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10.15.2014


गुरु नानक के काव्य में प्रकृति-चित्रण

 संपादक : सुमन कुमार घई
तिथी :१५ अक्तूबर, २०१४

गुरु नानक सिक्खों के आदि गुरु हैं। उन्हें कोई गुरु नानक, कोई बाबा नानक, कोई नानक शाह, कोई गुरु नानक देव, कोई नानक पातशाह और कोई नानक साहब कहते हैं। भारतीय धर्म-संस्थापकों एवं समाज-सुधारकों में इनका गौरवपूर्ण स्थान है। मध्ययुग के संत कवियों में उनकी विशिष्ट एवं निराली धर्म-परंपरा रही है। वह उस धर्म के संस्थापक हैं जिसके आंतरिक पक्ष में विवेक, वैराग्य, भक्ति, ज्ञान, योग, तितिक्षा एवं आत्म-समर्पण की भावना निहित है और बाह्य पक्ष में सदाचार, संयम, एकता, भ्रातृभाव आदि पिरोए हुए हैं। गुरु नानक मध्ययुग के मौलिक चिंतक, क्रांतिकारी सुधारक, अद्वितीय युग-निर्माता, महान् देशभक्त, दीन-दुखियों के परम हितैषी तथा दूरदर्शी राष्ट्र-निर्माता थे।

गुरु नानक देव प्रकृति की गोद में पले-बढ़े थे। प्रकृति के प्रति उनका महान् आकर्षण एवं लगाव था। गुरु नानक देव की विचारधारा ईश्वर-केंद्रित होने के साथ-साथ प्रकृति-केंद्रित भी रही है। प्रकृति की अनेकरूपता के सहारे उन्होंने परमात्मा की महत्ता बतलाई है। उनका मानना था कि उस हरि द्वारा निर्मित प्रकृति जब इतनी मोहक है तो उसका निर्माता कितना सुंदर होगा। यही कारण है कि वे कहते हैं,

गगन मै थालु रबि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती।
धूपु मलआनलो पवणु चवरो करे सगल बनराइ फूलंत जोती॥

यह आरती गुरु नानक देव ने जगन्नाथपुरी के पंडितों को सुनाई थी। इसमें सगुण ब्रह्म के विराट स्वरूप का मनोहर चित्रण हुआ है। गुरु नानक देव कहते हैं, प्रभु की आरती के लिए विस्तृत नीलाकाश थाल बना है, सूर्य और चंद्रमा दीपक बने हुए हैं तथा तारामंडल उस थाल में मोती के रूप में जड़े हुए हैं। मलय चंदन की सुगंधि धूप है, वायु चंवर कर रहा है। हे ज्योतिस्वरूप, वनों के खिले हुए समस्त पुष्प तुम्हारी आरती के लिए ही हैं। वर्तमान में, जिस प्रदूषण युग में हम जी रहे हैं, ऐसे में गुरु नानक देव द्वारा प्रस्तुत किया गया प्रकृति का यह रूप अत्यंत मनमोहक जान पड़ता है जिसकी कल्पना अब केवल काव्यों में ही की जा सकती है। गुरु नानक देव के अनुसार वायु, नदियाँ, अग्नि, पृथ्वी, इंद्र, धर्मराज, सूर्य, चंद्रमा, सिद्ध, बुद्ध, देवतागण, आकाश आदि परमात्मा के भय से स्थित हैं। गुरु नानक देव ने परमात्मा के प्रेम की अतिशयता वन-विहारिणी हरिणी, अंबराइयों में आनंद मनाने वाली कोयल, जल को जीवन समझने वाली मछली, तथा धरती में धँसी रहने वाली सर्पिणी के प्रेम के द्वारा अभिव्यक्ति की है। उन्होंने कहीं-कहीं पर प्रकृति के उपमानों द्वारा परमात्मा के प्रेम की प्रगाढ़ता की समता की है। वे कहते हैं,

रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी जल कमलेहि।....................रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी मछुली नीर।....................रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी चात्रिक मेह।....................रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी चकवी सूर। अर्थात् हे मन हरि से ऐसी प्रीति कर जैसी कमल जल से, मछली नीर से, चातक बादल से और चकवी सूर्य से करते हैं।

गुरु नानक देव ने अपनी अनुभूति एवं कल्पना के आधार पर उस अवस्था का चित्रण किया है, जब परमात्मा, शून्य हरि को छोड़कर कुछ भी अस्तित्व में नहीं था---“कई अरब तथा अरबों से परे—अगणित युगों तक अंधकार ही अंधकार था। उस समय पृथ्वी, आकाश, दिन, रात, चंद्रमा, सूर्य, जीवों की चार खानियाँ, पवन, जल, उत्पत्ति, विनाश, जन्म-मरण, खंड, पाताल सप्त-सागर, नदियाँ, स्वर्गलोक, मृत्युलोक, पातल, दोजख, विहिश्त, क्षय, काल, नरक-स्वर्ग, आवागमन, ब्रह्मा, महेश, दु:ख-सुख, यती, सतोगुणी, वनवासी, सिद्ध, साधक, भोगी, योगी, जंगम, नाथ, जप, तप, संयम, व्रत, पूजा, शौच, तुलसी आदि की माला, कृष्ण, गोपियाँ, ग्वाल-बाल, गौएँ, तंत्र, मंत्र, पाखंड, कर्मकांड, मायारूपी मक्खी, निंदा-स्तुति, जीव-जंतु, कुल, ज्ञान, ध्यान, गोरखनाथ, मत्स्येंद्रनाथ, वर्णाश्रम, वेशादिक, ब्राह्मण, क्षत्रिय, देवता, मंदिर, गौ-गायत्री, यज्ञ-होम, तीर्थस्थान, शेख, मशायख, हाजी, राजा-प्रजा, अहंकार, संसार, भाव-भक्ति, शिव-शक्ति, साजन, मित्र, वीर्य, रज, कतेब, वेद, शास्त्र, स्मृति, पाठ, पुराण, सूर्योदय और सूर्यास्त कुछ भी नहीं थे।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, जबकि प्रकृति-विज्ञान बहुत तेज़ी से विकास कर रहा था, एक वैज्ञानिक ने कहा था कि “प्रकृति मंदिर नहीं, बल्कि एक कारखाना है, जिसमें मनुष्य एक श्रमिक की तरह है।” उसके कहने का मतलब यह था कि वैज्ञानिक प्रगति ने प्रकृति के साथ मनुष्य के रागात्मक संबंध को नष्ट कर दिया है और अब मनुष्य प्रकृति के परिवेश में उसी तरह रहता है जिस तरह कोई श्रमिक कारखाने में। मंदिर में मनुष्य उससे रागात्मक लगाव अनुभव करता है, जबकि कारखाने में वह सिर्फ काम करता है, यंत्रों से अपना कोई हार्दिक संबंध स्थापित नहीं करता है। यह विचार समाप्त नहीं हो गया है, बल्कि एक या दूसरे रूप में वह आज भी जीवित है। आज ऐसा मानने वाले लोगों की कमी नहीं है कि आधुनिक युग प्रकृति के सौंदर्य को नकारने का युग है, उससे प्रभावित होने का युग नहीं। वे ऐसा मानते हैं कि मनुष्य की वैज्ञानिक बुद्धि ने प्रकृति के प्रति उसकी सौंदर्य भावना के स्त्रोत को सुखा दिया है। आज का मनुष्य प्रकृति के सौंदर्य का आस्वादनकर्ता नहीं, बल्कि उसका संहारक है। जबकि पहले ऐसा नहीं था, पहले के मनुष्यों का प्रकृति से विशेष लगाव था। उनका प्रकृति के साथ भावात्मक संबंध था, प्रकृति उनके लिए साध्य भी थी और साधन भी। इसका साक्षात् प्रमाण है, कवियों द्वारा प्रयोग में लायी जाने वाली बहुप्रचलित काव्यरूढ़ि- प्रकृति का बारहमासा वर्णन, जिसमें वर्ष के प्रत्येक महीने की मानवीय अनुभूतियों के साथ समानता दर्शायी जाती है। गुरु नानक देव ने भी तुखारी राग के बारहमाहा में वर्ष के बारह महीनों का अत्यंत हृदयग्राही चित्रण प्रस्तुत किया है। चैत्र महीने का वर्णन करते हुए वे कहते हैं,

चेतु बसंतु भला भवर सुहावड़े।/ बन फूले मंझ बारि मै पिरू घरि बाहुड़ै॥/ पिरू घरि नही आवै धन किउ सुखु पावै बिरहि बिरोध तनु छीजै।/ कोकिल अंबि सुहावी बोलै किउ दुखु अंकि सहीजै॥/ भवरू भवंता फूली डाली किउ जीवा मरू माए।/ नानक चेति सहजि सुखु पावै जे हरि वरू घरि घन पाए॥

अर्थात् चैत्र महीने में वसंत ऋतु के आगमन से वनराजि फूल पड़ती है। अमराइयों में कोयल सुहावनी बोली बोलती है। फूली हुई डालियों पर भँवरा चक्कर लगाता है। प्रियतम के वियोग में यह ऋतु बड़ी दु:खदायिनी हो जाती है।

वैशाख महीने में वृक्षों की शाखाएँ खूब फलती-फूलती हैं। इस ऋतु में जीवात्मा रूपी स्त्री पति-परमात्मा की प्रतिक्षा करती है। जेठ के महीने में सारा संसार भार के समान तपता है। आषाढ़ महीने का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं,

आसाडु भला सूरजु गगनि तपै।/ धरती दूख सहै सोखै अगनि भखै॥/ अगनि रसु सोखै मरीऐ धोखै भी सो किरतु न हारे।/ रथु फिरै छाइआ घन ताकै टीडु लवै मंझि बारे॥

अर्थात् आषाढ़ के महीने में सूर्य आकाश में तपता है। घोर उष्णता से पृथ्वी दु:ख सहन करती है। वह निरंतर सूखकर आग के समान तपती है। अग्नि रूपी सूर्य जल सुखा देता है, बेचारा जल सुलग-सुलग कर मरता है, फिर भी निर्दयी सूर्य का कार्य जारी रहता है। वह अपने जलाने वाले भाव से बाज नहीं आता। इस सूर्य का रथ निरंतर चालू रहता है और स्त्री गर्मी से त्राण पाने के लिए छाया ताकती है। वन में टिड्डे वृक्षों के नीचे ‘चींचीं’ करते हैं अर्थात् पानी के लिए तरसते हैं।

गुरु नानक देव कहते हैं, सावन में वर्षा ऋतु आ गयी है। बादल बरस रहे हैं। हे मेरे मन आनंदित हो। ऐसे समय में मेरे प्रियतम मुझे छोड़कर परदेश चले गये हैं। वे घर नहीं आ रहे हैं। मैं शोक में मर रही हूँ। बिजली चमक कर मुझे डरा रही है। हे माँ, मैं अपनी सेज पर अकेली हूँ और अत्यधिक दु:खी हूँ। यहाँ जीवात्मा रूपी स्त्री के अपने परमात्मा रूपी पति से वियोग का बहुत सुंदर चित्रण हुआ है। हिंदी साहित्य के अंतर्गत भी जायसी कृत ‘पद्मावत’ में नागमती के विरह-वर्णन के अंतर्गत जो बारहमासा वर्णन प्रस्तुत हुआ है, वह अपने-आप में अद्वितीय है। गुरु नानक देव भादो मास का वर्णन करते हुए कहते हैं कि इस महीने में जलाशयों और स्थलों में जल भर गया है। वर्षा हो रही है। अंधेरी काली रात्रि को वर्षा की झड़ी और भयानक बना रही है। भला, बिना प्रियतम के इस ऋतु में स्त्री को सुख कैसे प्राप्त हो सकता है? मेढ़क और मोर बोल रहे हैं। पपीहा ‘पी-पी’ कहकर बोल रहा है। साँप प्राणियों को डसते फिरते हैं। मच्छर डंक मारते हैं। सरोवर लबालब भरे हैं। ऐसे में स्त्री बिना प्रियतम हरी के कैसे सुख पा सकती है। अश्विन महीने में कोकाबेली और कास आदि फूल गए हैं। आगे-आगे तो धूप चली जा रही है और पीछे-पीछे जाड़े की ऋतु आ रही है। दशों दिशाओं में शाखाएँ हरी-भरी दिखलाई पड़ रही हैं। वृक्षों में लगे हुए फल सहज भाव से पककर मीठे हो गए हैं। कार्तिक माह में विरह अति तीव्र हो जाता है और एक-एक पल छ: महीने के समान हो जाता है। यदि हरि के गुण हृदय में समा जाएँ तो अगहन का महीना अच्छा हो जाए। पौष माह में तुषार पड़ता है। वन के वृक्षों और तृणों का रस सूख जाता है। हे प्रभु, तू मेरे तन, मन और मुख में बसा हुआ है, फिर क्यों नहीं मेरे समीप आता। माघ महीने में जो ज्ञान के सरोवर में स्नान करता है, उसे गंगा, यमुना, (सरस्वती) का संगम तथा त्रिवेणी-प्रयागराज तथा सातों समुद्र के पवित्र तीर्थ अनायास प्राप्त हो जाते हैं। फागुन के महीने में, जिन्हें हरी का प्रेम अच्छा लग गया, उनके मन में उल्लास रहता है।

इस प्रकार, गुरु नानक देव ने अपनी वाणियों के माध्यम से प्रकृति का अत्यंत मनोहारी एवं चित्रात्मक रूप प्रस्तुत किया है। उनके द्वारा किया गया प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण एवं उसकी सजीवता देखते ही बनती है। प्रकृति के सौंदर्य में पृथ्वी का हर पहलू सिमटा हुआ है। इसने कलाकारों को दृश्य कलाकृतियों की तथा लेखकों और कवियों को ऐसी रचनाओं के सृजन की प्रेरणा दी है जो हमारे जीवन को जीवंत बनाते हैं। किंतु वर्तमान में, पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ती मानव जनसंख्या के कारण भोजन और आश्रय जैसे संसाधनों की माँग मानव द्वारा बढ़ गई है। जनसंख्या हमारे ग्रह की वहन क्षमता से अधिक हो गई है तथा मानव निवास के लिए प्राकृतिक वातावरण का प्रयोग किया जा रहा है। हम अपने घर बनाने के लिए जंगल काट रहे हैं। हम प्राकृतिक संसाधनों का लगातार अत्यधिक खपत कर पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ा रहे हैं जिससे हम अपनी भावी पीढ़ी को खतरे में डाल रहे हैं। लेकिन यह कहाँ तक नैतिक है? आज हमें इस पर विचार करने की अधिक आवश्यकता है। प्रकृति एक निरपेक्ष सत्ता है, अर्थात् वह अपने अस्तित्व के लिए किसी दूसरे पर निर्भर नहीं है। वह मनुष्य से पहले भी थी और कदाचित् उसके बाद भी रहेगी। आज का मानव यह भूल गया है कि प्रकृति मनुष्य पर निर्भर नहीं है बल्कि मनुष्य ही प्रकृति पर निर्भर है। आज का मानव सब कुछ पाने की चाह में अपनी संवेदना खोता जा रहा है। ऐसे समय में गुरु नानक देव की वाणियाँ एवं उनके द्वारा किया गया प्रकृति-चित्रण मानव के प्रकृति के साथ मजबूत संबंधों को दर्शाता है तथा उसे प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाता है, जो वर्तमान की आवश्यकता भी है।

संदर्भ---

 १. जयराम मिश्र, नानक वाणी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबद, दूसरा संस्करण- १९८८, पृ.४१६
२. वही, पृ.१४८-१४९
३. वही, पृ.३५-३६
४. डॉ नंदकिशोर नवल, कविता की मुक्ति, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, दूसरा संस्करण-१९९६, पृ.४०
५. जयराम मिश्र, नानक वाणी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबद, दूसरा संस्करण-१९८८, पृ.६७४
६. वही, पृ.६७४

मनमीत कौर
शोध-छात्रा, हिंदी-विभाग
विश्व-भारती, शांतिनिकेतन
मो.न.- ८४३६७९८२८२


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