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03.12.2008
 

जाना ही था तो ज़िंदगी में तुम आये क्यूँ
महिमा बोकारिया


जाना ही था तो ज़िंदगी में तुम आये क्यूँ
खुश्क आँखों में गहरे समन्दर लाए क्यूँ ।।

थोड़ी सी थी उम्मीदें, नन्हें नन्हें से थे ख़्वाब
पलकों से निकालकर उन्हें आसमां में सजाये क्यूँ ।।

मिटा दिया होता ज़हन से, हर लम्हा तेरी याद का
पर जाते जाते पीछे मुड़ तुम मुस्कुराये क्यूँ ।।

पतझड़ की रूत फैली, अब जीवन आँगन में
फिर फूलों की महक कहीं से आये क्यूँ ।।

कहते हैं मुझसे सभी, दुश्मन था वो कोई पुराना
पर हर अहसासों में मुझे वो ही नज़र आये क्यूँ ।।


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