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03.01.2014


खाली प्याले, निचुड़े नीम्बू

खाली प्याले, निचुड़े नीम्बू, टूटे बुत सा अपना हाल
कब सुलगी दोबारा सिगरेट, होकर जूते से पामाल

रैली,परचम और नारों से कर डाला बदरंग शहर
वोटर को फिर ठगने निकले, नेता बनकर नटवरलाल

चन्दा पर या मंगल पर बसने की जल्दी फिक्र करो
बढती जाती भीड़, सिमटती जाती धरती सालों साल

गांधी-गर्दी ठीक है लेकिन ऐसी भी नाचारी क्या
झापड़ खाकर एक पे आगे कर देते हो दूजा गाल

यार, बना कर मुझको सीढ़ी, तू बेशक सूरज हो जा
देख कभी मेरी भी जानिब, मुझको भी कुछ बख्श जलाल

उनके चाँदी के प्यालों में गुमसुम देखी लालपरी
अपने काँच के प्याले में क्या रहती थी खुशरंग-जमाल


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