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03.25.2014


कुछ तो सस्ता भी होता है

"कनछेदी यह बात पूरी तरह से सत्य है कि वर्त्तमान सरकार महँगाई रोकने में पूरी तरह से असफल रही है।" मैंने तमतमाते हुए कनछेदी को घूर कर देखा जैसे वह ही इसके लिए ज़िम्मेदार रहा हो। भले ही मैं महँगाई का कुछ नहीं बिगाड़ सकता था परन्तु मैं कनछेदी को तो कच्चा चबाने के लिए तैयार था। मुझे लग रहा था कि उसे दाँतों में दबाते भी महँगाई भी दब कर मेरे दाँतों के बीच आ जायेगी। जैसे प्राचीन कथाओं के राक्षस के प्राण किसी तोते में होते थे और तोते की गर्दन दबाते ही राक्षस मर जाता था। मुझे लगा महँगाई के प्राण कनछेदी में स्थित हैं और ज्यों ही मैं कनछेदी का गला दबाऊँगा महँगाई छटपटाती हुई धरती पर गिर कर तड़पने लगेगी।

"पर इसमें मेरा क्या कसूर है। महँगाई तो अर्थशास्त्र के नियमों के अनुसार ही बढ़ती घटती है और अर्थशास्त्री मैं नहीं हमारे प्रधान मंत्री हैं जिन्होंने साफ कह दिया है कि इस पर काबू पाना फिलहाल संभव नहीं है। इससे पहले भी उनके कई पूर्ववर्ती यह हमें बता चुके हैं कि महँगाई एक अन्तर्राष्ट्रीय मामला है और इसमें हमारा राष्ट्र अकेले वैसे ही कुछ नहीं कर सकता जैसे अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। जब इतने सालों से लगातार महँगाई के कद को बढ़ता हुआ देख रहे हो तो अब क्यों मक्खी की तरह भिनभिना रहे हो।" कनछेदी ने मेरे नहले पर दहला मारते हुए उत्तर दिया।
"मैं भिनभिना नहीं रहा केवल बता रहा हूँ कि हर चीज़ महँगी हो रही है कोई भी तो चीज़ सस्ती नहीं मिल रही है बाज़ार में।"

"कैसे सस्ती नहीं है ज़रा बतायें। रोज़ ही तो किसी न किसी वस्तु का अभाव हो जाता है। यदि वह सस्ती न हो तो इतनी मात्रा में कोई कैसे खरीदेगा कि उसका अकाल पड़ जाये। आप स्वयं ही तो कहते हो कि आज टमाटर नहीं मिल रहा, कल प्याज़ की कमी थी। कभी रसोई गैस नहीं मिलता तो कभी मिट्टी का तेल गायब हो जाता है। यदि ये सब वस्तुएं मंहगी होती तो कोई उन्हें कैसे खरीदता। यहाँ तो समस्या यह है कि ज्यों ही पेट्रोल, बल्कि किसी भी चीज़ के दाम बढ़ते हैं उसकी खपत में भी बढ़ोतरी हो जाती है। यह सब तो अर्थशास्त्र के सारे नियमों के विरुद्ध हुआ न।" कनछेदी ने अपनी मूँछों पर ताव देते हुए कहा।

"वह तो लोग इस डर से खरीद लेते हैं कि कहीं वह वस्तु बाज़ार से गायब ही न हो जाये। उस डर के मारे अधिक दाम देने के लिए भी तैयार हो जाते हैं। वैसे हर वस्तु के दाम ज़रूरत से ज़्यादा हैं यह तो तुम भी मानोगे।" मैंने कनछेदी को समझाने का असफल प्रयास करते हुए कहा।

"मैं आपकी इस बात से कतई सहमत नहीं हूँ। जब हमारा योजना आयोग सहमत नहीं तो मैं कैसे हो सकता हूँ। योजना आयोग ने कह दिया है कि 32 रुपये प्रतिदिन में गुज़ारा हो सकता है तो महँगाई कैसे हुई जबकि किसी छोटे से छोटे कामगार का भी प्रतिदिन का वेतन इससे चार-पाँच गुना अधिक होता है। फिर भी तुम्हारी तसल्ली के कहता हूँ कि आप मुझे एक महँगी चीज़ का नाम बतायें तो मैं उसके मुकाबले में एक ऐसी चीज़ का नाम लूँगा जो सस्ती हो चुकी होगी।" कनछेदी ने चुनौती देते हुए कहा।

"अरे किस किस चीज़ का नाम गिनाऊँ। आदमी के काम आने वाली हर वस्तु के दाम बढ़ गये हैं।" मैंने कहा।

"आपने ठीक कहा भाई साहब परन्तु इतना तो आप भी स्वीकार करोगे कि आदमी के दाम घट गये हैं। इतना तो मानते हो कि पहले सड़क पर कोई आदमी मर जाता था तो हंगामा हो जाता था। आज तो रोज़ ही सड़क पर आदमी को भेड़ बकरों की तरह ज़िबाह किया जा रहा है। प्रतिवर्ष भारत की सड़कों पर लाखों लोग दुर्घटनाग्रस्त हो कर स्वर्ग सिधार जाते हैं कोई परवाह ही नहीं करता। जितने आदमी कम हो रहे हैं ट्रकों और कारों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है। कितने लोग पटरियों पर एड़ियाँ रगड़ते हुए मर जाते हैं कोई जानता ही नहीं। उनकी कीमत कितनी कम है यह अस्पतालों में फर्श पर पड़े मरते हुए मरीज़ों से पूछ लो। वे स्वयं बता देंगे कि आज उनके प्राण कितने सस्ते हो गये हैं।" कनछेदी ने तर्कशास्त्र का सहारा लेते हुए मुझे समझाया।

"मैं सोने चाँदी की बात कर रहा हूँ। अचानक कितने महँगे हो गये हैं। कहाँ सौ पचास रुपये की बात होती थी अब तीस हज़ार रुपये की बात होती है।" मैंने कनछेदी को कमॉडिटी मार्किट की ओर ले जाने का प्रयास करते हुए कहा।

"पर सोने जैसे बाल और चाँदी जैसे बदन तो हर गली में कितने सस्ते दामों पर बिकने लगे हैं। पहले कुछ बदनाम बाज़ारों में ही ऐसा ज़िंदा गोश्त मिलता था। आज तो पाँच सितारा होटलों और बड़ी-बड़ी पॉश कालोनियों में भी आसानी से उपलब्ध हो जाता है।" कनछेदी ने हमारा ज्ञानवर्द्धन करते हुए बताया।

"हीरे-मोती पर कितना पानी चढ़ गया है, पेट्रोल का दाम फिर से बढ़ गया है। बिजली पानी के बिल देख कर उपभोक्ता कितना डर गया है।" मैंने समझाने का प्रयास किया।

"इसके मुकाबले में बताता हूँ कि आदमी की आँख का पानी मर गया है। जीवन मूल्यों का अवमूल्यन हो गया है। संस्कृति और सभ्यता के दाम गिर गये हैं। आदमी सगे रिश्तेदारों से भी रिश्ता रखने में डर गया है। रिश्तों की औपचारिकतायें निभाने में कितना पैसा खर्च होता था वह खर्चा हर एक घर में बच गया है।" कनछेदी ने बिना झिझके उत्तर दिया।

"गेहूँ गल्ला कितना महँगा है। दालें सब्जियाँ पहाड़ की चोटी पर जा बैठी हैं।" मैंने अपना दर्द स्वर में भरते हुए कहा।

"नैतिकता और लिहाज की कीमतें गहरी खाई में जा गिरी हैं। दोस्ती तक का कोई मोल ही नहीं रहा।" कनछेदी ने मेरा उपहास उड़ाते हुए उत्तर दिया।

"और तो और थैला भर कर रुपया ले जाओ तो थैला भरने लायक सामान नहीं मिलता।" मैंने अन्तिम अस्त्र चलाते हुए कहा।

"यही तो मैं कह रहा हूँ भाई साहब। आप स्वयं मेरी बात का समर्थन कर रहे हैं कि रुपये की कीमत गिर गई है। मान रहे हो न कि रुपया सस्ता हो गया है। इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि सब कुछ महँगा ही महँगा हुआ है। मान लो कि कुछ न कुछ तो हुआ है सस्ता।"

अब मेरे पास अपना सिर पीट लेने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था इसलिए मैंने चुपचाप पकड़ लिया घर का रस्ता।


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