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ISSN 2292-9754

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07.02.2016


हिन्दी कवियों की राष्ट्रीयता एवं "दिनकर जी"

यह निर्विवाद है कि कवि जिस परिवेश में रहता है, उससे उसमें विचारों एवं भावों का सम्प्रेषण होता ही है, इसी को युग-बोध, सामाजिकता या सामयिकता कुछ भी कहा जा सकता है। युग-प्रतिनिधि कवि, परिवेश द्वारा संप्रेषित संवेदनों को ग्रहण करता है और यथावसर उन्हें अपने कार्य-कौशल से व्यक्त भी करता रहता है। वस्तुतः सम्प्रेषण व्यापार के दो छोर हैं- एक परिवेश और दूसरा व्यक्ति। परिवेश प्रभाव भेजता है और व्यक्ति कुशाग्रता से उसे ग्रहण करता है। परिवेश एवं संस्कृति से प्राप्त प्रभाव को काव्य में प्रस्तुत करते ही कवि युग-प्रतिनिधि के महत्वपूर्ण पद पर आसीन हो जाता है। भारतीय संस्कृति की दृष्टि प्रारम्भ से ही आत्मवादी रही है, जिसने अपनी उपलब्धि की सीमा में समग्र दृष्टि को समेट लिया है और यह मानवतावादी दृष्टिकोण ही है जो लोक-मंगल की भावना से अनुप्राणित है। हिन्दी की काव्य-दृष्टि भी हमेशा से लोक-कल्याणपरक रही है, जिसके अनुसार सभी रचनाकारों ने सामाजिक प्राणीमात्र के कल्याण की कामना की है। वस्तुतः हिन्दी कवियों की राष्ट्रीयता संकुचित न रहकर अपनी वृहतर परिधि में विश्व-प्रेम तथा विश्व-मंगल की कामना में व्यक्त हुई है। भारतीय दार्शनिक, साहित्यकार एव जनमानस ने "सर्वे भवन्तु सुखिनः" ने विश्व-बंधुत्व की उदात भावना का पोषण किया है। जिनमे तुलसी, सूर, कबीर से लेकर निराला तक सभी कवियों ने कहीं भी अपने रचना में संकुचित राष्ट्रीयता का पोषण नहीं किया, बल्कि सभी ने आदर्शों तथा सार्वभौम मूल्यों की प्रतिष्ठा की है। ये सब उच्च मूल्यों के प्रलोभन में देश की राजनीतिक एवं सामाजिक चुनौती को खुलकर स्वीकार नहीं कर पाए। अगर ध्यान दिया जाए तो उनकी लेखनी का आधार अन्तराष्ट्रीय ही रहा, जिससे देश की राष्ट्रीयता की विशेष क्षति हुई। इन कवियों ने खुलकर कभी भी विदेशियों के शोषण तथा अत्याचारों के विरुद्ध अपना स्वर तीव्र नहीं किया। तुलसी राम-भक्ति में लीन रहे तो सूर, कृष्ण की बाल-क्रीड़ाओं में। इधर प्रसाद शैव-दर्शन में तन्मय होकर युग की पुकार से कतराते रहे और रवीन्द्रनाथ ठाकुर भी रहस्य की अनुभूति में विलय हो गए। हाँ, भारतेन्दु ने देश-दशा की ओर थोड़ा-बहुत ध्यान दिया, किन्तु बड़ा ही संतुलित –

"अँग्रेज़ राज सुख साज सजे सब भारी।
पै धन विदेश चलि जात यहै अति ख्यारी"॥

अँग्रेज़ों के राज्य तथा सुख-लाभों की प्रशंसा करते हुए बड़ी सावधानी से उन्होंने परिस्थिति का संतुलन कर कहा की कष्ट है तो केवल यह कि भारत का धन विदेशों को चला जा रहा है। यथार्थ-बोध तो उन्हें हुआ, किन्तु जो कुछ कहा, वह दबी जबान से डरते-डरते पर उस समय इतना कह देना भी अत्यंत साहस का काम था। भरतेन्दु जी ने राष्ट्रीयता का सूत्रपात तो किया आशा थी कि राष्ट्रीयता का उतरोतर विकास होगा, किन्तु छायावादी कवियों ने इस आशा पर तुषाराघात कर दिया। वे वेदान्त के रहस्यवाद तथा शैव-दर्शन के निभृत निकुंजों में जा बैठे। युग की ललकार सुनने से पहले ही जैसे उन्होंने कानों में उँगली डाल ली। देखें तो मैथलीशरण गुप्त की "भारत भारती" और माखनलाल चतुर्वेदी की "वाणी" में राष्ट्रीयता का स्वर तीव्र तो हुआ, किन्तु प्राचीन परंपरा का प्रभाव उन पर बना रहा। "दिनकर" पहले कवि हैं, जिन्होंने देश-दुर्दशा को देखा और खुलकर क्रांति के गीत गाए। उनका कवि दासता की कठोर बेड़ियाँ काटने को अधीर हो उठा। विद्रोही एवं विरोध के स्वर उनके काव्य में अत्यंत तीव्र हो उठे। उद्बुद्ध राष्ट्रीय-चेतना ने जन-जीवन में शक्ति का संचार किया, वे अपनी राष्ट्रीय विचारधारा के कारण आधुनिक युग के भूषण बन गए हैं। इनके "हुंकार" में जो हुंकार सुनाई दी, उसने राष्ट्र को जगा दिया। यद्यपि "हुंकार" चिंतन तथा समाधान-प्रधान नहीं था, फिर भी उसने भारतीय रक्त को खौलाया ही। "दिनकर" की राष्ट्रीयता वस्तुतः उस दासता को समाप्त करने के लिए छटपटा रही थी। जब गाँधीजी के नेतृत्व में कठिन क्रांति का पथ प्रशस्त किया जा रहा था उस समय दिनकर अपने काव्य के माध्यम से खुलकर मैदान में आए और उन्होंने शक्ति, शौर्य तथा तलवार से स्वतन्त्रता प्राप्ति के उद्बोधन के गीत गाए। राष्ट्र को उसके अतीत के शौर्य एवं गौरव का स्मरण कराया। हृदय से प्रेम और सौन्दर्य का उपासक कवि शक्ति और शौर्य का आराधक बन गया। दिनकर हिमालय को संबोधित करते हुए कहते हैं –

"सिंह की हुंकार है हुंकार निर्भय वीर नर की।
सिंह जब वन में गरजता है,
जन्तुओं के शीश फट जाते,
प्राण लेकर भीत कुंजर भागता है।
योगियों में, पर, अभय आनन्द भर जाता,
सिंह जब उनके हृदय में नाद करता है॥"

अपने काव्य के विषय में "दिनकर" ने जितना आत्म-मंथन किया है, उतना अन्यत्र दुर्लभ है। वे अपनी राष्ट्रीयता को एक सामाजिक पक्ष स्वीकार करते हुए कहते हैं – "संस्कारों से मैं कला के सामाजिक पक्ष का प्रेमी अवश्य हो गया था, किन्तु मेरा मन यही चाहता था कि गर्जन-तर्जन से दूर रहूँ और केवल ऐसी ही कविताएँ लिखूँ, जिनसे कोमलता और कल्पना का उभार हो। ............ और सुयश तो मुझे "हुंकार" से ही मिला, किन्तु आत्मा मेरी अब भी "रसवंती" में बसती है........ राष्ट्रीयता मेरे व्यक्तित्व के भीतर से नहीं जन्मी, उसने बाहर से आकार कुझे आक्रांत किया है।" दिनकर के कवि व्यक्तित्व के तीन प्रमुख गुण हैं – भारत के अतीत की गौरवपूर्ण परंपरा, सामयिक परिवेश का प्रभाव और छायावादी संस्कार। दिनकर जी दासता के पाश आबद्ध भारत को देखकर शताब्दियों पूर्व के उसके विश्वव्यापी अतीत गौरव को प्रेरणा-स्रोत के रूप में विस्मृत नहीं कर पाए। अपने अतीत में प्रगति, शक्ति एवं शौर्य के शिखर पर आसीन विजेता भारत को आज क्या हो गया है? इसका तुलनात्मक चित्रण किस देश की स्वतन्त्रता के लिए प्राणार्पण करने को प्रस्तुत नहीं करेगा? मन में स्थित देशभक्ति की भावना से उन्होंने अतीत का गौरव-गान किया है। वर्तमान में दासता का अपयशपूर्ण जीवन जो सर्वथा अभिशाप के रूप में है, उससे मुक्ति की उत्कट भावना से उनकी जीवित राष्ट्रीयता का उदय हुआ है। दिनकर के कवि-व्यक्तित्व के इन आयामों की त्रिवेणी में राष्ट्रीय-चेतना की गंगा सबसे वेगवती रही है। भले ही सामयिकता के प्रभाव से उत्पन्न काव्य-रचना उनकी रुचि के विरुद्ध रही हो या वह बाहर से आरोपित हो, किन्तु कवि को सर्वाधिक यश उनकी राष्ट्रीय-चेतना से उदबद्ध कविताओं से ही मिला है। आज भी "कुरुक्षेत्र" जो सामाजिक माँग का काव्य है, "उर्वशी" से अधिक महत्वपूर्ण है। संभवतः परिवेश का यह प्रभाव, जिससे राष्ट्रीयता का उदय हुआ है, कवि-व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बन गया है, नहीं तो बाहर से आरोपित इस राष्ट्रीयता से श्रेष्ठ काव्य-ग्रन्थों की रचना कहाँ संभव थी? इसी कारण "दिनकर" के काव्य में बाहर से आक्रांत करने वाली राष्ट्रीयता को महत्व-मूल्यांकन की दृष्टि से प्रथम स्थान मिला है और उनकी ही प्रेम विषयक रचनाओं को दूसरा। पराधीन-भारत की दुर्दशा से क्षुब्ध दिनकर रुद्र और भवानी का आह्वान करते हुए विद्रोह, विप्लव और क्रान्ति का संदेशवाहक और प्रणेता बन गया है -

"क्रान्ति-धात्री! ओ क्रान्ति जाग उठ आडंबर में आग लगा दे,
पतन पाप पाखंड जले, जग में ऐसी ज्वाला सुलगा दे।"

दिनकर जी की राष्ट्रीयता के तत्व हैं – शक्ति, क्रांति विद्रोह और विनाश। उनकी राष्ट्रीयता गाँधीजी की विचारधारा से भी प्रभावित है, साथ ही अतीत की गौरवमय परंपरा भी "दिनकर" की राष्ट्रीयता के अंतर्गत है। दिनकर की राष्ट्रीयता अधिकांशतः भाव-प्रवण है। उसमें चिंतन कम तथा भावावेश और आवेग अधिक है। पराधीन वातावरण में अँग्रेज़ों के शोषण तथा अत्याचारों के विरुद्ध उनमें प्रतिक्रिया विद्यमान है, जिससे उमंग, उत्साह तथा प्रेरणा को शक्ति मिलती है। श्री तारकनाथ बाली ने दिनकर की राष्ट्रीयता पर प्रकाश डालते हुए लिखा है – "दिनकर को समकालीन भाव-बोध ने जिस उग्र भाववादी राष्ट्रीयता की ओर प्रेरित किया, उसने अपने अनुकूल नए बिंबों की योजना भी की। तलवार, रक्त, क्रांति, अग्नि, जलन, विष, तूफ़ान आदि के रूपों के प्रयोग द्वारा उग्र, कठोर भावों की अभिव्यक्ति की है। हिमालय, गंगा और प्राचीन महापुरुषों के आख्यान भी इसी राष्ट्रीयता के अंश हैं। समग्र काव्य साधना में दिनकर की राष्ट्रीयता का स्थान निर्धारण अत्यंत जटिल एवं विवादास्पद है। एक ओर उन्होंने हिंसा तथा क्रांति आदि पर बल दिया है तो दूसरी ओर प्रणय तथा करुणा के गीत भी गाए हैं। हिंसा के साथ-साथ उन्होंने अहिंसा तथा विश्व-प्रेम की कामना भी की है।" अंत में दिनकर की राष्ट्रीयता अपने आदर्श रूप में मानवतावाद में परिणत हो गई पर कहीं-कहीं उनकी दृष्टि सर्वत्र द्विधायुक्त रही है। कहीं वे गाँधीजी की विचारधारा के समर्थक हैं तो कहीं विरोधी। फिर भी यह द्विधाग्रस्त व्यक्तित्व सत्य, प्रेम और अहिंसा की ओर से अधिक उन्मुख रहा है और यह सब जीव-जगत के शाश्वत मूल्य हैं। उनके काव्य में भीष्म, युधिष्ठिर, कर्ण, बुद्ध सभी के चरित्र शक्ति से मंडित होते हुए भी आदर्श के प्रतीक हैं। अस्तु "दिनकर" जी की राष्ट्रीयता की चरम परिणति भारतीय आदर्शवाद में ही होती है और आदर्शवाद भारत की अतीत परंपरा का ही अभिनव रूप है। यहाँ दिनकर राष्ट्र-भक्ति की बुझती हुई शिखा को नया जीवन देने के लिए याचना करते हैं –

"धुंधली हुई दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुँआ-सा।
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है,
मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है?
डाँट! पुकार मेरी, संदीप्त को जिला दे,
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे !
प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ,
चढ़ती जवानियों का शृंगार माँगता हूँ।"

दिनकर जी के कवि व्यक्तित्व के दो पहलू हैं – एक सामाजिक या राष्ट्रीय और दूसरा व्यक्तिगत या प्रणयी। दोनों की परिणति मानवातावादी है। दोनों में आदर्शवाद एवं अध्यात्मवाद का समन्वित रूप व्यंजित है। उनकी राष्ट्रीयता सामयिक माँग है। जब देश संकटग्रस्त होता है या रहा है, उस समय वे क्रांति, विरोध तथा विद्रोह के गीत गाते हैं और शांत-काल में उनका मन प्रेम, सौन्दर्य एवं आनंद की ओर अग्रसर होता है। शांति-काल की नवीन दिशाएँ निर्माण तथा विकास के क्षेत्र की ओर बढ़ती है। दिनकर की राष्ट्रीयता युद्ध-काल की राष्ट्रीयता है –

"बल के सम्मुख विनत भेड़-सा,
अंबर शीश झुकाता है,
इससे बढ़ सौन्दर्य दूसरा
तुमको कौन सुहाता है?
है सौन्दर्य शक्ति का अनुचर,
जो है बाली वही सुंदर,
सुंदरता निस्सार वस्तु है
हो न साथ में शक्ति अगर?"

वह एक आपद धर्म है। उनके प्रणय-गीत शांति-काल में उभरते हैं जो राष्ट्रीयता के शाश्वत मूल्यों का चित्रण करते हैं। संक्षेप मे कहें तो दिनकर की राष्ट्रीयता एक ओर जहाँ सामयिक माँगो की पूर्ति करती है, वहीं अतीत से निरंतर जीवित भारतीय शांतिवादी धारा से भी दौड़ी हुई है। दिनकर की राष्ट्रीयता की यह अत्यंत महत्वपूर्ण विशेषता है। दिनकर की समग्र काव्य-साधना पर संक्षेप में प्रकाश डालते हुए श्री तारकनाथ बाली ने लिखा है – "जब इस समग्र रूप में दिनकर को देखने का प्रयास करते हैं तो स्पष्ट हो जाता है कि दिनकर उस पुनरुत्थानवादी धारा के कवि हैं जो भारतेन्दु हरिश्चंद्र से प्रारम्भ होकर द्विवेदी युग से होती हुई छायावादी काव्य में परिणत हुई। छायावादी काव्य मूल रूप में तथा व्यापक रूप में पुनरुत्थानवादी काव्य हैं, जिसका मूल स्वर वेदान्त का है। जिस प्रकार प्रसाद ने चन्द्रगुप्त मौर्य आदि के माध्यम से प्राचीन पात्रों में कर्म और शक्ति का सौन्दर्य दिखाया है, उसी प्रकार दिनकर ने भीष्म आदि प्राचीन पात्रों के माध्यम से कर्म और क्रांति का प्रेरक वर्णन किया है। प्रसाद में जो कर्म का वेग है, वही दिनकर में आकार क्रान्ति का नाद बन गया है। लेकिन इस विकास को समझने के लिए दिनकर को उन परिस्थितियों के बीच रखकर देखना होगा जो स्वाधीनता के आंदोलन ने पैदा की थी। शांति और क्रांति का जो वेग खुलकर दिनकर में व्यक्त हुआ है, वह अन्य कवियों में कम दिखाई देता है। उसी में दिनकर की विशेषता है, भारतीय आदर्शवादी परंपरा दिनकर के काव्य में पूर्ण शक्ति के साथ व्यक्त हुई है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता"।

डॉ रवीन्द्र भ्रमर ने – "कवि दिनकर कृतित्व में राष्ट्रीयता की भावना को प्रमुख माना गया है। इनकी अनेक रचनाओं में भारतीय संस्कृति और उसके प्राचीन गौरव का ओजपूर्ण शैली में वर्णन किया गया है। इनके कुछ रचनाओं में भारत की वर्तमान दशा के प्रति क्षोभ प्रकट किया गया है और स्वदेश के उद्धार तथा उत्थान के लिए सोई हुई राष्ट्रीय चेतना को जागरण का संदेश दिया गया है। दिनकर जी की राष्ट्रीय भावना ने महात्मा गाँधी की अहिंसा से बहुत कम मात्रा में समझौता किया। इनकी राष्ट्रीयता नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वारा निर्दिष्ट पथ पर चली है। इन्होंने तलवार और पौरुष के बल पर राष्ट्रोद्धार की कल्पना की है, इसलिए इन्हें "वीर-रस" का कवि कहा जाता है। इनकी वाणी में ओज और शक्ति है, आप शांति नहीं, क्रांति के गायक हैं। इस दृष्टि से इनकी तुलना बंगाल के काज़ी नज़रुल इस्लाम और उर्दू के महाकवि जोश से की जा सकती है"। राष्ट्र-प्रेम की भावना से ओत-प्रोत कवि का यह उदाहरण देखा जा सकता है –

"नहीं जीते जी सकता देख
विश्व में झुका तुम्हारा भाल।
वेदना मधु का भी कर पान
आज उगलूँगा गरल कराल।"

दिनकर जी के काव्य के संबंध में यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि वे वाद विशेष से बँध कर नहीं चले हैं। यद्यपि उन्होंने भी छायावादी युग में प्रेम और सौन्दर्य की रचना की है। छायावादी कवियों की भाँति उन्होंने भी प्रेम और सौन्दर्य के गीत गाए हैं, फिर भी हम दिनकर जी को छायावादी कवि नहीं कह सकते। किसान, मज़दूर और शोषित वर्ग का पक्ष समर्थन करते हुए भी दिनकर प्रगतिवादी कलाकार नहीं हैं, क्योंकि उन्होंने रूस के मार्क्सवाद का आँख बंद कर समर्थन नहीं किया है। प्रयोगवादी कवियों की भाँति दिनकर ने भी अपनी काव्य-रचना मे नए प्रयोग किए हैं, फिर भी प्रयोगवादी कवियों की गणना में दिनकर जी का नाम नहीं आता। सच तो यह है कि दिनकर जी आधुनिक हिन्दी काव्यधारा की सभी प्रमुख प्रवृतियों के साथ रहकर भी सबसे अलग और सबसे ऊपर हैं। वे अपने आप में पूर्ण हैं, उनकी काव्य-प्रतिभा स्वयं ही बड़ी उदात और तेजस्विनी है। आधुनिक हिन्दी काव्यधारा में इसीलिए उनका विशिष्ट स्थान है।

संदर्भ ग्रंथ :

1. भारतेन्दु हरिश्चंद्र और हिन्दी नवजागरण की समस्याएँ – रामविलास शर्मा – राजकमल प्रकाशन
2. हुंकार – रामधारी सिह "दिनकर" – राजपाल प्रकाशन
3. रसवंती – रामधारी सिह "दिनकर" – उदयाञ्चल प्रकाशन
4. भारतीय काव्य सिद्धान्त - तारकनाथ बाली – हिन्दी माध्यम कार्यालय निर्देशलय, नई दिल्ली
5. रामधारी सिह "दिनकर" - डॉ रवीन्द्र भ्रमर – उद्याञ्चल प्रकाशन, पटना

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