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ISSN 2292-9754

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03.13.2018


नारी उत्पीड़न
(प्रवासी महिला कहानी लेखन के संदर्भ में)

नारी शब्द का अर्थ है, जिसका कोई अरि/शत्रु न हो। भारतीय संस्कृति में नारी को अजातशत्रु माना गया है। लेकिन जिस समाज में पुरुष अहं ब्रह्मास्वि कहकर अपना परिचय देते हों, वहाँ स्त्री सिर्फ़ अमुक की पुत्री, अमुक की पत्नी, अमुक की माँ के इलावा कुछ नहीं है। घरेलू हिंसा नारी उत्पीड़न का चरम है। अग्नि परीक्षाएँ लेने वाले, जुए में हारने वाले, आपस में मिल बाँटने वाले, शादी की अंगूठी पहना राज दरबारों में गुम हो जाने वाले देव पुरुष, राजाधिराज, स्वामी, मालिक इस देश के आराध्य हैं। उन्हें तो सौ खून भी माफ़ हैं। भारत की 70 प्रतिशत स्त्रियाँ किसी न किसी रूप में उत्पीड़न का शिकार हैं, भले ही शिकायत की दर केवल एक प्रतिशत ही है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व की दस में से छह स्त्रियाँ घरेलू हिंसा का शिकार बनती हैं। भ्रूण हत्या, दहेज, जलाना, बलात्कार, ओनर किलिंग उत्पीड़न के कुछ रूप हैं। इंडियन पैनल कोड की धारा 498 के अंतर्गत 1983 में घरेलू उत्पीड़न को अपराध के घेरे में लिया गया। 8 मई 2007 को घरेलू उत्पीड़न निषेध से सम्बद्ध कानून लागू हुआ। इनके अनुसार पत्नी या लिव-इन पार्टनर महिला मारपीट, यौन शोषण, आर्थिक शोषण या फिर अपमान जनक भाषा के प्रयोग के हालात में शिकायत कर सकती है और सम्बद्ध पुरुष को क़ानून का उलंघ्घन करने की स्थिति में जेल के साथ- साथ जुर्माना भी हो सकता है। थप्पड़ मारना, घसीटना, लात मारना, पीटना, बाल खींचना- घरेलू हिंसा के प्रमुख रूप हैं। इसके लिए Partner Abuse, Spouse Abuse जैसे शब्द भी प्रचलित हैं। बिल क्लिंटन की संसद ने 1914 में Voilence Against Women एक्ट पारित किया। 21 वीं शती के प्रगति लक्ष्यों में तृतीय लक्ष्य नारी उत्पीड़न का उन्मूलन है। The Millenium Development Goals (MDG) के अंतर्गत लैंगिक समानता और नारी सशक्तिकरण की उद्घोषणा की गई। अमेरीकन अकेडमी ऑफ फ़ैमिली डॉक्टरज़ की अप्रैल 2005 की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में हर वर्ष दो मिलियन स्त्रियाँ घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। वहाँ The National Domestic violence Hot line है, जहाँ शिकायतें की जा सकती हैं और हॉट लाइन के वकीलों द्वारा सुझाव भी लिए जा सकते हैं। Good Search. Com भी घरेलू उत्पीड़न के ख़िलाफ़ बनाई गई वेब साइट है। New National Teen Dating Abuse Hotline तेरह से अठारह वर्षीय किशोरों के लिए है।

नारी उत्पीड़न कटु सच्चाई है। इसका शिकार हर देश, समाज, समुदाय, वर्ग की स्त्री है। उच्च या निम्न, शिक्षित या अशिक्षित, घरेलू या कामकाजी का भेद यहाँ नहीं है। पिता परिवार हो या पति परिवार- उसका दोयम दर्जा सर्वत्र निश्चित है। घरेलू हिंसा की क़ानूनी सुनवाई हो ही नहीं सकती। क्योंकि क़ानून चश्मदीद गवाह चाहता है, सबूत माँगता है। घरेलू हिंसा औरत का क़द छोटा कर देती है। जिसे घर में इज़्ज़त नहीं मिली, बाहर कौन सम्मान देगा। औरतें पूरा जीवन इसी आशा में बिता देती हैं कि सब कभी न कभी सुधर जाएगा। शायद वे उस चमत्कार की प्रतीक्षा में रहती हैं, जो कभी घटित हो ही नहीं सकता। स्त्री न देवी है, न दुर्गा है, न अन्नपूर्णा, न अर्द्धांगिनी। मनोविश्लेषांवादी फ्रायड ने कहा था कि देह स्त्री की नियति है और सीमोन कहती है- औरत पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। यानी गले में संस्कारों और वैध- अवैध की गाँठ बाँध उसे स्त्री बना दिया जाता है।

इस उत्पीड़न की शुरूआत उसके जन्म से भी पहले यानी भ्रूणहत्या से हो जाती है। सुधा ओम ढींगरा की ‘लड़की थी वह‘1 में सर्दी की एक रात, जब पूरा मुहल्ला घरों के अंदर लिहाफ़ों में सो रहा था, कुत्तों का शोर जगा देता है और बाहर आ विदेश से भारत आई नायिका और मुहल्ले के सब लोग देखते हैं कि कूड़े के ढेर में पड़ी एक नवजात कन्या शिशु को कुत्तों का झुंड संरक्षण दिये है। इंसान ने लड़की होने के कारण जिसे कचरे में फेंक दिया, उसे कुत्तों की इंसानियत बचा लेती है। भ्रूण से लेकर मृत्यु तक उसके हिस्से में सिर्फ़ एक यातना शिविर ही है।

शादी होते ही बेटियों के सुख-दुख से पितृ परिवार अनासक्त हो जाता है। अवधारणा है कि जहाँ डोली गई, वहाँ से सिर्फ़ अर्थी उठनी चाहिए। जायदाद में हिस्सा माँगने वाली लड़कियों के मायके से संबंध ही समाप्त हो जाते हैं। सुषम बेदी की ‘विषकन्या’2 में पितृ परिवार द्वारा बेटी का उत्पीड़न चित्रित है। विषकन्या उस भारतीय सोच को लिए है, जहाँ सेवा बेटी के नाम और जायदाद बेटे के नाम लिख दी जाती है। विषकन्या में सुरभि को पति ने इसलिए तलाक़ दे दिया कि वह पिता की बेटी है, रात दिन उसी की सेवा में लगी रहती है, और पिता ने इसलिए मकान बेटे के नाम कर दिया क्योंकि जायदाद के हक़दार सिर्फ बेटे होते हैं। बेटियाँ नहीं। उसके कसमसाने पर पिता कहता है- “खाती भी है और भौंकती भी।"

दिव्या माथुर की ‘सफरनामा’3 में विजया की सहेली बिल्लो का बहनोई द्वारा बलात्कार होता है और गर्भ रहने पर पिता से मिलकर उसकी हत्या कर दी जाती है। इज़्ज़त और दहेज बचाने का इससे बढ़िया उपाय और क्या होगा। सभी अभियुक्त दे दिला कर छूट जाते हैं। अनूप की बहन मिन्नी का ससुराल में उत्पीड़न किया जाता है। सब जानने के बावजूद माँ, बाप, भाई इसे पति-पत्नी का आपसी मामला मान मिन्नी की आहुति दे देते है। मानसी नित्य पति के अत्याचारों का शिकार होती है। पिता परिवार दवारा चुप्पी साध लेना भी उत्पीड़न का पोषण करता है। परंपरित सामाजिक मूल्यों की दुहाई देता पितृ परिवार अपने अहम को थपथपाता रहता है।

ज़ाकिया जुबैरी की ‘मन की सांकल’4 में जैसा क्रूर और हिंसक बाप वैसा ही क्रूरतम बेटा। कान्फ्रेंस से जल्दी लौटी माँ घर में सैंतीस वर्षीय बेटे के साथ एक नई स्त्री नीरा को पा विरोध करती है और बेटा कैंसर से जूझ चुकी माँ की बाजू दरवाज़े में दे अपना पौरुष दिखाता है, भयभीत माँ रात हत्या के भय से अंदर से सिटकनी लगा कर रखती है। दिव्या माथुर की पंगा की सेवानिवृत ‘पन्ना’5 इंग्लैंड की जर्जर यातायात और मेडिकल व्यवस्था तथा गुंडों और पुलिस के बावजूद बुढ़ापे में अपने कैंसर के इलाज के लिए स्वयं भटक रही है। पति के पास दूसरी औरत है और बेटे के पास अपना परिवार।

घरेलू हिंसा एक अभिशाप है। मनीषा लिखती हैं- “पति स्त्री देह को शक्ति प्रदर्शन का सुलभ क्षेत्र मानता है। दुनिया के हर देश, सम्प्रदाय, भाषा एवं जाति के मर्द अपनी पत्नियों को पीटने में अव्वल हैं, इसलिए पढ़ी लिखी सम्पन्न औरत हो या गरीब श्रमिक- सबके पति लात-घूँसे चलाने के मौक़े तलाशते रहते हैं। दुनिया की पचहत्तर प्रतिशत औरतें अपने पति के हाथों कभी न कभी पिटी अवश्य हैं। . . अमेरिकी समाज से बेहद प्रभावित लोगों को आश्चर्य होगा कि वहाँ की तीस प्रतिशत औरतें मारपीट की शिकायत करती हैं। ग्यारह प्रतिशत औरतें तो गर्भावस्था में पति द्वारा सताई जाती हैं। हमारे यहाँ भी सोलह प्रतिशत औरतें गर्भावस्था के दौरान पिटाई के कारण मर जाती हैं। . . . इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर रिसर्च ऑन वुमेन नाम की संस्था का मानना है कि घरेलू हिंसा से जितनी औरतें दुनिया भर में मरती हैं, उतनी तो कैंसर से भी नहीं मरतीं।6

घरेलू हिंसा हमारे सामने उस परिवार का चित्र अंकित करती है, जहाँ पति-पत्नी संबंध शिकार और शिकारी जैसे होते हैं। स्थिति बाघ बकरी सी होती है। जर्मन अनुसंधान कर्त्ताओं के अनुसार घरेलू हिंसा या उत्पीड़न की शुरूआत वैवाहिक सम्बन्धों में एक दूसरे को नीचा दिखाने या शर्मिंदा करने से होती है। मनोविशेषज्ञ गिजेला डेयर जीवन साथी द्वारा मिलने वाले अपमान की परिणति ही शारीरिक हिंसा मानते हैं। घरेलू हिंसा नारी उत्पीड़न का घोर पाश्विक रूप है। अहिल्या का पत्थर बनना या गर्भवती सीता का वनों में भटकना यहाँ का इतिहास है। बंद दरवाज़ों के पीछे की इस पाशविकता से मुक्ति आज पूरे भूमंडल की चिंता है।

दिव्या माथुर की ‘निशान’7 में पंजाबिन रानी का जीवन नित्य पति बलबीर की मार और धौंस सहते व्यतीत हो रहा है। वह आधा दिन सेंसबरीज़ सुपरमार्केट में काम करती है। रोज़ पति से पिटती है। वह उसका चेहरा लाल-नीला करके उसकी सूरत बिगाड़ देता है। जो हाथ में आता है, पटक देता है। उसके सामने ही लिन बलबीर को चूमती-चाटती रहती है। फिर भी रानी पति और पत्नीत्व के अधिकारों को छोड़ना नहीं चाहती। उसकी सास सत्या भी जीवन भर, पहले पति के और फिर पुत्र के जूते खाती रही। उनकी ‘फैसला‘ में सन्नी अक्सर माँ के कहने पर पत्नी को दो चार थप्पड़ लगा दिया करता है। उनकी ‘आत्महत्या से पहले’8 में नायिका सोचती है वे बहुएँ कितनी भाग्यशाली होती हैं, जिन्हें पति और सास तिल-तिल कर मारने की अपेक्षा एक ही बार में जला मारते हैं।

महानगरीय जीवन का अजनबीपन और अंतर्देशीय विवाह की त्रासदी प्रवासी स्त्री के उत्पीड़न का प्रमुख कारण है। लक्ष्मी शुक्ल की ‘अनहिता’9 में नायिका के सामने वाले फ्लैट में डॉ मल्होत्रा, उनकी ख़ूबसूरत ईरानी पत्नी अनहिता और बेटा सिद्धार्थ रहते हैं। भाषिक समस्या के बावजूद दोनों मे थोड़ी- बहुत आत्मीयता पनपने लगती है। नायिका महसूसती है कि कई बार अनहिता के रोने या उसके पति के चिल्लाने की आवाज़ें भी आती हैं। अनहिता एक बार छत से कूद कर आत्महत्या का असफल प्रयास करती है। फिर पता चलता है कि उसके पिता बीमार हैं और वह अपने देश जा रही है और फिर एक साल बाद उसकी दुर्घटना मृत्यु का ही ऐलान किया जाता है। डॉ. मल्होत्रा कहते हैं कि उनका एक्सीडेंट तेहरान में हुआ और उनकी बहन कहती है कि अमेरिका में। एक स्त्री की बलि ले ली जाती है और परिवार, समाज, पड़ोस, प्रशासन, देश, विश्व- सब अनासक्त हैं।

सुदर्शन प्रियदर्शिनी की ‘खाली हथेली’10 में पत्नी को आर्थिक तंगी, मानसिक यातना देने वाला, शारीरिक उत्पीड़न करने वाला, लोकाचार के गणित में निष्णात और हर समय षडयंत्र रचने वाला कुंठित पति है। दोनों साथ-साथ डाक्टरी की पढ़ाई कर रहे थे। वह उससे कहीं अधिक इंटेलिजेंट, चुस्त और सुंदर थी। शादी के बाद दोनों अमेरिका आते हैं। दो बेटियाँ भी हो जाती हैं। लेकिन पति का प्रभुत्व और पशुत्व, अहं और आक्रामकता कभी साथ नहीं छोड़ते। उसका लक्ष्य पत्नी को हर पल प्रताड़ित करना ही है। वह उसे कीड़े-मकोड़ों की तरह मसलता है, घर की चक्की में अच्छी तरह पीसने के लिए दूर-नज़दीक के रिश्तेदार बुलाता है। पत्नी को ब्रेन ट्यूमर होने पर भी उसके ईलाज और दवाइयों में घपले करता है।

कामकाजी, अर्थ स्वतंत्र स्त्री के उत्पीड़न के अवसर और भी बढ़ जाते हैं। वह दोहरे दायित्व को झेलने के लिए एक साँझीदार चाहती है, जबकि पति-परमेश्वर अपने अतिरिक्त समय और अतिरिक्त सुविधाओं से उत्पीड़न के नित्य नए जुगाड़ में व्यस्त रहते हैं और वह उनके हिंसात्म्क व्यवहार को झेलने के लिए विवश है। दिव्या माथुर की ‘अभिनय’11 में पत्नी कमाती है। परिवार के सारे ख़र्च और बिलों का भुगतान करती है और पति मनु कारोबारी परिवार से है, छोटी-मोटी नौकरी करना उसकी फ़ितरत में नहीं, इसलिए बेकार है। घर में बच्चे भी नहीं सँभाल पाता। हाँ बच्चों को सँभालने के लिए 20 पाउंड रोज़ पर रखी आया से शारीरिक संबंध अवश्य बना लेता है। कामकाजी स्त्री के गृहस्थ में उत्पीड़न का यह नया अध्याय है।

सुषम बेदी की ‘खुल जा सिम सिम’12 में घर और नौकरी- दोनों पाटों के बीच पिसने वाली माँ रेवा है। बेकार पति घर मे रहता है और वह दो-दो नौकरियों के साथ-साथ घर भी सँवारती-सँभालती है। उसे पता ही नहीं चलता कि कब बेटी अनु ने सौत का स्थान ले लिया। यह पति पुरुष दोनों औरतों का अपने लिए इस्तेमाल करता रहा। उनकी ‘तीसरी दुनिया का मसीहा’ में पति के बहन से अवैध सम्बन्धों के कारण पत्नी को दिन रात पीटा जाता है। उससे नौकरानियों सा व्यवहार किया जाता है। उनकी ‘संगीत पार्टी’13 में उन भारतीय संस्कारों का अंकन, जो कहते हैं कि औरत मात्र सेवा के लिए है। आरती बच्चों की डॉक्टर है। सारी कमाई उसका पति सँभालता है और वह गधों की तरह खाना परोसने से लेकर कपड़े प्रेस करने तक मे जुटी रहती है। वह पति और पुत्र के लिए मात्र उपयोगी और उपभोग्य वस्तु है। बेटा भी उसे धमकाता है कि अगर वह उसके विवाह में आई तो वह विवाह नहीं करेगा। कामकाजी होना या आत्मनिर्भर होना काफ़ी नहीं। समस्या पुरुषीय सोच के न बदल पाने की है।

दिव्या माथुर की ‘नीली डायरी’14 में स्नेहा को नित्य पति-ननद-सास के ताने सुनने पड़ते हैं। उसका पासपोर्ट छिपा दिया जाता है और चेहरे पर पड़े लाल-नीले निशान नारी-उत्पीड़न की कहानी कहते हैं। पति अमर उसके सामने ही दूसरी औरतों से फ्लर्ट करता है। वंदना मुकेश की ‘साजिदा नसरीन’15 की नायिका भोली, प्यारी और थुलथुली, अकेलेपन से घबराने वाली स्त्री है। बीस साल पहले उसका ऑपरेशन हुआ था। बच्चा मर गया था। ससुराल में बहुत मारते थे, फिर पति ने छोड़ दिया। अस्सी साल की अम्मी उसकी देखभाल करती है। प्रताड़नाओं ने उसकी सहजता, उसका दिमागी संतुलन छीन लिया है। अपने अस्तित्व की अस्वीकृति का दुख उसे मृत्यु के आगोश में झोंक देता है। बेटियों की क़िस्मत चौखट के आर और पार में बदल जाती है। कविता वाचक्नवी की ‘लंबी उड़ारी’16 में मायके में पम्मी छह चाचाओं की लाड़ली थी। दादी के लिए ख़ास और माँ की इकलौती संतान। ससुराल में वह नौकरी भी करती है और पंप वाले स्टोव पर दिन-रात हलकान भी होती रहती है। न प्यार, न आदर, न अपनापन। उसे ब्रेन ट्यूमर होने पर मायके का सारा खानदान पी॰ जी॰ आई॰ चंडीगढ़ और फिर दिल्ली एम्स में पहुँचता है, पर पति को सिर्फ़ पत्नी की मृत्यु का इंतज़ार है। वह वहाँ उम्र की दुहाई दे दूसरी शादी की बातें करता है। “फिट्टे मुँह जँवाई दा”- ऐसे ही नहीं कहते। रिवाज के अनुसार उसके मृत शरीर को ससुराल के घर लाया जाता है। सास अंदर नहीं लाने देती। दादी के दुप्पटे पर उसे लिटाया जाता है। सिर के नीचे ईंट रखी जाती है। अमूल्य बेटी मूल्यहीनता मे बदल जाती है।

पुरुष सत्ताक नहीं चाहता कि स्त्री के पास वह खिड़की हो, जिससे वह बाहर की दुनिया से जुड़ सके। इला प्रसाद की ‘खिड़की’17 की अपर्णा जब से इस घर में आई है, उसके मन में एक ही बात है- काश कमरे में सड़क की ओर खुलने वाली एक खिड़की होती। खिड़की यानी बाहर की दुनिया से जोड़ने वाला सम्पर्क सूत्र, धूप और रोशनी की वाहिका। लेकिन उसके पति को स्पष्ट है कि खिड़की का अर्थ घर की दीवारों को कमज़ोर करना है। शादी के पाँच वर्ष बाद, बेटे के होश सँभालते ही पति खिड़की बनवा देता है, पर यह उसके लिए नहीं है, लगातार पाँच वर्ष दीवारों के अंदर रहकर अब उसे खिड़की की आदत ही नहीं रही। हंसा दीप की ‘पति परमेश्वर’18 घरेलू नौकरानी दीतू की कहानी है। शराबी पति पीट-पीट कार लहू लुहान कर देता है और मालकिन की बातें भी सुननी पड़ती हैं। उसकी दरिंदगी के कारण वह उसकी मौत की कामना करती है और मर जाने पर इसलिए दुखी है कि पति परमेश्वर ही एक मात्र संरक्षक होता है।

घरेलू हिंसा का वीभत्स रूप और एक जली हुई वीभत्स, विकृत, झुलसी, खंडित, अपंग स्त्री का जीवट अनिल प्रभा कुमार की ‘बस पाँच मिनट’19 में देख सकते हैं। सोना इस देश में मामा के कहने पर स्टूडेंट वीज़ा की आड़ में शादी के मीठे सपने लिए आई थी, लेकिन शादी के एक महीने बाद ही उसे लौट जाने को कहा गया, क्योंकि उसके पिता ने ससुर को दहेज की तय राशि दस लाख नहीं दी। रात के समय, बिल्डिंग/ घर को आग लगा उसे जला दिया गया। जले कोयले की तरह उसके होंठ, नाक, हाथ, पैर गिरे। ढेरों ऑपरेशन हुये। सुंदर सोना वीभत्स, विकृत, झुलसी, खंडित, अपंग काया में परिणित हो गई। न्यूजर्सी में एक कमरा ले उसने समोसे वगैरह से केटरिंग का काम शुरू किया। काम बढ़ता गया सुशीला, अंजु, चंदा, मालती जैसी स्त्रियाँ जुड़ती गई। एक नया परिवार बनता गया। बड़ा अपार्टमेंट ले लिया। बाज़ार में पूजा और त्योहार के सामान की दुकान खोल ली। उत्पीड़िता जाने कितने लोगों की संरक्षक बन गई।

भ्रूण से लेकर बुढ़ापे तक स्त्री को उत्पीड़न झेलना पड़ता है। उसे यदा-कदा अपमानित करना, सताना, उसमें दोष ढूँढ़ना घरेलू हिंसा ही है। कहते हैं कि सुरक्षित घर और सुरक्षित परिवार एक सुरक्षित और सभ्य समाज की नीव रखते हैं, जबकि निर्मम तथ्य यह है कि घर- गृहस्थी ने औरत को कभी सुरक्षा नहीं दी। घर- गृहस्थी उसकी मजबूरी है। घरेलू हिंसा का सामाजिक या आर्थिक स्तर से कोई लेना-देना नहीं। यह किसी भी वय, जाति, देश, आयवर्ग, धर्म में घटित हो सकती है। शिक्षित, अर्धशिक्षित या अशिक्षित परिवारों में सर्वत्र इसे देखा जा सकता है। भारतीय या प्रवासी, संस्कृत या असंस्कृत की कोई सीमा रेखा यहाँ नहीं है। चिंतक कहते हैं कि इक्कसवीं शती धरेलू उत्पीड़न के लिए चुनौती की सदी है। यहाँ मुख्य लक्ष्य इस अभिशाप से छुटकारा पाना है। जबकि अपनों और अपनी धरती से दूर स्त्री की यातनाएँ बहुत बार द्विगुणित हो जाती हैं।

संदर्भ:

1. सुधा ओम ढींगरा, लड़की थी वह, कौन सी ज़मीन अपनी, भावना, दिल्ली, 2011
2. सुषम बेदी, सड़क की लय, नेशनल, दिल्ली, 2007
3. दिव्या माथुर, सफरनामा, आक्रोश, हिन्दी बुक सेंटर, दिल्ली, 2000
4. जाकिया जुबैरी, मन की सांकल, 28 अप्रैल अभिव्यक्ति, 2012
5. दिव्या माथुर,पंगा, पंगा तथा अन्य कहानियाँ, मेघा बुक्स, दिल्ली 2009
6. मनीषा, हम सभ्य औरतें, पृ, 24
7. दिव्या माथुर, निशान, पंगा तथा अन्य कहानियाँ, मेघा बुक्स, दिल्ली 2009
8. वही, आत्म हत्या से पहले, आक्रोश, हिन्दी बुक सेंटर, दिल्ली, 2000
9. लक्ष्मी शुक्ल, अनहिता, अभिव्यक्ति, 9 अक्तूबर 2003
10. सुदर्शन प्रियदर्शिनी, खाली हथेली, विभोम स्वर, जुलाई-सितम्बर 2016
11. दिव्या माथुर, अभिनय, पंगा तथा अन्य कहानियाँ, मेघा बुक्स, दिल्ली 2009 12. सुषम बेदी, खुल जा सिम सिम, सड़क की लय, नेशनल, दिल्ली, 2007
13. वही, संगीत पार्टी
14. दिव्या माथुर, नीली डायरी, 2050 और अन्य कहानियाँ, डायमंड पॉकेट बुक्स, दिल्ली, 2011
15. वंदना मुकेश, साजीदा नसरीन, हरिगंधा, सितम्बर 2014
16. कविता वाच्क्नवी, लंबी उड़ारी, संकलन- बीसवीं शती की महिला कहानीकारों की कहानियाँ, खंड-10, नमन, दिल्ली, 2010 .
17. इलाप्रसाद, खिड़की, साहित्यकुंज, 18 मई, 2012
18. हंसा दीप, पति परमेश्वर, साहित्य कुंज, 6 अप्रैल 2007
19. अनिल प्रभा कुमार, बस पाँच मिनट, हिन्दी समय,

http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=7858&pageno=1


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