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ISSN 2292-9754

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03.05.2016


चढ़ा हूँ मैं गुमनाम उन सीढ़ियों तक

चढ़ा हूँ मैं गुमनाम उन सीढ़ियों तक
मिरा ज़िक्र होगा कई पीढ़ियों तक

ये बदनाम क़िस्से, मिरी ज़िंदगी को
नया रंग देंगे, कई पीढ़ियों तक

ज़मा शायरी उम्रभर की है पूँजी
ये दौलत ही रह जाएगी पीढ़ियों तक

"महावीर" क्यों मौत का है तुम्हे ग़म
ग़ज़ल बनके जीना है अब पीढ़ियों तक


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