अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
01.20.2016


भारतीय मुस्लिम परिवार में जन्मी स्त्री के शोषण और संघर्ष की आत्मकथा
"दर्द जो सहा मैंने"

पुस्तक : दर्द जो सहा मैंने (आत्मकथा)
लेखिका : आशा आपराद
मूल - मराठी, हिंदी अनुवाद : आशा आपराद
प्रथम संस्करण : 2013
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रा लि
1 बी नेताजी सुभाष मार्ग, दरिया गंज
नई दिल्ली - 110002
पृष्ठ : 276, मूल्य : 495/-

"दर्द जो सहा मैंने" आशा आपराद की प्रसिद्ध मराठी आत्मकथा "भोगले जे दु:ख त्याला" अनूदित संस्करण है। प्रस्तुत महिला आत्मकथा अनेक अर्थों में हिंदी लेखिकाओं की आत्मकथा से नितांत भिन्न है। आशा आपराद महाराष्ट्र में कोल्हापुर की निवासी हैं। बाल्यावस्था से ही वे अपने ही परिवार में माता के अत्याचारपूर्ण व्यवहार और यातनाओं से पीड़ित और प्रताड़ित होने के बावजूद स्वयं को इन अत्याचारों से मुक्त करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने शोषण और उत्पीड़न से मुक्ति का मार्ग स्वयं तलाशा और आख़िर उन्होंने स्वतन्त्रता और आत्म निर्भरता का लक्ष्य प्राप्त किया। उन्होंने कठिनतम स्थितियों में एम.ए., बी.एड. और एम. फिल की शिक्षा पूरी की। आज वे एक सक्षम प्राध्यापिका हैं। महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। अनेक सामाजिक संगठनों से जुड़ी हुई हैं।

"दर्द जो सहा मैंने" आशा आपराद की आत्मकथा है। एक भारतीय मुस्लिम परिवार में जन्मी ऐसी स्त्री की गाथा जिसने बचपन से ही स्वयं को संघर्षों के बीच पाया। संघर्षों से जूझते हुए जिस प्रकार से लेखिका ने शिक्षा प्राप्त की, परिवार का पालन-पोषण किया, अपने घर का सपना साकार किया - यही इस आत्मकथा का मूल कथ्य है। निश्चित रूप से यह आत्मकथा आज की उत्पीड़ित स्त्री को पारिवारिक और सामाजिक यातनाओं से मुक्ति दिलाने में संप्रेरक सिद्ध होगा।

अपनी माँ के ही अन्यायपूर्ण अत्याचारों से लेखिका जो यातनाएँ झेलनी पड़ीं उन्हें पढ़कर पाठकों का विचलित होना सहज है। साथ ही पिता का स्नेहिल सहारा लेखिका के तपते रेतीले जीवन सfर में मरुद्यान की शीतलता प्रदान करता रहा। पिता ही के संबल से लेखिका अपने अकेले जीवन संघर्ष को एक निश्चित मुक़ाम तक पहुँचाने में सफल होती हैं। "दर्द जो सहा मैंने" - सुख-दु:ख, मिलन-विछोह और अभाव-उपलब्धि के धागों से बुनी यह एक अविस्मरणीय आत्मकथा है। आत्मकथा का शीर्षक ही लेखिका के दुःख-दर्द और संघर्ष को मुखरित करता है। लेखिका का यह आत्मकथ्य दृष्टव्य है - "मेरी क़िताब सिर्फ़ 'मेरी' नहीं, तो प्रातिनिधिक स्वरूप की है, ऐसा मैं मानती हूँ। हमारा देश तो स्वतंत्र हुआ लेकिन यहाँ का इंसान 'ग़ुलामी' में जी रहा है। अगर यह सच न होता तो आज भी औरतों को, पिछड़े वर्ग को, ग़रीब वर्ग को अधिकार और न्याय के लिए बरसों तक झगड़ना पड़ता क्या? आज भी स्त्रियों पर अनंत अत्याचार होते हैं। दहेज के लिए आज भी कितनों को जलना पड़ता है। बेटी पैदा होने से पहले ही उसे गर्भ में 'मारने का' तंत्र विकसित हो गया है। मैं चाहती हूँ, जो स्त्री -पुरुष ग़ुलामी का दर्द, अन्याय सह रहे हैं, शोषित हैं, अत्याचार में झुलस रहे हैं, उन सबको अत्याचार के विरोध में लड़ने की, मुक़ाबला करने की शक्ति प्राप्त हो।"

आशा आपराद बचपन से एक अभिशप्त पुत्री के रूप में अपनी माँ के हाथों निरंतर उत्पीड़ित होती रहीं। परिवार, माँ और अपने माहौल से लेखिका में बचपन से ही वितृष्णा का भाव विकसित हुआ। उनके और उनके परिवार में जो भी कुछ बुरा घटता रहा, चाहे वह इंसानी हो या कुदरती उसके लिए 'माँ' आशा को ही ज़िम्मेदार मानती गई। सिर्फ़ वही ज़िम्मेदार मानकर ही वह चुप न रही, उसकी सज़ा भी आशा को उम्र भर देती रही। आशा उम्र भर उन ग़ुनाहों की सज़ा भुगतती रही जिसे उसने कभी किया ही नहीं था।

लेखिका की ज़िंदगी की दास्तान उस माँ के छल-कपट से भरी हुई है जो उसी की माँ है। उसकी सगी माँ। यही इस आत्मकथा की विडम्बना है।

लेखिका के शब्दों में - "मेरी माँ की बहुत सारी गंदी आदतों में से एक आदत थी हर चीज़ गिरवी रखने की। कभी बर्तन, कभी गहने, कभी पिताजी की शादी में सर पर बाँधा हुआ 'साफा', कभी मंगलसूत्र, न जाने और क्या-क्या! आगे चलकर तो उसने मेरी ज़िंदगी, मेरे सारे अरमान अपने लिए अपने पास गिरवी रख लिए। मैं हर गिरवी चीज़ छुड़ाकर लेती गई - और तो और, अपनी गिरवी रखी ज़िंदगी छुड़ाने में मेरी पूरी ज़िंदगी बीत गई।" यह आत्मकथा उसी संघर्ष की करुण दास्तान है।

जैसे ही लेखिका के पिताजी गुज़र गए, माँ तो मालकिन बन बैठी। आशा की जीवन की डोर 'माँ' ने अपने हाथों में ले थाम लिया। आशा की पढ़ाई बंद कर दी। उसका स्कूल से रिश्ता तोड़ दिया गया और परिवार की ज़रूरतों की गाड़ी में बैल की तरह उसे बाँध दिया गया।
आशा आपराद जीवन के हर मोड़ और पड़ाव पर अपने आप को ढूँढने की कोशिश करती हैं। लेखिका अपने अस्तित्व को पाने के लिए जीवन भर प्रयास करती हैं। लेखिका स्वयं को धर्म, रूढ़ि, रीति-रिवाज़, परंपरा जैसे अनेक पत्थरों से बनी दीवारों के कारागार में अपने आप को क़ैद पाती हैं। इस क़ैद से छुटकारे के प्रयास का विधिवत वर्णन से भारी है यह आत्मकथा। जीवन के प्रति उत्कट प्रेम ही लेखिका को जुझारू बनाता है। उसकी जिजीविषा उसे समाज, परिवार और अपनी अत्याचारी माँ से लोहा लेने का साहस प्रदान करती है। लेखिका हर उस दीवार को तोड़ना चाहती है जो औरत को उससे जीने का अधिकार छीन लेता चाहता है।

आशा नहीं चाहती की वह रूढ़ियों और धार्मिक तथा सामाजिक नियमों और बंधनों की कट्टरता के कीचड़ में फँसकर वह ख़त्म हो जाए। वह हर हाल में जीना चाहती है। वह जीना चाहती है अपने लिए, अपने बच्चों के लिए, उनके भविष्य और सपनों के लिए क्योंकि वह ज़िंदगी से बेहद प्यार करती है। जीवन के प्रति यही प्यार और जुनून उसे संघर्ष करने का साहस और धैर्य देता है। उसकी ऊर्जा का स्रोत अगर कहीं था तो ज़िंदगी के प्रति उत्कट प्रेम में। आशा आपराद को उस आसमान की तलाश थी जहाँ वह पूरी तरह मुक्त होकर उड़ान भर सके।

मराठी से हिंदी में अनुवाद स्वयं लेखिका आशा आपराद ने किया है जो अपने मराठी आस्वाद के कारण एक विशेष पाठकीय अनुभव प्रदान करता है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें