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ISSN 2292-9754

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03.13.2015


शारीरिक विकलांगता: संरचनात्मक दृष्टिकोण

शारीरिक विकलंगों की समस्याओं को सरकार एवं प्राथमिक स्तर पर अभी तक मानवीय आधार पर समझा नहीं गया है और इस दिशा में प्रयास कम हुए हैं। जिन्हें समझना बहुत ज़रूरी है। आवश्यक सेवाओं की विकलांगता विषयक नीति व्यवस्था होना आवश्यक है। विकलांग व्यक्ति अन्य साधारण व्यक्तियों जैसा ही है केवल विकलांगता होने के कारण ही उसकी समस्या का रूप भिन्न हो जाता है। इसे शासन, प्रशासन को और हमें समझना है।

समाज अनेक व्यक्तियों से मिलकर बनता है। मौलिक रूप से मनुष्यों की शारीरिक बनावट एक सी होती है। संरचना को लेकर समरूपता है, किन्तु व्यक्तिशः शारीरिक बनावट में भिन्नता होती है। एक परिवार दूसरे से, यहाँ तक कि एक ही परिवार का प्रत्येक सदस्य भी अन्य सदस्यों से भिन्न होता है। यद्यपि "प्रकृति ने सभी प्रकार के विभेदों को नकारते हुए सामाजिक व्यवस्था में इंसान को एक ही श्रेणी में रखा है, तथापि सामाजिक व्यवस्था के संचालकों ने इसे अलग-अलग विभाजित कर इसे संरचना के दृष्टिकोण से अपनाया है।-1" सामान्य मानव वर्ग वह होता है, जो शारीरिक रूप में सम्पूर्णता लिये होता है, स्वस्थ होता है, जिनकी शारीरिक बनावट जैसे हाथ पैर, आँख, कान, मस्तिष्क आदि की संरचना एवं प्रकार्य जीव विज्ञान द्वारा निर्धारित मापदण्डों पर आधारित हों। इसके विपरीत असामान्य मानव वर्ग वह वर्ग होता है जो शारीरिक रूप से अपूर्ण हो, अस्वस्थ हो, जिनकी शारीरिक संरचना एवं प्रकार्य जीव विज्ञान के मापदण्डों पर आधारित न हों, ऐसा वर्ग सामान्यजन से भिन्न समझा जाता है और यही भिन्नता उसे कुछ कार्यों को संपन्न करने में अयोग्य बनाती है।

शारीरिक रूप से बाधित व्यक्ति के विभिन्न स्तर होते हैं। उनको भय रहता है कि उसके बच्चे की हालत बिगड़ न जाय या वे सोचते हैं कि यह उनके पिछले परिणाम हैं। शारीरिक रूप से बाधित अपने आप को दूसरे से हीन समझता है। यह सत्य है कि कुछ व्यक्तित्व श्रेष्ठ होते हैं। वे सांवेगिक प्रतिक्रियाएँ प्रदर्शित नहीं करते या वे उन पर नियंत्रण रखने में सफल होते हैं। "कार्यकर्ता बाधित की सांवेगिक प्रतिक्रियाओं का निरन्तर अध्ययन आवश्यक है तथा अनावश्यक निराशा को दूर रखने का यह भरसक प्रयत्न है।-2" प्रत्यक्ष साक्षात्कार के माध्यम से इन भावनाओं के स्पष्टीकरण का अवसर प्रदान करता है, शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्तियों में कुछ ऐसे भी होते हैं, जिनको मनोचिकित्सा की आवश्यकता होती है। कार्यकर्ता उसका प्रयोग करता है। जिससे वह सामान्य रूप से बराबरी कर सके। बाधित व्यक्ति की मनोसामाजिक एवं आर्थिक समस्याओं को समझता है तथा उन्हें सुलझाने का प्रयत्न करता है। उग्र भावनाओं तथा नैराश्य को रचनात्मक क्रियाओं द्वारा दूर करने का प्रयत्न करता है। अतः सामाजिक विकलांगता को विशेष प्रशिक्षण एवं अनुभव की आवश्यकता इनके साथ कार्य करने के लिये होती है। सम्प्रेषण समस्या से वह बहुत ही कम प्रभावकारी सिद्ध होता है। बातचीत के अभाव में वह अपंग सा दिखायी देता है। विकलांगता की समस्याओं को समझकर उसकी सेवा आवश्यक है। उसके लिए ऐसे नये नियम बनाये जाने चाहिएँ, जिससे वह अपने जीवन को सुचारू रूप से चला सके, अपना जीवन जी सके।

भारत सहित विश्व के तमाम देशों ने विकलांगों के हित में तकनीकी विकास का उपयोग किया जा रहा है। अब नये-नये प्रकार के यंत्र बाधित व्यक्तियों के लिये उपलब्ध हैं। अस्थि विकलांगों के लिये हल्के, मज़बूत और टिकाऊ कृत्रिम अंग उपलब्ध हैं। बढ़ते तकनीकी विकास ने ऐसे मेग्निफाइंग यंत्र बना दिये हैं, जो अल्प दृष्टि वालों के पढ़ने-लिखने को बहुत आसान बना रहे हैं। अब इलेक्ट्रॉनिक यंत्र आ गए हैं, जिसकी सहायता से पूर्ण नेत्रहीन व्यक्ति सामान्य पुस्तकें पढ़ सकता है। ऐसे सेलेक्टिव फिल्टर आ गए हैं जिनसे वे बेहतर और स्पष्ट सुन सकते हैं। हल्के, लचीले और टिकाऊ सामान से बने कृत्रिम अंग अस्थि विकलांग के जीवन को न सिर्फ आसान बना रहे हैं, वरन् उनका इस्तेमाल करके टॉम व्हाइटकर एवरेस्ट पर चढ़ जाते हैं और नृत्य ओर अभिनय की दुनिया में कुछ अपंग तहलका मचा देते हैं। भारत में तकनीकी विकास का उपयोग एक लम्बे अर्से से विकलांगों के हित में किया जा रहा है। 1954 में देहरादून स्थित सेंटर जो आज एन.आई.वी.एच. के नाम मशहूर है, ने उपकरण बनाने प्रारम्भ कर दिये। ब्लाइंड्समैन एसोसियेशन, अहमदाबाद, मोक्ष इंटरप्राइज़ेज़ आदि ने भी बड़े पैमाने पर ऐसे उपकरण बनाने प्रारंभ कर दिये। युद्ध में बड़े पैमाने पर सैनिक घायल और विकलांग हुए तो सरकार ने बड़े पैमाने पर आधुनिक तकनीक पर आधारित कृत्रिम अंग बनाने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में आर्टीफिशियल लिम्ब मैनुफैक्चरिंग यंत्र लगाये। युद्ध ने विभिन्न देशों की सरकारी स्तर पर विकलांगों के लिये कार्य करने पर मजबूर किया ताकि युद्धरत सैनिकों का मनोबल बना रहे। पूरे देश में 150 से अधिक ऐसे उपकेन्द्र चल रहे हैं जहाँ कृत्रिम अंग फिट किये जाते हैं। इसमें हर प्रकार के अस्थि विकलांगों के लिये कैलिपर, कृत्रिम अंग व नेत्रहीनों के लिये भी कुछ उपकरण बनने लगे हैं।

नेत्रहीनों के लिये सहायक उपकरणों को विकसित करने और उनका बड़े पैमाने पर उत्पादन में दहेरादून स्थित नेशनल इंस्टीटयूट आँफ विजुअली हैंडीकैप्ड आगे हैं। विविध प्रकार के उपकरणों का विकास किया है। "इनमें नेत्रहीनों के पढ़ने में काम आने वाली ब्रेल स्लेट, टेसर्ल फ्रेम, अंकगणित और बीजगणित के सवाल हल करने हेतु उपकरण, सुई में धागा डालने वाला यंत्र, ब्रेल शॉर्टहैंड मशीन, फिजिक्स आदि पढ़ते समय काम आने वाले चित्र आदि शामिल है।-3" नेत्रहीनों को सुविधाजनक यात्रा करने हेतु सफेद छड़ी विकसित करके दी गई है, वहीं नेत्रहीन बुनकरों के लिये धागों का पता करने के लिये भी यंत्र विकसित कर दिये गये हैं। उनके मनोरंजन और शारीरिक विकास के लिये अनेक खेल के सामान, जैसे क्रिकेट खेलने के लिये छोटी गेंद, फुटबाल खेलने के लिए बजने वाली गेंद, नेत्रहीनों के लिये शतरंज के बोर्ड, बेल में निशान वाले ताश के पत्ते आदि भी विकसित किये हैं। स्विच सिंथेसाइजर विकसित हो गये हैं, जिसे किसी भी आई.बी.एम. कम्प्यूटर के साथ जोड़ा जा सकता है। इससे कम्प्यूटर के मॉनीटर पर आ रही सामग्री आवाज में बदल जाती है और सामने बैठा नेत्रहीन व्यक्ति उसे सुनकर काम करता चला जाता है। कम गति वाला कम्प्यूटरकृत ब्रेल एम्बॉसर भी विकसित है। इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा रहा है। ब्रेलशीट, जो थर्मोफोम मशीन में इस्तेमाल की जाती है, को भी अब अपने ही देश में बनाया गया है। थर्मोफोम मशीन का उत्पादन अब देश में कई कम्पनियॉ कर रही है। इन मशीनों एवं यंत्रों के द्वारा हजारों नेत्रहीन लाभ उठा रहे हैं।

नेत्रहीनों और श्रवणहीनों के लिये सहायक यंत्रों में कम्प्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक्स का बहुत महत्व है। उनके लिये विकसित किये जाने वाले यंत्र सूक्ष्म, हल्के और टिकाऊ मिलने लगे हैं। इससे एक नई धारणा विकसित हो रही है। विशेषज्ञों की राय है कि ये उपकरण स्थानीय उपलब्ध जैव सामग्री से बनाए जाने चाहिए। इससे इन उपकरणों की लागत तो कम होगी है, वे बहुत ज़्यादा कृत्रिम भी नहीं लगेंगे और विकलांग व्यक्ति अपने आपको प्रकृति के ज्यादा नजदीक महसूस करेगा। आज़ादी के बाद सरकारी और गैर सरकारी दोनों क्षेत्रों में इन सहायक उपकरणों का विकास और उसके बाद निर्माण हुआ। "अब हर प्रकार के कैलिपर कमज़ोर पोलियोग्रस्त टाँगों के लिए उपलब्ध है। इन कैलिपरों के लिये एलिस्को द्वारा हर साइज़ की पूरी किट बनी बनाई मिल जाती है। अनुभवी तकनीशियन विकलांग व्यक्ति के पैरों को नाप लेकर इस किट को जोड़कर आरामदायक कैलिपर तैयार करते हैं। ये कैलिपर हल्की पर मज़बूत धातू के बने होते हैं। इसी प्रकार कृत्रिम हाथ या कृत्रिम पैर भी तैयार किये जाते हैं। ये हाथ या पैर काफी हद तक सुविधानुसार और सुन्दर होते हैं। इनमें व्यक्ति चीज़ें पकड़ कर भी चल सकता है। कृत्रिम हाथ में पेन फँसाकर विकलांग व्यक्ति बड़े आराम से लिख सकते हैं।

विकलांगों की विशेष ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए सहायक उपकरण बनाए गये हैं। उनके लिए खाने, लिखने आदि में सहायता करने वाला उपकरण इस प्रकार बनाए गये हैं ताकि वे अपने हिलते हुए हाथों से अपना काम आसानी से कर सकें। अब ऐसे स्पास्टिक जो बोल नहीं पाते हैं, लिये भी यंत्र तैयार किये जाते रहे हैं। जो इन यंत्रों की सहायता से अपनी बात कह पायेंगे। विदेशों में अस्थि विकलांगों के लिये नवीनतम तकनीक पर आधारित उपकरण तैयार करने का काम पूरी गंभीरता से चल रहा है और इसमें व्यापक सफलता मिली है। यही कारण है कि वहॉ मोटरचालित व्हीलचेयर बड़े पैमाने पर दिखाई देती है। ये व्हीलचेयर कम्प्यूटर द्वारा नियंत्रित है और बैठने और निकलने की आवश्यकताएं इतनी सरल है कि पूरी तरह निष्क्रिय अंगों वाला व्यक्ति भी इन्हें इस्तेमाल कर रहा है। "21वीं शताब्दी के पाश्चात्य सभ्यता के आगमन में बहुत सी संस्थायें बन गई। शारीरिक रूप से बाधित-मूक बघिर, दृष्टिहीन, महिला विकलांक जिन्हें औपचारिक रूप से परिवार द्वारा संभाला गया, जिसके परिणाम स्वरूप समाज में भिक्षावृत्ति, अपराध और निराश्रिता बढ़ गई, महिला विकलांगों के कल्याण के संदर्भ में विशेष प्रयास हो रहे हैं।-4" वर्तमान काल में कल्याणकारी राज्य की स्थापना के साथ 1951 से ही महिला विकलांगों की तरफ ध्यान देना प्रारंभ कर दिया गया, प्रथम पंचवर्षीय योजना में पुनर्वास की आवश्यकता पर बल दिया गया और साथ ही अनेक योजनाएं प्रारम्भ हुई। इसके बाद महिला एवं वाल्य विकलांगों के कल्याण हेतु निरन्तर प्रयास किये जा रहे हैं।

संदर्भ:

1. डॉ. शिखा व्यास: विकlलांग कल्याण नीति, पृ. 1,2
2. डॉ. सुनीता जैन: शारीरिक बाधित क्रियायें, पृ. 229
3. डॉ. विवेक चौहान: नेत्रहीन विकलांगता, पृ. 119
4. डॉ. सीताशरण सेन: विलांगता के रूप, पृ. 165

डॉ. महेन्द्र सिंह धाकड़
प्रोग्राम कोर्डिनेटर
आईसेक्ट विश्वविद्यालय, भोपाल (म.प्र.)




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