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ISSN 2292-9754

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06.07.2016


सिनेमा में सेंसर की ज़रूरत हमने ही पैदा की है : मिहिर भुट्टा
केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड के वर्तमान सदस्य मिहिर भुट्टा की सिनेमा शोधार्थी मनीष कुमार जैसल की बातचीत

अभिव्यक्ति की आज़ादी का मामला इन दिनों अपने चरम है और हमेशा से ही अभिव्यक्ति के लिए नागरिक सत्ता से लड़ते आए हैं। साहित्य के अलावा सिनेमाई अभिव्यक्ति पर भी लगाम लगाने का चलन भारत की ग़ुलामी के दिनों से चलता आया हैं। वर्तमान में चलचित्रों पर बने क़ानून तो आज़ाद भारत के है पर 21वीं सदी के हिसाब से काफ़ी पुराने महसूस होते है। ख़ुद सिनेमा से जुड़े लोग सेंसरशिप जैसी व्यवस्था को नकारते हैं।

फ़िल्मकार मुकेश भट्ट, अपनी फ़िल्म के सेंसर से ख़फ़ा सरकार के रवैये पर भी सवाल उठाते हैं और कहते हैं, "सरकार बदलने के साथ ही सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष बदल जाते हैं। सरकार का ही कोई नुमाइंदा कुर्सी पर बैठता है और फिर शुरू होता है नया खेल। सिनेमा वाले सबसे आसान निशाना होते हैं तो पहले हमला उन्हीं पर होता है।"

वहीं निर्माता दिवाकर बनर्जी भी यह मानते हैं कि हमें सेंसरशिप क़ानून की समीक्षा करने की ज़रूरत है। सरकार या नौकर शाही द्वारा मनमाने ढंग से अपने उद्देश्यों कि पूर्ति के लिए सेंसर बोर्ड का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। फ़िल्म निर्माता होमी अदजानिया एक समझदार और बेहतर सेंसरशिप विकसित करने कि ज़रूरत की बात कहते हैं। अपनी ख़ुद की फिल्मों में सेंसरशिप के चलते लगने वाली अटकलों से जूझते फ़िल्मकार अनुराग कश्यप इन्टरनेट युग में सेंसरशिप को बेकार मानते है। कश्यप कहते हैं यहाँ कोई आदर्श दुनिया नहीं है जहाँ हम हर तरह की सेंसरशिप के अधीन हों। सेंसर बोर्ड की भूमिका को सीमित करना इस दिशा में सबसे बेहतर क़दम होगा।

सेंसरशिप को लेकर रोज़ नए-नए प्रयोग होते दिख रहे हैं फ़िल्म में सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा फ़िल्मकार श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गयी जो जल्द ही सेंसरशिप के प्रसार तथा उनकी नीतियों पर अपनी बात रखेगी।

सेंसरशिप के नैतिक मानदंड तथा हिन्दी सिनेमा विषय को लेकर मैंने सेंसर बोर्ड के वर्तमान सदस्य श्री मिहिर भुट्टा जी से संपर्क किया और और सेंसरशिप के संदर्भ में बोर्ड की गतिविधियों की लंबी चर्चा की। श्री मिहिर भुट्टा जी लेखक और निर्देशक हैं इन्होंने चाणक्य, महाभारत, रज़िया सुल्तान, जैसे टीवी सीरियल में सराहनीय और महत्वपूर्ण योगदान दिया। मिहिर जी से मेरी मुलाक़ात सपनों के शहर मुंबई में हुई। सड़कों पर हमेशा रेड लाइट जलने वाले इस शहर के ट्रैफिक में मैं भी फँसा और मिहिर जी से मिलने में थोड़ी देर हुई हालाँकि उन्होंने मेरा इंतज़ार किया इसके लिए उनका धन्यवाद...... पेश है उनसे बातचीत के मुख्य अंश :

मनीष :

आप मितेश पटेल के साथ प्रधानमंत्री मोदी जी पर कोई फ़िल्म बना रहे हैं? क्या यह सच है?

मिहिर भुट्टा :

मितेश पटेल एक दम झूठा आदमी है, इसकी बातों को मैं सिरे से नकारता हूँ।

मनीष :

आप सेंसर बोर्ड के सदस्य हैं इन दिनों सेंसरबोर्ड बोर्ड की गतिविधियों पर आपकी क्या टिप्पणी है?

मिहिर भुट्टा :

सबसे पहले तो हमने सोचा है और हमारे राज्य मंत्री जी की ओर से आश्वासन भी मिला है, हम लोग सेंसर बोर्ड से सर्टिफ़िकेशन बोर्ड कहलाने की ओर जाएँगे। हम अमेरिकन और ब्रिटिश में से किसी एक सिस्टम को उठाएँगे। दोनों काफ़ी हद तक समान हैं। हम भी 17+ 18+ इत्यादि वर्ग के लिए प्रमाणीकरण की व्यवस्था करने की ओर अग्रसर हैं।

मनीष : आपको क्या लगता है कि सिनेमा में सेंसर की ज़रूरत है?
  हिंदुस्तान में हर चीज पर सेंसर की ज़रूरत हमने ही पैदा कर दी है। हम इतनी बेवकूफ़ प्रजा हैं कि सेंसरशिप नहीं करेंगे तो मार-काट पर उतर आएँगे। आप देखिये थियेटर में तो सेंसरशिप नहीं है तो अमेरिकन प्ले को देखिये मार्डननिटी के नाम पर क्या-क्या दिखा देते हैं।
मनीष : ऐसे में तो आप अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का पूरी तरह हनन कर रहे हैं?
मिहिर भुट्टा :

देखिये 2-3 बातें हैं एक तो अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता मेरे दृष्टिकोण से अमर्यादित नहीं हो सकती है या तो मर्यादा हम ख़ुद समझें या फिर सरकार जो कर रही है ठीक है। दूसरा आप देखिये हमारे देश कि स्थिति थोड़ी शोचनीय है। हमारे देश में बस्ती बहुत ज़्यादा हैं, अनपढ़ लोग बहुत हैं, सिर्फ़ अपना साइन करके निकल जाने वाले,10वीं आठवीं तक पढ़ने वाले लोगों को पढ़े-लिखे नहीं कहेंगे। अलग-अलग धर्म, अलग-अलग भाषा, अलग-अलग राज्य के होते हुए अगर हमारे यहाँ सेंसरशिप या मर्यादा नहीं लगाई गयी बहुत जल्द खून-मार की तक बात पहुँच जाएगी ऐसा मेरा मानना है। जो कि हो रहा है एवरि डे।

सबसे पहले तो एक विचार जो चला था - कला के लिए कला उस विचार से मैं बहुत ज़्यादा तवज्जो नहीं रखता हूँ। मुझे लगता है आप अपनी कला बेचने निकलते हो समाज को ध्यान में रखकर अपनी कला को तैयार करना पड़ेगा। हालाँकि फ़िलहाल में हमारा बोर्ड बहुत ज़्यादा सकारात्मक नहीं है इसे सर्टिफ़िकेशन बोर्ड बनाने कि तरफ जल्द से जल्द प्रयास किया जाना चाहिए। क्यों अभी हमारे पास 4 ही तो कटेगरी हैं उसमें से ua का तो कोई मतलब ही नहीं है। इसी पर एक बात और कहना चाहूँगा कि सर्टिफ़िकेशन की व्यवस्था बढ़ा लेने से भी ग्रामीण भारत में कौन जाकर यह देखने वाला है कि कौन 17+ है या 18+। फिर भी सर्टिफ़िकेशन हो तो उसे वर्गीकृत किया जा सकता है कि कि फ़िल्म में क्या है? कौन देखे?

अभी क्या है कि अ सर्टिफिकेट वाली फ़िल्म बहुत वाइलेंट बहुत सेक्सुयल अभद्र भाषा की भी हो सकती है पता नहीं चलता आपको। इसीलिए कैटेगरी बढ़ाना ज़रूरी है। मैं कहूँ तो सेंसरशिप शब्द बहुत बुरा है लेकिन उसके पीछे जो आशय है वो उतना बुरा नहीं है। ऐसा मेरा मानना है।

मनीष :

अगर ज़रूरी है सेंसरशिप तो मानदंड क्या होने चाहियें?

मिहिर भुट्टा :

इसके मानदंड क्या होने चाहिएँ .... यह सवाल तो काफ़ी पेचीदा है। सबसे पहले तो हमें यह सोचना पड़ेगा कि हमारा देश अनपढ़ देश है, दूसरा डायवर्सिटी बहुत ज़्यादा है। डायवर्सिटी में अभी जो मुद्दा धर्म भाषा का छिड़ा है [कोंकोक्सन] चला है इसमें कहीं न कहीं बात हिंसात्मकता तक न पहुँच जाये, समाज पूरी तरह टूट न जाए, इससे निपटने के लिए इस प्रकार का मानदंड रखना ज़रूरी है। आप कोशिश करें कि सेक्सुयल कंटेन्ट, वायलेंट कंटेन्ट बच्चे न देखें। ऐसा मानते हैं .... प्राब्लम तब पैदा होती है जब किस ख़ास समुदाय के बारे में कुछ कहा गया हो उनको हर्ट किये जाने वाली बात फ़िल्म में की गयी हो तो उसके मापदंड अलग बनाने पड़ेंगे। सिर्फ़ इससे नहीं चलेगा कि बच्चे इसे देख पायें न या देख पायें। इस पर बोर्ड बातें कर रहा है पिछले दिनों इन्ही मुद्दों को लेकर बड़ी बोर्ड मीटिंग आयोजित हुई थी हालाँकि मैं यू.एस. गया हुआ था तो अटेण्ड नहीं कर पाया।

मनीष : अब तक जो मानदंड अपनाए जाते रहे हैं क्या आप उनसे संतुष्ट हैं?
मिहिर भुट्टा :

नहीं... बिलकुल नहीं। ऐसा कोई ठोस आधार ही सिनेमेटोग्राफ़ एक्ट में बनाया ही नहीं गया जिससे संतुष्ट हुआ जा सके। सब लोग अपना ही चलाने में आमादा रहते हैं।

देखिये हर साल पूरे भारत में क़रीब 13000 यूनिट्स देखे जाते हैं जिनमें फ़िल्में हों, प्रोमोस हों, विज्ञापन हों, वृत्तचित्र हों, इन्हें 25 आदमी का बोर्ड तो देख नहीं सकता तो सरकार व चेयरमैन ने सिस्टम ये बनाया कि एड्वाइज़री बोर्ड मेम्बर की नियुक्ति हो। हालाँकि इनमें कोई सदस्य की सीमा निर्धारित नहीं है। और तो और ये कोई सिनेमा कि फील्ड से जुड़े हुए भी मेम्बर भी नहीं होते हैं तो वो लोग अपने हिसाब से ही फ़िल्मों के प्रमाण पत्र का निर्धारण करते हैं। वो सिर्फ़ एक्ट को ही ध्यान में रखकर जो समझ आता है निर्णय लेते हैं। कभी साला शब्द भी फ़िल्म से निकलवाते हैं वहीं भ म च वाली गालियाँ भी नहीं निकलवाते। तो वो उनके हिसाब से चलता रहता है। हो सकता है इन सब मामलों में कभी कोई करप्शन भी रहा हो हालाँकि मेरे सामने तो हुआ नहीं।

मनीष : वर्तमान सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष निर्मित फ़िल्मों में भी इसी तरह के शब्दों का प्रयोग आम हुआ करता था। और वही उन्होंने फ़िलहाल में 31 शब्दों कि लिस्ट जारी की है जिन्हें फ़िल्मों में बैन किया जाना प्रस्तावित किया है।
मिहिर भुट्टा :

हा हा हा ..... बहुत ही अच्छा सवाल है। देखिये होता ये है कि मार्केट फोरसेस हमेशा चलते रहते हैं। अगर आपकी फ़िल्म में सपोज़ एक आइटम नंबर दिखा और फ़िल्म चल पड़ी तो मैं जब अपने 5 करोड़ या अधिक लगा कर फ़िल्म बनाऊँगा तो 1 आइटम नंबर डालने कि कोशिश तो ज़रूर करूँगा। हमारे यहाँ तो ये भी कहा जाता है कि हिट फ़िल्म का कुत्ता भी हिट होता है उसको ले आओ उसी तरह आइटम नंबर का भी कांसेप्ट है। वही काम पहलाज जी ने अपने समय में किया होगा। और यह भी सच है कि जो काम आज पहलाज जी कर रहे हैं वो काम उन दिनों के सेंसर बोर्ड ने किया होता तो पहलाज जी ऐसी फिल्में कभी नहीं बना पाते। और यह कहना तो बिलकुल जायज़ भी नहीं लगता कि पहलाज जी ने किया तो अब वो क्यों बैन कर रहे हैं।

मनीष : आने वाले दिनों में सेंसर बोर्ड की क्या नयी योजनाएँ हैं?
मिहिर भुट्टा :

एक तो सिंप्लीसिटी लाने कि कोशिश, सेंसर बोर्ड की जगह सर्टिफ़िकेशन बोर्ड कहलाने कि ओर बढ़ रहे है। स्पीड लाने कि कोशिश जैसे अभी बोर्ड थियेटर किराए में लेकर फ़िल्मों का परीक्षण करता है उसे इन्टरनेट से अपलोड डाउनलोड कर कहीं भी, कभी भी देखकर उसे एक दिन के अंदर प्रमाणित किए जाने की भी योजना है। प्रोड्यूसर के साथ वीडियो कान्फ्रेंसिंग करने कि भी योजना बना रहे हैं। कुल मिलकर इन्शोर्ट प्रोद्योगिकी का ज़्यादा इस्तेमाल किए जाने कि योजनाएँ है।

मनीष : फ़िल्म प्रमाणित होने के बाद क्या आपको लगता है कि आपने दर्शक की अंतिम रेखा खींच दी।
मिहिर भुट्टा :

सपोज़ किसी फ़िल्म को वयस्कों के लिए प्रमाण पत्र दिया गया तो क्या गारंटी है कि उसे सिर्फ़ वयस्क ही देखेगा। क्योंकि इसी देश में यू ट्यूब जैसे अन्य माध्यमों में भी नई फ़िल्मों का मिल जाना आम है।

देखिये मैं आपको यही बताने कि कोशिश कर रहा हूँ कि हमारी बस्ती बहुत बढ़ गयी है। फिल्में बहुत बढ़ गयी हैं और ये जो सेंसर बोर्ड और एड्वाइज़री बोर्ड इनके लिए बहुत छोटा पड़ रहा है। प्रमाणपत्र देने से आगे का काम सेंसर बोर्ड कर नहीं सकता है हालाँकि बोर्ड मेम्बर को एक कार्ड दिया जाता है कि आप कहीं भी किसी भी थियेटर में जाके वो फ़िल्म देख सकते हैं ताकि आपको पता चले कि आपने जो सीन काटा है वो फ़िल्म से काटा है या नहीं। हालाँकि यह थ्योरी बेस्ट है प्रैक्टीकली इसे करने का साहस सेंसर बोर्ड ने अभी नहीं लिया है।

मनीष : आपके सहयोगी बोर्ड सदस्य श्री चन्द्र प्रकाश द्विवेदी की फ़िल्म मुहल्ला अस्सी के बिना रिलीज़ हुए अन्य माध्यमों में उपलब्ध होने की घटना पर आप क्या कहना चाहेंगे।
मिहिर भुट्टा :

अभी यह फ़िल्म सेंसर बोर्ड के सामने आई ही नहीं इसके अलावा मैं कुछ नहीं कह सकता।

मनीष : सेंसर बोर्ड का वर्तमान रवैया अगर देखा जाए तो क्या यह कहना गलत होगा कि फ़िल्म कि कहानी भी इन्ही मानदंडों को देख कर लिखी जाएँगी इसमे समाज का सच और अभिव्यक्ति की आज़ादी कहाँ तक बचती है?
मिहिर भुट्टा :

समय बदल चुका है पहले फ़िल्में मनोरंजन और शिक्षा का काम दोनों साथ करती थीं पर आज समाज का सच दिखाने का ज़िम्मा अन्य माध्यमों ने भी उठाया है। फ़िल्म को एंटरटेनमेंट तक सीमित रखना चाहिए ऐसा मेरा मानना है। शिक्षा आधारित फ़िल्म हो तो आप भले ही इसकी नयी कटेगरी बना सकते हैं।

जब आप शिक्षा कि बात करेंगे तो...... भारत में जो मानदंड बनाए जाएँगे वो भारत कि मानसिकता को ध्यान में रखकर ही बनाए जाएँगे। ऐसा देश जहाँ पर शिवसेना अपने पंडाल पर ..........

मनीष : आपने हर हर महादेव के संवाद, रज़िया सुल्तान की कहानी, महाभारत के संवाद, कर्ण के पहले सात एपिसोड का निर्देशन किया क्या आपने कभी सोचा कि अगर इनमें भी सेंसर जैसी व्यवस्था लागू होती तो क्या करते?
मिहिर भुट्टा :

एक लेखक की अपनी भी मर्यादा होती है मैं उसी में रह कर काम करने की कोशिश करता आया हूँ और करूँगा।

मनीष : भविष्य में आप कैसे फ़िल्में बनाना चाहेंगे।
मिहिर भुट्टा :

हिस्टोरिकल मेथोलोजिकल का मेरा रुझान रहा है। कॉमेडी। गोलमाल फ़र्स्ट मेरे कॉमेडी प्ले पर आधारित है। कभी ज़रूरत पड़ी तो इन्हीं दोनों विषयों को लेकर फ़िल्म बनाऊँगा। फ़िलहाल लेखक हूँ उसी पेशे में ख़ुश हूँ।

मनीष : प्रतिबंधित होने के बाद सिनेमा और भी चर्चित हो जाता है इस पर आपका क्या कहना है।
मिहिर भुट्टा :

अच्छा है निर्माता को फ़ायदा होता है।

मनीष : सेंसर बोर्ड के मानदंड सिर्फ़ सिनेमा तक सीमित है। ऐसे में सेंसरबोर्ड की ज़िम्मेदारी भी सिनेमागृहों तक ही मान ली जाए। आप क्या कहना चाहेंगे?
मिहिर भुट्टा :

देखिये गाँव में आज भी नेटवर्क की सुविधा जितनी होनी चाहिए उससे कहीं कम है और जिनके पास एन्टरनेट है वो शिक्षित भी है। आप की बात से सहमत हुआ जा सकता है कि सिनेमा गृहों के अलावा भी ये फ़िल्में हमें मिल सकती हैं पर इंटरनेट की कम उपलब्धता के के कारण गाँव का आदमी आज भी फ़िल्में देखने सिनेमा गृहों तक ही जाता है। इसीलिए सेंसरबोर्ड ने अपने मानदंडों को सिनेमागृहों तक बनाया है जैसे-जैसे प्रोद्योगिकी का विकास होगा वैसे-वैसे बोर्ड भी अपने मानदंडों में परिवर्तन करता जाएगा जिससे एक स्वस्थ और सभ्य समाज बना रहें और हमें फ़िल्में मनोरंजन कराती रहें।

  प्रस्तुति :-
मनीष कुमार जैसल
फ़िल्म शोधार्थी
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा
09616730363

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