अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
 

चढ़ते दरिया को अभी पार भी करना है मुझे
मनोज अबोध


चढ़ते दरिया को अभी पार भी करना है मुझे
भावनाएँ हैं तो इज़हार भी करना है मुझे

सिर्फ़ झगड़ा ही कराना मेरी आदत क्यों हो
फ़ैसले के लिए तैयार भी करना है मुझे

याद है आपके अहसान ज़ुबानी मुझको
वक़्त पर आपका आभार भी करना है मुझे

ये ही बेहतर है उसे और न रोकूँ टोकूँ
घर का अब बेटे को मुख़्तार भी करना है मुझे

जागते रहने की पूछी जो वजह, तो बोले
नींद से पहले तुम्हें प्यार भी करना है मुझे


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें