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ISSN 2292-9754

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10.09.2017


कबीर का धर्म

मध्यकालीन उत्तर भारत मुस्लिम आक्रमणकारियों के लगातार आक्रमण से उद्वेलित हो उठा था। ठीक इसी समय दक्षिण भारत में उसके मूल ब्रह्म की नव्य व्याख्या करने के प्रयत्न चल रहे थे। बौद्ध धर्म के पतन के पश्चात आठवीं शताब्दी में शंकराचार्य ने वैदिक धर्म की पुन: स्थापना की और अद्वैतवाद का प्रचार किया। सैद्धांतिक दृष्टि से शंकराचार्य के एकत्ववाद में संकीर्णता का अभाव है और समाज को एकता के सूत्र में बाँध देने की शक्ति है। परंतु देखा जाए तो व्यावहारिक दृष्टि से वह सफल न हो सका। इसके पश्चात शंकराचार्य के अद्वैतवाद को आधार मानकर आगे दक्षिण में चार मुख्य मतों की स्थापना हुई– रामानुजाचार्य का विशिष्टद्वैतवाद, निम्बार्क का द्वैताद्वैतवाद, विष्णुस्वामी का शुद्धाद्वैतवाद और मध्वाचार्य का द्वैतवाद। यह दार्शनिक वाद परस्पर भिन्न होते हुए भी मूलरूप में एक दूसरे के पूरक थे और यह धार्मिक एवम दार्शनिक व्याख्याएँ किसी न किसी रूप में समग्र भारत में फैली हुई थीं। देखा जाए तो पूरे भारत में भक्ति आंदोलन को जन्म देने का श्रेय इन दार्शनिकों को ही है। इतिहास इस बात का गवाह है कि दक्षिण भारत का यह धार्मिक आंदोलन अपनी मूल चेतना में अखिल भारतीय सांस्कृतिक नव-चेतना का ही नया रूप था। दक्षिण भारत के इस जनवादी धार्मिक आंदोलन ने विभिन्न धर्मों, मतों, सम्प्रदायों में विभाजित सम्पूर्ण भारतीय जनता को पुन: एकसूत्र में बाँधने का काम किया। रामानुजाचार्य, निम्बार्काचार्य, मध्वाचार्य, विष्णुस्वामी, बल्लभाचार्य, चैतन्य महाप्रभु, रामानंद आदि आचार्य वैष्णव थे। इन लोगों के प्रयास से विभिन्न सम्प्रदाय अस्तित्व में आये और आगे चलकर पूरे भारत में इनके मतों का प्रचार-प्रसार हुआ। दक्षिण के अलवार भक्तों द्वारा प्रतिपादित प्रवृतिमूलक भक्ति ने जो गीता, उपनिषद तथा ब्रह्मसूत्र पर आधारित थी, हिंदी के भक्ति साहित्य को सर्वाधिक प्रभावित किया। कबीर ने इस तथ्य को प्रकट करते हुए कहा है कि-

“भक्ति द्रविडी उपजी लाये रामानंद,
परगट किया कबीर ने सात दीप नौ खंड।”1

बारह अलवार भक्तों के बाद दक्षिण में चार आचार्य हुए जिन्होंने अद्वैतवाद का खण्डन करके भक्तिमार्ग का पथ प्रशस्त किया जिनमें आचार्य रामानुज सबसे महत्वपूर्ण एवम प्रभावशाली थे। इनका सिद्धांत विशिष्टाद्वैतवाद कहलाता है। इन्होंने दास्य भाव की भक्ति का प्रचार किया। प्रपति तथा शरणागतिपरक भक्ति इन्हीं की देन है। इनकी भक्ति में ‘विष्णु और नारायण’ नामों की प्रधानता मिलती है जिसके अनुसार इसी परम्परा में रामानंद का नाम आता हैं जिन्होंने ‘राम’ की भक्ति भावना का प्रचार किया। इन्होंने भक्ति का द्वार सबके लिए खोल दिया जिससे समाज के सभी वर्ग के लोग जैसे अनंतानंद, सुखानंद, सुरसुरानंद, नरहर्यानंद, भवानंद, पीपा, कबीर, सेन, धन्ना, रैदास, पद्मावती और सुरसरी नामक इनके बारह शिष्य बने थे। रामानंद ने सगुण-निर्गुण राम को भाक्ति का आधार बनाकर राम काव्य का विकास किया।

मध्वाचार्य ब्रह्म सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे। जिनका कार्यक्षेत्र कर्नाटक और महाराष्ट्र था। इनके सिद्धांत को द्वैतवाद कहा जाता है। यह माधुर्य भाव की उपासना करते थे तथा ईश्वर, जीव और जगत में तात्विक भेद मानते हुए जगत को सत्य मानते थे। कृष्ण के उपासक मध्वाचार्य का प्रभाव चैतन्य महाप्रभु पर मुख्य रूप से पड़ा था।

निम्बार्काचार्य का सिद्धांत द्वैताद्वैतवाद अथवा भेदाभेदवाद कहलाता है। इनके विचार से जीव, जगत और ब्रह्म एक-दूसरे से भिन्न हैं फिर भी जीव और जगत का अस्तित्व प्रभु की इच्छा पर निर्भर है। जीव अवस्था भेद ब्रह्म से भिन्न भी है, अभिन्न भी, ब्रह्म जगत का निमितोपादान कारण है। जीव और ब्रह्म का सम्बंध अंश-अंशी का है। निम्बार्क से ही हिंदी में राधा वल्लभ और हरिदासी सम्प्रदाय का विकास हुआ है। राधा वल्लभ सम्प्रदाय के प्रवर्तक स्वामी हित हरिवंश थे तथा वृन्दावन में हरिदास ने सखी सम्प्रदाय की स्थापना की थी।

विष्णुस्वामी को विष्णु सम्प्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है। इसी सम्प्रदाय में आचार्य वल्लभ हुए थे जो उच्च कोटि के दार्शनिक, चिंतक और संत थे। वृन्दावन में श्रीनाथ जी के मंदिर की स्थापना इन्होंने ही की और शुद्धाद्वैतावाद का प्रतिपादन किया। शंकराचार्य के अद्वैतवाद का इन्होंने खण्डन किया और ब्रह्म की व्यापकता को प्रतिष्ठित किया। इनकी भक्ति को पुष्टिमार्गी कहते हैं। पुष्टि का अभिप्राय – पोषण अथवा ईश्वर का अनुग्रह प्राप्त होना है। ‘पुष्टिम तदनुग्रह:”। दिव्य गुणों से सम्पन्न कृष्ण भगवान को इन्होंने पुरुषोतम्ब्रह्म माना है। अपने पुत्र विट्ठलनाथ के सहयोग से इन्होंने अष्टछाप की स्थापना की जिसमें आठ भक्त कवि थे सूरदास, कुम्भनदास, परमानन्दास, कृष्णदास, जो वल्लभ के शिष्य थे। बाकी के चार नंददास, गोविंदस्वामी, छीतस्वामी और चतुर्भुजदास विट्ठलनाथ के शिष्य थे। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि हिंदी का भक्ति साहित्य दक्षिण से प्रभावित है। संतकाव्य, रामकाव्य और कृष्णकाव्य प्राचीन भारतीय परम्परा का स्वाभविक रूप है एवम इस युग का सूफ़ी काव्य मुसलमानों की देन है।

कबीर की उत्पति के सम्बंध में अनेक प्रकार के अपवाद प्रचलित हैं। कहते हैं, काशी में स्वामी रामानंद का एक भक्त ब्राह्मण था जिसकी विधवा कन्या को स्वामी जी ने पुत्रवती होने का आशीर्वाद भूल से दे दिया। फल यह हुआ कि उसे एक बालक उत्पन्न हुआ जिसे वह लहरतारा के ताल के पास फेंक आई थी। जिसे नीरू और नीमा नामक जुलाहे अपने घर ले आए थे जो बालक आगे चलकर कबीरदास के नाम से प्रसिद्ध हुआ। कहते हैं कि आरम्भ से ही कबीर में हिंदू भाव से भक्ति करने की प्रवृति लक्षित होती थी। वे राम-राम जपा करते थे और कभी-कभी माथे पर तिलक भी लगा लेते थे। इससे सिद्ध होता है कि उस समय में स्वामी रामानंद का प्रभाव खूब बढ़ रहा था और छोटे-बड़े, ऊँच-नीच सब तृप्त हो रहे थे। अत: कबीर पर ऐसे भक्ति का यह प्रभाव बाल्यावस्था से ही यदि पड़ने लगा हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। रामानंद जी के महात्म्य को सुनकर कबीर के हृदय में शिष्य होने की लालसा जगी होगी। ऐसा प्रसिद्ध है कि एक दिन वे एक पहर रात रहते ही पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर जा पड़े जहाँ से रामानंद जी स्नान करने के लिए उतरा करते थे। स्नान को जाते समय अँधेरे में रामानद जी का पैर कबीर के ऊपर पड़ गया। रामानंद जी बोल उठे, ‘राम-राम कह’ और कबीर ने इसी को गुरुमंत्र मान लिया। यहीं से उन्होंने रामाननद को अपना गुरु मान लिया।

इसके ठीक विपरीत कुछ लोगों का कहना है कि कबीर मुस्लिम पंथी थे। उनका कहना है कि कबीर ने प्रसिद्ध सूफ़ी फ़कीर शेख़ तकी से दीक्षा ली थी और उन्हीं को कबीर का गुरु मानते थे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कबीरदा के काव्य और व्यक्तित्व का आकलन करते हुए लिखा है – “कबीर की उक्तियों में कही-कही विलक्षण प्रभाव और चमत्कार है। प्रतिभा उन्में बड़ी प्रखर थी, उसमें संदेह नहीं” कबीर की विलक्षण प्रतिभा पर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है – “हिंदी साहित्य के हज़ार वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेखक ऐसा कवि उत्पन्न नहीं हुआ है।” भाषा पर कबीर का ज़बर्दस्त अधिकार था, वे वाणी के डिक्टेटर थे। उनके संत रूप के साथ ही उनका कविरूप बराबर चलता रहता है। कबीर की जितनी भी रचनाएँ मिलती हैं उनके शिष्यों ने उसे बीजक नामक ग्रंथ में संकलित की हैं। इसी बीजक के तीन भाग हैं – साखी, शबद और रमैनी। साखी में संग्रहित साखियों की संख्या 809 है शबद के अंतर्गत 350 पद संकलित है। साखी शब्द का प्रयोग कबीर ने संसार की समस्याओ को सुलझाने के लिए किया है। शबद कबीर के गेय पद हैं। रमैनी के ईश्वर सम्बंधी, शरीर एवम आत्मा उद्धार सम्बंधी विचारों का संकलन है। कबीर निर्गुण भक्ति मार्ग के अनुयायी थे और वैष्णव भ्क्त थे। रामानंद से शिष्यत्व ग्रहण करने के कारण कबीर के हृदय में वैष्णवों के लिए अत्यधिक आदर था। कबीर ने धार्मिक पाखण्डों, सामजिक कुरीतियों, अनाचारों, पारस्परिक विरोधों आदि को दूर करने का सराहनीय कार्य किया है। कबीर की भाषा में सरलता एवम सादगी है, उसमें नूतन प्रकाश देने की अद्भुत शक्ति है। उनका साहित्य जन-जीवन को उन्नत बनाने वाला, मानवतावाद का पोषक, विश्व-बंधुत्व की भावना जागृत करने वाला है। इसी कारण हिंदी संत काव्यधारा में उनका स्थान स्र्वश्रेष्ठ माना जाता है।

जैसा कि वे एक निम्न जाति जुलाहा से संबंध रखते थे कबीर दास अपने विचारों को प्रचारित करने में कड़ी मेहनत करते थे। वे कभी भी लोगों में भेदभाव नहीं करते थे चाहे वो वैश्य, निम्न या उच्च जाति से संबंध रखता हो। वे ख़ुद के अनुयायियों के साथ सभी को एक साथ उपदेश दिया करते थे। ब्राह्मणों द्वारा उनके उपदेशों का उपहास उड़ाया जाता था लेकिन वे कभी उनकी बुराई नहीं करते थे। इसी वज़ह से कबीर सामान्य जन द्वारा बहुत पसंद किये जाते थे। वे अपने दोहों के द्वारा जीवन की असली सच्चाई की ओर आम-जन के दिमाग़ को ले जाने की शुरुआत कर चुके थे-

“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।“2

वे हमेशा मोक्ष के साधन के रूप में कर्मकाण्ड और संन्यासी तरीक़ों का विरोध करते थे। उन्होंने कहा कि अपनों के लाल रंग से ज़्यादा महत्व है अच्छाई के लाल रंग का। उनके अनुसार, अच्छाई का एक दिल पूरी दुनिया की समृद्धि को समाहित करता है। एक व्यक्ति दया के साथ मज़बूत होता है, क्षमा उसका वास्तविक अस्तित्व है तथा इसी के साथ कोई व्यक्ति कभी न समाप्त होने वाले जीवन को प्राप्त करता है। कबीर ने कहा कि भगवान आपके दिल में है और हमेशा साथ रहेगा। तो उनकी भीतरी पूजा कीजिये। उन्होंने अपने एक उदाहरण से लोगों का दिमाग़ परिवर्तित कर दिया कि अगर यात्रा करने वाला चलने के क़ाबिल नहीं है, तो यात्री के लिये रास्ता क्या करेगा-

“जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।“3

उन्होंने लोगों की आँखों को खोला और उन्हें मानवता, नैतिकता और धार्मिकता का वास्तविक पाठ पढ़ाया। वे अहिंसा के अनुयायी और प्रचारक थे। उन्होंने अपने समय के लोगों के दिमाग़ को अपने क्रांतिकारी भाषणों से बदल दिया। कबीर के पैदा होने और वास्तविक परिवार का कोई पुख़्ता प्रमाण मौजूद नहीं है। कुछ कहते हैं कि वो मुस्लिम परिवार में जन्मे थे तो कोई कहता है कि वो उच्च वर्ग के ब्राह्मण परिवार से थे। उनके निधन के बाद हिन्दू और मुस्लिमों में उनके अंतिम संस्कार को लेकर विवाद हो गया था। उनका जीवन इतिहास प्रसिद्ध है और अभी तक लोगों को सच्ची इंसानियत का पाठ पढ़ाता है-

“दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।“4

कबीर दास के अनुसार, जीवन जीने का तरीक़ा ही असली धर्म है जिसे लोग जीते हैं ना कि वे जो लोग ख़ुद बनाते हैं। उनके अनुसार कर्म ही पूजा है और ज़िम्मेदारी ही धर्म है। वे कहते थे कि अपना जीवन जीयो, ज़िम्मेदारी निभाओ और अपने जीवन को शाश्वत बनाने के लिये कड़ी मेहनत करो। कभी भी जीवन में संन्यासियों की तरह अपनी ज़िम्मेदारियों से दूर मत जाओ। उन्होंने पारिवारिक जीवन को सराहा है और महत्व दिया है जो कि जीवन का असली अर्थ है। वेदों में यह भी उल्लिखित है कि घर छोड़ कर जीवन को जीना असली धर्म नहीं है। गृहस्थ के रूप में जीना भी एक महान और वास्तविक संन्यास है। जैसे, निर्गुण साधु जो एक पारिवारिक जीवन जीते हैं, अपनी रोज़ी-रोटी के लिये कड़ी मेहनत करते हैं और साथ ही भगवान का भजन भी करते हैं। कबीर ने लोगों को विशुद्ध तथ्य दिया कि इंसानियत का क्या धर्म है जो कि किसी को अपनाना चाहिये-

“हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।“5

कबीर के गुरु रामानंद ने उन्हें गुरु मंत्र के रूप में भगवान ‘राम’ नाम दिया था जिसका उन्होंने अपने तरीक़े से अर्थ निकाला था। वे अपने गुरु की तरह सगुण भक्ति के बजाय निर्गुण भक्ति को समर्पित थे। उनके राम संपूर्ण शुद्ध सच्चिदानंद थे, दशरथ के पुत्र या अयोध्या के राजा नहीं जैसा कि उन्होंने कहा “दशरथ के घर ना जन्में, ई चल माया किनहा”। वो इस्लामिक परंपरा से ज़्यादा बुद्ध और सिद्ध से बेहद प्रभावित थे। उनके अनुसार

“निर्गुण नाम जपो रहे भैया,
अविगति की गति लाखी ना जैया।”6

उन्होंने कभी भी अल्लाह या राम में फ़र्क नहीं किया, कबीर हमेशा लोगों को उपदेश देते कि ईश्वर एक है बस नाम अलग है। वे कहते हैं कि बिना किसी निम्न और उच्च जाति या वर्ग के लोगों के बीच में प्यार और भाईचारे का धर्म होना चाहिये। ऐसे भगवान के पास अपने आपको समर्पित और सौंप दो जिसका कोई धर्म नहीं हो। वो हमेशा जीवन में कर्म पर भरोसा करते थे। भारतीय समाज की जटिल संरचना और बदलते सामाजिक प्रतिमानों के कारण कबीर के अध्ययन की पद्धति में बदलाव आता रहा है कबीर की अध्ययन की पद्धति बहुधा प्रचलित सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों से प्रभावित होती रही है। समाज सुधारक, उपदेशक से लेकर कबीर के समाज विरोधी स्वरूप की व्याख्या समय-समय पर होती रही है। हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल है कि क्या कबीर का कोई साहित्यिक महत्व है जिसके आधार पर हम उनका अध्ययन हिन्दी साहित्य में करें? अगर कबीर का मूल कार्य समाज सुधार या उपदेशक पर ही केन्द्रित था तो निश्चित रूप से आचार्य शुक्ल नाथों, सिद्धों और जैनों के साहित्य की तरह कबीर को साहित्य में शामिल करते। असल में कबीर को साहित्य के भीतर जगह देने में आलोचकों को कभी असुविधा नहीं हुई बल्कि समस्या यह रही कि कबीर का साहित्यिक स्थान कितना बड़ा हो, यह तय करने में।

आज के मशीनी युग में भी आवश्यकता कबीर के धर्म, उनकी सहज भक्ति से प्रेरणा लेने की है। जिसमें कोई जटिलता नहीं है। हृदय से प्रभु को नमस्कार करो। उसके दिये जीवन, सुख-दुख का सम्मान करो। उसे सत्कर्यों में लगाओ। कबीर के धर्म में निरर्थक पाखण्डों और कर्मकाण्डों के लिए कोई स्थान नहीं था। इस मार्ग पर चलकर मनुष्य आज भी वास्तविक मानसिक शांति पा सकता है। अन्यथा तीर्थों, मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों में भक्तों की भीड़ तो उमड़ी रहती है, किंतु कोई पूर्णतया सुखी नहीं दिखायी देता, क्योंकि उनके सुख और संतुष्टि भी भौतिक इच्छाओं के दायरे में सिमटे हैं और उन्हें वास्तविक संतोष का अनुभव हुआ ही नहीं है। वह ईश्वर की उपासना करके भी धन-सम्पति, भौतिक सुख-सुविधाएँ ही माँगता है। वास्तविक सुख का न तो उन्हें अनुभव है, न ही उसकी कामना है। कबीर का धर्म उन्हें उस सुख का अनुभव कराने में समर्थ है। कबीर ने तो अपने ‘साहब’ ईश्वर की पहचान बताई और कहा कि मेरा वही एक भगवान है और उसी को समर्पण करते हैं-

“जन्म-मरन से रहित है, मेरा साहिब सोय,
बलिहारी उस पीव की, जिन सिरजा सब कोय।”7

कितना सरल है कबीर का धर्म, कितनी सहज है उनकी भक्ति और कितने सुलभ हैं कबीर के ईश्वर। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि कबीर किसी धर्म-विशेष के प्रति दुराग्रह नहीं रखते थे, बल्कि उनका विरोध, धर्म की आड़ लेकर हो रहे पाखण्डों, उस कट्टरता से था, जो धर्म का वास्तविक उद्देश्य नहीं था। उनकी दृष्टि में धर्म न तो पूजा-पाठ में है, न ही दूसरे धर्मों की निरर्थक आलोचना में। मोक्ष की कामना करने वाले के मन में सच्ची भक्ति होनी चहिए, इसीलिए उन्होंने धर्म में वैचारिक स्तर पर सुधार के लिए अपने स्तर पर तीव्र प्रयास किये। किसी भी समाज की मूलभूत विशेषता उसकी धर्म-सम्बंधी धारणाएँ, मन्यताएँ, परम्पराएँ होती हैं। धर्म ही व्यक्ति के व्यवहार, सोच को स्पष्टत: प्रभावित करता है। कबीर के अनुसार केवल सुबह-शाम स्नान-संध्या धर्म नहीं, बल्कि अच्छे विचार और अच्छे कर्म- धर्म होते हैं। धर्म का नाम लेकर यदि किसी को सताया जा रहा है, तो ईश्वर की दृष्टि में इससे बड़ा पाप और कोई नहीं हो सकता। किसी भी व्यक्ति की शारीरिक-मानसिक पीड़ा का कारण यदि धर्म को बनाया जा रहा है, तो वह उसका दुरुपयोग है। धर्म सभी को समानतापूर्वक, ससम्मान जीने के अवसर देता है। धर्म का उद्देश्य आपस में लोगों को जोड़ना होता है। धर्म न तो दूरियाँ पैदा करता है, न ही उन्हें बढ़ावा देता है। आधुनिक युग में, धर्म में भी कबीर के दृष्टिकोण को आदर्श मानकर सुधार की आवश्यकता है, क्योंकि आज मनुष्य की सारी सोच-सामर्थ्य धर्म के आडम्बरों में ही व्यर्थ हो रही है। इसीलिए वह न तो अपने लिए और समाज के लिए कुछ सकारात्मक कर पाता है। कबीर का ध्येय लोगों को दैनिक संकीर्णताओं से ऊपर उठाकर उनमें मानवीयता व एकता की भावना का संचार करने का रहा है। कबीर और अन्य संत-सुधारकों में एक मौलिक अंतर यही रहा है कि कबीर की सुधार की भाषा अत्यंत तीखी रही और सम्भवत: कटाक्ष्पूर्ण होने के कारण अधिक असरदार भी रही। जो आज प्रासंगिक है। आज फिर से कबीर की आवश्यकता है, जो दूसरों को समझा सके, उन्हें सही मार्ग दिखाकर उस पर चलने के लिए बाध्य कर सके, प्यार से नहीं, तो डाँट-फटकार कर।

संदर्भ ग्रंथ :

1. हिंदी-साहित्य का इतिहास : डॉ. नगेंद्र
2. भारतीय संस्कृति एवम धर्म : ब्रजराज स्वरूप
3. कबीर-समग्र – युगेश्वर
4. कबीर-ब्रंथावली – श्यामसुंदर दास
5. वही
6. कबीर वाणी-संग्रह : डॉ. पारसनाथ तिवारी
7. वही

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