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ISSN 2292-9754

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10.20.2017


तसव्वुर का नशा गहरा हुआ है

तव्वुर का नशा गहरा हुआ है
दिवाना बिन पिए ही झूमता है

नहीं मुमकिन मिलन अब दोस्तो से
महब्ब्त में बशर तनहा हुआ है

करूँ क्या ज़िक्र मैं ख़ामोशियों का
यहाँ तो वक़्त भी थम-सा गया है

भले ही खूबसूरत है हक़ीक़त
तसव्वुर का नशा लेकिन जुदा है

अभी तक दूरियाँ हैं बीच अपने
भले ही मुझसे अब वो आशना है

हमेशा क्यों ग़लत कहते सही को
"ज़माने में यही होता रहा है"

गुज़र अब साथ भी मुमकिन कहाँ था
मैं उसको वो मुझे पहचानता है

गिरी बिजली नशेमन पर हमारे
न रोया कोई कैसा हादिसा है

बलन्दी नाचती है सर पे चढ़के
कहाँ वो मेरी जानिब देखता है

हमेशा गुनगुनाता हूँ बहर में
ग़ज़ल का शौक़ बचपन से रहा है

जिसे कल ग़ैर समझे थे वही अब
रगे-जां में हमारी आ बसा है


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