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ISSN 2292-9754

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12.14.2015


महीन सामाजिक छिद्रों को उघाड़ती कहानियाँ
डॉ. अनुराधा शर्मा

पुस्तक: दीपावली@अस्पताल.कॉम
लेखिका: डॉ. मधु संधु
प्रकाशक: अयन प्रकाशन
पृष्ठ संख्या: १२८
मूल्य: २५०रु

समाज का दर्पण साहित्य युगानुरूप प्रवृतियों की अभिव्यकित रहा है। कहानी विधा इसका सशक्त उदाहरण है। कहानी मे प्रवृतिगत आया परिवर्तन सदैव उसे शीर्ष पर स्थापित करता रहा है। नवीन प्रवृतियों के विपरीत कुछ सामाजिक प्रवृतियाँ साहित्य में ज्यों की त्यों बनी रहती हैं। “दीपावली@अस्पताल.कॉम” – नवीन तथा प्राचीन सामाजिक प्रवृतियों को आत्मसात करता, लम्बे समय से साहित्य सेवा में संलग्न डॉ. मधु संधु का दूसरा कहानी संग्रह है। इस कहानी संग्रह में संकलित कहानियाँ प्रसिद्ध पत्रिकाओं हंस, वागर्थ, साहित्य कुंज, गर्भनाल, हिन्दी चेतना, अभिव्यक्ति, रचनाकार, मंथन, संचेतना आदि में प्रकाशित हो चुकी हैं। संग्रह दो भागों में विभाजित है। प्रथम खंड में कहानियाँ तथा द्वितीय खंड में लघुकथाएँ संकलित हैं। संग्रह की अधिकतर कहानियाँ कुटिल विद्रूप सामाजिक सच्चाइयों का वर्णन करती हैं, तथा सामाजिक सत्य को प्रस्तुत करती हैं।

लेखिका लम्बे समय से साहित्य तथा शिक्षा जगत से जुड़ी है। “इंटलेक्चुअल”, “संगोष्ठी”, “ग्रांट”, “अवार्ड”, “हिन्दी दिवस”, “विमोचन”, “असिस्टैंट” आदि कहानियाँ शिक्षा जगत के अघोषित कुटिल सत्य को उघाड़ती हैं। यहाँ दूर के ढोल सुहावने का मुहावरा उचित बैठता है। “इंटलेक्चुअल” के नायक अनिरुद्ध तथा “अवार्ड” की नायिका की भाँति कई छात्र तथा शोधार्थी शिक्षा जगत के विद्वानों, नामी साहित्यकारों तथा सम्पादकों के हाथों का खिलौना बन कर रह जाते हैं। आत्मसीमित महत्वाकांक्षाओं से जुड़े शिक्षाविद् प्रतिभा को नगण्य कर देते हैं। यथा “अगले दिन संगोष्ठी की सारी खबर अपने से खत्म और शुरू होते देख वे मुस्काराए बिन न रह सके। उन्हें अपनी चाणक्य बुद्धि पर मान हुआ” (६५)। “ग्रांट” तथा “हिन्दी दिवस” कहानियाँ जहाँ दिखावे का रंग दिखाती हैं वहीं हिन्दी दिवस पर विवश हिन्दी की दयनीय स्थिति प्रस्तुत करती हैं। कहानियाँ शिक्षा तथा साहित्य जगत में धीरे-धीरे बढ़ रहे छिद्रों का प्रतिबिम्ब हैं।

“परीक्षा और साक्षात्कार”, “शोध-तंत्र” तथा “पैकेज” आदि कहानियाँ भूख, पेट हेतू संघर्षरत प्रतिभा संपन्न लोगों की मनोदशा प्रस्तुत करती हैं। यथा “उससे कहीं कम अंक लेने वाले अच्छे-अच्छे पदों पर थे, यह परीक्षाओं और साक्षात्कारों के बीच की सच्चाई थी।“ (१२५)। यहाँ नायक की मानसिक बौखलाहट दिखती है।

“पहिया जाम”, “ब्रीफ केस” तथा “अनुशासनहीन” कहानियाँ वह सत्य कहती हैं जो भारतीय सरकारी तंत्र की त्रासदी तथा आम आदमी के जीवन कि विडम्बना बन चुका है। चाँदी का जूता (रिश्वत) सर्वोपरि है। “ब्रीफ केस” कहानी का कड़वा सत्य व्यंग्य भी है। सरकारी तंत्र में परिवतन है कार्य शैली का। रिश्वत लेने की परम्परा थैले से बैग की जगह ब्रीफ केस आ जाने का परिवर्तन है। यहाँ केवल चलता पुर्जा ही सफल हो सकता है।

लेखिका ने मानवजीवन में बढ़ रहे बाज़ारवाद के महत्व को अभिव्यक्ति दी है। “दीपावली@अस्पताल.कॉम” “कैरेक्टर” तथा “गोल्डन व्यू” कहानियाँ मानव की बाज़ारवादी मनोवृति को प्रस्तुत करती हैं। बाज़ारवाद जीवन से ऊपर माना जा रहा है। यथा “दुकानदार ज़रा से डिज़ाइनदार डिब्बों में दो सौ का ड्राई फ़्रूट डाल साढ़े चार सौ में बेच रहे थे और अस्पताल ने डॉक्टर मरीजों के गैर ज़रूरी ऑपरेशन कर, स्टेंट डाल, मरे हुओं को वेंटीलेटर में रख दीपावली मना रहे थे” (५८)। यहाँ यह बात सिद्ध होती है “बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपया”।

कई तरह की सामाजिक विसंगतियों को प्रस्तुत करते हुए लेखिका खोखली नीतिरहित भारतीय राजनीति का वर्णन करना नहीं भूली। “बीजी”, “इमेज”, “बेचारा अलादीन”, “बोट नीति” आदि कहानियाँ राजनीतिक स्वार्थ का लेखा जोखा प्रस्तुत करती हैं। यथा “उन्हें तब पता चला जब अगला चुनाव आने पर उन्हें बिठा दिया गया और उन्हीं के एक जिन्न को खड़ा कर दिया गया, जिताया गया, मंत्री बनाकर अलादीन बनाया गया” (१०९)। मोहरा बने अलादीन को राजनीति का जिन्न निगल जाता है। “बीजी” कहानी की बूढ़ी बीजी को भ्रष्ट नेता लालच से वोट हेतू ले जाकर अकेली छोड़ देता है। यहाँ राजनीति केवल नोट तथा वोट तक सीमित नीति बन कर रह गई है।

संग्रह में समाज की प्रमुख प्रवृति रूढ़ियों के प्रति नारी संघर्ष तथा समाज द्वारा उसका दमन- लेखिका ने अत्यंत गहनता से प्रस्तुत किया है। “कुमारिका गृह”, “संरक्षक”, “फ़्रैक्चर”, “लेडी डॉक्टर”, “सती”, “बिगड़ैल और”, “डायरी”, “जीवन घाती” आदि कहानियाँ पिता, पुत्र, पति, भाई, समाज के ठेकेदारों की दृष्टि में स्त्री के स्थान तथा स्त्री संघर्ष को अभिव्यक्ति देती हैं। कुमारिका गृह की नायिका ने भाई के संरक्षण से परे अपना बसेरा खोज लिया है। संरक्षक की पुत्री का पिता उसकी देह से अपने भक्षक पिता होने का कर्ज उतार रहा है। “फ्रैक्चर”, “लेडी डाक्टर” तथा “थैंक्यू” की नायिका पुरुष की मर्दवादी प्रवृति अंह का शिकार है। “बिगड़ैल औरत” की नायिका प्राचीन समाधान से तुष्ट न होकर नवीन समाधान खोज रही है। यथा “उसने कहा औरत पाँव की जूती है, वह जगमग करते हीरों में बदल गई। अब पाँव में डाले या गले मे... उसने गंवार कहा वह विश्वविद्यालय में प्रथम आ फ़ेलोशिप ले विदेश यात्रा कर आई” (१०४)। “डायरी” की नायिका ने अकेलेपन में जीना सीख लिया है कहती है, “मुझे कैक्टस और ग्लेडियस दोनों से प्यार है। क्या एक्वापंचर की चुभन से आशा और आनंद नहीं बंधा रहता” (७९)। परिवार से परे वह अस्तित्व रखती है।

स्त्री की भावनाओं को आहत करता तथा अपने जीवन में आधुनिकता की दुहाई देता पुरुष स्त्री संबंधी मानसिकता में आज भी सौ वर्ष पीछे ही सोचता है। “संरक्षक”, “फ्रैक्चर”, “जीवनघाती”, “रिटायर्ड”, “सती” तथा शुभचिंतक का पुरुष (मर्द, पति, भाई, बेटा) नारी पर आधिपत्य ईश्वर का वरदान मानता है। कहानियाँ कर्ता-धर्ता कहे जाने वाले अंहवादी रूढ़ पुरुष की कुटिल मानसिकता को नग्न करती है। “रिटायर्ड” का पुरुष अपने बुढ़ापे में अन्य औरतों के फ़िगर (देह) का खूब ध्यान रखता है। “शुभचिंतक” का पुरुष अबला औरत की देह का संरक्षण चाहता है। यथा “पर ऐसे फोन पहले कभी नहीं आए थे। उसके मरते ही इतने शुभ चिंतक? सभी मेरे खसम बने फिरते हैं” (१२३)। मर्द प्रवृति केवल औरत देह तक सीमित है। लेखिका ने वर्तमान नारी के पुरुष के प्रति विद्रोह को भी आवाज़ दी है।

संग्रह की कई कहानियाँ बदल रहे सामाजिक सरोकारों तथा रिश्तों को प्रस्तुत करती हैं। “दी तुम बहुत याद आती हो”, “तन्वी”, “नवीकरण”, “संगणक”, “वसीयत” आदि में बदल रहे समाज का लेखा-जोखा है।

स्त्री-पुरुष के संबंधों में आज एक विशेष परिवर्तन देखा जा रहा है। यह प्रवृति “लिवइन”, “सनराईज इंडस्ट्री” तथा “मैरिज ब्यूरो” कहानियों में देखी जा सकती है। युवा स्त्री पुरुष विवाह संस्था से परे इकट्ठे रहते हैं। जहाँ देह सुख से ऊपर किसी बंधन, कर्तव्य अथवा जुड़ाव का महत्व नहीं। स्त्री पुरुष बिन विवाह अपनी इच्छा हेतु शर्तों की अनुपस्थिति में रहते हैं। जहाँ वैवाहिक बंधनों की जकड़न नहीं होती।

संग्रह की सभी कहानियाँ समय की सार्थक अभिव्यक्ति हैं। वर्तमान सामाजिक मूल्यों की पड़ताल करते हुए लेखिका ने बदल रहे सामाजिक परिवेश को विभिन्न स्वरूपं में प्रस्तुत किया है। कहानियों की भाषा सहज, स्वाभाविक, समय, स्थान तथा पात्रानुकूल है। हिन्दी के अतिरिक्त कहानियों में अंग्रेजी शब्दों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग हुआ है। अपनी गहन अनुभव यात्रा में देखी समझी विसंगतियों वेदनाओं तथा संवेदनाओं को लेखिका ने सहज ढंग से चित्रित किया है। कहा जा सकता है कि कहानी संग्रह लेखिका की अत्यंत सूक्ष्म तथा पैनी दृष्टि का परिणाम है।

डॉ. अनुराधा शर्मा
एम.ए., एम.एड.,एम. फ़िल., पी.एचडी. (प्रवासी कहानीकारों पर)
शिक्षा विभाग, पंजाब
kaushal.anu9@gmail.com


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