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ISSN 2292-9754

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08.15.2016


जनमत संग्रह तो बहाना है

"आखिर जनमत संग्रह करवाने की धुन तुम्हारे मन में क्यों समा गई है कनछेदी। जनमत संग्रह क्या होता है यह जानते भी हो, जनमत संग्रह द्वारा लिये गये निर्णय को मानते भी हो? अरे तुम ने अपने दल तक में जनमत नहीं करवाया, दल के निर्माताओं तक को बाहर का रास्ता समझाया। जिनके कंधे पर सवार हो कर राजनीति में आये थे उन्हें भी अँगूठा ही दिखाया," मैंने कनछेदी से उसकी योजना जानने के लिए रोक कर पूछा।

"भाई साहब आप को मेरी लोमड़ी सरीखी खोपड़ी का भान नहीं, राजनीति के क ख ग तक का आपको ज्ञान नहीं। बेकार में इतने वर्षों तक संसदीय पत्रकारिता के नाम पर झक मारते रहे हो। आपने तो नैतिकता के नाम पर केवल गाँधी को पढ़ा है, पर यह भूल गये कि गाँधी को उनके अनुयायियों ने ही ठगा है। उन्हीं से ही मैंने यह सब नहीं सीखा और जिया है, मैंने मैक्यावली के द’प्रिन्स और चाणक्य के अर्थशास्त्र को घोट -घोट कर पीया है," कनछेदी ने बहुत गर्वित भाव से उतर दिया।

"परन्तु यह जनमत संग्रह का विचार तो आपने अंग्रेज़ों से चुराया है," मैंने उसे उकसाने के लिये याद दिलाया।

"आप भूल गये मूलतः मेरी योजना तो हर गली मोहल्ले में जनमत संग्रह करवाने की थी। वास्तव में विश्व में ऐसा प्रयोग करने का विचार मैंने ही अंग्रेज़ों को दिया था। फिर भी मैं अंग्रेज़ों की कूटनीति का कायल हूँ। अपनों के विश्वासघात से भी घायल हूँ। उन्हें यूँ ही बाहर का रास्ता नहीं दिखाया, उनकी औक़ात क्या थी इतना ही था समझाया। उन्हें अपना छोटा सा करिश्मा दिखाया, जिस एैरे-गैर के कंधे पर हाथ रख दिया उसे ही विधायक बनाया।," कनछेदी ने अपना सीना अठावन इंच का करते हुए कहा।

"तुम तो बात अंग्रेज़ों की रीतिनीति की कर रहे थे, वास्तव में तो पुराने साथियों से डर रहे थे। इसलिए अचानक अटक गये, रीति-नीति छोड़़ कहीं और भटक गये," मैंने टोका।

"अंग्रेज़ों के फूट डालो और राज करो के छोटे से नियम को अपना कर कांग्रेस ने इस देश पर कई वर्षों तक निष्कंटक राज किया है, मैं तो उनकी पूरी रीति-नीति ही अपनाने जा रहा हूँ। जनमत संग्रह तो केवल एक बहाना है, मकसद तो दुनिया की राजनीति में अपना रंग जमाना है," वह पुनः भटके हुए मुसाफिर की भाँति रास्ते पर आते हुए बोला।

मैंने कहा, "लगता है कि तुम्हारा कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाना है।"

"अब आयी न आपको बात समझ में। आम जनता की तरह आप भी हर बात देर में ही समझते हो। मैं बहुत दूर तक देख रहा हूँ। भारत के टटपूँजिया नेताओं की तरह मेरा लक्ष्य कोई छोटा-मोटा नहीं है। जल्दी ही मैं अपने आपको विश्व नेता के रूप में स्थापित करने जा रहा हूँ। जिस स्थान की कल्पना नेहरू और वाजपेयी तक नहीं कर पाये और जिस के लिए मोदी भी ललचा रहे हैं मैंने उस मंज़िल की ओर मज़बूती से क़दम बढ़ा दिये हैं," वह सपनों से भरी अधमूँदी आँखों से बोला।

"भले ही तुम मुझे वह भोला नागरिक समझ लो जिसे तुम जैसे राजनीतिक ठग जब चाहें लेते हैं परन्तु मैं भारतीय संविधान की शपथ उठाते हुए यह स्वीकार करता हूँ कि मैं अभी भी कुछ नहीं समझा। तुम न जाने क्यों शेखचिल्ली की भाँति कनकौव्वै उड़ा रहे हो। अथवा अपने आप को मूर्ख बना रहे हो।"

"इसीलिये तो मैंने कहा न कि संसद में बैठ कर आपने कुछ सीखा ही नहीं। कुछ सीखा होता तो अमेरिकी कांग्रेस के भाग्यविधाता बन कर बैठे होते। नहीं तो संयुक्त राष्ट्र संघ की असेंबली में ही ऐंठे होते। घबराओ नहीं मैं जल्दी ही आपको किसी ऐसी ही जगह पर बिठाऊँगा, वहाँ भी अपना चमत्कार दिखाऊँगा। इसे काला धन वापिस लाने जैसा वायदा मत समझना। मैं जो कहता हूँ वही करता हूँ,सरकार और प्रशासन से नहीं डरता हूँ।"

"अच्छा यह बताओ अभी तक तुमने संसद भवन तक का मुँह नहीं देख पाये और विश्व नेता बनने के सपने देख रहे हो," मैंने फिर टोका।

"आपके प्रधान मंत्री मोदी ने भी तो नहीं देखा था। और अब देखो अमेरिकी संसद में भाषण तक दे आये। जानते हो क्यों? जब उन्हें वीज़ा नहीं मिला था शायद तभी उन्होंने भीष्म प्रतिज्ञा की होगी कि वहाँ के प्रशासन को सबक सिखाना है, अमेरिका को कुछ कर दिखाना है।"

"लगता है अपनी औक़ात देखे बिना वैसा ही कुछ तुम करने जा रहे हो, या फिर अपने मन को यूँ ही बहला रहे हो," मैंने ताना सा मारते हुए फब्ती कसी।

"औक़ात की बात ही तो बता रहा हूँ, आपको बुद्धि में आये इसलिए धीरे-धीरे समझा रहा हूँ। यह बताओ कि आज तक किसी मुख्य मंत्री ने इतना साहस किया है कि वह जनमत संग्रह की बात करे। नहीं न! पर मैंने किया है। क्या आपने किसी ऐसे नेता के बारे में सुना है जिसने स्थानीय ज़िला स्तर का नेता होने पर भी प्रधान मंत्री से बराबरी की दावेदारी की बात मीडिया से मनवा ली हो। जब मैं दिल्ली की राजनीति में नया-नया आया था तो मीडिया ने मुझे नौसिखिया मान कर बहलाया था। मेरी तुलना शीला दीक्षित, हर्षवर्द्धन जैसे छोटे नेताओं की अपेक्षा प्रधान मंत्री मोदी से करके मुझे ललचाया था। सत्य यह है कि मैंने ही मीडिया को उल्लू बनाया था। भले ही कुछ लोग आरोप लगायें कि मैंने मीडिया को ख़रीदा तो भी किसी दूसरे मुख्य मंत्री ने क्यों नहीं ख़रीदा। मीडिया यदि आज बिकाऊ है तो पहले भी रहा होगा। इतने बड़े-बड़े राज्यों के वर्षों से मुख्य मंत्री होने के वावजूद किसी ने आज तक किसी प्रधान मंत्री से आँख तक नहीं मिलायी और न ही उसे चुनौती दी। मैं देता हूँ और रोज़ देता हूँ। डंके की चोट देता हूँ। मेरी तुलना सीधे पी.एम. के साथ करने लगे, मेरी एक-एक बाइट के लिए तरसने लगे। अर्थात मेरी योजना में था दम, यह तो मेरा पहला है क़दम। आगे-आगे देखना होता है क्या!"

"आगे क्या होगा लगे हाथ यह भी बता दो।"

"अच्छा पहले कभी किसी विधानसभा ने अपने राज्यपाल को सम्मन किया है। मैं दिल्ली के उपराज्यपाल को कर रहा हूँ। मौक़ा लगा तो राष्ट्रपति को भी सदन के सामने पेश होने के लिये बुलाऊँगा। मीडिया झक मार कर मेरे पीछे आयेगा। इतने से बात नहीं बनी तो न्यायाधीशों को भी निशाना बनाऊँगा।"

"कनछेदी हम तो बात जनमत संग्रह की कर रहे थे। तुम न जाने कहाँ से कहाँ पहुँच गये।"

"हाँ मैं भी वही बताने जा रहा हूँ। पहली सीढ़ी की बात समझाने के बाद ही दूसरी सीढी की बात करूँगा। दिल्ली के जनमत करवाने की बात करने के बाद मैं भारत में जनमत करवाने की माँग करूँगा और भारत को सौ टुकड़ों में विभाजित करने का दम भरूँगा। सोचो जब सौ देश मेरी मुट्ठी में होंगे तो सुरक्षा परिषद में वीटो का अधिकार पाना कितना आसान हो जायेगा जिसके लिए हमारा देश वर्षों से झक मार रहा है।"

"परन्तु ऐसा होगा कैसे?"

"मैंने कब कहा कि ऐसा हो ही जायेगा। मेरे भोले भइया जनमत संग्रह की बात ही तो करनी है। भगवान ने जिह्वा दी है इसलिए कुछ भी कहने का मौलिक अधिकार हमें भगवान ने दिया है। जल्दी ही मैं अपनी तुलना अमेरिकी राष्ट्रपति से करने के लिए मीडिया को मजबूर कर दूँगा। ऐसा होते ही मोदी जी तो मीलों पीछे छूट जायेगें। उस सीढ़ी के बाद मेरा लक्ष्य जनमत संग्रह द्वारा स्वयं को भगवान घोषित करवाने का होगा। वैसे भी आप जानते हैं कि भारत में कितने ही तरह के भगवान हैं और कितने ही साधु-संत अपने आपको भगवान के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। उनकी ग़लती यह कि उन्होंने जनमत संग्रह का सुगम रास्ता अपनाने की बजाय जप-तप का कठोर रास्ता अपनाया है, जो जनता को रास नहीं आया है," उसने धीरे-धीरे अपने पत्ते खोलते हुये मुझे दिखाने शुरू किये।

"तो तुम्हें भगवान कोई क्यों मानेगा?"

"मैंने कब कहा कि लोग मुझे भगवान मानें। मैं तो केवल दावा करूँगा। मेरा दृढ़ मत है कि भगवान मुझे चुनौती देने के लिये अवतार नहीं लेंगे। यदि उनके कुछ ठेकेदार सामने आये भी तो वे स्वयं मेरी तुलना भगवान से करने लगेंगे। उन्हें मीडिया की तरह बहलाना-फुसलाना भी नहीं पड़ेगा केवल उकसाना ही पड़ेगा। आप तो भली भाँति जानते हैं कि इस धर्मनिरपेक्ष देश में धार्मिक भावनाओं को भड़काना सबसे आसान काम है। भले ही कुछ ख़ून बहता है परन्तु प्रचार भरपूर मिलता है। आप जानते ही हैं कि प्रचार ही मेरी सबसे बड़ी खुराक है। इससे दुनिया का कोई भी मीडिया मेरी उपेक्षा कर ही नहीं सकेगा।"

"यदि यह सब शेख़चिल्ली के सपने जैसा ही रहा तो तुम्हारा क्या हाल होगा?"

"कुछ नहीं इतनी ऊँचाई से फिसलने के बाद कुछ न कुछ तो शेष रह ही जायेगा। इतना ही ं बहुत है। विश्व के अनेक बौने नेताओं से मेरा क़द ऊपर ही रहेगा इसका विश्वास मैं आप को ग़रीबी हटाओ के वायदे की भाँति दिलवा सकता हूँ। आप केवल देखते रहिये और व्यक्तिगत रूप से अपने अच्छे दिनों का इंतज़ार कीजिये। आपके अच्छे दिन आयेंगे इसमें मुझे बिल्कुल भी सन्देह नहीं है।"

इतना कह कर कनछेदी अगली सीढ़ी के आरोहण की तैयारी करने के लिए चल दिया। मैंने एक साधारण नागरिक की भाँति वही किया जो पूरा देश स्वतंत्रता के बाद से आज तक करता आया है और अपने अच्छे दिनों के सुनहरे सपनों में खो गया।


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