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ISSN 2292-9754

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12.05.2015


कुछ लोग जी रहे हैं

कुछ लोग जी रहे हैं वहमो-गुमान में
वो सोचते हैं हम ही हैं बस इस जहान में

जब वो नहीं तो अब इसे हम घर ही क्या कहें
दम घुटने लगा है मेरा खाली मकान में

अब देखते हैं उसका निशाना बनेगा कौन
बाक़ी है तीर आख़री उनकी कमान में

वो आसमाँ को छू के ही लौटेंगे अब तो बस
क्या हौंसला है देखिए नन्हीं सी जान में

औरों के वास्ते जो करते हैं बददुआ
रहता नहीं कोई असर उनकी ज़बान में

‘इरशाद’ दिल का साफ़ है ये जानता हूँ मैं
सौ ऐब होंगे माना यूँ तो उस नादान में


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