अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
12.28.2015


चाहिए एक अदद बीवी

अब आप ही बताइए, मैं क्या करूँ? मेरी शादी नहीं होती जनाब। रंगा, छाबड़ा, कालू, टुण्डा, सभी हम उम्र साथियों के हाथ पीले हो गए कई-कई बच्चे भी हो गए है। भरापूरा घर बस गया उनका। उस पीढ़ी का एक मैं ही तो अभागा रह गया हूँ, जैसे भाज्य और भागफल से शेष लटकता रहता है।

सो बात नहीं है कि इस दिशा में मैंने प्रयत्न न किया हो, देखिए सभी प्रदेशों के समाचार पत्रों में विज्ञापन दे चुका हूँ, विवाह कराने वाले दलालों से सम्पर्क कर चुका हूँ, लेकिन अभी तक कोरे पोस्टकार्ड जैसा हूँ। लोग मेरे पास रिश्ते वालों को भेजते तो हैं लेकिन वे महाशय हमारा चाय-नाश्ता डकार कर ऐसे गायब हो जाते है जैसे गधे के सिर से सींग।...लगता है भगवान ने हमारे लिए किसी लड़की का निर्माण नहीं किया या हमारी जन्म कुण्डली में शादी का कॉलम छपते-छपते मिसप्रिंट हो गया।

आप सच मानिए, दहेज लेने के बारे में तो हमें कभी ख़्याल भी नहीं आया। मुझे तो केवल लड़की ही मिल जाए तो ठीक है और यदि कोई लड़की का बाप अधिक लालची हो तो श्रद्धा अनुसार मैं अपने ससुर को थोड़ा बहुत दहेज भी दे दूँगा, लेकिन कोई मेरे रिश्ते की हाँ तो करे, आजकल मेरे माता-पिता भी मेरी शादी के लिए बहुत चिंतित रहते हैं। घर में योग्य जवान लड़का बैठा हो तो उसके पिता को नींद कहाँ आती है।

पिता जी भी कई लड़की वालों को फांस ही लाते हैं। पिछले सप्ताह वे अपने पुराने चपड़ासी को ही पकड़ लाए थे मुझे दिखाने के लिए लेकिन वह तो मुझे देखकर ऐसे चौंके जैसे मैं इन्सान नहीं कोई भूत हूँ।

सब कहते है कि मुझे टी.बी. का रोग है परन्तु मैं भी तो यही अर्ज कर रहा हूँ कि कोई कानी, लंगडी काली या टी.बी. की मरीज़ लड़की ही दे दो मुझे ताकि एक बार मेरा घर तो बस जाए।

टी.बी. हॉस्पीटल में मैंने एक ऐसी मरीज़ को खोज भी लिया था। उसे शादी के लिए तैयार भी कर लिया था, लेकिन बात बनते-बनते रह गयी उसका नीम हकीम बाप विलेन की तरह कूद पड़ा कहने लगा जनाब मेरी लड़की टी.बी. से मर गई तो आप दूसरी शादी बना लोगे लेकिन कहीं आपका स्वर्गवास हो गया तो मेरी लड़की का क्या होगा?

मैंने उन्हें बहुत समझाया, डॉक्टर का प्रमाण पत्र भी दिखाया जिसमें साफ़ लिखा था कि आठ वर्ष तक मेरी जान को कोई ख़तरा नहीं। माता-पिता का मैं अकेला लड़का हूँ। तीन-चार वर्ष में मेरे पिता अवश्य स्वर्ग सिधार जाएँगे, इसलिए यदि आठ वर्ष के बाद हम तीनों भगवान को प्यारे हो भी जाएँ तो हमारी सारी चल और अचल सम्पति की वारिस मेरी अकेली पत्नी होगी जो लगभग छ: अंकों में बैठेगी। मैंने उन्हें यह भी साफ़-साफ़ बता दिया कि बी.ए अन्तिम वर्ष का मेरा तीन वर्ष का तजुरबा है। लोग तो यूँ ही चलते-चलते बी.ए.कर लेते है लेकिन मुझ जैसा अनुभवी दामाद आपको चिराग लेकर भी नहीं मिलेगा। वह टस से मस नहीं हुआ। हमने तो उसको लाख-दो-लाख तक दहेज का भी लालच दिया लेकिन यह सुनकर तो वह क्रोधित हो गया और जाते-जाते हमें फटकार भी पिला गया "आप जानते नहीं में दहेज के बिल्कुल ख़िलाफ़ हूँ मुझे अपनी लड़की को बेचना नहीं है आप किसी और को ही फाँसिए।"

पिता जी मेरी और मैं उनकी आँखों में आँखें डालकर अन्दर-ही-अन्दर रोते रहे। फिर उन्होंने मुझे सीने से लगाकर पुचकारा "बेटा रो मत, तू चिन्ता न कर मैं फिर किसी को फाँसकर लाऊँगा तू अधिक रोएगा तो तेरी आँखें और अन्दर को धंस जाएँगी।"

मैंनें आँसू पोंछकर शीशे में अपने चेहरे को देखा, आँखों के नीचे काले-काले दाग अधिक गहरा गए थे, लेकिन वे मेरे श्याम वर्ण तथा चेचक के दागों के कारण अधिक स्पष्ट दिखायी नहीं देते। सिर में उगते सफेद बालों को देखकर भी मैं बहुत चिन्तित रहता हूँ। सुबह-सुबह कितने ही बालों को नोचकर निकाल भी देता हूँ लेकिन वे बरसात की घास की तरह प्रतिदिन अधिक-से-अधिक उगते रहते हैं। माँ कहती है मेरे सारे बाल धूप में सफेद हुए जा रहे है।

जनाब, अब तो आप मेरे जैसे कुँआरे लड़कों की पीड़ा समझ रहे हैं ना इसका एकमात्र कारण है लड़कियों की कमी या दूसरे शब्दों में कहें तो कन्याओं के भ्रूण की हत्या। मेरा हाथ-पैर जोड़कर सभी माता-पिताओं से अनुरोध है कि कन्याओं को गर्भ में न मारें अन्यथा हम जैसे नौजवान कुँआरे लड़कों को आत्महत्या करनी पड़ेगी।

आज भी मैं एक एजेंट के निमंत्रण पर किसी लड़की को देखने के लिए घर से तैयार होकर निकला हूँ। आप भी देख लीजिए जंच रहा हूँ ना? कोट, पैन्ट, टाई पर सुबह से कई बार सैंट का स्प्रे किया है, तभी तो आ रही है मुझमें से भीनी-भीनी सुगन्ध, मुँह पर क्रीम लगाना मैंने आजकल छोड़ दिया है, क्योंकि सब दोस्त मुझसे मज़ाक करते हुए कहते है, "लो भाई, वो आ गयी मक्खन में लिपटी भैंस" इतना ही नहीं दूसरा उससे भी आगे बढ़ जाता है— "अरे नहीं यार, क्यों बेचारे की बेइज़्ज़ती में चार चाँद लगा रहे हो यह तो क्रीम लगे जूते जैसा लगता है।" इन सब बातों को सुनते-सुनते मैंने क्रीम लगाना ही छोड़ दिया।

गली पड़ोस वाले कई वृद्ध आज भी मुझे कालू कहकर पुकारते है लेकिन उनके कहने से क्या होता है ये तो संयोग से मेरा जन्म अमावस की रात्रि को हो गया इसी से मेरा नाम कालूराम पड़ गया। जो अमावस्या के दिन पैदा होगा, उसका रंग काला ही तो होगा चाहे आप कृष्ण भगवान को ही देख लें। माँ ने एक दिन बताया था, मेरा नाम रखना तो श्री कृष्ण ही था, क्योंकि मैं जन्माष्टमी के दिन आधी रात को पैदा हुआ था। श्री कृष्ण नाम बोलने में कठिन था इसलिए सब मुझे प्यार से कालू ही पुकारने लगे। माँ तो अब भी सभी रिश्तेवालों से यही कहती है कि मेरा लड़का साँवले रंग का है बिल्कुल कृष्ण कन्हैया के समय पैदा हुआ है। रंग का क्या है? है तो कितना होनहार!

लो, अपनी तो बस भी आ गयी और बड़े ठीक समय पर आयी। वाह-वाह कितना शुभ दिन है बस ठीक हमारे सामने आकर रुक गई जैसे केवल मुझे ही लेने आई है। जो दिन अच्छा होता है उस दिन सभी काम अपने आप बनते जाते है। आज तो चाहें जो हो जाए लड़की हमें पसन्द करेगी ही।

बस में चढ़कर एक हसरत भरी निगाह से मैंने आगे से पीछे तक सभी सवारियों को देखा। दूसरे राऊंड में मेरी नज़र एक जनानी सवारी से लिपट गयी। जनानी क्या...यूँ कहिए जवान लड़की बिल्कुल स्वीट सिक्सटीन। डबल वाली सीट के कोने पर बैठी थी और उसी से साथ लगती ट्रिपल सीट मैंने हथिया ली। सचमुच इतनी ख़ुशी हुई सीट हथियाने पर कि मिनिस्टर को भी क्या होती होगी? मन-ही-मन हमने सोचा आज तो बिक गए सवा किलो लड्डू। लड्डू वाली बात आपकी समझ में नहीं आयी शायद। आपकी समझ में आती भी कैसे? क्योंकि अभी तक हमने आपको बताया ही नहीं। ख़ैर, जब आपने पूछा है तो बताना ही पड़ेगा। हमारे एक दोस्त बर्फी लाल थे हमारी ही तरह कई बार फेल होने के बाद वे तो फील्ड छोड़कर काम धन्धे की तलाश करने लगे लेकिन हम अभी तक मैदान में पड़े हैं। एक बार वो हमें लल्लू की दुकान पर मिल गए। हाल चाल पूछने के बाद उन्होंने बताया "भाई दो साल से बेकार घूम रहा हूँ कहीं कोई काम ही नहीं मिलता। कोई अपना काम करूँ तो अंटी में पैसा नहीं है," हमें उनसे बहुत सहानुभूति हुई अपने सातवें दिमाग का प्रयोग करके हमने उन्हें सुझाया, "भाई बर्फीलाल अड्डे पर चाय पानी की दुकान खोल लो, कुछ विशेष खर्चा भी नहीं आएगा और विज्ञापन भी नहीं करना पड़ेगा, क्योंकि नाम तो तुम्हारा बर्फी लाल है ही"...।

उन्होंने हमारी नेक सलाह को स्वीकार कर लिया और अगले महीने ही हमने देखा कि वे एक साफ़-सुथरी दुकान पर बैठे चाय बना रहे थे। एक ट्रे में थोड़े से लड्डू, थाल कतीदाना और एक डिब्बें में भुजिया रखी थी। उन्होंने आग्रह करके हमें अपने पास बैठा लिया और हमारे लिए चाय बनाने लगे। बातों के बीच में कोई एक रूपये की भुजिया या कोई एक लड्डू लेने आ जाता था।

तभी एक बाबूनुमा आदमी दुकान पर आकर बोला—"क्यों जी, लड्डू क्या भाव हैं?"

"दो रुपये का एक और दस रुपये के छ:" बर्फीलाल ने रटे रटाए शब्द बोल दिए। "अरे भाई, किलो का भाव बताओ ना?"

"जी...सत्तर रुपये किलो,"—बर्फी लाल ने उपेक्षा से कहा क्योंकि उसे विश्वास हो गया था कि उन्हें लड्डू तो लेने नहीं, वैसे ही झक मारने आया है।

"सत्तर रुपये किलो, ठीक है सवा किलो तोल दो,"—ग्राहक ने आदेश दिया, लेकिन बर्फीलाल को विश्वास नहीं आया। उसने ग्राहक के चेहरे की ओर ध्यान से देखा और फिर पूछ ही लिया— "बाबू जी, सवा किलो क्या?"

"हाँ भई, सवा किलो,"—बाबू अपनी जेब से पैसे निकालने लगा।

"अभी तोलता हूँ बाबू जी यहाँ बैठ जाइए’" कुर्सी की ओर संकेत करके उसने लड्डूओं को देखा। उसके पास तो इतने वज़न के बट्टे भी नहीं थे इसलिए बर्फीलाल अपने थड़े पर खड़ा होकर चिल्लाने लगा—"ओ तारे, अरे भाई भोलू अपना एक किलों का बट्टा भेज जल्दी से, आज तो अपने भी सवा किलो लड्डू बिक गए," चिल्लाते-चिल्लाते वह लगभग नाचने लगा था।

तो साहब हमें लड़की की बराबर में सीट क्या मिली आज तो अपने भी सवा किलो लड्डू बिक गये। एक भरपूर नज़र से हमने लड़की का मुआयना किया। उसकी दोनों उंगलियाँ सिलाइयों से खेल रही थी शायद किसी स्कूल की टीचर होगी। फिर तो होगी भी अकेली...? कोई हमे घूरता न देख ले यह सोचकर हमने अपने सामने अख़बार खोल लिया।

अब बस के झटकों के साथ हमने अपना दिल पाँव में लपेटकर उसकी ओर धीरे-धीरे बढ़ाना शुरुकर दिया। बस चलती रही और पाँव में लिपटा हमारा दिल उसकी ओर बढ़ता रहा।

"बाबू जी, अपना पाँव ठीक कर लें और अपनी टिकट कटा लें," ये लोडिड ट्रक कहाँ से आ मरा? बिल्ली की तरह हमने अपना पाँव अन्दर को समेट लिया और भारी मन से हज़ार गालियाँ देते हुए जल्दी से टिकट कटवा लिया।

लोडिड ट्रक के गुज़रते ही हमने अपने पाँव को पुन: गीयर लगाया और रफ्तार दे दी। नज़र हमारी अब भी अख़बार पर टिकी थी कि कोई देख भी ले तो समझे यह सब अनजाने में हो रहा है।

अरे वाह-कालूराम, सवा किलो क्या, आज तो सवा पाँच किलो बिक गए। हमारा जूता उसकी कोमल सैण्डलों से छू गया हमारे दिल रूपी जूते ने उसकी सैंडिल को बड़े प्यार से धीरे-धीरे सहलाया और उसने अपनी सैंडल को ज़रा भी नहीं हटाया, इसका तो साफ़ मतलब है वह भी हमे चाहती है। आज बन गयी बात। जिसकी तलाश में हम वर्षों से भटक रहे थे वे आज मिली। कल तक हमारे घर में बिल्ली भी नहीं झाँकती थी, अब दुल्हन आएगी....।

हमारा प्यारा-प्यारा जूता उसकी सैंडि़ल के साथ ऐसे खेलने लगा जैसे चाँदनी रात में दो प्रेमी लीला में मस्त हो। बस अड्डा थोड़ी ही दूर रह गया, नीचे उतरते ही बात कर लेंगे। बस अड्डे पर तो भीड़ होगी इसलिए किसी ढाबे में बैठकर प्रेम भरी बातें करेंगे इसी को तो प्यार कहते हैं। आज होगा हमारा मधुर मिलन।

अरे बस अचानक ठहर क्यों गई? हाँ ठीक है फाटक आ गया ना। हमने निहायत सावधानी से अख़बार के कोने से नज़र चुराकर अपने प्रेमी जूते को देखा। देखते ही अपने पर रोना आ गया साहब, हमारा प्रेमी जूता भी हमारी तरह कुँवारा एल्युमिनियम की पट्टी में उलझ-पुलझ हो रहा था। बस में बैठे-बैठे हमने अपना सिर धुन लिया और सोच लिया शायद हमारी किस्मत में कुँवारा ही मरना लिखा है। आपको हमसे थोड़ी सी भी हमदर्दी हो तो ध्यान रखिएगा अवश्य...आपको याद है ना, कैसी भी हो हमें चाहिए केवल एक अदद बीबी...।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें