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ISSN 2292-9754

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12.05.2015


आदमी ख़ुद से मिला हो तो

आदमी ख़ुद से मिला हो तो ग़ज़ल होती है
ख़ुद से ही शिकवा-गिला हो तो ग़ज़ल होती है

अपने जज़्बात को लफ़्ज़ों में पिरोने वालो
डूब कर शेर कहा हो तो ग़ज़ल होती है

ग़ैर से मिलके जहाँ ख़ुद को भूल जाय कोई
कभी ऐसा भी हुआ हो तो ग़ज़ल होती है

दिल के ठहरे हुए ख़ामोश समन्दर में कभी
कोई तूफ़ान उठा हो तो ग़ज़ल होती है

बेसबब याद कोई बैठे-बिठाए आए
लब पे मिलन की दुआ हो तो ग़ज़ल होती है

सिर्फ़ आती है सदा दूर तलक कोई नहीं
उस तरफ कोई गया हो तो ग़ज़ल होती है

देखो ‘इरशाद’ ज़रा गौर से सुनना उसको
गुनगुनाती सी हवा हो तो ग़ज़ल होती है


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