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02.18.2014


गरम है जूतों का बाज़ार

मंदी के इस विश्वव्यापी दौर में भी जूतों का बाज़ार बहुत गरम है। जूते के हर प्रयोग का अपना धरम है। इस अस्त्र का प्रयोग कब, कैसे और कहाँ किया जाए इसके लिए पूरे विश्व में बहुत भरम है। अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश पर ईराक की राजधानी बगदाद में एक संवाददाता मुंतजिर-अल-जैदी ने अपना जूता फेंका और उसे बुश की विदाई के चुम्बन का नाम दिया । दूसरा जूता उसने ईराक की विधवाओं और अनाथों की ओर से फेंका। बुश दोनों ही जूतों के वार एक कुशल खिलाड़ी की भाँति आसानी से बचा गए, और उस समय अपने अपमान को अपनी मुस्कुराहट में छिपा गए। वह इस घटना से तनिक भी नहीं घबराए और न ही उस संवाददाता सम्मेलन में तनिक भी शरमाए। उनका कहना था कि यह अपनी ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट करने की एक घटिया चाल है। यह चाल किसी संवाददाता द्वारा चली गई इस बात का ही मलाल है। संवाददाताओं को इस बात की चिन्ता थी कि शायद भविष्य में उन्हें नंगे पैर ऐसे सम्मेलनों में आना होगा, अथवा जूतों पर कोई नई सील लगवानी होगी। कल यदि कोई कलम फेंक कर करेगा वार, तो क्या कलम को मान लिया जायेगा तलवार।

संवाददाता की इस हरकत से भले ही बुश को कोई हानि नहीं हुई हो परन्तु जिस कम्पनी ने उस जूते का निर्माण किया था उसके तो पौ बारह हो गए और उस पर छा गया एक नया ही सरूर, उसके जूते दुनिया भर में मुफत में ही हो गए मशहूर। बताया जाता है कि टर्की की इस जूता कम्पनी को रातों रात ३० हजार जोड़ी जूते बनाने का आर्डर मिल गया, यह दूसरी बात है कि उसका पूरा ढाँचा ही इससे हिल गया। संवाददाता को कम्पनी ने क्या दिया कोई नहीं जानता, कुछ नहीं दिया होगा यह भी नहीं मानता। उस कम्पनी को मेरा परामर्श यह है कि वह कम से कम जैदी परिवार को जीवन पर्यन्त मुफत जूते देने का इक़रार कर ले, और उससे ऐसे ही कारनामें भविष्य में करवाने का करार कर ले। ताकि भविष्य में जूता फेंकने वालों को इससे प्रेरणा मिलती रहे। इस घटना ने जूता कम्पनियों को भी नई राह दिखाई है। अब वह अपना विज्ञापन करते समय कह सकते हैं कि हमारी कम्पनी का जूता दूर तक फेंका जा सकता है और वह अपना लक्ष्य भी नहीं चूकता। भविष्य में ऐसी कम्पनियाँ जैदी जैसे पत्रकारों को प्रायोजित करने में परस्पर होड़ लेने लगेगीं इसमें किसी कोई सन्देह नहीं होना चाहिए। यह बात इसलिए भी सत्य है कि साउदी अरब के एक व्यापारी ने फेंके गए जूते ५० करोड़ रुपए में खरीदने की पेशकश की है। बहुत से लोगों का मत है कि जूतों की इस जोड़ी को किसी संग्रहालय में सजा दिया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें देख-देख कर प्रेरणा ग्रहण करती रहें।

जूते फेंकने के महत्व को ध्यान में रखते हुए फेंकने की कला को भी प्रोत्साहन दिया जाने लगा है। यद्यपि यह कार्य अभी अपनी शैशवास्था में है। न्यूजीलैंड ने इसकी ज़ोरदार शुरुआत की है। न्यूजीलैंड में जो प्रतियोगी सबसे दूर जूता फेंकता है उसे स्वर्ण बूट पुरस्कार के रूप में भेंट किया जाता है। इसके लिए सन् २००३ से प्रतिवर्ष प्रतियोगिताएँ आयोजित की जा रही हैं। वहाँ के शहर ’टेहापे‘ को जूता फेंकने की कला की राजधानी माना गया है। अब तो इसके लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाने लगी हैं इनमें अनेक विकसित राष्ट्र भी हिस्सा लेने लगे हैं। अमरीका, लैटिन अमरीका और यूरोप के बहुत से देशों में स्थान-स्थान पर बिजली की तारों और पेड़ों पर परस्पर बँधे जूतों के जोड़े लटकते दिखाई देते हैं। दोनों जूतों को फीतों से बाँध कर लोग इन तारों पर फेंकने का अभ्यास निरन्तर करते रहते हैं। लोगों को इस दिशा में प्रवृत्त करने के लिए अनेक प्रकार की दंतकथाएँ इसके साथ जोड़ दी गई हैं।

किसी नेता के उपर इस प्रकार से जूता फेंकें की वारदात अमरीका के राष्ट्रपति बुश के लिए कोई नई बात नहीं । इससे पहले भी मध्य एशिया में अनेक स्थानों पर लगने वाले उनके पोस्टरों के साथ जूतों के चित्र प्रदर्शित किए जाते रहे थे। उनकी विदेश सचिव कोंडिला राईस को लोग वहाँ पर ’कुंडारा‘ के नाम से सम्बोधित करते रहे हैं जिसका अर्थ होता है जूता। व्हाईट हाउस के बाहर प्रदर्शनकारियों ने भी बुश के पुतले पर भारी संख्या में जूते बरसाए थे। अनेक दूतावासों पर जूते फेंक कर कितने ही देशों में विरोध प्रदर्शन होता रहा है। बगदाद में ही बुश का एक चित्र एक होटल के प्रवेश द्वार के फर्श पर बनाया गया था ताकि उसमें प्रवेश करने वाला हर व्यक्ति उस चित्र पर अपने जूते रख कर ही आगे बढ़े। बाद में जब ईराक पर अमरीका ने नियंत्रण कर लिया तब उस चित्र के स्थान पर सद्दाम हुसैन का चित्र बना दिया गया था। स्पष्ट है कि जूते मार कर अपमानित करने की धारणा अमरीका में भी कुछ कम नहीं है।

बुश के बाद अब चीन के प्रधान मंत्री विन जिआवो को ब्रिटेन में जूता फेंकने की घटना का सामना करना पड़ा है। यह दूसरी बात है कि वहाँ पर जूता फेंकने वाला इतना अनाड़ी था कि उसके द्वारा फेंका गया जूता अपने लक्ष्य तक पहुँच ही नहीं पाया। आवश्यकता इस बात की है कि जूता फेंकने का प्रशिक्षण लोगों को उलब्ध कराया जाना चाहिए ताकि भविष्य में किसी जूता फेंकने वाले को निराश न होना पड़े। जूता फेंकने की यह कोई नई घटनाएँ नहीं हैं। जूते का प्रयोग किसी भी व्यक्ति को अपमानित करने के लिए हज़ारों वर्षों से किया जाता रहा है। सोवियत संघ के तत्कालीन प्रधान मंत्री निकेता ख्रुशचेव ने तो १९६० में अपना जूता संयुक्त राष्ट्र संघ की जनरल एसेम्बली में दिखाया था। ऐसे न जाने कितने ही उदाहरणों से मानव सभ्यता का इतिहास भरा पड़ा है जहाँ पर जूतों को एक हथियार के रूप में प्रयोग में लाया गया।

वैसे जूता मानव का बहुत पुराना साथी है। लगभग ८०००-१०००० साल पहले से जूते का प्रयोग मानव के पैरों की रक्षा के लिए होता रहा है। वैसे १९३८ में अमरीका के ओरेगॉन में स्थित ’फोर्ड रॉक केव‘ में ऐसा जूता मिला था जिसे लगभग २६,००० साल से लेकर ४०,००० वर्ष पुराना बताया गया। धीरे-धीरे पाँव की रक्षा के लिए बनाया गया जूता पाँव की सजावट के काम आने लगा। परन्तु एक लंबे समय तक विश्व की एक बहुत बड़ी आबादी जूते का प्रयोग नहीं करती थी। ज्यों-ज्यों जूते का प्रयोग बढ़ने लगा त्यों-त्यों जूते के नए-नए प्रयोगों का आविष्कार होने लगा। विश्व के प्रायः हर देश में जूता दिखाना अथवा जूता फेंकना एक अपमानजनक कार्य माना जाता है। अनेक स्थानों पर जिस व्यक्ति को अपमानित करना हो उसे गधे पर बिठा कर उसका मुँह काला करके उसके गले में जूतों से बना हार पहनाया जाता है। मध्य एशिया में किसी को अपमानित करने के लिए जूते को बहुत महत्वपूर्ण अस्त्र माना जाता है।

शायद यही कारण है कि प्रायः प्रत्येक सभ्यता में पवित्र स्थानों पर जूतों को प्रवेश द्वार से बाहर उतारने की प्रथा रही है। आज भी मन्दिरों, मस्जिदों और गुरुद्वारों में जूते पहन कर प्रवेश नहीं करने दिया जाता। भारत सहित अनेक देश ऐसे हैं जहाँ घरों के भीतर भी जूतों का प्रवेश वर्जित माना जाता है। पूर्वी और उत्तरी यूरोप, मध्य एशिया, अफ्रीका और कनाडा में इस बात का बहुत प्रचलन रहा है। अमरीका के भी कुछ स्थानों पर गृह स्वामी की अनुमति के बिना जूते पहन कर घर में जाना वर्जित माना गया है। अफ्रीका, मध्य एशिया, कोरिया और थाईलैंड में गलती से भी जूते का तला दिखाने को अपमानजनक माना जाता है। भले ही व्यक्ति स्वाभाविक रूप से टाँग पर टाँग रख कर आराम कर रहा हो । यदि उसके जूते का तला सामने वाले को दिखाई दे जाए तो इसे उसका अपमान माना जायेगा। वास्तव में पैर मानव के शरीर का सबसे निचला भाग होने के कारण सबसे निम्न कोटि का अंग माना जाता है। इसी कारण इसे अपवित्र कहा गया है। न जाने किस युग में किस कारण से ऐसी अवधारणा बनी होगी जिससे बहुत से लोग आज तक मुक्ति नहीं पा सके। भारत में भी सदियों तक शुद्रों को पैरों से उत्पन्न माना जाता रहा है। भारत में वर्ण व्यवस्था के रोग के लिए इस प्रवृत्ति को दोषी माना जा सकता है।

वैसे जूता शक्ति का प्रतीक है। जिसकी लाठी उसी की भैंस की तर्ज पर जिसके जूते में दम होता है उसी का सर्वत्र दबदबा होता है। भारत में इसी जूते के भय से कितने ही वर्षों तक करोड़ों लोग खुद अपने मताधिकार तक का उपयोग नहीं कर पाए। कुछ लोग सोने की जूती के बल पर वोट प्राप्त करते रहे हैं। जूता बराबरी का भी प्रतीक है। माना जाता है कि जब बाप का जूता बेटे के पाँव में पूरा आने लगे तो उसके साथ बराबरी का और दोस्ती का व्यवहार किया जाना चाहिए। जूते का साहित्य में भी अपना योगदान है। जूते से जुड़े मुहावरों का प्रयोग हमारे प्रतिदिन के जीवन बार-बार सरस बनाता रहा है और उसे साहित्य में भी मान्यता प्राप्त है। राजनेताओं के बंदरबाँट को अक्सर जूतों में दाल बाँटने की संज्ञा दी जाती है। मियाँ की जूती मियाँ के सिर वाली कहावत प्रायः हर समाज में प्रचलित है। जूतम पैजार और जूतम जूत होना तो अब हम अपने विधान सभा सरीखे निकायों में अक्सर देखने लगे हैं। इससे स्पष्ट है कि जूतों की महिमा अपरंपार है। और इससे किसी भी प्रकार से छुटकारा नहीं पाया जा सकता।


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