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02.18.2014


सरकार की लाडली बेटी है महँगाई

हमारी सरकार की सबसे लाडली बेटी का नाम है महँगाई, पैदा होते ही इसकी बढ़ने लगी थी लम्बाई। तीन वर्षों में ही छः फुट सवा सात इंच की हो गई है, उसकी लाज शर्म देश की अस्मिता की तरह से न जाने कहाँ खो गई है । गरीब देश की बेटी है इसलिए अमरीका जैसे किसी भी राष्ट्र को परवाह नहीं है, विश्व बैंक को भी काबू में लाने की चाह नहीं है। हर कोई जानता है कि गरीब की बेटी को कर्ज ले कर ही ब्याहा जाता है, उधार ले कर पिए गए घी का मूलधन कब चुकाया जाता है । इसके ताऊ मनमोहन सिंह जी जाने माने अर्थशास्त्री हैं परन्तु इसकी तेज गति को भाँप नहीं पाये, चच्चा चिदंबरम भी इसके मन की गहराईयों में झाँक नहीं पाए। दादी सोनिया ने जरूर इसके ऊँचे होते हुए कद पर चिन्ता जताई थी, राहुल भैया की चिन्ता उन्हें दूसरों से पहले समझ में आई थी। पर चच्चा चिदंबरम ने साफ कह दिया मेरे पास जादू कोई छड़ी नहीं है कि इसे बौना बना दूँ, हाँ इतना कर सकता हूँ कि इसकी सांवली सूरत को सलौना बना दूँ।

जब यह पैदा हुई थी तब चाटुकार रिश्तेदारों ने कहा था कि घर में लक्ष्मी आई है, परन्तु कुछ हितचिन्तकों ने चिन्ता जताते हुए कहा था- ताऊ यह तो साक्षात महँगाई है। देश में हो रही कन्याओं की भ्रूण हत्यायों की तरह इसकी भी हत्या अब तक नहीं कर पाये तो अब जन्म लेते ही इसका टेंटुआ दबा दो, इसे मार कर किसी गहरे गड्ढे में गिरा दो। एक बार खरपतवार की तरह से बढ़ जायेगी तो सच मानों सारे विकास की फसल यह अकेली ही खायेगी। आप ने भले ही देश में कन्याओं का अनुपात घटाया है पर इसे अवश्य ही सिर माथे पर बिठाया है।

यह सच है कि आपके कुछ चमचों ने कहा था कि यह तो विकास की निशानी है, देश में होने वाले भावी विकास रूपी शिशु की प्यारी सी नानी है। महँगाई बढ़ेगी तो लोगों के पास अधिक धन आयेगा, गरीब भी उसे खर्च करने में नहीं शर्मायेगा। रोज छपने वाले नए नए नोटों पर गांधी जी का चेहरा चमचमायेगा, रिक्शावाला भी आटा दाल खरीदने के लिए नोटों का थैला लाद कर ले जायेगा। जब ग्रामों वाली थैली में दाल मिलेगी तभी तो देश की प्रगति की गाड़ी हिलेगी। चलेगी नहीं, लोगों को भरमायेगी, गाड़ी भाग रही है यह जानकर आपकी धाक बैठ जायेगी। लोग समझेंगे उनके वेतन बढ़ रहे हैं, आप दावा करना कि वे विकास की सीढ़ियाँ चढ़ रहे हैं। फिर से इतिहास का वह दौर आयेगा जिसमें लोग रोटी न मिलने पर केक खाते हैं, रोम के जलने पर नीरो तो बाँसुरी ही बजाते हैं।

प्याज के छिलके जैसे आपकी लाडली लोगों के कपड़े उतार रही है, पश्चिमी सभ्यता के नए नए फैशन से देश को सँवार रही है । बदन नंगा होने पर कपड़ा तो बचता है यह सब जानते हैं, पर अपनी नाक रखने के लिए उसे आधुनिक फैशन ही मानते हैं। ऐसी हालत में गुंडों की गंदी नजरों में सरकार की बेटी चढ़ रही है, चच्चा कह रहे हैं कि सट्टेबाजों, जमाखोरों और मुनाफाखोरों जैसे पड़ोसियों की वजह से महँगाई बढ़ रही है। घर में बेरी लगी होगी तो पत्थर आयेंगे ही, जवान महँगाई को देख कर लम्पट पड़ोसी ललचायेगें ही। ताऊ जी ने अपने क्षत्रपों को कह दिया है कि वे ऐसे पड़ोसियों के साथ सख्ती से निपटे, उनके मोहल्ले में कोई महँगाई के साथ न चल पाये सटके। ताऊ को उस वर्ग की सबसे ज्यादा चिन्ता है जो इसे गोद में उठा कर खुश होता है, उसका पूरा भार अपने कंधों पर ढोता है। गरीब के कंधे कमजोर होते हैं यह तो वह भी जानते हैं, पर महँगाई उनकी लाडली है यह भी सब मानते हैं।

अर्थशास्त्री मानते हैं कि महँगाई के बढ़ने से बाजार में रौनक आयेगी, इससे गरीब की बेटी भी पब्लिक स्कूल में पढ़ने के लिए जायेगी। जो रिक्शावाला दिन में दो चार रुपए कमाता था अब वह चार सौ कमाता है, उसका चच्चा के पास पैन कार्ड वाला खाता है। यह दीगर बात है कि कमबख्त का परिवार आज भी आधा पेट खा कर पटरी पर सो जाता है। जिसे बीस के आगे की गिनती नहीं आती थी वह हजारों में गिनना सीख गया है क्योंकि अब वह चिल्लर की जगह नोट कमाता है, और अपने छोटे से जीवन में ही लाखों की झोंपड़ी का मालिक बन जाता है। महँगा रूपी लक्ष्मी की कृपा से अब झोंपड़ी भी पगड़ी के रंग रूप देख रही है, सरकार है कि किसान की एकड़ों में छीनी गई जमीन इंचों की नाप में बेच रही है।

महँगाई का साथ पा कर लोग धन्य हो रहे हैं, महँगाई की जवानी के नशे में दिन रात खो रहे हैं। यह जिसके सिर पर बैठती है उसका सिर ऊँचा उठ जाता है, समाज में उसका रुतबा लक्ष्मी की ठनक सा ठनठनाता है। जिसकी कमर पर चढ़ती है उसे तोड़ डालती है, मध्यवर्ग की पगड़ी भरे बाजार उछालती है। मध्य वर्ग पर ही यह करती है सबसे करारा प्रहार, उसके लिए तो महँगाई है नयनों से भी ज्यादा तीखी कटार। जो गरीब इसे पैरों में बिठाता है वह सीधा नरक में जाता है। हाँ अमीर के लिए यह अवश्य ही पाँव की जूती है, गरीब की बेटी है पर उसके लिए रखैल सरीखी है। इसीलिए बड़ी और भव्य पार्टियों में यह देती नहीं दिखाई, वहाँ पर तो सिर्फ सजावट की चीज ही बन कर रह गई है महँगाई।


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