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02.19.2014


बलात्कार मंजूर विवाह नहीं

"वो मारा पापड़ वाले को। एक विकिट और चटका दी भैया," कहता हुआ कनछेदी बहुत तेज़ी के साथ गाँव से बाहर जाने वाले रास्ते पर डग भरता हुआ जा रहा था।

मैंने कहा, "कनछेदी! कहाँ मंहगाई की तरह इतनी तेज़ी से भागे जा रहे हो। आज तो तुमने राम राम तक नहीं की।"

"अरे राम राम कहने की किसे फुर्सत है भैया! अभी-अभी उस चटवाल के छोरे की गर्दन को चटकता हुआ देख कर आ रहा हूँ। लटका दिया साले को अपनी खाप पंचायत ने।"

"चटवाल के बेटे को। वही जो अभी विदेश से पढ़ाई पूरी करके लौटा था। क्यों क्या हुआ उसको?" मैंने आतुरता से प्रश्न किया।

"अरे कुछ नहीं। वह अपने ही गाँव की एक छोरी को भगा कर ले गया था पिछले महीने। ऐसी पढ़ाई किस काम की ससुरी जो अपने शरीर में इतनी गर्मी भर दे कि रिश्ते-नातों की शर्म लिहाज भी बाकी न बचे। कमीने ने शहर में जा कर मन्दिर में उससे शादी कर ली। बाद में अदालत में रजिस्ट्रर भी करवा ली और निकल गया हनीमून मनाने ससुर, अपनी ही बहिन के साथ। कमीना....." कनछेदी की गालियों का भंडार समाप्त ही नहीं हो रहा था।

"वह अपनी मर्जी से ही तो गई होगी उसके साथ। गाँव की है तो क्या। वह भी पढ़ी-लिखी होगी। उठा कर, मेरा मतलब है अगवा करके तो नहीं ले गया होगा चटवाल का छोरा," मैंने कहा।

"पढ़ी लिखी ही नहीं। बड़े घर की बेटी भी है। अपने एम.एल.ए. साहब की भतीजी," कनछेदी ने बताया।

"भले ही उसे लड़के ने फुसलाया हो अथवा वह अपनी मर्जी से उसके साथ गई हो। गाँव वालों को क्या मतलब है। दोनों बालिग और पढ़े लिखे हैं तो पंचायत बेकार में मुसलचंद क्यों बन गई," मैं गुस्से से बोला।

"यूँ ही अपनी मर्जी से साथ चल देने पर कोई अपनी बहिन के साथ विवाह कर लेता है क्या। पढ़ाई लिखाई क्या बहिन के साथ विवाह करने को कहती है। कमबख्त चल पड़ा बहिन के साथ हनीमून मनाने। अब भुगतना पड़ा न," कनछेदी ने तमतमाये चेहरे से उत्तर दिया।

"बहिन के साथ। अरे! अभी-अभी तो तुम कह रहे थे कि उसने मन्दिर में शादी कर ली। फिर अदालत में भी पंजीकृत करवा ली। तो हनीमून के लिए अपनी बीवी को ही तो लेकर गया होगा न। तो बहिन कैसे कह रहे हो," मैंने जिज्ञासा की।

"इसलिए कि भाई वह छोरी अपने गाँव की ही तो थी। तो एक ही गाँव की होने के कारण उसकी बहिन नहीं हुई। तुम्हीं बताओ," कनछेदी ने प्रश्न किया।

"खैर हुआ क्या।"

"होना क्या था। हनीमून मना कर लौटा तो पंचायत ने उसे पकड़ मंगवाया शहर से। उसका चाचा और भाई ही तो पकड़ कर लाए थे उन दोनों को," कनछेदी ने चटकारेदार सिसकी भरते हुए बताया। "सुना है एम.एल.ए.साहब का भी पूरा समर्थन था इस मामले में।"

"फिर क्या हुआ।"

"अपनी पंचायत ने कहा कि एक ही गाँव के होने के कारण तुम्हारा इस लड़की अर्थात अपनी बीवी के साथ बहिन का रिश्ता बनता है। इसलिए पंचायत के कहर से बचना है तो अपनी ब्याहता इस लड़की से राखी बँधवाओ। अब राखी कैसे बँधवा सकता था वह। जब उससे शादी कर ली थी। उसी के साथ हनीमून पर हो आया था," कनछेदी ने फिर से उसे एक भद्दी सी गाली देते हुए बताया।

"हाँ यह बात तो बिल्कुल ठीक है। शादी के बाद राखी कैसे बँधवा सकता है," मैंने अपनी राय व्यक्त की।

"यही तो। परन्तु पंचायत ने कहा। जो हुआ सो हुआ। अब से शादी कैंसिल और तुम दोनों हुए भाई और बहिन," कनछेदी ने पंचायत के निर्णय के साथ अपनी सहमति व्यक्त करते हुए कहा।
‘फिर क्या निर्णय हुआ," मैंने पूछा।

"फिर क्या! वे दोनों कहाँ मानने वाले थे। तो पंचायत ने फैसला किया कि चटवाल के छोरे को पेड़ पर रस्सी से बाँध कर लटका दो। भैया सीधे फाँसी की सज़ा सुना दी हरामी को। न हमारी सरकार की तरह से कोई मुकदमा न कोई सुनवाई। न अपने न्यायालयों की तरह एक के बाद एक वर्षों तक तरीखों का झंझट। झट से फाँसी की सज़ा सुनाई और गले में रस्सी बाँध कर लटका दिया चटवाल को उस पीपल के पेड़ पर।"

"और किस ने सुनाई थी यह सज़ा। न्यायाधीश कौन था," मैंने पूछा।

"सबने मिल कर। पूरी पंचायत एक स्वर में बोल रही थी। मुखिया जी की हाँ में हाँ मिला रही थी पूरी की पूरी भीड़। मुखिया जी ने ही मुकदमा पेश किया और उन्होंने ही सज़ा सुना दी तुरन्त," कनछेदी ने बताया।

"और पिछले महीने मुखिया जी के बेटे ने अपनी मौसी की लड़की के साथ मुँह काला किया था और खेत में रंगों हाथों पकड़ा गया था उसका क्या हुआ। किसी ने उस मामले को नहीं उठाया पंचायत में," मैंने जानना चाहा।

"अरे वह तो मामूली सी बात थी। जवान बच्चों से ऐसा हो ही जाता है। उन्होंने कोई विवाह थोड़ी न किया था। बलात्कार ही तो किया था। बलात्कार कोई बंधन थोड़े न होता है। विवाह तो सात जन्मों का साथ होता है। जो एक ही गोत्र अथवा गाँव के लड़के-लड़की का नहीं हो सकता। अपने शास्त्र ऐसा ही कहते हैं न। और विज्ञान भी यही मानता है," कनछेदी ने मुझे विस्तार से समझाते हुए पंचायत की राय बता दी।

"पिछले साल मुखिया जी स्वयं गाँव की एक महिला के साथ बलात्कार करने के जुर्म में गिरफ्तार हो गए थे। तब तो किसी ने उनके खिलाफ गवाही तक नहीं दी थी कचहरी में। वह भी रिश्ते में उनकी बहिन ही लगती थी। और इसी गाँव की भी थी और उनकी जात बिरादरी की भी। वह निरन्तर चिल्लाती रही परन्तु किसी ने उसकी बात नहीं मानी और मुखिया जी साफ बरी हो गए। आज भी समाज के अगुआ बने हुए हैं," मेरा मन वितृष्णा से भर उठा।

"हाँ भाई। बड़े लोगों की बड़ी बातें। हाँ इतना मैं भी जानता हूँ कि आज तक किसी खाप पंचायत ने मेरी जानकारी में बलात्कार करने पर तो किसी को मौत की सज़ा सुनाई नहीं। पर हमें इससे क्या लेना देना," कनछेदी ने जैसे पूरे मामले से हाथ झाड़ते हुए कहा।

"शायद तुम्हें पता नहीं है कि इस इलाके के इस गाँव में सबसे अधिक गर्भपात कराए जाते हैं जिनमें से अधिकांश ऐसी लड़कियों के होते हैं जो अपने सगे संबंधियों, यहाँ तक कि सगे भाई भतीजों और मामाओं - चाचाओं द्वारा किए जाने वाले बलात्कार की शिकार होती हैं," मैंने कनछेदी को जानकारी देने के लिए कहा।

"सो तो ठीक है भैया! हमारा क्षेत्र कोई निराला है। पूरे देश में आंकड़े यही बताते हैं कि अधिकतर बलात्कार अपने सगे संबंधियों और जान-पहचान वालों द्वारा ही किए जाते हैं," कनछेदी ने मेरी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा।

"तो उस समय यह गोत्र, गाँव और जात बिरादरी कहाँ जाती है। उस समय तो उँची जाति नीची जाति का सब अन्तर मिट जाता है। तब छूत=अछूत का भेद-भाव कहाँ जाता है," मैंने पूछा।

"कहीं नहीं। मैंने बताया न कि बलात्कार तो बलात्कार ही होता है, कोई विवाह थोड़े न होता है। पंचायत को तो एतराज शादी विवाह से है, बलात्कार और ज़ोर-ज़बरदस्ती से नहीं। अब जो जोरावर है वह ज़ोर ज़बरदस्ती तो करेगा ही। गाँव के भीतर करे अथवा घर के भीतर," कनछेदी ने बात साफ करते हुए कहा।

इतना कह कर कनछेदी तेज़ी से आगे बढ़ने लगा।

मैंने उसका हाथ पकड़ कर कहा, "और उस लड़की का क्या हुआ?"

"उसे उसके घर वाले पकड़ कर ले गए हैं। जिन्दा जलाने से पहले उसके साथ समूहिक बलात्कार किया जाये। कुछ ऐसी ही सज़ा सुनाई जायेगी इसकी चर्चा सुन कर आ रहा हूँ। अब मुझे जाने दो। मैं यह समाचार किसी मीडिया वाले तक पहुँचा कर कुछ कमाई करने के चक्कर में हूँ। देर हो जायेगी तो बेकार में नुकसान हो जायेगा।"

इतना कहते ही कनछेदी बंदूक से निकली गोली की तरह राजमार्ग की तरफ दौड़ता दिखाई दिया।


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