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ISSN 2292-9754

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08.26.2017


ग़रीबी मौहे प्यारी लागै

देश के करोड़ों निवासियों की तरह मुझे भी ग़रीबी से इश्क़ हो गया। पहले जब कोई कहता था कि हमारा देश बहुत अमीर है परन्तु इस में निवास करने वाले हम हिन्दुस्तानी बहुत ग़रीब हैं तो मेरे ठंडे ख़ून में बासी कढ़ी सरीखा उबाल आ जाता था। जो ख़ून सरे बाज़ार किसी की अस्मत लूटते देख कर भी ठंडा ही रहता था अब ग़रीबी का नाम सुनते ही रेगिस्तान की गर्मी की तरह उबलने लगता है। मैं बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के युद्ध भूमि में कूदने के लिये तैयार रहता हूँ। कहीं भी किसी से भिड़ जाता हूँ और किसी पर भी कश्मीरी पत्थरबाज़ों सा पत्थर फेंकने लगता हूँ। मेरा घर तो शीशे का है नहीं तो डर किस बात का।

समस्या यह है कि मुझे ज्ञात नहीं होता कि मैं लड़ना किससे चाहता हूँ। अब ग़रीबी अपनी मशूक है उससे लड़ने का प्रश्न ही नहीं रहा। अमीरी से लड़ने की औक़ात मेरी न पहले थी न अब है। साम्यवादियों ने नवग़रीबों को लाख समझाया था कि जब सारी दुनिया के ग़रीब एक हो रहे हैं तो तुम क्यों समुद्र के किनारे बैठे लहरों के साथ मोतियों के आने की प्रतीक्षा कर रहे हो। हम थे कि हमें कुछ फ़र्क ही नहीं पड़ता था। हम जानते थे कि हम ग़रीब नहीं हैं क्योंकि हमारा देश अमीर है। किसी ज़िद्दी बच्चे की तरह हमें यह समझाना बहुत कठिन था कि अमीर देश के लोग भी ग़रीब हो सकते हैं। यह बात हमारे गणित के समीकरणों पर पूरी नहीं उतरती थी। हम मन ही मन देश की कुल सम्पति का जोड़ लगा कर कुल जनसंख्या से भाग करके प्रमुदित होते रहते थे और काल्पनिक भागफल को अपनी जेब में भर लेते थे। जैसे रेल के हर डिब्बे में लिखा होता है कि रेल आपकी सम्पति है जिसे पढ़ कर यात्री का मन प्रसन्न होता रहता। स्पष्ट है कि सरकार भी यह मानती है कि रेल हमारी सम्पति है। और जो रेल जैसी सम्पदा का स्वामी हो वह ग़रीब तो हो ही नहीं सकता। इसी प्रकार अन्य अनेक सम्पतियों को देख कर हम प्रसन्न होते रहते थे कि आख़िरकार ये सब हैं तो हमारी ही। ठीक उस धनी सेठ के बेटे सरीखी जिसका बाप उसे एक धेला तक न देता हो परन्तु वह यह मान कर इतराता रहे कि मेरा बाप तो अमीर है।

इसलिये न चाहते हुये भी मैं ग़रीबी से घृणा करता था। आप पूछ सकते हैं कि फिर एकाएक क्या हुआ कि मुझे ग़रीबी भाने लगी। क्यों उसकी सुन्दर देहयष्टि, किसी फ़िल्मी नायिका की भाँति सुते हुए नयन नक़्श, मेरे सपने में आने लगे। क्यों अदना सा पीला कार्ड पासपोर्ट से भी अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देने लगा। किसी भी डेबिट अथवा क्रेडिट कार्ड तो क्या अमेरिका के ग्रीन कार्ड से भी अधिक मूल्यवान लगने लगा।

ग़रीबी कितनी रसभरी है यह मैंने पहले कभी सोचा नहीं था। अब लग रहा है कि अमीर बनने के चक्कर में आधी ज़िन्दगी बेकार कर दी। पूरी जवानी नीरस और फीकी-फीकी ही रही। जमाने भर की धूल फाँकने और सिर पटकने के बाद अब ज्ञात हुआ कि बिड़ला,अडानी या अम्बानी बनना जितना कठिन है होरी, दुखिया और हरखू बनना उतना ही आसान है। सुना था आसान रास्ते कभी मंजिल की ओर नहीं ले जाते। जिसने जितने अधिक कष्ट उठाये वह उतना ही बड़ा प्रेमी सिद्ध हुआ। जितनी कठिन मन्दिर की चढ़ाई उतनी ही अधिक पुण्य की कमाई। परन्तु आजकल तो आसान रास्ते पर चलने वाले यात्रियों की खोज-खोज सरकार घर-घर गाँव-गाँव कर रही है। उसे समाज के सबसे निचले पायदान पर गिरे हुये व्यक्ति की तलाश है। इस पायदान पर जल्दी से जल्दी नीचे गिरने की चाहत में लोग दीवानों की तरह दौड़ रहे हैं।

मैंने देखा येन केन प्राकेण ग़रीबी की रेखा से नीचे गिरने का लक्ष्य प्राप्त करने के लिये देश के करोड़ों निवासी जुट हुये हैं। सबका एक ही ध्येय है कि किसी न किसी प्रकार उसे ‘येलो कार्ड’ धारक मान लिया जाये। मैं यह जान कर कि पीला कार्ड संकटमोचक सिद्ध हो सकता है उस चूहा दौड़ में शामिल हो गया। समझ चुका था कि इतने बड़े परिवार का पालन पोषण दिन प्रति दिन कठिन होता जा रहा है। वर्षों पहले मेरे बहुत से मित्रों ने बताया था कि आरक्षण के लाभ उठाने के लिये उन्होंने अपने आपको अनुसूचित जाति में पंजीकृत करवा लिया है परन्तु मुझे ऐसा करना सम्मानजनक नहीं लगा। भला मैं अपनी जाति क्यों बदलूँ? बाद में पिछड़ा वर्ग में शामिल होने का सुझाव भी दिया परन्तु मैं तो अगड़ों में भी अगड़ा था और खाप वालों की तरह अपनी आन का बड़ा तगड़ा था। इस लिये इस सुझाव को भी मैंने अनदेखा कर दिया। अब ग़रीबी की रेखा के नीचे रहने वाली बात मेरे मन में घर कर गई। निर्धन का क्या है कोई भी हो सकता है। आज का धन्ना सेठ भी कल ग़रीब हो सकता है। न तो वर्ग बदलने का झंझट न ही जाति बदलने का। सो अपनी औक़ात से अधिक चढ़ावा दे कर मैं दरिद्र देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने में सफल हो गया।

पीतवासिनी देवी की कृपा से पीला कार्ड हाथ में आते ही मैं आसमान में उड़ने लगा हूँ। ग़रीबी के कितने लाभ मुझे मिलने लगे हैं। किसी ने मकान दिया है तो कोई उसके सम्पति कर में छूट देने के लिये मेरे पीछे भाग रहा है। कोई फ्रिज, हीटर और गीजर के प्रयोग की खुली छूट दे रहा है। किसी को चिन्ता नहीं कि मेरे पास बिजली का कोई मीटर है या नहीं। जिन के पास है उन्हें भी बिजली पानी का बिल नहीं देना। गैस के चूल्हे तो मतदाता पर्ची की तरह घर-घर वितरित किये जा रहे हैं। तरह-तरह के अनुदान बाँटने के लिये बैंकों में खाते खुलवाये जा रहे हैं। नवग़रीबों का आनन्द ही आनन्द है। अब हमें अपने बेटियों वाले बड़े परिवार की शिक्षा दीक्षा की कोई चिन्ता नहीं करनी है। शायद सरकार ने हम जैसे नवग़रीबों को ध्यान में रख कर ही बेटी बढ़ाओ बेटी पढ़ाओ की योजना के विषय में सोचा होगा। पहले हर बेटी के आने पर हम जैसे ग़रीब लोग अपनी पत्नी को कोसते थे अब उसे कहते हैं भाग्यवान लगी रहो, प्रदूषित ही सही गंगा में नहाओ और ख़ूब बेटियाँ बढ़ाओ। कोई चिन्ता नहीं। उनके पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा और रहन-सहन का सारा भार देश सहर्ष उठा रहा है। वह जानता है कि आख़िर इस अमीर देश की सम्पदा में हम सरीखों का भी हिस्सा है। पहले बच्चे दिन भर गलियों में नंग धंड़ग घूमते फिरते थे अब स्कूलों की ओर उसी तरह खींचे चले जाते हैं जैसे शराबी मयखाने की ओर। उन्हें इस बात की चिन्ता नहीं कि वहाँ न तो टाट पट्टी है और न ही ब्लैक बोर्ड। शिक्षक तक नहीं हैं। हाँ मुफ़्त में ड्रेस,कापी किताब और भोजन बाँटने वाले अवश्य मिल जाते हैं। खिलौनों को तरसने वाले अब कम्प्यूटर से खेलते हैं। हमारी भी बल्ले बल्ले उनकी भी बल्ले बल्ले।

अब हमें कर्ज़ लेने में कोई कठिनाई नहीं होती। न तो शर्म आती है और न ही झिझक होती है क्योंकि हमारे शास्त्रों ने यह पाठ पढ़ाया है कि कर्ज़ ले कर घी पीते रहो। हम स्वयं भी घी पीते हैं और लाठियों को भी पिलाते हैं। सब जानते हैं कि घी पीने वालों से कर्ज़ वसूलना कभी किसी के बस में नहीं रहा। जो लोग मुफ़्त का घी पीते हैं समाज उनकी ताक़त के गुण गाता है तो ऐसे बलवान लोगों से ऋण वसूलना किसके बूते की बात है। बैंक उन्हें बहुत उदार हृदय से कर्ज़ बाँटते हैं। वे भी जानते हैं कि राम की चिड़िया राम के खेत की तर्ज़ पर सारा का सारा माल तो इन्हीं चिड़ियों का है तो इन्हें रोकने में व्यर्थ ही उर्जा का नुकसान क्यों किया जाये। वैसे भी कर्ज वसूलने की अपेक्षा उसे माफ करना कहीं अधिक सुगम कार्य है। इसीलिये तो सरकार भ्रष्टाचार को रोकने में कोई रुचि नहीं लेती क्योंकि जितनी रकम का घोटाला नहीं हुआ होता उससे अधिक धन उसकी जाँच पर व्यय हो जाता है न मानों तो बोफोर्स वालों से पूछ लो। आँकड़े इस बात के गवाह हैं कि जितना धन पुराना ऋण वसूलने में सरकारी खज़ाने में नहीं आता उससे कहीं अधिक उसे वसूलने में व्यय हो जाता है। अदालतों में सालों से न जाने कितने छोटे मोटे मुकदमें लंबित हैं जिनकी राशि वकीलों की फ़ीस का सौंवा भाग भी नहीं। सरकार का कितना धन व्यय होता है उसकी तो गिनती करना ही संभव नहीं। आसान कार्य करना वैसे भी हमारे अधिकांश अधिकारियों की प्रवृत्ति है और इसे देश हित में करना उन्हें उचित भी लगता है।

इसीलिये आज कल माफ़ी का दौर चल रहा है। कहीं किसानों का ऋण माफ़ किया जा रहा है तो कहीं बिजली पानी का बिल। देश में धन की इतनी भंयकर बाढ़ आ गई है कि जिन वस्तुओं की हम जैसे ग़रीबों ने कभी कल्पना भी नहीं की थी वे अपने आप हमारे पास खींची चली आ रही हैं। लगता है हर गली मोहल्ले में कल्प वृक्ष उग आये हैं अथवा हर आँगन में कामधेनु बाँध दी गई है। पहले तो भगवान भी बहुत चिचौरी, पूजा, अर्चना, उपवास और न जाने कैसे कैसे कर्मकांड करवाने के बाद कोई एक-आध मुराद पूरी किया करते थे, वह भी मुफ़्त में नहीं। आज तो घर बैठे-बिठाये अथवा बुला-बुला कर हमारी मनोकामनाओं की पूर्ति की जा रही है। अब राम की चिड़ियों को स्वयं दाना खोजना नहीं पड़ता क्योंकि चारों ओर राम जी के ही खेत खलिहान हैं। खेतों के पहरेदार यह जान गये हैं कि यदि उन्हें बुला-बुला कर दाना चुगाया जायेगा तो कहीं अधिक पुण्य प्राप्त होगा। पुण्य के रूप में उन्हें झोली भर-भर कर नोट और वोट मिलेंगे। जो जितना अधिक पुण्य कमायेगा उसे उतने ही अधिक वोट मिलेगे। किसी के पुण्य कमाने के मार्ग में रोड़ा नहीं अटकाना चाहिये यही सोच कर मैंने ग़रीबी को अपना बना लिया है और उस पर अपना तन मन पूरी तरह से लुटा दिया है।


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