सेठ के हुकुम में
कलम ही मेरा हल है, कुदाल है॥
बहुत बुरा हाल है।।।”

नागार्जुन को उनके वक्त पर पकड़ और प्रतीति दोनों थी यही वजह है कि देश-देशांतर की घटनाओं का भावी प्रतिफलन उनके काव्य में दिखायी देता है। चीजें क्या रुख लेने वाली हैं, इसका अंदाजा वे लगा लेते और उसे कह भी देते। नेहरु के विचार परिवर्तन के परिणाम उन्होंने भाँप लिया था, इमर्जेंसी के काल की हकीकत उन्होने बयाँ की थी। जय प्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति की पथ भ्रष्टता भी उन्हें नज़र आई थी। मिसाल के तौर पे नागार्जुन की कविता ‘एटम बम’ को ली जा सकती है। 16 जुलाई 1945 ई. को सुबह 5 बजकर 30 मिनट पर संयुक्त राज अमेरिका ने अणुबम का परीक्षण किया था, जिसकी चमक देखकर उसके आविष्कर्ता राबर्ट जे. ओपेनहैमर को गीता का वह श्लोक याद आया, जिसमें ईश्वर के विराट रुप का वर्णन ‘सूर्यसहस्रस्य’ कहकर आकाश में हजारों सूर्यों के एक साथ उत्पन्न हुए प्रकाश के रुप में किया गया है। लेकिन यह विडम्बना है कि इसके एक महीने से कम समय में ही 6 अगस्त 1945 ई. के दिन वही एटमबम जापान के हिरोशिमा व नागासाकी पर गिरा जो मासूम जनता का महाकाल बन गया। बाद में लगभग चौदह साल बाद (1959 ई. में) अज्ञेय ने ‘हिरोशिमा’ नाम से एक कविता लिखी जिसमें उस बम की कल्पना सूर्य के रुप में ही की गई थी-

“एक दिन सहसा
सूरज निकला
अरे क्षितिज पर नहीं
नगर के चौक”

कुदरत की प्राणदायिनी शक्तियों के स्वामी का उपयोग एक प्राणहंता बम के लिए करना यह सूर्य और गीता के श्लोक दोने का दुरुपयोग है। जबकि नागार्जुन ने इससे बहुत पहले (एटम बम बन जाने या उससे कुछ समय पहले) ही उसके विनाशकारी दुरुपयोग को भाँप लिया था। उन्होंने लिखा-

“कहाँ गिरेंगे एटम या हाइड्रोजन बम?
नहीं फौज पर, नहीं पुलिस पर
नहीं लाम पर, नहीं मुहिम पर
बम बरसेंगे जनाकीर्ण आबादी पर ही
निरपराध निर्दोष निष्कलुष
बाल वृद्ध वनिताओं की ही जान जाएगी
ताजा ताजा खून बहेगा
उस पवित्र शोणित धारा में नहा-नहाकर
खाज मिटाने चाहेंगे
युद्धाकांक्षी मानवाभास पागल पिशाच
दस बीस पच्चीस पचास...”

भगवान सिंह ने इसीलिए कहा कि “निर्णय की जैसी स्पष्टता और पक्षधरता भक्तिकालीन कवियों में मिलती है, वैसी ही नागार्जुन के यहाँ है। अपने कॉमनसेंस, जीवनानुभव एवं जीवनदृष्टि की अंतर संबद्धता में जो उनको सी लगा वह उन्होंने निडरतापूर्वक निसंकोच कहा।” नागार्जुन ने केवल क्षोभ भर ही प्रकट नहीं किया बल्कि अपने काव्य-चित्रों में जीवन के हर अनुभव को खींचा है। इन अनुभव-चित्रों ने हिंदी साहित्य की परंपरा में नायाब मणि-माणिक्य बनकर हिंदी साहित्य के खजाने को सम्पन्न बनाया है और जनवादी परम्परा को मजबूत फलक दिया है। रामविलास शर्मा के शब्दों में वे हमारे राष्ट्रीय सम्मान के रक्षक और जनवादी साहित्यिक विरासत के सजग प्रहरी हैं।


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