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ISSN 2292-9754

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06.06.2017


कितनी सार्थक होती हैं दूरदर्शन पर होने वाली बहस

आधुनिकता के इस दौर में संभवतः कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं होगा जो दूरदर्शन के माया जाल से बच पाया हो। दूरदर्शन पर सास बहू के नीरस कार्यक्रमों के अतिरिक्त बहुत सा समय प्रतिदिन हर चैनल पर होने वाले वाद विवादों पर व्यय होता है। शायद आज तक किसी ने इस बात पर शोध नहीं किया होगा कि इन करोड़ों लोगों का कितना समय व्यर्थ में बर्बाद होता है। क्षणिक उत्तेजना किसी को भी आकर्षित करती है। लोग चाहे अनचाहे ऐसी बातों में व्यस्त हो जाते हैं जो उन्हें किसी न किसी प्रकार से उतेजित करती हैं। मनुष्य की इसी दुर्बलता का लाभ दूरदर्शन वाले उठाते हैं। कोई विचार अथवा मुद्दा किसी के मन में आया और उस पर वाद विवाद प्रारम्भ हो गया। ऐसे अनेक अनर्गल और पुराने घिसे-पिटे मुद्दे हमें दूरदर्शन पर देखने को मिलते हैं। घंटों उन पर बहस होती है परन्तु उनका कोई परिणाम नहीं निकलता। जब तक मुद्दा बाज़ार में गर्म रहता है चैनल वालों की दुकानदारी ख़ूब चलती रहती है जब तक कि उनके हाथ मे बहस का कोई नया मुद्दा नहीं आ जाता।

यह ठीक है कि दूरदर्शन कोई मिशन लेकर नहीं चलता। किसी भी समस्या की सही-सही जानकारी देना ही उसका कर्त्तव्य होता है और दर्शकों को किसी एक मामले में उलझा कर वह आगे बढ़ जाता है और पीछे छोड़ जाता है कुछ लिजलिजी सोच और याद। कई बार मीडिया को स्वयं यह समझ में नहीं आता कि वह पीछे क्या छोड़ आया है। उदाहरण के तौर दिल्ली में एक लड़की का बलात्कार हुआ। उसे निर्भया नाम दिया गया। नृशंस रूप से उसकी हत्या कर दी गई। लोगों ने लंबे-लंबे जुलूस निकाले। लंबा-चौड़ा कैडल मार्च हुआ। दिल्ली ही नहीं पूरा देश हिल गया। टी.वी. वाले उस ख़बर को कवर करने के लिए पगला गये। दूरदर्शन ने इसका ख़ूब आंनद लिया। महान विद्वानों के पैनल दूरदर्शन पर घंटों ज़ुबानी जंग लड़ते रहे। नेताओं ने लंबे-चौड़े ब्यान जारी किये। दुनियां भर के मुआवज़ों से उसके परिवार वालों की क्षतिपूर्ति करने की घोषणायें हुईं। उसके नाम पर एक कोष स्थापित कर दिया गया जिसमें करोड़ों रुपये जमा हुए। उस राशि का क्या हो रहा है कोई जानता नहीं। प्रश्न यह है कि क्या उससे पहले किसी लड़की का बलात्कार नहीं हुआ था। क्या इसके बाद भी यह घिनौना कुकृत्य बंद हो गया। तो उनको वह सब पीड़ितों को वह कुछ क्यों नहीं मिला जो निर्भया के लिये घोषित किया गया। पत्रकारों को इस नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाता है कि वह ऐसे किसी कुकृत्य से पीड़ित महिला के नाम का ख़ुलासा नहीं करेंगे। इसका भी नहीं किया गया और उसके लिये एक नया नाम सोच लिया गया। किसी ने निर्भया कहा तो किसी ने अनामिका। परन्तु उसकी क्षतिपूर्ति किन को मिली क्या यह दूरदर्शन पर ढोल बजा कर नहीं बताया गया। माता-पिता के साक्षात्कार तक प्रसारित किये गये। इससे उसका परिचय गुप्त कैसे रहा। टी.वी. आने के बाद इसका तो कोई महत्व ही नहीं रहा कि कहाँ कोई दंगा हो रहा है और दोनों गुटों के लोग कौन हैं। दूरदर्शन पर उन्हें साफ़ तौर पर दिखाया जाता है। वाद-विवाद करने के लिये आये विद्वान अपने अपने गुट, जाति, बिरादरी और धर्म का नाम ले लेकर बहसें करते हैं। इससे क्या ऐसी घटनाओं की आग कम होती है अथवा भड़कती है? क्या इसके द्वारा दूरदर्शन समाज को बाँटने का काम नहीं करता? क्या इसे समाज में अधिक ज़हर नहीं घुलता? क्या इससे देश की अखंडता और एकता पर आँच नहीं आती परन्तु किसी को कोई अन्तर नहीं पड़ता। चीख-चीख कर ऐसे तर्क दिये जाते हैं जिनका कोई आधार नहीं होता।

किसी एक सिपाही की हत्या का शोर-गुल जब टी.वी. पर मचता है तो उसके लिये एक करोड़ रुपये के मुआवज़े की घोषणा हो जाती है। उसके बाद में ऐसे शहीद होने वालों का क्या? दोनों की अलग-अलग ्क़ीमत लगाई जाती है क्यांे। इसका अभिप्राय यह निकलता है जब किसी नेता के मन में जो आया उसने घोषणा कर दी जैसे वह पैसा उसकी जेब से दिया जाने वाला हो। जनता और उसके टैक्स का इससे कोई लेना-देना ही नहीं है।

यह तो कुछ अस्थायी बातें हैं जिन्हें दूरदर्शन जब-तब उठा लेता है। ज़रा उन बहसों पर भी विचार किया जाये जो दूरदर्शन के लिये शाश्वत हैं और उनकी कमाई का स्थायी स्रोत और स्वतंत्रता से लेकर आज तक चली आ रही हैं। जैसे भारत-पाक संबंध, कश्मीर समस्या, धारा 370, सामान नागरिक आचरण संहिता, राम मन्दिर, धर्मनिरपेक्षिता बनाम धर्म , बंगलादेश्यिों की घुसपैठ, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी,नेताओें के व्यक्तिगत आचरण इत्यादि दर्जनों ऐसे मामले हैं। जिन पर अनवरत बहसें होती रहीं परन्तु क्या आज तक किसी ने इन समस्यायों का समाधान सुझाने का प्रयास किया? क्या किसी बहस के बाद इस बात की घोषणा हुई कि इस बहस पर इस पैनल ने सर्वसम्मिति से यह निर्णय लिया है? जिसे समाज और देश के सामने प्रस्तुत करते हुए यह अपील की जा रही है कि इस पर गंभीरता से विचार किया जाये। वास्तव में चैनल वालों को इससे कुछ लेना-देना होता ही नहीं। दूरदर्शन का समय समाप्त होता है और विद्वान वक्ताओं की चिल्ल-पौं वहीं समाप्त हो जाती है। इन बहसों का सबसे कमज़ोर पक्ष यह है कि विद्वता के नाम पर बुलाये गये वक्ताओं को उस विषय की कोई गहरी जानकारी ही नहीं होती। अचानक एक विषय तय होता है और फटाफट जो सामने उपलब्ध होता है उसे बुला लिया जाता है अथवा भेज दिया जाता है। न उनकी होम वर्क करने में रुचि होती है और न ही उनके पास समय। विभिन्न राजनैतिक दलों के प्रवक्ता भी प्रत्येक विषय पर बोलने और मत रखने के जैसे विशेषज्ञ हों। क्या यह संभव है कि नेताओं को हर बात की जानकारी हो ही? कोई प्रवक्ता उठ कर कुछ कहने लगता है तो दूसरा उसकी बात को अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता के अनुरूप काटने लगता है। इस चक्कर में सब एक दूसरे की छिछालेदार करने लगते हैं। दर्शक बेकार की बातों में उलझ कर रह जाता। एक प्रवक्ता संविधान की किसी धारा का उल्लेख करता है जैसे कि वह संविधान का बहुत बड़ा ज्ञाता हो। दूसरा भी उस पर टिप्पणी करने लगता है जैसे वह भी संविधानविज्ञ ही है। वास्तविकता यह होती है कि दोनों को ही थोड़ी थोड़ी उथली सी जानकारी होती है। संविधान की एक आध धारा के विषय में हो सकता है कि उसने पढ़ा अथवा सुना हो परन्तु उसकी अन्य धाराओं और उपधाराओं का क्या।

इस बात को विस्मृत नहीं किया जा सकता कि भारतीय संविधान विश्व का सबसे वृहद संविधान है उसको पूरी तरह से एक जन्म में समझ पाना तो किसी एक प्रवक्ता के लिये संभव नहीं है। कोई भी बिना समझे बूझे कोई उद्धरण देने लगता है। मुझे ध्यान है कि कॉलेज के जीवन में जब हम वाद-विवाद में भाग लेने के लिये जाते थे तो बहुत से छात्र शेक्सपीयर, अरस्तू, सुकरात और चाणक्य के उद्धरण दे दे कर बात करते थे जबकि उन्होंने अपनी पाठय पुस्तकों को भी ठीक से पढ़ा नहीं होता था। यह कहना तो बहुत आसान होता था कि हमारे शास्त्रों में यह लिखा है अथवा गीता में कहा गया है। रामायण,महाभारत में यह लिखा है। वे ये मान कर चलते थे कि निर्णायकों ने ही कौन से इन ग्रंथों अथवा विचारकों को पढ़ा होगा। हो सकता है तो चार निर्णायक प्रभावित हो जाते हों परन्तु लाखों दर्शकों को ऐसे प्रभावित करना संभव नहीं है।

इससे भी बड़ी और घिनौनी बात जो इन बहसों में सामने आती है वह एक दूसरे के आचरण पर कीचड़ उछालना। एक आरोप के बदले दूसरे पर आरोप लगाना। सब जानते हैं कि हमाम में सब नंगे होते हैं परन्तु नंगई को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं किया जाता। इन बहसों में इसके अतिरिक्त कुछ नहीं होता। आज के सन्दर्भ में हुई किसी बहस पर पुराने मामले उठाये जाते हैं। एक के भ्रष्टाचार के बदले में दूसरे के भ्रष्टाचार का उदाहरण दिया जाता है। एक की कमियों के बदले दूसरे की कमियाँ बताई जाती हैं। एक दल द्वारा किये गये ग़लत कामों के उत्तर में कहा जाता है कि जब आपकी सरकारें थीं तो आप ने भी यही सब किया था। हमारी सरकारें अथवा केन्द्र सरकार यह कर रही है अथवा उनके राज्य में यह सब हो रहा है तो तुम्हारे समय में भी यही अथवा इससे बढ़ कर होता था। पूरा का पूरा समय एक दूसरे को आईना ही दिखाया जाता है। एक दूसरे पर चिल्लाने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। अधिकांश एंकर बहस को दिशा देने में पूरी तरह से असफल होते हैं। उनका वक्ताओं पर कोई नियंत्रण नहीं होता।

मेरे विचार में दूरदर्शन पर होने वाली बहसों पर पूरी तरह से रोक लगाई जानी चाहिये। यदि नहीं तो एंकर इतना योग्य अवश्य होना चाहिये कि वह अपने वक्ताओं को अनुशासित करके उन्हें पूरी बात कहने अथवा निर्धारित समय में पूरी करने के लिये कहें। किसी को बीच में बोलने नहीं दिया जाना चाहिये। अनावश्यक रूप से हस्ताक्षेप करने वालों के माइक बंद कर दिये जाने चाहियें। दूसरों पर आरोप लगा कर अपने आपको बचाने का अवसर नहीं दिया जाना चाहिये। जिस विषय पर बहस आयोजित हो केवल उसी पर वर्त्तमान सन्दर्भ में बात हो किसी को यह कह कर बच निकलने का अवसर नहीं मिलना चाहिये कि आप की चादर में भी छेद हैं अथवा तुम्हारी कमीज़ मुझ से अधिक मैली है। उसे आगे बढ़ कर यह स्वीकार करना चाहिये कि यदि मेरी चादर मैली हो रही है तो अपने अनुभव से उसे साफ़ करने के लिए सार्थक सुझाव दें। ताकि दर्शकों का बहुमूल्य समय बेकार ही बर्बाद न हो। बहसों में सार्थकता बहुत ही आवशयक है इस पर चैनल वालों को गंभीरता से सोचना चाहिये कि किस प्रकार इन्हें सार्थक बनाया जाये।


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