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08.20.2007
 
करवट
महावीर शर्मा


दहकते साँसों से आह निकलती है,
ज़िंदगी आज क्यों करवट बदलती है।

पतझड़ की सूनी इक डाली की तरह,
ज़िंदगी बिन पत्तों की तरह ढलती है।

दिन तो तसव्वर में ही बीत जाता है,
शब ग़मे-हिज्र की आग में जलती है।

तिरी निगाहों का आदी बन गया हूँ,
जो हर लम्हे, हर बात में बदलती है।

तिरी जफ़ाओं में इक ज़लज़ला देखा,
जिसमें प्यार की बुनियाद दहलती है।

दूर होकर आज भी तू पास ही है,
तिरी सूरत आँसुओं में पिघलती है।

ज़िंदगी वक्त के क़ैदी की तरह चुप है,
पलकों में छुपाने की सज़ा मिलती है।

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