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ISSN 2292-9754

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05.20.2016


नवजागरण के परिप्रेक्ष्य में रवीन्द्रनाथ ठाकुर का कालजयी उपन्यास "गोरा"

समीक्ष्य कृति : गोरा
लेखक : रवीन्द्रनाथ टैगोर
प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन्ज़
761, मेन रोड, बुरारी, देहली - 110084
पृष्ठ संख्या : ३२०
मूल्य : १००/-रु.

रवीन्द्रनाथ ठाकुर (1861-1941), जन्म के डेढ़ सौ वर्ष और मृत्यु के सात दशक बाद आज भी तेज़ी से बदलते समाज और इस राष्ट्र की सामूहिक चेतना में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से विद्यमान हैं। रवीन्द्रनाथ अकेले ऐसे कालजयी विचारक, चिंतक और संस्कृतिकर्मी हैं जिन्होंने भारतीय महाद्वीप के सामासिक जीवन का प्रतिनिधित्व, सुविशाल और सुविस्तृत फ़लक पर किया है। उनकी तेजोमय विविधोन्मुखी लोगों को आश्चर्य में डाल देती है। वे एक उत्कृष्ट कवि, उत्तम कोटि के कथाकार और नाटककार, एक अभिनव संगीतकार, अप्रतिम चित्रकार और विलक्षण शैलीकार थे। इतना ही नहीं वे एक महान शिक्षाविद, चिंतक और सुयोग्य समाजचेता भी थे। अपनी रचनात्मक क्षमता और मानसिक ऊर्जा के द्वारा उन्होंने अपने वैश्विक जीवन दर्शन को समूचे विश्व में व्याप्त किया। रवीन्द्रनाथ बीसवीं सदी की कतिपय सार्वदेशिक विभूतियों में से एक हैं। उन्होंने अपने सार्वभौम व्यक्तित्व की विकसित अवधारणा में प्राचीन सभ्यताओं एवं परंपरागत मूल्य सरंचना को समाविष्ट किया।

रवीन्द्रनाथ के चिंतन से, पूर्व-पश्चिम के द्वंद्व का निराकरण करते हुए एक ऐसी विश्वदृष्टि संपन्न हुई जो एक साथ भारतीय, सार्वभौम एवं सार्वदेशिक थी।

भारत में उपन्यास विधा के आगमन से पूर्व ही अंग्रेज़ी और अन्य यूरोपीय भाषा साहित्य में औपन्यासिक विधा का पूर्ण विकास हो चुका था। यूरोपीय उपन्यास साहित्य, अंतर्वस्तु, शैली और शिल्प के धरातल पर चरम बिन्दु को स्पर्श कर चुका था। भारत में सर्वप्रथम बांग्ला में उपन्यास विधा का प्रारम्भ हुआ। बंकिमचंद्र चटर्जी (1838-1894), भूदेव मुखर्जी (1825-1894) और प्यारीचाँद मित्र (1814-1853) बांग्ला के प्रारम्भिक कथाकार हुए जिन्होंने बांग्ला गद्य को रोचकता और सरसता प्रदान की। प्यारेचाँद मित्र की प्रतिनिधि रचना आलालेर घरे दुलाल और बाद में कालि प्रसन्न सिंह की चर्चित रचना हुतोम पेंचार नक्शा ने बांग्ला में एक नए पाठक वर्ग का निर्माण किया। बाद के वर्षों में बंकिमचंद्र चटर्जी के राजमोहन्स वाईफ (1864) के अनंतर दुर्गेशनंदिनी, कपालकुंडला, मृणालिनी, विषवृक्ष, रजनी, कृष्ण्कांतेर विल, राजसिंह, आनंदमठ (1882) आदि कृतियों ने बांग्ला में उपन्यास लेखन परंपरा को सुस्थापित किया। बंकिमचंद्र और शरतचंद्र की परंपरा में ही रवीन्द्रनाथ ठाकुर का पदार्पण बांग्ला साहित्य में हुआ। रवीन्द्रनाथ ठाकुर केवल बांग्ला साहित्य के ही नहीं वरण समस्त भारतीय साहित्य का प्रतिनिधित्व करने वाले बहुविज्ञ साहित्यचेता हैं।

"गोरा" रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कालजयी रचना है जो केवल बांग्ला संस्कृति की ही नहीं अपितु समस्त भारतीय संस्कृति की वैचारिकता का समाहार है। इस कृति में रवीन्द्रनाथ ने भारत की प्राचीन और आधुनिक चिंतन परंपराओं का विश्लेषण प्रस्तुत किया है। धर्म और कर्म के द्वंद्व को आधुनिक दृष्टि से मानवता के संदर्भ में स्पष्ट किया है। नवजागरण आंदोलन की सबसे बड़ी समस्या धार्मिक कर्मकांड और कट्टर ब्राह्मणत्व के आचार-विचारों से आक्रांत भारतीय समाज की अंतश्चेतना थी। रवीन्द्रनाथ ने "गोरा" उपन्यास के माध्यम से हिंदुत्व के विभिन्न व्यवहारिक स्वरूपों की आलोचनात्मक प्रोक्ति प्रस्तुत की है।

रवीन्द्रनाथ के मानस में आरंभ से ही भारत की एक वैश्विक छवि विद्यमान थी, जिसे वे मूर्तिमान रूप देना चाहते थे। बीसवीं सदी के आरंभ से ही हिंदू पुनरत्थानवाद का स्वर जिस तरह उभर रहा था, उसे वे बंगाल और भारत के अन्य प्रान्तों में देख चुके थे। वर्ष 1905 में बंग-भंग के प्रतिरोध में स्वदेशी आंदोलन का नेतृत्व करने के बावजूद उन्होंने उग्र राष्ट्रवाद का कड़े शब्दों में प्रतिवाद किया था। ऐसा माना जाता है कि "गोरा" की परिकल्पना, सिस्टर निवेदिता और रवीन्द्रनाथ के मध्य, परंपरागत एवं प्रचलित धर्मदर्शन एवं हिंदू मतवाद के वैचारिक विमर्श से की गई। स्वाभाविक है कि इस चर्चा के दौरान रवीन्द्रनाथ को उस विरोधाभास का सामना करना पड़ा होगा – जो प्राचीन और नवीन के बीच पार्थक्य ही नहीं, वैमनस्य भी पैदा करता है। सिस्टर निवेदिता, नव-हिंदूवाद के प्रखर प्रवक्ता एवं पुरोधा, स्वामी विवेकानंद की शिष्या थीं। वह स्वयं हिंदू मतवाद की उग्र प्रवक्ता थीं। रवीन्द्रनाथ भारतीय पृष्ठभूमि में हिंदू धर्म के प्रति निवेदिता की निष्ठा और उत्साह के लिए उनकी पर्याप्त सराहना भी करते थे। किन्तु रवीन्द्रनाथ भारतीयता के संदर्भ में निवेदिता की उक्त धारणा से प्रति पूर्णत: सहमत नहीं थे।

भारतीय पुनर्जागरण काल के धर्म के उस विकृत रूप को, जो हिंदू पुनरुत्थानवादी धारणा में अंतर्निहित थी, रवीन्द्रनाथ ने बहुत पहले पहचान लिया था। इसी वैचारिक विचलन का प्रतिफलन ही था "गोरा" यानी "गौरमोहन" – जिसे भारतीय "इतिहास की विडम्बना" भी बताया गया। तभी तो गोरा सगर्व कहता है - “मैं भी तो एक हिंदू हूँ। इस धर्म का मर्म आज भले न समझूँ– कल तो समझ पाऊँगा, और अगर कभी समझ न भी पाऊँ तो भी चलना तो इसी पर होगा। हिंदू समाज के साथ पूर्वजन्म का संबंध तोड़ न पाया, तभी तो इस जन्म में ब्राह्मण के घर जन्मा। ऐसे ही जन्म-जन्मांतर मैं इसी हिंदू धर्म और हिंदू समाज के भीतर से ही, उसकी चरम परिणति तक पहुँच पाऊँगा और कभी भूल से भी किसी दूसरे रास्ते की ओर मुड़ भी जाऊँ तो दुगुने वेग से लौट आऊँगा।"

गोरा के धार्मिक-सामाजिक परिवेश के साथ कई विचित्रताएँ जुड़ी थीं, जिन्हें यथाप्रसंग कथाकार ने स्पष्ट किया है। लेकिन लेखक का मानना है कि कोई आवश्यक नहीं कि स्थितियाँ बदलने पर संबंधित पात्रों की मन:स्थिति भी बदल जाए। "गोरा" उपन्यास में देश, काल एवं पात्रों का विन्यास जितनी सहजता और स्थिरता के साथ किया गया है – वह कई प्रसंगों में इसके पात्रों के साथ-साथ पाठकों को भी विचलित करता है।

"गोरा" उपन्यास की कहानी का आरंभ कृष्णदयाल बाबू और उनकी दूसरी पत्नी आनंदमयी से होता है। अपनी युवावस्था में अँग्रेज़ों की कमिश्नरी (कमिसेरियत) में काम करते हुए उन्होंने जीवन का बहुत सा हिस्सा पश्चिम भारत में बिताया था। पलटन के गोरों के साथ रहकर उन्होंने मद्य-मांस खाने से परहेज़ नहीं किया और आचरण भ्रष्ट होने के साथ-साथ वे देशी लोगों, पुरोहित-पुजारियों और वैष्णव संन्यासियों का अपमान तक कर डालते थे। लेकिन आयु के अंतिम पड़ाव पर पहुँचते-पहुँचते वे एकदम बदल गए। अब वे हमेशा गेरुवा रेशमी वस्त्र पहने रहते। उनके हाथ में पीतल का कमंडल होता और पैरों में खड़ाऊँ। किसी नए साधक या संन्यासी का संधान पाकर तंत्र साधना में भी उनकी रुचि बढ़ गई। कृष्णदयाल बाबू की पहली पत्नी जब एक पुत्र को जन्म देकर गुज़र गई, तब उनकी उम्र केवल तेईस साल ही थी। वे अपने उस पुत्र "माहिम" को ससुराल में छोड़कर पश्चिम की ओर चले गए ताकि वैराग्य ग्रहण कर लें। लेकिन छह महीने के अंदर ही काशीवासी, सार्वभौम महाशय की पौत्री आनंदमयी से उन्होंने विवाह कर लिया।

इसी बीच एक सम्मानजनक नौकरी प्राप्त कर कृष्णदयाल ने, अभिजात समाज में अपनी विशेष पहचान बना ली। सार्वभौम बाबू के मरने के बाद उन्होंने पत्नी को अपने पास बुला लिया। 1857 के सिपाही विद्रोह के दौरान उन्होंने अपनी युक्ति से दो-एक उच्चपदस्थ अँग्रेज़ अधिकारियों को सुरक्षा प्रदान करने का काम किया था। फलस्वरूप उन्हें यश तो मिला ही, सरकारी जागीर भी मिली। विद्रोही दंगों में किसी विदेशी दंपति के मारे जाने से, उसके अनाथ शिशु को कृष्णदयाल घर ले आए और पत्नी को सौंप दिया। उसे नाम दिया गया- गौरमोहन– गोरा। गोरा जब पाँच बरस का हो गया तो उन्होंने काशी छोड़ दी। वे पत्नी और दोनों बच्चों के साथ कलकत्ता आकर ठाठ-बाट से रहने लगे। इस बीच उनके पुत्र माहिम को भी राजस्व विभाग में काम मिल गया।

बचपन से शरारती स्वभाव का गोरा कलकत्ता में भी अपने संगी-साथियों के साथ हुड़दंग मचाया करता था। थोड़ा बड़ा हुआ तो युवोचित उत्साह में स्वाधीनता और विद्रोह की बातें करने लगा। यही नहीं, इन्हीं बातों पर दोनों भाइयों में ठन जाती थी। पिता और पुत्र में वैचारिक मतभेद आरंभ हो गया था। इस बीच केशवचन्द्र सेन की वक्तृता का कायल गोरा ब्राह्म समाज की ओर आकृष्ट हो गया जब कि पिता कृष्णदयाल पहले से ही घोर रूढ़िवादी बने हुए थे। बात-बात में "स्व" जाति का अहंकार और ब्राह्म धर्म के वर्चस्व को सिद्ध करने में गोरा को बड़ा रस मिलता था। इस उपन्यास में कई ऐसे प्रसंग हैं, जहाँ उसके इस ब्राह्म धर्म के प्रति उसके पूर्वाग्रह को रवीन्द्रनाथ ने रेखांकित किया है। कृष्णदयाल बाबू की धर्मपरायणता के चलते घर में भी दो ध्रुवान्त सक्रिय थे। जब कि धार्मिक विश्वास में संतुलन बनाए रखने में ही नहीं, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक संबंधों को निभाने में माँ आनंदमयी अत्यंत कुशल थीं। किन्तु गोरा और माहिम के आपसी संबंध में तनाव बना ही रहा। गौरमोहन उर्फ गोरा – यथानाम गोरा चिट्ठा, लंबा, सुदर्शन व्यक्तित्व का एक स्वाभिमानी उत्साही युवक था। वह आचार-विचार और व्यवहार में हिंदू मतवाद का कट्टर समर्थक था। किन्तु उपन्यास के अंत में एक ऐसा मोड़ आता है जब गोरा को अपने आइरिश माँ-बाप के मारे जाने और अनाथ हो जाने का पता चलता है तो वह न केवल हतप्रभ होता है बल्कि विचलित हो उठता है। वह यह सोचकर हैरान भी था कि कैसे एक नि:संतान ब्राह्मण दंपति ने उसे अपने घर में शरण देकर ब्राह्मणोचित संस्कार दिया। पिता कृष्णदयाल और माँ आनंदमयी ने उसे एक धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान दी, जिसके बल पर उसने ब्राह्मण गौरव और शक्ति संपन्न जाति का अहंकार प्राप्त किया। इसी के सहारे उसने न केवल अपने सच्चे मित्रों का, बल्कि अपनी प्रेयसी का प्रेम तक ठुकरा दिया। लेकिन उसका समस्त जाति-गौरव एकबारगी ढह जाता है जैसे ही उसे पता चलता है कि वह तो आइरिश मूल के माता-पिता की संतान है। इस सूचना मात्र से ही उसकी सारी अस्मिता और धर्मप्रवण सत्ता जैसे धराशाई हो जाती है। लेकिन धीरे-धीरे घटनाओं के घात-प्रतिघात से और संकीर्णता से वह मुक्त होता जाता है। अपने विश्वास को डिगने से बचाने के लिए वह सबसे पहले परेश बाबू के पास जाता है ताकि उसे अपनी सच्ची पहचान का कोई आधार प्राप्त हो। इस निष्ठुर भावनात्मक आघात से बचने और आत्म-परिपुष्टि के लिए वह माँ आनंदमयी की शरण में पहुँचता है और निवेदन करता है – "तुम्हीं मेरी माँ, तुम्हीं वहाँ घर पर बैठी थीं और तुम्हारे लिए मैंने कहाँ-कहाँ की ख़ाक नहीं छानी। तुम्हारी कोई जाति नहीं, तुम अपनी संतानों में कभी कहीं कोई अंतर नहीं करतीं। तुम सब पर समान रूप से कृपा करती हो – चाहे वह हिंदू हो, मुसलमान हो, या ईसाई हो, तुम्हीं हो भारत माँ!"

गोरा के इस प्रायश्चित्त में, उसके निवेदन में, उस मिथ्या अहंकार के लिए अनुताप भी था – जिसके कारण वह अज्ञात कुलशील और ब्राह्मण वर्चस्व का दंभ पाले हुए था। इस मिथ्या दंभ को भारतीय समाज और संस्कृति के लिए घातक बताते हुए गोरा का अभिनव रूपान्तरण ऐसे पात्र में हुआ जो अब सर्वथा एक नई भावभूमि के साथ यथार्थ की वैचारिक ज़मीन पर खड़ा था। क्योंकि अपने कट्टर पूर्वाग्रह और रक्तशुचिता के निकष पर अब वह एक विषम समाज और जाति का प्राणी था। विजातीय होने के इस आत्मबोध ने ही उसे वृहत्तर जाति गौरव और देश बोध से जोड़ा – अन्यथा वह और भी टूटकर बिखर जाता।

रवीन्द्रनाथ के जीवन में बीसवीं सदी का आगमन अवसादपूर्ण झंझावात लिए आया था। वर्ष 1902 में उनकी पत्नी मृणालिनी देवी का निधन हुआ, वे शोक से उबरे भी न थे कि उनकी दूसरी शादीशुदा बेटी रेणुका लंबी बीमारी के बाद चल बसी। वर्ष 1905 में पिता देवेन्द्रनाथ ठाकुर चल बसे और वर्ष 1907 के नवंबर माह में उनके कनिष्ठ पुत्र शमीन्द्रनाथ ठाकुर की मृत्यु हैजे से हो गई।

इन्हीं विषम परिस्थितियों में रवीन्द्रनाथ अपनी महत्वाकांक्षी कृति "गोरा" की रचना कर रहे थे रवीन्द्रनाथ ने "गोरा" अपनी पीड़ा को झुठलाने के लिए नहीं, बल्कि मानवता को उसकी सही पहचान दिलाने के लिए लिखा था। माँ आनंदमयी, वरदासुंदरी, हारान बाबू, परेश बाबू, सुचरिता, विनय आदि पात्रों के संदर्भ में गौरमोहन की पात्रता को रवीन्द्रनाथ ने न केवल मुखर बल्कि जिस कौशल के साथ विन्यस्त एवं परिभाषित किया था, यह इस उपन्यास की अतिरिक्त विशिष्टता है। इनमें रवीन्द्रनाथ स्वयं अपनी भूमिका को वैश्विक संदर्भ में रेखांकित करना चाहते थे।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने प्रयत्नपूर्वक राजा राममोहन राय और पिता देवेन्द्रनाथ ठाकुर की ब्राह्म धर्म परंपरा को वृहत्तर मानवीय और वैश्विक संदर्भों से जोड़ा और धर्म की चेतना को सांप्रदायिक या समाज विशेष के संकीर्ण दायरे से बाहर निकालकर उसे सामाजिक और जातीय आस्था से सींचा। उनके इस चिंतन के केंद्र में "मनुष्य" ही प्रतिष्ठित था। इस "मनुष्य" की तलाश में उन्हें कहीं भटकना नहीं पड़ा। लेकिन उस पर से धर्म-प्रेरित अहंकार की धूल को उन्हें अवश्य हटाना पड़ा, जिसका नैतिक साहस विरले ही जुटा पाते हैं। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने सृजनात्मक स्तर पर साहसपूर्वक शक्ति बटोरकर धर्म, समाज और मनुष्य को उसके संकीर्ण दायरे से निकालकर व्यापक परिवृत्त प्रदान किया। वे ऐसे देवता की आराधना करना चाहते थे और किसी ऐसे एक मंत्र का आह्वान करना चाहते थे – जिसे पाकर गोरा – जैसा व्यक्ति भी विधर्मी क़रार दिए जाने के बावजूद कह उठे – "परेश बाबू, आज मैं मुक्त हूँ। मैं पतित हो जाऊँगा, ब्रात्य हो जाऊँगा, मुझे अब इस बात का भय या चिंता नहीं। मुझे पग-पग पर भूमि की ओर देखकर शुचिता की रक्षा करते हुए नहीं चलना पड़ेगा। ईश्वर मेरी अशुचिता को संपूर्णत: नष्ट कर देंगे, यह मैं सपने में भी कदापि नहीं सोच सकता था। आज मैं इस प्रकार पवित्र हो गया हूँ कि मुझे चांडाल के घर में भी अपवित्र हो जाने का भय नहीं रहता। परेश बाबू, आज प्रात:काल से ही मैं संपूर्ण अनावृत्त हृदय के साथ भारतवर्ष की गोद में बैठ गया हूँ, माँ की गोद किसे कहते हैं, यह मैं इतने दिनों बाद परिपूर्ण भाव द्वारा प्राप्त कर सका हूँ।"

गोरा के स्वर में अब संपूर्ण भारत का उदात्त स्वरूप स्पष्ट और मुखर हो गया। अपनी मुक्ति के साथ उसमें सबकी स्वाधीनता और मानवीय एकता का आह्वान था। उसका आत्मबल अब यह कह रहा था कि मेरे लिए देश से बढ़कर कुछ नहीं; मैं ज्ञान-अज्ञान से परे नहीं लेकिन समग्र भारत का सुख-दुःख मेरा है। मैं आज पूरी तरह भारतवर्षीय हूँ। गोरा, मात्र एक धर्मनिष्ठ हिंदू संतान के रूप में स्वीकार किए जाने को बंधन मानने वाला और अब इस बंधन से सर्वथा मुक्त होकर, हिंदू-मुसलमान-ईसाई, इन सबको अपनाकर वह स्वयं को अधिक गौरवान्वित और उन्मुक्त मानने लगा। वह बार-बार कहता है – "आज इस भारतवर्ष की समस्त जाति ही मेरी जाति है – सबका अन्न मेरा अन्न है। अब मुझे अपने पतित होने का तनिक भी भय नहीं।"

रवीन्द्रनाथ ठाकुर के अनुसार– "जो लोग नवयुग लाने के पक्षधर हैं, उन्हें ऐक्य-साधना के लिए ही स्वातंत्र्य साधना करनी होगी, यह ध्यान में रखना होगा कि इस साधना से किसी एक जाति की मुक्ति नहीं, सारे मानव की मुक्ति हो।"

उपन्यास के अंत में, माँ आनंदमयी के रूप में गोरा ने उसी भव्य मूर्ति का दर्शन किया था और भाव विह्वल स्वर में बोल उठा था– "जिस माँ को मैं खोजता फिर रहा था – वे तो मेरे घर में पहले से आ बसी थीं। माँ, तुम्हारी कोई जाति नहीं, किसी से भेदभाव नहीं घृणा नहीं, तुम तो केवल कल्याण और करुणा की मूर्ति हो– तुम ही मेरा भारतवर्ष हो।"

वस्तुत: गोरा के आख्यान में जिस भाव-संक्रमणवादी अवधारणा को विमर्श के स्तर पर रखा गया है, वह मानव सत्य पर आधारित है और उसमें देश-निष्ठा, धर्म-निष्ठा और जातीय अस्मिता के प्रश्न निहित हैं। उन्नीसवीं सदी की जागरण वेला में जिस सत्य की प्रतिष्ठा पर रवीन्द्रनाथ का ज़ोर रहा है– वह तब अपनी युगीन समस्याओं और संस्थागत आग्रहों से मुक्त तो नहीं था लेकिन उसमें तब भी एक मुक्त और स्वायत्त मानव-समाज का स्वप्न एवं विश्व समाज की संकल्पना की विराट चेष्टा अवश्य देखी जा सकती है। (रवीन्द्रनाथ ठाकुर- एक जीवनी, नेशनल बुक ट्रस्ट, पृ. 125)

गोरा मात्र एक औपन्यासिक कृति ही नहीं, एक महाकाव्यात्मक कृति है, जिसमें भारत के इतिहास की संक्रांति का चित्रण है, जब नए बुद्धिजीवी वर्ग के लोग सामाजिक और बौद्धिक जागरण के मंथन में जुट हुए थे। भारतीय साहित्य में ऐसी कोई दूसरी कृति नहीं है जो इतने उत्कृष्ट ढंग से, विरोधाभास से भरपूर भारत के सामाजिक जीवन की जटिलताओं का और साथ ही भारतीय राष्ट्रवाद के चरित्र का विश्लेषण कर सके। इस उपन्यास में देश की सामाजिक दु:स्थिति और राजनीतिक नियति को बड़े साहसपूर्ण ढंग से संकेतित किया गया है। साथ ही, महात्मा गाँधी द्वारा प्रेरित उस असहयोग आंदोलन की भविष्यवाणी भी की गई है, जो दस-बारह साल बाद राजनीतिक मंच पर घटित हुआ। यह स्पष्ट है कि रवीन्द्रनाथ का मानवतावाद एवं महात्मा गाँधी का स्वातंत्र्य–संकल्प एक दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं। लेकिन गोरा की पृष्ठभूमि और उसकी निर्मिति से रवीन्द्रनाथ का आशय स्पष्ट है कि वे किसी एक समुदाय, समाज या देश की बात नहीं करते, वे संपूर्ण मानव जाति और विश्व समाज की बात करते हैं। "मानव और मानवता" पर आधारित यह समग्र भारतीय दर्शन ही वस्तुत: रवीन्द्रनाथ की साहित्यिक साधना का प्रतिपाद्य रहा है जिसमें संपूर्ण मानव-जाति की कल्याण–कामना निहित है। जाति, धर्म, संप्रदाय का अहंकार और अपनी श्रेष्ठता का दंभ पालने वाले लोग मानवता के परम शत्रु हैं जिन्हें जान-बूझकर देश का आदर्श बना देना, मानवता और राष्ट्रीयता दोनों ही पक्षों को नकार देना है। हिंदू राष्ट्रवाद और तथाकथित ब्राह्मण गौरव पर प्रहार करते हुए रवीन्द्रनाथ ने भारतीय स्वाधीनता संघर्ष के देशव्यापी आंदोलन से पूर्व भारतीय राष्ट्र और राज्य का जो मानवीय आदर्श इस उपन्यास के रूप में प्रस्तावित किया, वह अन्यतम है।

"गोरा" तत्कालीन जातीय अस्मिताओं और धार्मिक श्रेष्ठता के अहंकार से उपजी कट्टरता पर आक्रामक प्रहार है, जिसमें रवीन्द्रनाथ ने तार्किकता के साथ उसका प्रतीकार करते हुए समभाव की संस्कृति और समाज मानव-दर्शन को प्रतिष्ठित किया। रवीन्द्रनाथ ने इसमें अपने समय और समाज की विडंबनापूर्ण सच्चाइयों से टकराकर स्वयं को पहचानने की वेदनामय स्थिति में भी गोरा को ढूँढ निकालने का रचनात्मक उपक्रम किया।

गोरा उपन्यासकार रवीन्द्रनाथ की सर्वोत्तम उपलब्धि है, जिसे उचित ही, श्रेष्ठतम भारतीय उपन्यास कहा जाता है और आधुनिक भारत का महाभारत भी; क्योंकि इसमें स्वातंत्र्यपूर्व और स्वातंत्र्योत्तर भारत की विगत-आगत स्थितियाँ दोनों ही मुखर हैं और जो इसके कालजयी होने की साक्षी हैं।

रवीन्द्रनाथ का दर्शन परिवार, समाज और राष्ट्र के परस्पर सामंजस्य के भीतर मनुष्य को समग्र बनाने का दर्शन है, जिसमें हर तरह की अंधरूढ़ि का निषेध है। नवीनतम विचारों को आत्मसात कर अपने समय के भीतर कालगति की पूरी प्रक्रिया को समझने के कारण रवीन्द्रनाथ ने इस उपन्यास को सही अर्थों में मानवीय उत्कर्ष का प्रस्थान बनाया। इस रचना-विमर्श में उनके कवि, दार्शनिक, समाज एवं एक मनस्वी विचारक का बहुत बड़ा योगदान है। धर्म का पाखंड, संन्यासवाद, जनवादी पारंपरिकता, हिंसा तथा उग्रता से भरी जातीयता एवं जातिगत श्रेष्ठता को नकारते हुए रवीन्द्रनाथ काल प्रवाह के साथ बहना चाहते हैं और यही उनका विश्व-मानवतावाद है।

"गोरा" उपन्यास में गौरमोहन यानी गोरा के चरित्र-निर्माण द्वारा रवीन्द्रनाथ ने जाति, धर्म, समाज, संस्कृति और पारिवारिक जीवन के अनुभवों के साथ विषम समाज के एक व्यक्ति को जिस शिखर तक पहुँचाया है – वह अद्वितीय है। ऐसा पात्र भारतीय कथा-साहित्य के इतिहास में दूसरा कोई नहीं हुआ। लेकिन इसके अन्य पात्र – जिनमें परेश बाबू और उनकी सहधर्मिणी आनंदमयी प्रमुख हैं – वे भी रवीन्द्रनाथ की कल्पना के अप्रतिम पात्र हैं। धैर्यवान, सौम्य, उदार और ब्राह्म होकर भी संकीर्ण सांप्रदायिकता या किसी विजातीय के प्रति कटुता से दूर, वे दूसरों के विचारों का आदर करने वाले व्यक्ति हैं। उनकी उदात्त मानवीयता मनुष्य पर उनकी आस्था को बनाए रखने में उनकी सहायिका बनी रहती है। इसी प्रकार कृष्णदयाल बाबू की पात्रता का भी अपना ही अलग रंग है। वे हिंदूवादी संस्कारों में पले-बढ़े थे और उनमें हिंदुत्व का गौरव भी है लेकिन वे इसका आडंबर नहीं रचते, इसलिए गोरा को भी इसकी रूढ़ियों और कर्मकांडों से दूर रखते हैं। धर्म-कर्म संबंधी गतिविधियों में, और अब वृद्धावस्था में यौगिक साधना आदि में रुचि रखने लगे हैं। लेकिन अपने धार्मिक या वैचारिक आग्रह को किसी पर वे नहीं थोपते। इस जीवन यात्रा में उन्हें अपनी धर्मपत्नी आनंदमयी का पूरा सहयोग मिल रहा था। यही कारण था कि पति-पत्नी ने एक विजातीय बालक को इतने जतन से पाल-पोसकर बड़ा किया और समर्थ बनाया कि उसे कभी अपने विदेशी होने का अनुमान तक नहीं हुआ। जब उसका मोहभंग अपने आप से हुआ तो उसने केवल अपनी माँ नहीं, बल्कि समस्त भारतीयों की माँ – भारतमाता कहकर संबोधित किया। पति-पत्नी के उदार और शांत व्यक्तित्व का प्रभाव उपन्यास की नायिका सुचरिता पर भी पड़ा है – जो उनके एक मित्र की बेटी थी और जिसे उन्होंने कभी पराया नहीं समझा। गोरा के प्रति उसका प्रेम अत्यंत गंभीर और संयंत बना रहा। धार्मिक कर्मकांडों से दूर एक सीधे-सादे अनुष्ठान द्वारा दोनों का विवाह संपन्न हुआ था। इस मंगलकार्य में भी माँ आनंदमयी की भूमिका प्रमुख थी। यही नहीं, कृष्णदयाल बाबू की पहली और दिवंगता पत्नी के पुत्र विनय को भी अपने पुत्र की भाँति उन्होंने अपना वात्सल्य प्रदान किया था।

समाज में विपरीत गति-मति और प्रकृति वाले पात्र भी होते हैं। यह देखकर आश्चर्य होता है कि परेश बाबू जैसे ऋषितुल्य और उदारमना की पत्नी वरदा सुंदरी में ब्राह्मों वाली कट्टर सांप्रदायिकता विद्यमान थी। वह आधुनिक होने के साथ साथ ज़िद्दी स्वभाव की थी, इसलिए बेटी ललिता और विनय के विवाह में कोई सहयोग नहीं करती। बल्कि विरोध करती है। ललिता अपनी माँ की अंग्रेज़ीयत और अंग्रेज़ी साहित्य के प्रति उसकी रुचि की प्रशंसक है किन्तु भारतीयता के प्रति उसके विद्वेष का विरोध करती है। वरदासुंदरी के अतिरेकपूर्ण आचरण का प्रतिरोध परेश बाबू अपने शांत और संयत स्वभाव से करते हैं। ललिता में भी कमोबेश हठधर्मिता है किन्तु उसमें उचित-अनुचित का विवेक भी है। इसलिए उसने उस साहित्यिक आयोजन का बहिष्कार किया, जो एक अँग्रेज़ अधिकारी के निर्देश पर आयोजित किया गया था और जहाँ उसे काव्य-पाठ करना था।

"गोरा" उपन्यास में एक और पात्र हैं पानू बाबू – जो ब्राह्म समाज की सांप्रदायिकता को अपने कपटपूर्ण कार्य-व्यवहार से ही नहीं, धूर्तता से भी संकीर्ण और अनुदार बनाते हैं। यही कारण है कि ब्राह्म होते हुए भी सुचरिता इनसे दूर चली जाती है। अपनी कुटिल चालों से इन्होंने गोरा, विनय और सुचरिता – सबको खिन्न कर दिया था। परेश बाबू के जीवन पर उनकी व्यक्तिगत दुश्मनी और दुष्प्रचार का सामयिक प्रभाव तो अवश्य पड़ा किन्तु अंतत: वे अपने बुने जाल में ख़ुद ही फँसते चले गए।

रवीन्द्रनाथ ने "गोरा" उपन्यास में ही नहीं, अपनी अन्य कथाकृतियों में भी नवजागरण काल और आधुनिकता के दौर के साथ उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के संक्रमण काल में विभिन्न विचारों के परस्पर टकराव और कहीं-कहीं सहभाव को भी, ऐसे ही पात्रों के माध्यम से उकेरा है। हज़ारों की संख्या में ये पात्र इतिहास, मिथक, लोकवृत्त, समसामयिक जीवन और समकाल से ही नहीं, स्वयं रवीन्द्रनाथ के जोड़ासांको के वृहत्तर ठाकुर परिवार से निकलकर उनकी रचनाओं में साकार हुए हैं। उच्च ब्राह्मण वर्ग एवं ब्राह्म समाज के आधुनिक और अभिजात स्त्री-पुरुष, उच्च, निम्न और मध्यवर्ग के लोग, किसान, मज़दूर, कलाकार, गायक, फ़कीर, किरानी, दलाल, शिक्षित-अशिक्षित सभी रवीन्द्रनाथ की रचनाओं में अपनी छोटी-बड़ी भूमिका के साथ उपस्थित हैं।

डॉ.एम वेंकटेश्वर,
पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी एवं भारत अध्ययन विभाग,
अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय,
हैदराबाद।
संपर्क : 9849048156


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