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05.03.2012
 

घरों के द्वार से परदे उड़ा रही है हवा
मनोज अबोध


घरों के द्वार से परदे उड़ा रही है हवा
गली गली में भँवर से उठा रही है हवा

मैं उसको रोक सकूँ, मेरे बस में है ही नहीं
किवाड़ बंद हैं, झिर्री से आ रही है हवा

मुझे ख़बर है महक किसकी साथ में लाई
गुज़र के आई कहाँ से बता रही है हवा

वही मिठास, वही रस वही लपक वही लय
मधुर सा गीत कोई जैसे गा रही है हवा

न जाने कबसे सफ़र में है पर थकी ही नहीं
न जाने कौन सी दुनिया से आ रही है हवा

बुझे हैं चंद दिए तो शिक़ायतें न करो
चिराग़ कितने घरों के जला रही है हवा


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