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02.18.2014


कौन है आम आदमी
 

 बहुत दिन से मेरे मन में यह उथल पुलथ चल रही थी कि आखिर भारत में आम आदमी है कौन? वह जो मंचों पर अपने आम आदमी होने की घोषणा करता है अथवा जो खेतों में मजदूरी करता हुआ हमेशा रहता है मौन। इस बजट के होने वाले विश्लेषण ने सारा मामला साफ कर दिया है, तस्वीर का असली चेहरा सबके सामने उघाड़ करधर दिया है। नेहरू युग से देश को लगता था कि खेतों में काम करने वाला आम आदमी है खेतीहर मजदूर। साम्यवादियों ने कहा कि मिलों में मशीनों से खटने वाला श्रमिक उससे भी ज्यादा है मजबूर। लोग दोनों को आम आदमी मानते थे और इनमें से जो साइकिल पर चढ़ जाता था उसे आम आदमी से कुछ ऊपर की श्रेणी वाला जानते थे। लाल बहादुर शास्त्री और इन्दिरा जी का युग आया उन्होंने एक दो एकड़ वाले किसान को आम आदमी बताया। उसके बाद न जाने कौन कौन प्रधान मंत्री आए, उन्होंने आम आदमी के अपने अपने पैमाने बनाए। इतने पर भी यह निश्चित था कि भारत का आम आदमी गरीब है, और वह कुपोषण के अभी भी बहुत करीब है। उसकी रोटी रोजी के प्रबंध का जिस बजट में हिसाब होता था, वही आम आदमी का बजट खास होता था। मुख्य रूप से हर बजट में यह बतलाया जाता था कि किस किस को अपना पेट और कितना काटना है, और अपना हिस्सा आम आदमी के साथ कैसे बाँटना है। बजट में दाल रोटी के दामों का जिक्र होता था तमाम, कम्प्यूटर और इंटरनेट का कहीं था ही नहीं नामो निशान। कार स्कूटर को भी आम आदमी के साथ नहीं जोड़ा जाता था, हाँ किसी न किसी प्रकार से सस्ते मकानों के प्रबंध को नहीं छोड़ा जाता था।

इस बजट में स्कूटर और कार रखने वाले को आम आदमी बताया गया है, उसी के लिए सारा बजट सजाया गया है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार आज के आम आदमी के पास कम्प्यूटर और इंटरनेट की सुविधा है, बड़ी कार खरीदने में अभी उसको कुछ दुविधा है। इसीलिए वित्तमंत्री ने अभी छोटी कारों के दाम घटाये हैं, आम आदमी के कैपीटल गेनस पर जरूर कुछ प्रतिशत बढ़ाये हैं। इसका अर्थ है कि हमारा आम आदमी कैपीटल गेनस देने की रखता है औकात, यहीं से उसकी उपर की सीढ़ी पर चढ़ने की होती है शुरुआत। आज आम आदमी की सफेद कमाई कम से कम एक डेढ़ लाख सलाना है, उसके पास अपने रहने और पौष्टिक खाने का ठिकाना है। वह नाश्ते में चाय काफी पीता है, दूध के साथ कार्नफलेक्स भी लेता है। वह साधारण दूध नहीं पीता उसे तो फलेवर्ड मिल्क ही भाता है, शरबत और नारियल पानी से उसका हर रोज का नाता है।

कनछेदी को कोई यह नहीं बता रहा कि भारत की एक तिहाई जनता जो आज भी बारह रुपए रोज कमाती है, वह किस श्रेणी में आती है। प्रधान मंत्री और वित्त मंत्री ने भी बार बार इसे आम आदमी का बजट बताया, और आम किसानों पर शान से साठ हजार करोड़ रुपया लुटाया । स्पष्ट है कि यह चार करोड़ किसान गरीबी रेखा से नीचे नहीं रहते थे, और भुखमरी का दारुण दुःख भी नहीं सहते थे। कर्ज न चुकाने के कारण हुई कुछ आत्महत्याओं के कारण सरकार का गया इस ओर ध्यान, पर कुपोषण, भूखमरी और बीमारी से मरने वाले हजारों गरीबों के लिए बजट में नहीं किया गया कोई प्रावधान। वित्त मंत्री ने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि यह साठ हजार करोड़ किस खास आदमी की जेब से जायेगा, और वित्त मंत्री के इस शाही फरमान का असली बोझ कौन उठायेगा। एक जमाने में आम आदमी को तो साठ हजार करोड़ की राशि लिखना भी नहीं आती थी, चवन्नी अठन्नी मिलने पर उसकी हथेली खुजलाती थी। सरकार ने अब कुल्लड़ और सत्तू को बिल्कुल भूला दिया है, जिन्हें खाने को ज्वार और बाजरा तक नहीं मिलता उनके लिए कुछ भी नहीं किया है। यदि कुछ करती तो बजट आम आदमी का न रह कर गरीब का हो जाता, और आम आदमी की भान्ति वह सरकार के करीब हो जाता।

वित्त मंत्री की नजर में सरकारी कर्मचारी भी आदमी आम नहीं है, पूरे बजट भाषण में उसका तो कहीं नामों -निशान नहीं है। सरकार अमीर वर्ग के अल्प संख्यकों को भी आम आदमी मान रही है उसके लिए हर प्रकार की सुविधाएँ जुटाने को बेकरार है, जानती है कि बहुसंख्यक गरीब के आर्थिक शरीर का हर अंग बीमार है। क्या सरकार उनके लिए रोटी, कपड़े और मकान का जुगाड़ करने को तैयार है। क्या वास्तव में उनकी गरीबी दूर करने के लिए उनके पास कोई हथियार है। क्या अब वह गरीब ’आम आदमी‘ नहीं कहलायेगा जो रात को भूखे पेट ही सो जायेगा। अल्पसंख्यकों से संबधित मंत्रालय को ५०० करोड़ की जगह एक हजार करोड़ की राशि जारी है, वोटों के लिए अल्पसंख्यक बहुल जिलों की सेहत सुधारना पार्टी की लाचारी है। ऐसे जिलों में अधिक से अधिक बैंक खोले जायेंगे, सुविधायुक्त हस्पताल इन्हें सजायेंगे। मदरसों के लिए विशेष किए जा रहे हैं प्रावधान, आज भी सरकारी स्कूलों में टाट पट्टी तक उपलब्ध नहीं है श्रीमान। शायद आम लोगों की श्रेणी से नीचे रहने वाला ’इंसान‘ देश की अर्थव्यवस्था पर भार है, फिर भी उसको जिन्दा रखने के लिए हर कोई तैयार है। उसका वोट आसानी से मिल जाता है, वह जरा से आश्वासन पर ही पिघल जाता है। यह सच है कि वह आम आदमी नहीं बल्कि वोट होता है, जो हर चुनाव के बाद माथा पकड़ कर रोता है। चुनावों से पहले भी वह कुछ नहीं कहता, आश्वासन ही पीता है आश्वासन ही है खाता। चुनावों के बाद तो उसकी कोई औकात नहीं होती, नेताओं की क्या कहें आम आदमी तक से उसकी कोई बात नहीं होती।


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