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ISSN 2292-9754

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11.27.2018


केदारनाथ सिंह की कविताओं में बदलते मानवीय संबन्धों का स्मृति चिह्न

 समकालीन हिन्दी कविता की समय सीमा साठोत्तर कविता से शुरू होती है। विभिन्न आन्दोलनों से गुज़र कर समकालीन कविता नब्बे तक आते-आते आन्दोलनों की भरमार से मुक्त होकर एक तरह से व्यवस्थित हो जाती है। वादों की संकरी गली में भटक रही कविता को नब्बे के बाद कवियों ने फासीवाद विरोधी मुहिम के राजमार्ग पर ला कर खड़ा किया है। नब्बे के बाद के वैश्विक परिदृश्य में भूमंडलीकरण के बृहत फासीवादी स्वरूप धीरे–धीरे उद्घाटित होने लगा। नित नये आविष्कारों से लैस वैश्विक परिदृश्य शक्तितंत्र के नये मंत्र का जाप ही कर रहा था। आल्विन टाफलर ने अपनी पुस्तक ‘पॉवर शिफ़्ट’ में उत्तर आधुनिकतावाद के इस शक्तितंत्र को समग्रता में उद्घाटित किया है। उनके अनुसार यह नया युग पॉवर शिफ़्ट का खेल खेल रहा है। “हमारे ऑफ़िस, बैंक, सुपर मार्केट, हॉस्पिटल, स्कूल, विश्वविद्यालय, घर, धर्म, दर्शन सभी के पुराने पैटर्न पूरी तरह चरमरा गए और हम अजनबी नई राहों पर चल पड़े हैं। एक ग्लोबल पॉवर स्ट्रक्चर हमारी अभ्यस्त जीवन शैलियों को पूरी तरह बदलने की तैयारी कर उठे हैं।”1

इस बदले हुए परिवेश का सर्वाधिक प्रभाव मानवीय संबन्धों पर ही पड़ा है। इस बृहत पुनर्संचना (मासीव रीस्ट्रक्चरिंग) में मानवीय संबन्धों का स्वरूप भी नये सिरे से परिभाषित हो गया है। जहाँ एक ओर सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से मानव–मानव के बीच की भौतिक दूरी कम हुई वहीं मानव-मानव के बीच की आत्मीयता की दूरी बढ़ती गयी। विश्वग्राम और खुले बाज़ार की अवधारणा ने मानवीय संबन्धों के सरोकारों के बीच नये आयाम जोड़े, जो ज्ञान, धन, और हिंसा के नये पाठ सृजित करते जा रहे हैं।

समकालीन कविता में लगभग चार पीढ़ियाँ सक्रिय रही हैं, जिसमें प्रारंभिक पीढ़ी के सर्वश्रेष्ठ कवि रहे हैं केदारनाथ सिंह। उन्होंने कभी भी अपनी कविता को वादों की संकरी गली में भटकने नहीं दिया है। विष्णु खरे कहते है “केदारनाथ सिंह की कविताओं का संसार क़रीब-क़रीब समूचा भारतीय संसार है – वह इस अर्थ में कि उन्हें स्रोतों का पता है जहाँ से जीवन मिलता है – भले ही आज की सर्वव्यापी मानव विरोधी मुहिम में वह जीवन कुछ कम हो चला हो और कभी-कभी उसके लुप्त हो जाने का भी ख़तरा हो और केदारनाथ सिंह की इस आस्था को उनसे छीन लेना असंभव है कि मानवीय अस्तित्व को, आज के भारत में आदमी बन कर रहने की इच्छा को अर्थ तथा बल देने के लिए उन्हीं स्रोतों पर पहुँचना होगा और जिस ज़मीन से वे निकल रहे हैं, उसे ही और गहरा खोदना होगा।”2 अपनी पूरी काव्य यात्रा में केदार नाथ जी इन्हीं स्रोतों से अपनी काव्य संस्कृति की तामीर करते रहे। उन्नीस सौ नब्बे में प्रकाशित उनका काव्य संग्रह ‘उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ’ में मानवीय संबन्धों की ऊष्मा लिए स्मृति चिह्न बराबर उभरकर सामने आता है। उनकी कविता में पिता की आदिम परंपरा को निभाने का जज़्बा है। एक ऐसा जज़्बा जो हृदय की अग्नि को प्रज्वलित रखता है। इस आदिम परंपरा का मोह कोई अंध परंपरा मोह नहीं है वरन् एक ऐसी कशिश है जो मानव संबन्धों की ऊष्मा और तपन को गहराई में महसूस करते हुए एक ऐसा संसार निर्मित करना चाहती है जहाँ समकालीन समय की अंधी दौड़ से थककर थोड़ी देर सुस्ताया जा सके। केदार नाथ सिंह के शब्दों में “मेरी पहली लड़ाई अपने मोर्चे पर ही है कि किस तरह कविता द्वारा मानव विरोधी शक्तियों के बीच मानव संबन्ध बनाए रखा जाय, परिवर्तन की दिशा में आज एक कवि की सार्थक पहल यही है।”3
उनकी कविताओं में बदलते संबन्धों के स्मृति चिह्न के रूप में गाँव लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करता नज़र आता है। कवि कहते हैं -

“यह हवा
मुझे घेरती क्यों है?
क्यों जहाँ चलते हुए लगता है
अपनी साँस के अंदर के
किसी गहरे भरे मैदान में चल रहा हूँ”4

गाँव की हवा कवि के अंदर मन में रची-बसी हुई है। यह स्मृति चिह्न ही कवि को पूर्णता का एहसास देता है। इसी कारण गाँव से जुड़ने की ललक की उनकी कविताओं में बराबर अभिव्यक्ति पाई जाती है।

एक तरफ़ विगत समय की पूर्णता भरा स्मृति चिह्न है तो दूसरी तरफ़ समसामयिक जीवन का अधूरापन। समकालीन समय की बेचैनियों के बीच कवि कुछ देर आराम पाने के लिए गाँव के स्मृति चिह्नों की पूर्णता की ओर लौटना चाहते हैं पर तभी कवि की दृष्टि कुदाल पर पड़ती है। इतिहास बोध से सघन कवि के लिए कुदाल मानवीय विकास यात्रा का लगाव भरा एक स्मृति चिह्न है। पर समसामयिक जीवन में कुदाल को कहाँ समाहित करना है यह कवि के लिए सबसे बड़ी परेशानी बन जाती है। हर चीज़ को मात्र उसके सामयिक उपादेयता के वज़न पर स्वीकार करने की उपभोक्ता वादी दृष्टि के सामने कवि को कुदाल का वजूद अटपटा लग रहा है।

“काम था
सो हो चुका
मिट्टी थी
सो खोद चुकी है जड़ों तक
और अब कुदाल है कि एक चुपचाप चुनौती की तरह
खड़ी है दरवाज़े पर”5

कृषि क्रान्ति से शुरू होकर औद्योगिक क्रान्ति से पल्लवित होकर सूचना क्रान्ति तक आये हुए समाज के पास आज कुदाल के लिए जगह कहाँ है? कवि कुदाल को न अपने ड्राईंग रूम में जगह दे पा रहा है न ही रसोईघर में।

“और अंधेरे में धीरे धीरे बढ़ता जा रहा था
कुदाल का कद
और अब उसे दरवाज़े पर छोड़ना
ख़तरनाक था
सड़क पर रख देना असंभव
मेंरे घर में कुदाल के लिए जगह नहीं थी।”6

जिस समय के पास कुदाल के लिए जगह नहीं है, वही समय बाज़ार में अमरूद को भी स्थान नहीं देता। अमरूद जैसी अदना और सामान्य वस्तु के लिए गौरवान्वित बाज़ार में जगह कहाँ?

“अमरूद फिर आ गए हैं बाज़ार में
और यद्यपि वहाँ जगह नहीं थी
पर मैंने देखा छोटे छोटे अमरूदों ने
सबको ठेल ठालकर
फुटपाथ पर बना ही ली
अपने लिए थोडी जगह”7

अमरूद और कुदाल के लिए कवि की संवेदना समानधर्मी है। समय के प्रवाह ने जिन स्वाभाविक और सामान्य को हाशिए पर ठेल दिया है उसकी गरिमा और ऊष्मा कवि का इतिहास बोध गहराई में महसूसता है।

मनीषा झा के अनुसार “केदार की कविता भूलने के विरुद्ध एक हस्तक्षेप है, स्मृतिहीनता के दौर में स्मृति की रक्षा का दायित्व वहन करती उनकी कविता हमें भूले हुए को याद दिलाती है”8 केदार नाथ जी में गृहातुर स्मृतियों के साथ इतिहास बोध सघन है। बदल रहे मानवीय संबन्धों को कवि अपनी कविता में मूल की ओर लौटाकर वजूद का एहसास दिलाता है। बाज़ार के लिए जो अर्थहीन है, वह कवि के लिए अर्थपूर्ण हो जाता है। पेड़ से गिरा हुआ घोंसला बाज़ार के लिए अर्थहीन है पर कवि के लिए घोंसला गृहातुर स्मृति एवं संवेदना का पुंज है। जब लगातार पेड़ों की संख्या कम होती जा रही है तब आनेवाले समय में घोंसले कहाँ मिलेंगें। बाज़ार में तो पिंजड़े ही मिलेंगे घोंसले नहीं। घर और घोंसले स्वच्छंदता से जुड़े हैं तो पिंजड़े और बाज़ार पराधीनता के सूचक हैं। - पिंजड़े और बाज़ार के समय में घर और घोंसले गृहातुर स्मृति चिह्न हो जाते हैं।

“सच यही है कि बाज़ार में मिलते नहीं घोंसले
वहाँ सिर्फ पिंजड़े मिलते हैं”9

संक्षेप में कहा जा सकता है कि मानवीस संबन्धों की ऊष्मा और तपन को गहराई में महसूसकर उसे अभिव्यक्ति देने में केदारनाथ सिंह सिद्धहस्त रहे हैं। वादों के चंगुलों से हमेशा मुक्त रहकर केदारनाथ जी की कविताई समकालीन कविता का नक्शा खींचती रही। समकालीन कविता के पूरे विस्तार को केदारनाथ जी की काव्ययात्रा अपने में समेटने की क्षमता रखती है। उनकी कविताओं को पढ़ने का मतलब है लगभग चार पीढ़ियों तक व्याप्त समकालीन कविता की निरंतरता से रू-ब–रू होना।

महेश एस.
शोधार्थी
कोच्चिन विश्वविद्यालय
कोच्चि 22

संदर्भ संकेत

1 उत्तर आधुनिकता और दलित साहित्य, कृष्णदत्त पालीवाल पृ सं 18
2 कवि केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे पृ सं 18
3 उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ, केदारनाथ सिंह पृ सं 11
4 उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ, केदारनाथ सिंह पृ सं 12
5 उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ, केदारनाथ सिंह पृ सं 17
6 उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ, केदारनाथ सिंह पृ सं 18
7 आलोचना, अप्रैल जून 2009 पृ सं 94
8 आलोचना, अप्रैल जून 2009 पृ सं 94
9 आलोचना, अप्रैल जून 2009 पृ सं 94


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