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ISSN 2292-9754

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07.01.2014


कहानी और लघुकथा का संकलनः पराया देश

कृति : पराया देश और छोटी बड़ी कहानियाँ
लेखक : प्राण शर्मा
प्रकाशक : मेधा बुक्स, दिल्ली-32
वर्ष : 2012
पृष्ठ : 128
मूल्य : 200 रुपए

प्रवासी साहित्यकारों और विशेषतः ब्रिटेन के प्रवासी साहित्यकारों में प्राण शर्मा एक लोकप्रिय एवं जाना पहचाना नाम है। 1965 से वे लंदन प्रवास कर रहे हैं। गज़ल कहता हूँ और सुराही काव्य रचनाओं तथा गज़ल पर आलोचनात्मक आलेखों के बाद उनका छोटी बड़ी कहानियों का संकलन पराया देश हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इसमें उनकी 6 कहानियाँ और 46 लघुकथाएँ संकलित हैं।

प्रवासी का दर्द इन कहानियों में यहाँ वहाँ बिखरा पड़ा है। उसके दर्द के कई पहलू हैं…. कि पराए देश में वह सारी समताओं के बावजूद न. दो की हैसियत से जीने के लिए अभिशप्त है… कि वहाँ भारत के पिछड़े इलाकों की गरीबी दिखाकर नई पीढ़ी के अंदर हीन भाव भरा जाता है……कि रंगभेद की सोच ने उन्हें सिर्फ ब्लैक बास्टर्ड और पाकी बना कर रख दिया है…..कि वह भारत लौट भी आए तो बेकारी, गरीबी और रिश्वतखोरी के भयंकर दैत्यों से वह लड़ नहीं पाएगा। उनकी पराया शहर का गणित का अध्यापक सोलह साल पहले ब्रिटेन आया था। आज वह यहाँ बस ड्राईवर है। दो बच्चे और पत्नी है। आर्थिक सम्पन्नता है, लेकिन नसलवादी सोच से मिलने वाला अपमान उसे क्षत विक्षत किए है। सोचता है-

जहाँ मान नहीं, इज्जत नहीं, वहाँ रहना ही क्यों….. पराए देश में सुख और आराम से जीने से अपने देश में गरीबी में और भूखे रहना कहीं अच्छा है। (पृ. 10)

प्रवासी कभी लौट कर अपने देश में स्थायी तौर पर नहीं आता। कभी पत्नी के कारण, कभी बच्चों की पढ़ाई के कारण, कभी वहाँ की सम्पन्नता के कारण, कभी भारत की बेकारी, रिश्वतखोरी , कभी प्रवास में मिली सम्पन्नता और सुविधाओं के स्तर पर पुनः स्थापित हो पाने- न हो पाने की आशंकाओं आदि के कारण वह वहाँ रहने के लिए अभिशप्त है।

प्रवास में मिली सम्पन्नता का अंकन ख़्वाहिश में भी है। यहाँ पैंसठ साल की उम्र में रिटायर होकर फिर से नौकरी ज्वायन करने वाले ड्राइवर चेतन बाबू का अंकन है। भारत का यह अंग्रेजी का प्राध्यापक ब्रिटेन में बस कंडक्टरी और ओवर टाइम से इतना कमा लेता है कि उसके पास महल जैसा घर, गाड़ी और लाखों पाउंड का बैंक बैलेंस है। बेटे सैटल्ड हैं।

यह उस वेलफेयर स्टेट की कहानियाँ हैं जहाँ लोग अनएम्प्लायमेंट बेनेफिट की रकम से भी गुज़ारा कर सकते हैं। पैंनशनरों के लिए बस का किराया सिर्फ एक पैनी हे।

प्रवासी होने के अभिमान, तमाम आधुनिकता, अर्थ सम्पन्नता और आभिजात्य के बावजूद जब शादी की बात आती है तो प्रवासी बच्चों की शादी अपने देश के लड़के लड़की से ही करना चाहते हैं। पंडित जी में पिता पंडित जी आयरिश लड़के से बेटी की शादी करने से तो मर जाना बेहतर मानता है।
प्रवासी की वेदना का एक पक्ष यह है कि भारत आने पर सभी दूर नजदीक के संबंधी लूटने लग जाते हैं। भारत यात्रा में दूर की बहन और भांजे नायक को चंडीगढ़ बुला कर उसके कोट पतलून और कमीज की सारी जेबें खाली करने में जुटे हैं।

प्रवासी को उस देश की अच्छी-बुरी संस्कृति को स्वीकारना ही है जहाँ वह रह रहा है। हिदायत में चाचा ब्रिटेन में आए भानजे को हिदायत देता है कि यहाँ न अखबार सांझा करते हैं, न चाय।

पराया देश में बहुत सी कहानियाँ भारतीय पृष्ठभूमि की हैं और कुछ ऐसी बातें भी हैं, जो दोनों देशों में समान है। एक थैली के चट्टे-बट्टे में शिक्षाधिकारी आनंद संपादक उदयनाथ के बेटे की नौकरी लगवाते हैं और उदयनाथ उनके नाम पर किताब लिखवा छपवा देते हैं। ख़्वाहिश के चेतन बाबू ब्रिटेन की धरती पर ओवर टाइम के लिए शराब की बोतल या सिगरेट के पैकेट उपहार में दिया करते हैं। इसे वे बुरा नहीं समझते। क्योंकि लेना-देना तो आदि काल से चला आ रहा है।

आस्था-अनास्था के बीच की स्थितियाँ और जैनेन्द्र कुमार की कहानियों जैसी दार्शनिकता भी इन कहानियों में मिलती हैं।

इस ब्रह्मंड का रचयिता अगर ईश्वर है तो उसका रचयिता भी तो कोई होगा। वह कौन है? वह दिखाई क्यों नहीं देता है? (पृ. 43)

छुट्टी और मेरी नैय्या पार लगाओ में भी आस्था अनास्था के बीच के स्वर मिलते हैं। तीन लंगोटिया यार में गोरे, काले, भूरे सबको लगता है कि ईश्वर उन्हीं के रंग का है।

पुरुष सत्ताक समाज की मानसिकता इन कहानियों/लघु कथाओं में यहाँ-वहाँ बिखरी पड़ी है। भगवान से संतान के रूप में हमेशा बेटा ही माँगा जाता है, बेटी नहीं। पहला बेटा जन्म ले या तीसरा, हर बार माँ बाप की खुशी बढ़ती ही जाती है, जबकि बेटी के संदर्भ में स्थितियाँ और सामाजिक मानसिकता विपरीत है। वो होता है जो मंजूरे खुदा होता है में बेटी की आकांक्षा रखने वाले पिता के लिए भी तीसरी बेटी का जन्म निराशा, हताशा, बेबसी ही लेकर आता है।

प्राण शर्मा वैयक्तिक जीवन में कुछ देर फिल्मों से भी जुड़े रहे हैं। ऐसे में उनकी कुछ कहानियों में किसी न किसी रूप में फिल्म जगत का भी उल्लेख है। फिर मिलेंगे में रंगमंच अभिनेता धीरज अपनी सारी योग्यताओं और जान पहचान के बावजूद मुंबई में सफल नहीं हो पाता और जब अवसर उसका द्वार खटखटाता है तो बहुत देर हो चुकी होती है। लघुकथा स्टार का धीरज एक हिट फिल्म देने के बाद फ्लाप ही रहता है। यानी मुंबइया संसार में पांव जमाने और उन्हें बरकरार रखने के चेष्टाओं की सफलताएँ-असफलताएँ यहाँ चित्रित हैं।

पुरुषसत्ताक की आत्मरति, पुरुष मनोविज्ञान या वृद्धों की लौलुप वृत्ति उनकी तीस साल का संबंध में देखी जा सकती है। यहाँ नायक मोहन लाल चौबीस और छब्बीस साल के विवाह योग्य बेटे होने के बावजूद पत्नी की मृत्यु के दो महीने बाद ही पुनर्विवाह के लिए गर्दन हिलाने लगते हैं। अगर करोड़ों की जायदाद हो तो आकांक्षा की तरह पैंसठ की उम्र में भी तीस की लड़की मिल जाती है। सच झूठ के युवक सैर के लिए नहीं, लड़कियों की तांक झांक करने पार्क में आते हैं। बेचारा दीपक का काव्य प्रेम काव्य से न होकर कवयित्री के यौवन से है। दुष्कर्मी में सहेली का पिता दीपिका से दुष्कर्म करता है। मेरी बात और है का पति पत्नी का पड़ोस में जाना भी बर्दाश्त नहीं कर पाता।

अर्थ का जीवन में विशेष महत्व रहता है। वाह री लक्ष्मी में पति पत्नी के बीच सदैव तूं तूं मैं मैं इसलिए रहती है कि पति को लाटरी जुए की लत हैं लेकिन जैसे ही पति की लॉटरी निकलती है, पत्नी की खुशी की सीमा नहीं रहती। दाता दे दरबार विच के पंडित नरदेव भक्तों से पैसे निकलवाने में माहिर है। अर्थ छोटे बड़े सब के मन को डांवांडोल कर देता है। कैरोल में वर्षों पुरानी नौकरानी का मन भी सोने की बालियाँ देख बेईमान हो जाता है। फीस में शिक्षा का बाजारीकरण चित्रित है।

राजनीति के बाजारीकरण के चित्रा भी यहाँ मिल जाएँगे। सुरक्षाकर्मी में पी. के. शर्मन को सुरक्षाकर्मी इसलिए मिलते हैं कि वे देश की प्रमुख पार्टी को हर साल करोड़ रूप्ए देते हैं- यही राजनीति कहती है और यही राजनेता और प्रशासन कहता है, अन्यथा जान की धमकी तो छोटे कर्मचारियों को भी मिलती रहती है। जननायक में अर्थ के आधार पर प्रजा जुटा कर नायक अपने लिए उपाधि का आयोजन करता हैं।

यह दुनिया संबंधों की नहीं असंबंधों की है। प्यार की नहीं स्वार्थ की है। आसक्ति की नहीं अनासक्ति की है। इसका उदाहरण उनकी नेकी कर कुएँ में डाल लघुकथा है।

संबंधों के बीच की सकारात्मक स्थितियों से भी उनकी कहानियाँ लबरेज हैं। उनके अनेक पात्रा मानवीय आसक्ति और भावनात्मक जुड़ाव लिए हैं। फिर मिलेंगे का धीरज प्रेमिका श्रुति के चले जाने के कारण फिल्मों का आफॅर छोड़ लौट आता है। सन्तान की सफलता की माँ बेटी के प्रथम आने की सूचना सुन आसन्न चोट को भूल उसे गले लगाने को विकल हो उठती हैं। मॉं बाप का साया में स्पष्ट है कि जब तक माँ बाप जिंदा रहें, बच्चों को बांधे रहते हैं। बहुत सी कहानियाँ उन मित्रों के वर्णन से भरी पड़ी हैं, जो भारत से नायक के पास इंग्लैंड आते हैं और अपने सास्कृतिक सभ्याचार से उसका मन जीत लेते हैं।

जीवन की हर छोटी-बड़ी घटना-दुर्घटना, समस्या, आकांक्षा इन कहानियों में चित्रित है। सन्तोष में स्पष्ट है कि व्यक्ति की श्ख्वाहिशें अगर लगातार पूरी होती जाएँ तो बढ़ती ही जाती हैं। आधुनिकता और फैशन को अपनाना सदैव सहज और सुखद होता हैं फैशन में गांव से आई दादी माँ पोते से अपने लिए ग्रैंड मम संबोधन सुनना चाहती है। हिपोक्रेट में दलित प्रसंग, जातिवाद और चरित्रा का दोगलापन है। यहाँ शबरी की कथा सुना वाहवाही लूटने वाले पंडित जी कभी किसी दलित के यहाँ पूजा के लिए नहीं जाते। मजबूरी का नायक युवावस्था में गरीबी के कारण और बुढ़ापे में बीमारियों के कारण मन पसंद खानपान से वंचित रहता है। पहेली में व्यंग्य साहित्यकारों पर है। यहाँ साहित्य जगत में छपने और प्रशंसा पाने के हथकंडे हैं।

हर कहानी एक चुन्नौती है, विरोधाभास लिए है। वैयक्तिक सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक कोई पक्ष छूटा नहीं है। यहाँ व्यंग्य है, पर आक्षेप नहीं। रोजमर्रा की छोटी छोटी बातें और बड़े जीवन सत्य एक साथ साकार हुए हैं। पराया देश एक सफल लघुकथाकार और मंजं हुए कहानीकार की सशक्त रचना है। साहित्य जगत की उपलब्धि है।


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