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ISSN 2292-9754

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06.30.2014


हिन्दी समालोचना : समस्याएँ एवं समाधान

आज हिन्दी साहित्य में आलोचना एवं समालोचना की परिपाटी जीवन्त होने के कारण हमें इसमें विभिन्न मत-मतांतर, विमर्श एवं समस्याएँ देखने को मिलती हैं। साहित्य में समालोचना के कुछ स्थापित शास्त्रीय आधार होने के बावजूद भी साहित्य निरंतर परिवर्तनशील, प्रयोगशील एवं विद्रोही प्रवृति का माना जाता रहा है। आज परिस्थिति को देखते हुए मेरे विचार से हरेक समालोचक को अपने व्यावहारिक ज्ञान एवं पठनशीलता को हिन्दी पाठकों के सामने लाकर नई-नई मान्यताओं का विकास करने का सामर्थ्य पैदा करना होगा। टी.एस. इलियट के अनुसार– "नयी कृति के संदर्भ का मूल्यांकन करने वाले समालोचक अपनी संतुष्टि का मापदंड करके ख़ुद समालोचक बन सकता है", अन्यथा रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार– "कच्चे समालोचक की समालोचना कच्चे आम की तरह हानिकारक होती है"। इसलिए इस हानिकारक अवधारणा को मूल में रखकर हिन्दी समालोचना में देखी गई समस्याएँ एवं उनके समाधान करने के उपाय खोजने होंगे।

सर्वप्रथम समालोचक को साहित्य का सहृदय पाठक होना होगा अन्यथा कृति का मर्म पहचानना एवं कृति की संवेदना की अनुभूति करना बहुत कठिन है। हिन्दी के डॉ. अरुण होता, प्रो. बलराज पाण्डेय, प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी, श्री शिवराजसिंह चौहान, अमरजीत कौंके, श्री अरुण कुमार, प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल, प्रो. वेदरमन, देवेन्द्रनाथ शुक्ल, डॉ. सत्यप्रकाश तिवारी आदि समालोचक साहित्य स्रष्टा सम्मत, संवेदनशील एवं सृजन परिक्रिया के ज्ञाता होने के कारण, इनकी समालोचनाओं में सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है। दूसरी तरफ साहित्य में समालोचक ही स्रष्टा होने के कारण अन्य स्रष्टा की कृति के मूल्यांकन में स्पष्टता का न होना या पूर्वाग्रह हो सकता है। जिससे बचने के लिए समालोचक हमेशा अपनी रचना में नैतिकता, ईमानदारी तथा तटस्थता की आधारभूमि तैयार करने की कोशिश करता है।

कुछ समालोचक हिन्दी समालोचना में कतिपय कृति के मूल्यांकन को न समझकर या क्षणिक प्रभाव में पड़ कर भी आलोचना करते हुए देखे जाते हैं जिस वज़ह से कभी-कभी समालोचना में गाली-गलौज करने वाला वातावरण का सृजन हो जाता है। ज़्यादातर समालोचकों को पाठक की रुचि, स्तर एवं समालोचना की प्रक्रिया से वास्ता न रखकर अपनी विद्वत्ता प्रदर्शन में ही अत्यंत क्लिष्ट होकर समालोचना करते हुए देखा जाता है जिससे उनकी पुनः समालोचना करने की आवश्यकता हो जाती है और ऐसा होना समालोचक के आत्म सम्मोहन के कारण उत्पन्न ऋणात्मक पक्ष का कारण हो जाता है और इस प्रथा के कारण कुछ समालोचकों में केवल मात्र बौद्धिक विलास होने का डर बना रहता है। किसी भी गहन विषय को सरल भाषा में समझा पाना ही एक सफल समालोचक का लक्ष्य होता है और जिसके लिए उसे व्यक्तिगत आग्रह का त्याग कर समालोचना करना आवश्यक रह जाता है।

अक्सर ऐसा देखा जाता है कि कुछ समालोचकों द्वारा अपने संकीर्ण विचार को किसी भी कृति या रचना पर लादने की प्रवृति के कारण, कतिपय युवा रचनाकार अपने लेखन से विचलित होते जा रहे हैं। साधारणतः कुछ समालोचकों के व्यक्तिगत अहम, अनावश्यक तर्क, जबर्दस्ती वैचारिक आग्रह एवं अज्ञानता के कारण ऐसी समस्याओं का जन्म होता है। आज तो ऐसी स्थिति आ गई है कि प्रगतिवादी साहित्यकारों में भी ऐसी संकीर्ण प्रवृतियों को बढ़ते हुए देखा जा रहा है। हम हिन्दी साहित्य से जुड़े पाठक एवं रचनाकारों को, ऐसे प्रगतिवादी विचार को अस्वीकार करने वाले एवं संकुचित मानसिकता वाले समालोचकों की मानसिक सोच को बदलना ही होगा। आज के युग में हिन्दी साहित्य में निरंकुश एवं एकाधिकारवादी समालोचकों का वर्चस्व होने के कारण यह भी प्रश्न सामने उठकर आता है कि अगर ऐसी ही स्थिति रही तो नए युवा साहित्यकारों के विचारों को परिष्कृत एवं उजागर करने के लिए कौन आगे आकर पथ प्रदर्शन करेगा?

एक समालोचक न्यायाधीश की तरह न्यायकर्ता तो है पर उसे किसी रचनाकर को कठिन सज़ा देने का अधिकार नहीं है और उसका ऐसी प्रक्रिया को अपनाना भी उचित नहीं है। वह सुधार के उपाय बता सकता है पर स्रष्टा या रचनाकार से द्वेष बढ़ाने वाले या निराश करने वाले कठोर शब्दों का प्रयोग करके साहित्य का हितैषी नहीं हो सकता है। हिन्दी साहित्य में एक स्रष्टा द्वारा समालोचना में अपने ही प्रतिबिंब को देखने की कमी है। मेरे विचार से एक समझदार समालोचक द्वारा किसी भी मूल्यहीन कृति के ऊपर कलम चलाना उचित नहीं है। साहित्य जगत में अधिकांश हिन्दी समालोचकों द्वारा अग्रगामी एवं वरिष्ठ साहित्यकारों का आदरपूर्वक सम्मान करते नहीं देखा जा रहा है, वे शायद यह नहीं समझ पा रहे हैं कि कभी न कभी वे भी वरिष्ठ होंगे और अनुजों द्वारा ऐसे ही अनदेखी करने पर उन्हें भी अपमानित होना होगा। हमारे वरिष्ठ आलोचकों को समझना होगा कि, सौन्दर्य का अर्थ ‘नवीनता’ है। उनके पुराने वही विचार, वही शैली, वैसे ही विषय एवं रचना से साहित्य आगे नहीं बढ़ सकता, आप को नए ज़माने की नयी धारा में आना होगा और नए साहित्य की मुख्यधारा में आकर नयी सोच के साथ चर्चा करनी होगी एवं नवीनता के लिए वातावरण बनाने में मदद करनी होगी।

साधारणतः देखा जाता है कि समालोचना में ज़्यादातर समालोचक प्राध्यापन पेशागत प्रतिभा से जुड़े होते हैं। जिससे केवल पाठ्यक्रम में होने वाले कृतियों को विद्यार्थी के लिए व्याख्या कर, सहज ढंग से मात्र विश्लेषण करने की प्रवृति जन्म ले रही है। बिना क्षमता के एक रचना का अनुकरण कर जबर्दस्ती समालोचना करना अत्यंत प्रत्युत्पादक हो सकता है। हिन्दी समालोचना में पाठकों की संख्या में कमी होने के कारण भी इस प्रथा ने प्रश्रय पाया है। इस प्रारूप को रोकने के लिए प्राध्यापक तथा पाठकों को एक ही मंच देकर वैचारिक विमर्श में संलग्न करना ज़रूरी भी है। समालोचक का काम विवरण सूची या उदाहरण देना मात्र न होकर उसका विश्लेषण करते हुए औचित्य एवं पुष्टिकर सौन्दर्य का निष्कर्ष देना है। भाषा एवं साहित्यिक कला के सहसंबंध को दिखा न सकना भी समालोचना को अर्थहीन बना देता है। इस पर अंकुश लगाने के लिए बौद्धिक विलास या प्राज्ञिक क्रियाकलाप का मात्र हाथ न थाम सामाजिक अंतक्रिया के रूप में सही समालोचना को विकास के पथ पर अग्रसर करना होगा।

अक्सर संस्कृत समालोचना को हिन्दी में आधार मानकर अंतर विषयक बनाने में असमर्थ एवं कुछ कृत्रिम शब्द वर्गीकरण प्रधान एवं बौद्धिक विलास को प्राथमिकता देने वाली दिशा की तरफ चलकर, समसामयिक आलोचनात्मक पद्धति को सक्षम बनाने में असमर्थ दिखाई देता है। आज यह प्रचलन कि आलोचक पाश्चात्य समालोचना की पद्धति का प्रयोग कर अधिकांशतः हिन्दी साहित्य को हूबहू उसी में फिट करने की कोशिश, हिन्दी समालोचक की मौलिकता में बारम्बार प्रश्न चिन्ह उठाती रही है जिसे कम करने के लिए अन्य संदर्भ को सहयोगी बनाकर हिन्दी कृतियों से विश्लेषण का प्रारूप तैयार करना ज़रूरी है। समावेशिता को आधार बनाकर सीमांकृत वर्ग, लिंग, क्षेत्र, जाति, भाषा आदि को साहित्य में उठाना अलग बात है पर उत्तरआधुनिकता के साहित्य, भाषा, इतिहास, सौन्दर्य की मान्यता एवं मूल्यांकन में कीचड़ उड़ाना एवं अव्यवस्था उत्पन्न करने को ही समालोचना मानने वाले समालोचक में गैरजिम्मेवार प्रवृति भी दिखाई पड़ती है। आक्रोश एवं ध्वंस कभी भी समालोचना का साध्य नहीं हो सकता है। इसी से हिन्दी साहित्य की पाठनशीलता में समालोचना एवं स्रष्टा का योगदान साहित्यिक समालोचना को परिष्कृत कर सकता है।

आपसी लेनदेन में लाभ या व्यक्तिगत सान्निध्य के आधार पर समर्थन, प्रशंसा करके या लांछन लगाकर या फिर राजनीतिक गुट-उपगुट बनाने वाले समालोचक होना दुर्भाग्यपूर्ण है। साहित्य सृजन में एक-दूसरे पर शंका, अविश्वास सिर्जना करना है और यह स्रष्टा तथा समालोचक दोनों को कुंठित करता है और ऐसे असंतुलन ने नए साहित्य एवं सैद्धान्तिक विमर्श के मुहाने को अवरुद्ध कर रखा है। हिन्दी समालोचकों को समालोचना के न्यूनतम सिद्धान्त एवं तत्वों को पूरा न कर समालोचना के नाम पर हमेशा एक ही प्रकार के परेशान करने वाले लेख लिखते हुए देखा जाता है। साधारणतः असल समालोचना के लिए चार प्रकार के पक्ष अनिवार्य होते हैं– ‘मूल्य निर्णय, व्याख्या-विश्लेषण, सैद्धांतिकरण एवं शोधपरकता’। दूसरे के अध्याय से पर्याप्त सामग्री लेकर उसका उल्लेख संदर्भ के रूप में नहीं कर पाने की कायरता समालोचक को शोभा नहीं देता। खुद को ज्ञान का मूल स्रोत ठान कर अपने लेखन में उसी शैली, पद्धति एवं सिद्धांतों की पुनरावृति कर अपनी लेखनी में मौलिकता नहीं दे पाना समालोचक का व्यर्थ ही अभिमान है। इस प्रवृति को हटा कर समालोचक में दूसरे की बातें पढ़ने, दूसरों को स्वीकारने एवं ज्ञान को परंपरा के निरंतरता के रूप में समझने की क्षमता, धैर्यता एवं उदारता के साथ सृजन करना होगा अन्यथा उनके द्वारा की गयी समालोचना कच्चे आम की तरह ही होगी।

समकालीन एवं नए रचनाकारों की साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन में कुछ बड़े एवं प्रसिद्ध समालोचकों द्वारा कम महत्व देते हुए देखा जाता है। अध्ययन ‘अप-टू-डेट’ न हो पाने पर या नए का इंतजार करने की क्षमता न होने पर भी समकालीन रचनाओं का तिरस्कार करने की समस्याएँ आती हैं। समालोचक को भी सैद्धान्तिक आधार, विभिन्न धारा के दृष्टिकोण तथा उदार ग्रहनशीलता के उचित वातावरण का भी अभाव है। इसी कारण समालोचना द्वारा सृजना प्रबोधित, संशोधित या परिष्कृत होने का क्रम शिथिल होकर प्राज्ञिकता ही शुष्क होने लगी है। इस प्रकार पाठक में साहित्य के प्रति विश्वास एवं रुचि कम होती जा रही है। रचयिता अधीर हैं, इसलिए वे लोग अपनी कृति की प्रशंसापरक ढंग से तुरंत ही समालोचना होते देखना चाहते हैं और ऐसा न होने पर समालोचना को मृत घोषित करना या समालोचक ही नहीं है यह कहना उनके लिए सहज है। उपयुक्त प्रतिभा या कृति से भी खुद ही मात्र पुरस्कार, चर्चा एवं ‘ग्लेमर’ हथियाने के लिए गलत प्रक्रिया अपनाने की प्रवृति को हमें निरुत्साहित करना होगा। इन समस्याओं से मुक्ति के लिए हिन्दी समालोचक को समकालीन साहित्य के प्रति सचेत दृष्टिकोण की बहुलता स्वीकार करना तथा साहित्य के सैद्धान्तिक, व्यावहारिक एवं अग्रगामी पक्षों में स्पष्ट होना आवश्यक है। सच्चे समालोचक को हरेक प्रकार की कृति के प्रति व्यापक एवं सकारात्मक दृष्टिकोण रखना होगा।

संदर्भ ग्रंथ :-

1. हिंदी साहित्य : बीसवीं शताब्दी - नंददुलारे वाजपेयी
2. नया साहित्य : नए प्रश्न - नंददुलारे वाजपेयी
3. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल : आलोचना के नये मानदण्ड - लेखक - भावदेव पाण्डेय
4. समकालीनहिंदीसाहित्यकेसतरंगीबिंब – डॉ. अरुण होता
5. सांस्कृतिक संकट और हिन्दी कहानी – डॉ. सत्यप्रकाश तिवारी


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