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ISSN 2292-9754

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01.23.2019


 समकालीन हिन्दी कविता में बदलते राजनीतिक संदर्भ

 समकालीन भारत का राजनीतिक संदर्भ इक्कीस्वीं सदी में क़दम रखने से पूर्व ही बेहद जटिल रूप धारण कर चुका था। अस्सी तक आते-आते भारतीय राजनीति में नवोदारतावाद का आसार गहराना शुरू होने लगा था और नब्बे तक वह पूर्ण रूप से अपना वर्चस्व स्थापित करने में कामयाब भी हुआ था। भारतीय राजनीति में आये इन परिवर्तनों को रेखांकित करते हुए रजनी कोठारी कहते हैं कि नवोदारतावाद के कारण “न केवल राजनीतिक प्रक्रिया की स्वायत्तता ख़तरे में पड़ती है, बल्कि नवोदारतावादी चिंतन राष्ट्र-राज्य, ग़ैर-सरकारी संगठनों और सभी जनोन्मुख राजनीतिक परियोजनाओं की स्वायत्तता नष्ट करने पर आमादा है। संक्षेप में भूमंडलीकरण और उदार आर्थिक नीतियों के ज़रिए यह चिंतन आमतौर पर राजनीति और ख़ासतौर पर परिवर्तनकारी राजनीति की भूमिका का हनन करते हुए राज्य की संस्था को उसके शीर्ष स्थान से हटा देने में लगा हुआ है। वह उसकी जगह प्रौद्योगिकी पूँजी और बाज़ार को स्थापित करना चाहता है।”1 इस बदले हुए राजनीतिक संदर्भ को समकालीन हिन्दी कविता बेहद राजनीतिक सजगता से अपना कण्टेण्ट बना रहा है जो पूर्व की राजनीतिक चेतना से बिल्कुल नये क़िस्म की है। कवि विजय कुमार कहते है “आज़ादी के बाद जिस भारतीय परिवेश को हम मोटे तौर पर राजनैतिक-आर्थिक शब्दावली में सामंतवाद और नवोपनिवेशवाद के गठबन्धन से उपजे एक अवरुद्ध समाज के रूप में देखते हैं – बोध के स्तर पर पाते है कि संसदीय पार्टियों के क्षरण, समाज के आधारभूत स्तर पर होनेवाली हलचलों पर राज्य सत्ता की पकड़ के लगातार ढीले पड़ते जाने और इन सबके साथ राष्ट्रीय राजनैतिक नेतृत्व की गरिमा लगातार ख़त्म होते जाने की प्रक्रिया ने एक नये प्रकार की राजनैतिक अभिव्यक्तियों और कण्टेण्ट की नई परिभाषाओं को जन्म देना आरंभ किया है।”2 इस बदले हुए राजनीतिक संदर्भ की अभिव्यक्ति अब मात्र राजनीति तक सीमित नहीं है। सामाजिक जीवन के सभी पहलू आज किसी न किसी प्रकार अपनी एक अलग राजनीति तय कर रहे हैं। समकालीन कविता की इस बदली राजनीतिक चेतना के बारे में अरुण कमल का कहना है “सीधे-सीधे आह्वान, उद्बोधन या श्राप का स्थान अब व्यंग्य-करुणा मिश्रित कविता ले लेती है जो अपने निहितार्थ में कहीं से भी कम राजनीतिक नहीं है। वास्तव में यह पूरा परिवर्तन राजनीति की एक नयी समझ से परिचालित था, अन्तर्विरोधों-द्वन्द्वों को जाँचने की समझ से- कि राजनीति ऊपर-ऊपर की चीज़ नहीं बल्कि पूरे जीव-व्यापार में पेबस्त है।”3

नब्बे के शुरुआती दौर में ही समकालीन कविता में इस बदले हुए राजनीतिक संदर्भ की अभिव्यक्ति मिलने लगी थी। 1998 में प्रकाशित राजेश जोशी के ‘दो पक्तियों के बीच’ संग्रह की कविता ‘एक शैतान से मुलाकात’ इस बदली हुई राजनीतिक चेतना की सशक्त अभिव्यक्ति देती है। ‘एक शैतान से मुलाकात’ कविता के बारे में उमाशंकर चौधरी का विचार यहाँ दृष्टव्य है। “कविता में दो शैतान हैं एक वह जो चुका हुआ है और एक वह जो अब वैश्विक पटल पर छाया हुआ है। राजेश जोशी ने इस शैतान के मार्फ़त से दो समाज, दो परिवेश को आमने-सामने रखा है। यह पहला शैतान तब का है जब हमारा समाज एक बंध समाज था और जहाँ शैतान इसी ज़मीन से तैयार होते थे। इसी ज़मीन पर चाकू-छूरी दिखाते थे। लेकिन यह नया शैतान वैश्विक ज़मीन पर तैयार होता है। यह चाकू-छूरी नहीं दिखाते हैं और ना ही यह खुलेआम हत्या करते हैं। राजेश जोशी अपनी इस कविता में रघुवीर सहाय की कविता ‘रामदास’ में चित्रित शैतान की छवि को डिकंस्ट्रक्ट करते हैं। और एक नए शैतान की छवि को क्रिएट करते हैं। रघुवीर सहाय ने जहाँ यह दिखाकर कि सड़क के बीचों-बीच एक आम आदमी की हत्या हो सकती है, हमारे न्यायतंत्र पर ऊँगली उठानी चाहिए थी वहीं राजेश जोशी उससे बहुत आगे निकलकर एक ऐसे डर को दिखाना चाहते है जो आपके सामने नहीं है।”4 एक अदृश्य क्रूर संस्कृति हमारे सामाजिक जीवन में इस क़दर रज बस गयी है कि उसे पहचानना लगातार कष्टसाध्य होता चला जा रहा है। इस विकराल बाज़ारू संस्कृति के सामने विश्व की सबसे बड़ी हमारी लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली लगातार अपनी प्रासंगिकता को बनाये रखने के जद्दोजहद में हाथ-पाँव मार रही हैं। राजेश जोशी कहते हैं -

“ उसने कहा मैं बहुत अकेला हो गया हूँ और थक गया हूँ
तुम्हें नहीं लगता कि मैं लगभग हास्यास्पद और निरीह हूँ
अब तो कोई बच्चा भी नहीं डरेगा मेरे कारनामों से
एक जोकर या खिलौने से ज्यादा नहीं है अब मेरी औकात
मुझे लगता है मैं बहुत पिछडा हुआ शैतान हूँ
यह दुनिया मेरी करतूतों से कहीं बहुत आगे निकल चुकी है।”5

भारतीय संविधान में भारतीय नागरिकों केलिए जिन मौलिक अधिकारों का विधान किया था वह लगातार अपनी प्रासंगिकता खोते नज़र आ रहे हैं। इस महाशक्ति तंत्र से उलझने का कोई कारगर हथियार कहीं से मिलने की संभावना भी लगातार कम होती जा रही है। ऐसे समय में जहाँ शत्रु ठीक हमारे सामने नहीं है वहाँ ऐतिहासिक बोध के साथ अपने समय की पड़ताल ही सही राजनीतिक चेतना है। मंगलेश डबराल कहते है –

“हमारा शत्रु कभी हमसे नहीं मिलता सामने नहीं आता
हमें ललकारता नहीं
हालांकि उसके आने-जाने की आहट हमेशा बनी हुई रहती है
कभी–कभी उसका संदेश आता है कि अब कहीं शत्रु नहीं है
हम सब एक दूसरे के मित्र हैं
आपसी मतभेद भूलकर आइए हम एक ही प्याले से पियें
वसुधैव कुटुंबकम् हमारा विश्वास है”6

एक ऐसे शत्रु जो सर्वव्यापी और सर्वग्रासी है उसको पहचानना ही सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। उमाशंकर चौधरी कहते हैं “राजेश जोशी अपनी कविता में जिस शैतान की छवि को उभारना चाहते है उसका कोई आकार नहीं है, उसका कोई नाम नहीं है, वह महज़ एक प्रवृत्ति है। आज लाखों किसानों की मृत्यु के लिए कौन ज़िम्मेदार है? किसने मारा है उन्हें इसका जवाब कोई एक नाम नहीं होगा। यह एक ऐसी स्थिति है जब शैतान हमारी फ़िज़ा को ज़हरीला बना रहा है ताकि हमारा साँस लेना भी दूभर हो जाए और हम ख़ुद-ब-ख़ुद मर जाएँ।"7

ऐसी विकराल स्थिति में सही राजनीतिक चेतना यही है कि हम लगातार जिरह करते रहें कि कहीं वह शत्रु हमारे भीतर तो पैठ नहीं गया है। समकालीन राजनीतिक चेतना की इस समझ को बहुत ही सशक्त रूप से उमाशंकर चौधरी अपनी कविता ‘रामदास 2’ में उजागर करते हैं। जहाँ रघुवीर सहाय का रामदास बीच सड़क में एक ठोस अधिनायकवादी राजनीतिक वर्चस्व द्वारा मारा गया था वहीं उमाशंकर चौधरी का रामदास दिल्ली में हुई एक दुर्घटना के वजह से मारा जाता है। इस दुर्घटना के भीतरी तहों को कविता में उजागर करते हुए कवि पूछते हैं कि रामदास की मौत हमारे वजह से तो नहीं हुआ है? कोलकाता में जब हाथ-गाड़ी खींचने पर प्रतिबन्ध लग गया तब वह नयी उम्मीद लेकर अपने भूखे-प्यासे परिवार समेत दिल्ली आ गया था। पर दिल्ली के रफ़तार में उन्हें कहीं जगह नहीं मिल पाई। एक बार दिल्ली में बस के भीतर घुसने की केशिश करते उसे बाहर धकेल दिया जाता है और वह पहियों के नीचे गिरकर दम तोड़ देता है। कवि कहते हैं -

“यह एक विकासशील राष्ट्र की तस्वीर है
जहाँ लाखों रुपये के मुनाफ़े में
बस से कुचलकर हुई एक की मौत काफ़ी छोटी है
लेकिन विकास की इस दौड़ में जैसे
आज यह तय कर पाना कठिन है कि हम
पहले संतुष्ट थे या अब, उसी तरह
यह निर्णय कर पाना भी कठिन है कि
इस बार हुई रामदास की मृत्यु
महज़ एक हादसा है या एक सुनियोजित हत्या"8

रघुवीर सहाय के रामदास की हात्या खुलेआम सबके सामने हुई थी। दोषी को दूध का दूध पानी का पानी की तरह पहचाना जा सकता था। पर उमाशंकर चौधरी के रामदास की हात्मा किसने की? कवि यही पूछना चाहते है कि जाने अनजाने हमारे हाथ तो रामदास की हत्या के पीछे नहीं है? यही समकालीन कविता की बदली हुई राजनीतिक समझ है। बदली हुई इस राजनीतिक समझ को ‘शताब्दी के इस अंतिम दशक में’ नामक कविता में मदन कश्यप यों अभिव्यक्ति देता है –

“झूठ इतना फलेगा-फूलेगा
कि अपने ही भेजे में नहीं धँसेगा
अपनी भूख का सच
यह भयावह समय है दोस्तो
जब मुझे ही पता नहीं है
अगले पल क्या सोचेगा मेरा दिमाग़
किस ओर मुड़ जाएँगे मेरे पाँव
यह भयावह समय है
और इस समय सबसे ज़्यादा ज़रूरी है
अपने भीतर के लालच से लड़ना"9

इस भयावह समय में जहाँ वर्चस्व शक्ति के प्रतिरोध की हर मुहिम लगातार धारहीन होती जाती है वहाँ वर्चस्व शक्ति के हर दाँव-पेंच से वाक़िफ़ रहना निहायत ज़रूरी है। यही समझ एक रचनाकार को समकालीन बनाती है। विजय कुमार कहते है- “‘रेडिकल की एक नयी समझ विकसित हुई है जो परम्परागत राजनीतिक दलों और राज्य की मशीनरी के नियन्त्रण के बाहर की चीज़ रही है। इसी के परिणामस्वरूप पिछले कुछ समय में हिन्दी में लिखी गई कविता का सौंदर्यबोध भी बहुत हद तक बदला है। एक औसत आदमी के दैनंदिन संसार में रागात्मकता का अर्थ, हिंसा और अमानवीयता के नए-नए संदर्भ, प्रकृति और मनुष्य के सनातन सम्बन्धों पर आया संकट और घर-परिवार समाज को लेकर एक भारतीय मन का संस्कार बोध, वर्तमान समय में व्यक्ति और समाज के संबन्धों की गतिशीलता और अवरोध—ये तमाम ऐसी चीज़ें हैं जो आज लिखी जा रही कविता को काफ़ी हद तक समकालीन बनाती है।"10

संक्षेप में कहा जा सकता है कि समकालीन कविता की राजनीतिक समझ नब्बे के बाद बुनियादी स्तर पर ही बदल गयी है। लगातार जटिल होती राजनीतिक संरचना के परतों को उखाड़ने का जोख़िम उठाने की क्षमता ही आज कवि की समकालीनता निर्धारित करती है। समकालीन कवि इस वास्तविकता को बख़ूबी पहचानते हैं इसीलिए अपनी जान को भी दाँव पर लगाकर वे अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ निभा रहे हैं।

संदर्भ सूची

1 रजनी कोठारी- राजनीति की किताब संपादक अभय कुमार दुबे पृ सं 80-81
2 विजय कुमार - कविता की संगत पृ सं 16
3 अरुण कमल - कविता और समय पृ सं 22
4 उमाशंकर चौधरी - राजेश जोशी स्वप्न और प्रतिरोध - संपादक नीरज पृ सं 244
5 राजेश जोशी - दो पक्तियों के बीच प्र सं 1998 पृ सं 97
6 मंगलेश डबराल – नये युग में शत्रु प्र सं 2013 पृ सं 15
7 उमाशंकर चौधरी - राजेश जोशी स्वप्न और प्रतिरोध - संपादक नीरज पृ सं 245
8 उमाशंकर चौधरी – कहते है तब शाहंशाह सो रहे थे प्र सं 2015 पृ सं 92
9 मदन कश्यप – नीम रोशनी में प्र सं 1993 पृ सं 60
10 विजय कुमार – कविता की संगत पृ सं 25

महेष एस
शोधार्थी कोच्चीन विश्वविद्यालय
कोच्चीन 22


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