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ISSN 2292-9754

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11.08.2014


अज्ञेय की कहानियों का पारिस्थितिकी पाठ
(जिज्ञास, शरणदाता, हारिति और रोज के विशेष संदर्भ में)

 हमारी पृथ्वी एक महान पारिस्थितिक तंत्र है जिसमें समस्त जीव समुदाय एक-दूसरे पर आश्रित हैं। प्रकृति में सभी जीव ज़रूरी हैं तथा पर्यावरण पर सभी का हक है। सभी जीवों में मानव चूँकि सबसे अधिक विकसित और सोचने-विचारने वाले दिमाग का प्राणी है तथा पर्यावरण का उपभोक्ता भी है, अत: इसके भले-बुरे का ज़िम्मा भी उसी का है। यह पारिस्थितिक चिंतन वर्तमान समय का सबसे ज्वलंत मुद्दा है। प्रस्तुत आलेख में पारिस्थितिकी के संदर्भ में अज्ञेय की कुछ कहानियों पर विचार किया जा रहा है।

सामाजिक वृत्ति के प्राणियों में मनुष्य सर्वाधिक चिंतनशील है जिसमें जिज्ञासा उसका स्वाभाविक गुण है। अज्ञेय की ‘जिज्ञासा’ नामक कहानी मनुष्य के इसी जिज्ञासु प्रवृत्ति पर आधारित है। इस कहानी के अनुसार ईश्वर ने ही इस सृष्टि की रचना की है। उसी ने सौरमंडल बनाया, पृथ्वी बनायी, वनस्पति-पौधे, झाड़-झंखाड़, फल-फूल, लता बेलें उगायीं और उन पर मंडराने के लिए भौरों और तितलियों, गाने को झींगुर भी बनाये, पशु-पक्षी बनाए तथा जीवन में वैचित्र्य लाने के लिए दिन-रात, आँधी-पानी, बादल-मेंह, धूप-छाँह आदि बनाए और फिर कीड़े-मकोड़े, मकड़ी, मच्छर, बर्रे, बिच्छू और अंत में साँप भी बनाए लेकिन उसे संतोष नहीं हुआ तो उसने मानव की सृष्टि की किंतु फिर भी ईश्वर द्वारा रचित उस विराट् सुंदर विश्व में गति नहीं आयी जिसका कारण मानव में जिज्ञासा की कमी थी। प्राचीन काल से लेकर आज तक के सभी रचनाकार किसी-न-किसी रूप में प्रकृति से अवश्य प्रभावित हुए हैं। वाल्मिकी का क्रौंच-वध देखकर आहत होना और रामायण की रचना करना, जायसी कृत ‘पद्मावत’ में नागमती के विरह में प्रकृति का उसके दुख में शामिल होना आदि इसका स्पष्ट उदाहरण है। कभी-कभी तो रचनाकारों ने नर और नरेतर जगत के बीच सम्वाद भी कायम किया है। यहाँ भी आधुनिक युग के रचनाकार अज्ञेय मनुष्य और साँप के बीच सम्वाद स्थापित करते हैं जिसमें साँप मनुष्य से कहता है, “मूर्ख, अपने जीवन से संतुष्ट मत हो! अभी बहुत कुछ है जो तूने नहीं पाया, नहीं देखा, नहीं जाना! यह देख, ज्ञान मेरे पास है। इसी के कारण तो मैं ईश्वर का समकक्ष हूँ।” जब मनुष्य ने पहली बार अपने द्वारा उत्पन्न हुए शिशु को देखा तो उसके भीतर से एक ही प्रश्न फूटा कि यह क्या सृष्टि है जिसकी रचना ईश्वर ने नहीं की। जब से मनुष्य में यह जानने की इच्छा पैदा हुई तभी से ईश्वर द्वारा निर्मित संसार में गति आ गयी। इस पर ईश्वर कहता है कि मेरी सृष्टि सफल हुई, लेकिन विजय मानव की है। मानव में जिज्ञासा है, अत: वही विश्व को चलाता और गति देता है।

स्पष्ट है कि सृष्टि के प्रारंभ से ही, इस जिज्ञासा की शांति हेतु चिंतन एवं नवीन प्रयोग करना मनुष्य की स्वाभाविक वृति रही है। उत्पन्न हुआ शिशु अपने परित: एक विचित्र परिवेश प्राप्त करता है, इस परिवेश के प्रति उसकी प्रारम्भिक जिज्ञासा अपनी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु होती है। बढ़ती आवश्यकताओं के अनुसार वह बड़े परिवेश से संबंधित होने लगता तथा उसका चिंतन सभी के प्रति बढ़ता है जिनसे वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा होता है। इस क्रम में वह अपने माता-पिता, भाई-बहन, नाते-रिश्तेदार, मित्रों, पशु-पक्षियों, आकर्षक पुष्पों, वृक्षों आदि के प्रति न केवल चिंतन करता है, ज्ञान प्राप्त करता है अपितु अपनी जिज्ञासाओं के समाधान हेतु इनका उपयोग भी करता है। यह उपयोग एक सीमा तक तो ठीक है किंतु सीमा से परे इनका उपयोग, उपयोग न होकर शोषण बन जाता है जो चिंतन का नहीं बल्कि चिंता का विषय है। यह उपयोग वृति कब उपभोग वृति का रूप ले लेती है, मनुष्य को स्वयं इसका ज्ञान नहीं हो पाता है। अज्ञेय मनुष्य के इस स्वाभाविक गुण से अच्छी तरह परिचित थे। मनुष्य के सामने उसके अस्तित्व की समस्या थी, इसीलिए उसमें सब कुछ जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। इसी कारण अज्ञेय का मंतव्य रहा है कि मानव जब भी कुछ जानने का इच्छुक हुआ है, तो कुछ-न-कुछ अनहोनी अवश्य हुई है।

हमारे चारों ओर की भूमि, हवा और पानी ही हमारा पर्यावरण है। इसी में हम चलते चले आए हैं और इससे हमारा संबंध बहुत पुराना है, लेकिन हमसे भी पुराना संबंध पौधों और जानवरों का है। यह पर्यावरण जीव-जातियों के कारण ही जीवंत है। किंतु आज हम प्रकृति से तथा प्रकृति के जीव-जंतुओं से दूर होते जा रहे हैं। वर्तमान में जानवरों के साथ हमारी संवेदन क्षमता में बहुत अंतर आ गया है। प्रकृति में मनुष्य तथा जानवर परस्पर पूरक हैं। अत: इनके एक दूसरे के साथ संवेदनात्मक संबंधों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। अज्ञेय की कहानी ‘शरणदाता’ वैसे तो हिंदू-मुस्लिम दंगों पर आधारित है किंतु विषाक्त भोजन करने से हुई बिलार की मृत्यु इस कहानी का केंद्र बिंदु है। जहाँ चारों ओर खून-खराबे का माहौल है, सभी लोग अपने घरों को छोड़कर भाग रहे हैं, वहीं देविंदरलाल अपने मित्र रफिकुद्दीन के यहाँ शरण पाता है। इस खूनी खेल का जीवंत वर्णन करते हुए अज्ञेय कहते हैं, “रात को जहाँ-तहाँ लपटें उठने लगीं और भादो की उमस धुँआ खाकर और भी गला-घोंटू हो गई।” एक अन्य स्थान पर वे कहते हैं, “विषाक्त वातावरण, द्वेष और घृणा की चाबुक से फड़फड़ाते हुए हिंसा के घोड़े, विष फैलाने को सम्प्रदायों के अपने संगठन और उसे भड़काने को पुलिस और नौकरशाही।” मजबूरीवश इस द्वेष पूर्ण माहौल को छोड़ देविन्दरलाल को शेख अताउल्लाह के यहाँ शरण लेनी पड़ती है। सुरक्षा के नाम पर उसे एक कोठरी में कैद करके रखा जाता है। वह सोचता है कि पहले विदेशी सरकार लोगों को कैद करती थी कि वे आज़ादी के लिए लड़ना चाहते थे, अब अपने ही भाई अपनों को तनहाई कैद दे रहे हैं क्योंकि वे आज़ादी के लिए ही लड़ाई रोकना चाहते हैं। भारतीय परम्परा के अनुसार आरम्भ से ही पशु-पक्षियों के साथ मनुष्य का बड़ा ही मित्रवत् संबंध रहा है, विशेषकर अकेलापन दूर करने की दृष्टि से। देविन्दरलाल के अकेलेपन का साथी बिलार बनता है। वह अपने खाने का कुछ हिस्सा बिलार को दे देते थे। बिलार भी उनसे खूब हिल-मिल गया था। वे कभी आँगन में कुछ वरजिश करते, कभी कंकड़ों से खेलते, कभी आँगन की दीवार पर बैठने वाली गोरैया देखते, कभी कबूतर की गुटरगूँ सुनते। इसी तरह दिन पार होने लगे परंतु अचानक एक दिन उनके खाने के बीच में से एक कागज़ की पुड़िया निकलती है जिस पर लिखा होता है कि खाना कुत्ते को खिलाकर खाइएगा। देविन्दरलाल वह खाना बिलार को खिला देते हैं। ज़हर वाला खाना खाने से हुई बिलार की दर्दनाक मृत्यु का चित्रण अज्ञेय ने बड़े ही मार्मिक ढंग से किया है, “सहसा बिलार ज़ोर से गुस्से से चीखा और उछलकर गोद से बाहर जा कूदा, चीखता-गुर्राता-सा कूदकर दीवार पर चढ़ा और गैराज की छत पर जा पहुँचा। वहाँ से थोड़ी देर तक उनके कानों में अपने-आप से ही लड़ने की आवाज़ आती रही। फिर धीरे-धीरे गुस्से का स्वर दर्द के स्वर में परिणत हुआ, फिर एक करुणा रिरियाहट में, एक दुर्बल चीख में, एक बुझती हुई सी कराह में, फिर सहसा चुप हो जाने वाली लम्बी साँस में—मर गया...।” मनुष्य स्वार्थबद्ध प्राणी है। अपने से कमज़ोर पर आधिपत्य जमाने से उसने कभी-भी संकोच नहीं किया। अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए उसने हमेशा ही अपने से दुर्बल के अस्तित्व को ख़तरे में डाला है। इसका स्पष्ट उदाहरण हमें ‘शरणदाता’ में देखने को मिलता है। शेख अताउल्लाह मुसलमानों के अस्तित्व को बचाने के लिए देविन्दरलाल को खाने में ज़हर देता है और देविन्दरलाल अपने अस्तित्व को बचाने के लिए न चाहते हुए भी, उस बेजुबान मूक बिलार को ज़हर वाला खाना खिला देता है और वहाँ से भागकर स्वयं को बचाता है। वही बिलार जो देविन्दरलाल की तन्हाई का साथी बनता है, देविन्दरलाल स्वयं को बचाने के लिए उसी बिलार की आहुति देने में तनिक भी संकोच नहीं करता है। मनुष्य की कमज़ोरियाँ ही उसे न चाहते हुए भी अमानवीय वृत्तियों के लिए मजबूर करती है। मजबूरन ही क्यों न हो, देविन्दरलाल ने उस बिलार के साथ अन्याय ही किया है। मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए उनका दुरुपयोग करता है। उनकी यातना-पीड़ा के बारे में नहीं सोचता है। परंतु आज इस विषय पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है। सभी जीव-जंतु हमारे पर्यावरण का हिस्सा है। उनमें भी विकार एवं वेदना है। अत: संवेदनात्मक और दुखात्मक स्तर पर मनुष्य को उन्हें अपने समान ही समझना चाहिए।

भूमंडलीकृत दुनिया में लोगों की मानसिकता पूर्णत: उपभोग की हो गई है। अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति या स्वार्थसिद्धी के लिए दूसरों का उपभोग ही सबका लक्ष्य बन गया है। इसके अंतर्गत मनुष्य को भी वस्तु समझा जाने लगा है। जब संवेदनशील मनुष्य का उपयोग कर उसे वस्तु के समान फेंक दिया जाता है तो उसका हृदय कितना दुखता होगा, इसकी अभिव्यक्ति ‘हारिति’ में हुई है। इस कहानी में एक ओर जहाँ क्रांति के नाम पर अपना सम्पूर्ण अर्पित करने वाली हारिति है तो दूसरी ओर क्रांति के नाम पर अपनी स्वार्थपूर्ति करने वाला निर्मम अधिकारी।

हारिति मछुआरों के बीच पली-बढ़ी एक ऐसी अविवाहित युवती है, जिसे कभी भी कुमारियों के जीवन में मिलने वाला आनंद नहीं मिल सका। वह सदा पुरुष वेश में रह कर कैंटन सेना में जासूस का काम करती है। उसके इस वाक्य में, “जिस देश में पुरुष भी गुलाम हों उसमें स्त्री होने से मर जाना अच्छा है।” मानव द्वारा मानव के शोषित होने का दर्द भरा आक्रोश छिपा है। एक ओर सीक्यांग नदी की प्रलयंकारी बाढ़ तो दूसरी ओर शत्रुओं की अचूक नज़र, ऐसी भयंकर परिस्थिति में हारिति स्वयं को संकट में डाल कर क्वानियन एवं अन्य साथियों के साथ घोड़े पर सवार होकर डायना पेइफू के पास अपने अधिकारी द्वारा दिए गए संदेश को पहुँचाती है।

रास्ते में शत्रुओं से उसकी मुठभेड़ होती है, जिसमें हारिति के सभी साथी मारे जाते हैं। हारिति किसी तरह पानी में कूदकर शत्रुओं के चंगुल से बच निकलती है और डायना पेइफू को पत्र सौंपती है। पत्र हारिति के सामने ही पढ़ा जाता है और उसे मालूम हो जाता है कि यह तो केवल एक प्रेम पत्र है जिसे उसका अधिकारी उसके जीवन की परवाह किए बगैर अपनी प्रेमिका के पास भिजवाता है। हारिति क्रांति के नाम पर अपना सर्वस्व दाँव पर लगा देती है किंतु स्वयं को वस्तु की तरह प्रयोग में लाया देखकर अत्यंत दुखी होती है और आत्महत्या कर लेती है। हारिति के मन की व्यथा को अज्ञेय ने इस प्रकार दर्शाया है, “व्यथा की एक रेखा उसके मुख पे दौड़ गयी। यही था काम, जिसके लिए उसने इतनी मेहनत की थी, यही थी सेवा, जिसके लिए उसने इतना बलिदान दिया था, यही था अनुष्ठान, जिसकी पूर्ति के लिए उसने उस घोड़े की, उन बंधुओं की, और क्वानयिन-क्वानयिन की आहुति दी थी- यह प्रेम प्रवंचना।” यहाँ यह प्रेम प्रवंचना नहीं बल्कि स्वार्थ प्रवंचना है। अज्ञेय की इस कहानी के माध्यम से हम भूमंडलीकृत दुनिया की अमानवीय वृत्तियों पर विचार करने के लिए बाध्य हैं। वर्तमान समय में मनुष्य दूसरे मनुष्य का वस्तु की तरह उपभोग करने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाता है। आज के मानव का उद्देश्य मात्र अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करना ही है, भले ही इसमें किसी की जान ही क्यों न चली जाए। इस कहानी में हारिति का अधिकारी अपनी स्वार्थ पूर्ति करता है और हारिति का भी उद्देश्य चाहे जो हो उसकी पूर्ति में उसके कई साथियों की, उनके बेजुबान सवारियों घोड़ों की जान चली जाती है। इस प्रकार मानव द्वारा मानव की, अन्य पशु-पक्षियों का वस्तु की तरह उपभोग करना अत्यंत ख़तरनाक प्रक्रिया है।

आज विकास, प्रगति आदि का मतलब प्रकृति से, अपनी स्वाभाविकता से कट जाना है। यह पर्यावरण प्रकृति से हमें विरासत में मिला था, पर विज्ञान युग ने अपने नए रंग-ढंग से इस प्राकृतिक पर्यावरण को अप्राकृतिक बना दिया है। आज का मनुष्य जीवन से बिल्कुल दूर होता जा रहा है और यांत्रिक जीवन जीने को मजबूर है। अज्ञेय की ‘रोज’ कहानी में इसी यांत्रिक युग की अभिव्यक्ति हुई है जिसके पात्र अप्राकृतिक जीवन जी रहे हैं और मानुषिक संवेदना से रहित होते जा रहे हैं। यह कहानी मालती, महेश्वर और उनके पुत्र टिटी की है। मालती और महेश्वर के वैवाहिक जीवन में प्रेम की बजाए निरसता भरी पड़ी है। वैसे तो वे पहाड़ी गाँव में अर्थात् प्रकृति की गोद में रहते हैं किंतु स्वयं अप्राकृतिक जीवन जीने को बाध्य है। महेश्वर डॉक्टर है और उसका रोज का वही काम है, वही गैंग्रीन के मरीज, वही हिदायतें, वही नुस्खे, वही दवाइयाँ। इसी प्रकार, मालती घर सँभालती है और घड़ी की सूई के हिसाब से रोज के एक ही कामों में उलझी रहती है। विवाह से पहले की चंचल और उद्धत मालती बाद में बिल्कुल शांत हो जाती है। वह अपनी स्वाभाविकता खो देती है। जहाँ पहले वह पढ़ना नहीं चाहती थी अब अखबार के एक टुकड़े को भी तरसती है। मालती की दशा का वर्णन लेखक ने इस प्रकार किया है, “मालती एक बिल्कुल अनैच्छिक, अनुभूतिहीन, नीरस, यंत्रवत- वह भी थके हुए यंत्र की भाँति- स्वर में कह रही है- ‘चार बज गए...’ मानो इस अनैच्छिक समय गिनने-गिनाने में ही उसका मशीन तुल्य जीवन बीतता हो, वैसे ही, जैसे मोटर का स्पीडो-मीटर यंत्रवत् फासला नापता जाता है, और यंत्रवत् विश्रांत स्वर में कहता है (किससे) कि मैंने अमित शून्यपथ का इतना अंश तय कर लिया...।” यहाँ तक कि मालती का पुत्र टिटी पलंग से गिरता है और उसे चोटें भी आती हैं तो भी एक माँ को कोई फर्क नहीं पड़ता है और वह कहती है कि ऐसा तो रोज ही होता है। कैसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि वर्तमान समय में लोग मशीन तुल्य जीवन बिताने को विवश तो है किंतु इस मशीनी जीवन ने यंत्र की भाँति उनके हृदय को भी संवेदनहीन कर दिया है जो कि कार्य तो करता है किंतु स्वयं हर प्रकार की संवेदना से रहित होता है, तभी तो महेश्वर का रोज गैंग्रीन के मरीजों की टाँगें काटना और मालती का अपने पुत्र को रोज पलंग से गिरते देखना, रोज चोटें लगना आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनसे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। आधुनिक युग में जहाँ एक ओर मानव ने अथाह प्रगति कर ली है, चाँद पर गाँव बसाने की कल्पना करने लगा है उसका इस प्रकार संवेदना शून्य हो जाना स्वयं उनके सुखी जीवन के लिए चिंता का विषय बन गया है।

आज आदमी आदमी नहीं बल्कि संसाधन या उपभोक्ता मात्र बनकर रह गया है। वह भौतिक समृद्धियों एवं सुविधाओं की अंधी दौड़ में शामिल होकर स्वयं भावना और संवेदना हीन हो गया है। मनुष्य का अपनी स्वाभाविकता, प्राकृतिक परिवेश, पर्यावरण से दूर होना ही इसका मुख्य कारण है। मनुष्य का अपने सुखी जीवन के लिए संवेदनशील होना नितांत आवश्यक है।

आज आवश्यकता है, मनुष्य संवेदनात्मक स्तर पर दूसरों को अपने समान ही समझे तभी ‘वसुवैध कुटुम्बकम्’ की अवधारणा सही साबित होगी। उसे पर्यावरण को सबका पर्यावरण समझना होगा तथा सभी के प्रति आदर भाव रखना होगा। अज्ञेय की उपर्युक्त कहानियों से स्पष्ट है कि उनकी पारिस्थितिक चेतना किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं है बल्कि उनकी यह चिंता हमारे सम्पूर्ण परिवेश के प्रति है जिसमें पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, मानव आदि सभी शामिल हैं। चाहे जैविक कारक हों या अजैविक, जहाँ कहीं भी उनका दोहन या शोषण हुआ है अथवा उनके अस्तित्व को नुकसान पहुँचा है तो वहाँ अज्ञेय जी की पैनी दृष्टि अवश्य गयी है जिसका वर्णन हमें उनकी रचनाओं में मिलता है। अत: स्पष्ट है कि पारिस्थितिक सजगता की दृष्टि से अज्ञेय हिंदी के विशिष्ट कहानीकार हैं। प्राकृतिक संसाधनों के समानांतर मानवीय संसाधनों में बदलते हुए मनुष्य की जो पारिस्थितिकी उन्होंने उकेरी है वह हिंदी कहानी में नव्यतर कही जाएगी।

संदर्भ--

१. कृष्णदत्त पालीवाल (स.), अज्ञेय रचनावली, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण-२०११, पृ.४८

२. वही, पृ.-५५९

३. वही, पृ.-५६०

 ४. वही, पृ.-५६६

५. वही, पृ.-६५

६. वही, पृ.-७७

७. वही, पृ.-२५३

मनमीत कौर
हिंदी-विभाग, शोध-छात्रा
विश्व-भारती, शांतिनिकेतन
मो.न.- ८४३६७९८२८२


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