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ISSN 2292-9754

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01.23.2018


मुक्तिबोध की काव्य चेतना

गजानन मुक्तिबोध (1917–1964 ) प्रगतिशील धारा के सबसे बड़े कवि हुए हैं। स्वच्छंद कवियों की तरह वे बिना मिलावट के शुद्ध स्वर्ण थे। यह बात और है कि शुरू में मार्क्सवादी आलोचकों ने शमशेर की तरह उन्हें भी ‘प्रगतिशील रुझान रखने वाला प्रयोगवादी कवि’ कहा था, जिसका एक कारण यह था कि वे ‘तार सप्तक‘ के कवि थे और दूसरा यह कि उनकी शैली प्रचलित अर्थ में यथार्थवादी न होकर फैंटेसी वाली थी। यह तो काफ़ी बाद की बात है कि डॉ. नामवर सिंह ने कहा कि यथार्थवाद कोई शैली न होकर जीवन दृष्टि है, जो अनेक रूपों में प्रकट हो सकती है। यह दुखद है कि आज भी ढेर सारे प्रगतिशील और जनवादी आलोचक उन्हें वर्गीय चेतना संपन्न कवि नहीं मानते। कारण यह कि वे सर्वहारा से आत्मीयता स्थापित करने के लिए अंत –अंत तक अपने मध्यवर्गीय संस्कारों से लड़ते रहे, जब कि केदार और नागार्जुन शुरू से सर्वहारा से एकात्म होकर कविता में आए थे, गोया सिद्धान्त रूप में मार्क्सवाद को स्वीकार करते ही कवि की संवेदना स्वयं बदल जाती है और उसे अपने मध्यवर्गीय संस्कारों से लड़ना नहीं पड़ता। डॉ. रामविलास शर्मा जैसे आलोचक ने तो संदर्भच्युत उद्धरणों के सहारे मुक्तिबोध की कविता में रहस्यवाद का आलोक और अस्तित्ववाद की छाया भी ढूँढ़ निकाली है, जब कि वे इन दोनों के घोर विरोधी थे।

वर्तमान युग में मानव नियति को राजनीति की परिभाषाओं में ही समझा जा सकता है, अब यह मान्यता लगभग स्वीकृत है। ऐसी स्थिति में रचनाकार के रूप में मुक्तिबोध का राजनीति से अलग रहना संभव न था, बल्कि वे भी मूलत: राजनीतिक कवि ही थे। यह ज़रूर है कि उनकी राजनीति नागार्जुन वाली रोज़मर्रा की राजनीति न होकर वस्तुत: मानव नियति का पर्याय है। उन्होंने हिंदी में फैंटेसी की शैली में लंबी कविताएँ लिखकर कविता में जैसे एक नई विधा को जन्म दिया। उनकी कविता समाज में चलने वाली ऐतिहासिक द्वन्द्वात्मक नाटक को बहुत ही विशाल पट पर रखकर चित्रित करती है, जिसे देखकर उनमें जो ‘sweep of imagination’ था उसका लोहा मानना पड़ता है। मुक्तिबोध राजनीति की अहमियत को भी समझते थे और उससे साहित्य का जो संबंध है उससे भी अवगत थे। उनकी स्पष्ट धारणा थी कि संपूर्ण मनुष्य–सत्ता का निर्माण करने का एकमात्र मार्ग राजनीति है, जिसका सहायक साहित्य है। उन्होंने साहसपूर्वक कहा कि ‘साहित्य पर आवश्यकता से अधिक भरोसा रखना मूर्खता है।‘ देश-भक्ति का अर्थ उन्होंने ‘जन-भक्ति’ बतलाया और राजनीति और साहित्य दोनों का स्रोत एक ही माना – जनजीवन का यथार्थ। उनकी दृष्टि में ये दोनों मूलत: एक हैं, इनमें फ़र्क सिर्फ़ अभिव्यक्ति की प्रणाली को लेकर है। निश्चय ही इससे यह भ्रम न होना चाहिए कि उन्होंने राजनीति और साहित्य के संबंध का किसी तरह से सरलीकरण किया है। उन्होंने साहित्य को जो राजनीति का सहायक माना, इसका भी यह अर्थ नहीं कि साहित्य के प्रति उनका दृष्टिकोण उपयोगितावादी था। वे रचना और रचनाकार की स्वतन्त्रता के क़ायल थे और गहन मानववादी भूमि पर राजनीतिक काव्य-रचना के पक्षधर थे। स्वभावत: उन्होंने कभी प्रचारात्मक कविता नहीं लिखी, या कहें कि ‘हथियार‘ के रूप में कविता का इस्तेमाल करने की कोशिश नहीं की।

वे कलाकार की प्रकृति को मूलत: राजनीतिक या दार्शनिक नहीं मानते, लेकिन उन लोगों से सहमत नहीं, जो यह कहते हैं कि राजनीतिक प्रेरणा कलात्मक नहीं हो सकती। अपने प्रसिद्ध लेख में उन्होंने कहा है कि कलाकार राजनीतिक क्षेत्र में जिन-जिन आदर्शों को लेकर जाता है, वे उसके हृदय के अपरिमित विस्तार के आवेश से सम्बद्ध होने के कारण उसके लिए कलात्मक ही होते हैं। वह उस क्षेत्र में कोई राजनीतिक कौशल प्राप्त करने नहीं, बल्कि मानव जीवन के महत्त्वपूर्ण क्षेत्र में भीगने, रस लेने, ज्ञान दीप्ति प्राप्त करने और उसे उत्तमतर बनाने तथा उचित दिशा में परिवर्तित करने के लिए किया जाता है। यह भीगने, रस लेने और ज्ञान-दीप्ति प्राप्त करने वाली बात राजनीति के प्रति कवि-रूप में उनके दृष्टिकोण को अच्छी तरह से स्पष्ट कर देती है। यह चीज़ शेष प्रगतिशील कवियों से उन्हें अलग भी करती है। वस्तुत: राजनीति के प्रति उन जैसा सृजनात्मक दृष्टिकोण और उससे उन जैसा सरस और आत्मीय संबंध हिंदी के किसी प्रगतिशील कवि का नहीं रहा।

मुक्तिबोध की आरंभिक राजनीतिक कविताएँ उदाहरणार्थ ‘लाल सलाम, एक नीली आग, दमकती दामिनी, क्रान्ति’ आदि प्राय: युद्ध-काल और युद्धोत्तर काल में रची गई हैं। इनकी पृष्ठभूमि अंतर्राष्ट्रीय भी है और राष्ट्रीय भी – फासिस्ट सेना और लाल सेना के बीच का युद्ध, युद्ध में सोवियत संघ की विजय के साथ पूर्वी यूरोप के देशों में कथित समाजवादी शासन की स्थापना, एशिया और अफ़्रीका के औपनिवेशिक देशों में उठने वाली स्वाधीनता की लहर, चीन का मुक्ति-संग्राम, और वहाँ क्रान्ति की विजय तथा भारत का सामंत और उपनिवेश-विरोधी जन उभार, तेलंगाना के किसान आंदोलन, आज़ाद हिंद फौज की बंदियों की रिहाई के लिए किए गए राष्ट्रीय आंदोलन, डाक-तार विभाग के कर्मचारियों और दक्षिण भारतीय रेलवे के मज़दूरों की हड़ताल तथा बंबई के नाविक–विद्रोह के रूप में दिखलाई पड़ा था। बिना इस पृष्ठभूमि के ये कविताएँ नहीं रची जा सकती थीं। जो विद्वान मुक्तिबोध को इस पृष्ठभूमि से अलग करके देखते हैं, वे उनके संबंध में ग़लत निष्कर्ष निकालते हैं। इन कविताओं की सीमा यह है कि इनमें राजनीति और क्रान्ति की चेतना प्राय: भावना के स्तर पर है। इसीलिए उसकी अभिव्यक्ति भी प्राय: भावनात्मक ढंग से ही हुई है। स्वभावत: अभिव्यक्ति के अधिकांश उपादान वही हैं जो छायावादी कविता में काम में लाए जाते थे – बादल, बिजली, तूफ़ान आदि। इन उपादानों का उपयोग भी कवि ने छायावादी ढंग से ही किया है, यानी अप्रस्तुतों के रूप में। यह ज़रूर है कि उनके संयोजन में कुछ ऐसी विशेषता है, जिससे पुराने उपादानों से भी अनेक बार नई आभा से युक्त चित्रों की सृष्टि हुई है, जैसे क्रान्ति के उपमान ‘बिजली’ के लिए यह कथन – ‘लावण्य की अपराजिता असि धार‘। शब्द पुराने हैं, लेकिन नई भावना से दीपित, लौ से जलते हुए। जहाँ मुक्तिबोध श्रमजीवी जनता के प्रति गहरा प्रेम प्रकट करते हैं, वहाँ उनके शब्द अनाज के दूध भरे कच्चे दानों – जैसे प्रतीत होते हैं। वे चूँकि वैचारिक दृष्टि से बहुत सजग थे, इसलिए उनका क्रांतिकारी भावावेग उनके वैचारिक अनुशासन को कभी भंग नहीं करता। इसमें अराजकता या विस्फोटकता नहीं है, इसलिए उनकी ये कविताएँ सिर्फ़ राजनीतिक ‘तराने’ बनकर नहीं रह गईं हैं। लेकिन यह सहज है कि इनमें यथार्थवादिता की जगह एक सशक्त रोमानियत है। ‘आ – आकर कोमल समीर’, ‘ओ विराट स्वप्नों’ और ‘पीत ढलती हुई साँझ‘ – जैसी कविताओं में धीरे-धीरे यथार्थवादी भूमि उभरने लगती है। इनमें मुक्तिबोध कथाकार की तरह जीवन और परिवेश के यथार्थ का चित्रण करने का प्रयास करते हैं। अब उनकी कविता क्रांतिकारी भावावेग से हटकर सामाजिक अंतर्विरोधों के चित्रण का माध्यम बनने की ओर अग्रसर होती हैं। उसमें सामान्यीकरण का स्थान विशिष्टीकरण लेता जाता है। इसी अनुपात में उनकी कविताओं की लंबाई बढ़ती जाती है और उनकी संरचना जटिल होती जाती है। यह आकस्मिक नहीं है कि उक्त कविताएँ इस दौर की उनकी सबसे लंबी राजनीतिक कविताएँ हैं।

स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद मुक्तिबोध ने अपनी संपूर्ण अग्नि फ़ासिज़्म, साम्राज्यवाद और पूँजीवाद के विरुद्ध केन्द्रित की और छोटी-बड़ी अनेक प्रभावशाली राजनीतिक कविताएँ लिखीं। ‘जमाने का चेहरा‘ ‘अंधेरे में‘ के बाद की एक उल्लेखनीय कविता है। यद्यपि यह एक वर्णनात्मक कविता है और इसमें ‘अंधेरे में‘ जैसी जटिलता नहीं, तथापि यह अपने वर्णन की ओजस्विता और उदात्तता से पाठकों पर महाकाव्यात्मक प्रभाव डालती है। ‘मुक्तिबोध रचनावली’ में इसके अपूर्ण होने की संभावना व्यक्त की गई है, लेकिन यह अपूर्ण नहीं, एक पूर्ण कविता है, जिसमें मुक्तिबोध ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की अपने काल की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटनाओं का बहुत ही विस्तार से वर्णन किया है – फ़ासिज़्म की पराजय और नव-उपनिवेशवाद का उदय। ‘बारह बजे रात के‘ उनकी एक अपेक्षाकृत छोटी कविता है, जिसमें उन्होंने नाटो और सीटो –जैसी फौजी संधियों वाले साम्राज्यवादी देशों के बीच इंग्लैंड के एक होटल में चलने वाली युद्ध-मंत्रणा का बहुत ही वीभत्स और भयानक चित्र खींचा है। अपनी अधिकांश कविताओं में उन्होंने पूँजीवाद पर कठोर प्रहार किया है, निश्चय ही अनेक बार बेमालूम तरीक़े से। इनमें उन्होंने पूँजीवाद के आमनवीय रूप को उजागर किया है, उससे समाज में फैलाने वाली अलगाव की भावना का चित्रण किया है। ‘सूखे कठोर पहाड़’ उनकी एक सशक्त कविता है,जो ‘कष्टजीवियों के प्रतिनिधि‘ यानी मज़दूर नेता को संबोधित कर लिखी गई है। मुक्तिबोध ने मज़दूर नेता को ‘महाश्रमिक’ और ’जन-क्रान्ति-रूप’ कहा है। सूखे कठोर नंगे पहाड़ पूँजीवादी व्यवस्था के प्रतीक हैं। कवि ने मज़दूर नेता से आग्रह किया है कि वह उन पहाड़ों को अपने बाहु-बल से उठाकर इतिहास के समुद्र में फेंक दे।

‘ज़िंदगी का रास्ता ‘ मुक्तिबोध की एक आत्मकथात्मक कविता है – लंबी और उनकी अन्य लंबी कविताओं की तरह ही सारपूर्ण तथा मार्मिक। इसका नायक रामू, कवि का प्रतिरूप है, जो शाम को अपने काम से घर लौटता है, ‘पीत ढलती हुई साँझ‘ के नायक की तरह। लेकिन उस कविता से इसमें फ़र्क यह है कि इसका नायक निराश नहीं है, शुरू से ही आशा और विश्वास से भरा हुआ है। बीसवीं सदी के पचासवें चरण में और पूँजीवादी झूठ के विराट अत्याचारों के बीच उसे आशा और विश्वास कहाँ से मिलता है, यह कविता में अंकित इस प्रकार के चित्रों से स्पष्ट हो जाता है, जो युद्धोत्तर विश्व के दृश्य हमारे सामने उपस्थित करते हैं –

‘आधुनिक सहस्र मुख रावण से द्रोह कर
विद्रोही भूमि के संगाररत पुत्रों ने
धुएँ के उभरते हुए बादलों के ठीक बीच
भागती हुई कौंधती –सी ज्वाला –सी
प्रलंबित धारा को
आँखों से देखा –
अपने ही हाथों से छूती हुई
(स्टेनगन की ही ) वह आग थी।
शोषण–व्यवस्था को भंग करती हुई
आग की लकीर वह
पृथ्वी पर घूमती।

‘साँझ रंगी ऊंची लहरों में‘ शीर्षक कविता में एक उलूक है, जो ह्रासोन्मुख पूँजीवादी सभ्यता का परम दयनीय प्राण-पुत्र है। कारण यह कि वह पूँजीवादी व्यवस्था के आमनवीय रूप से परिचित है, लेकिन अपने में सिमटा हुआ और निष्क्रिय है। वह वस्तुत: मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी है, जो एक ओर युद्धोत्तर विश्व के जन-संघर्षों की रक्तिम घाटी में खिले हुए कालांतर उपस्थित करने वाले सत्य के प्रतीक –रूप अंगार –चंद्र को देखता है और दूसरी ओर पूँजीवादी व्यवस्था के खंडहर को, लेकिन युद्ध करता नहीं, सिर्फ़ सोचता है कि कोई उस खंडहर में रहने वाली जनता को पूँजीवादी सभ्यता के विषम और विकृत रूप से परिचित कराकर उसकी मूर्च्छा तोड़ दे। उसमें तीखा आत्मचिंतन चलता है, जनता का मुक्ति-अभियान उसके मस्तिष्क में तड़ित-नृत्य करने लगता है, जिसके परिणाम-स्वरूप अंतत: वह पूँजीवादी व्यवस्था से निकल भागता है। वह व्यवस्था इस निकल भागें को ‘भीषण देश-द्रोह‘ की संज्ञा देती है, लेकिन मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के साथ छोड़ने की घटना से वह यह भी सोचने लगता है कि उसका अंत निकट है।

‘उलट-पुलट शब्द’ एक छोटी लेकिन बहुत ही सार्थक कविता है, जिसमें मुक्तिबोध ने पूँजीवादी कारखाने में माल का उत्पादन करने वाले मज़दूरों के स्वयं माल बन जाने का वर्णन किया है। ‘भविष्य धारा‘ उनकी एक लंबी और उल्लेखनीय कविता है। इसका विषय भी पूँजीवाद ही है। इसमें एक वैज्ञानिक है, जो कवि भी है। वह पूँजीवादी व्यवस्था के उच्छेद के लिए समीकरण के कुछ सूत्र आविष्कृत करता है, जिन्हें पूँजीपति वर्ग चुराकर जला देता है। मुक्तिबोध कहते हैं कि वह कब तक ऐसा करता रहेगा? इतिहास की गति रुकती नहीं है, वे सूत्र पुन: आविष्कृत होंगे। इतिहास के नियमों का गहरा ज्ञान रखने वाले और विश्व-राजनीति की गति को अपनी नाड़ियों में महसूस करने वाले कवि को पूरा विश्वास है कि पूँजीवाद का नाश होकर रहेगा। वे पूँजीपति वर्ग के आश्रयान्वेषी मध्य वर्ग को विस्तार से उसकी आसलियत का ज्ञान कराते हैं और निम्न-मध्यवर्ग को ‘दुर्जेय भविष्य धारा‘ बतलाते हैं, क्योंकि उसमें क्रान्तिकारिता होती है और वह श्रमिक–वर्ग से अपनी एकता स्थापित कर देश के भविष्य का निर्माण करता है। ‘अंत:करण का आयतन‘ शीर्षक प्रसिद्ध कविता की समस्या भी राजनीतिक ही है। इसमें कवि को वर्तमान पूँजीवादी विश्व में दो प्रकार के दृश्य दिखलाई पड़े हैं – ध्वंस के भी और निर्माण के भी, और निराश होने की जगह वह इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि इन परस्पर विरोधी शक्तियों के संघर्ष की प्रक्रिया में ही विश्व का क्रांतिकारी रूपान्तरण होता है।

पूँजीवादी समाज में अमानवीकरण की जो प्रक्रिया चलती रहती है, उसका बहुत ही सशक्त वर्णन मुक्तिबोध की ‘ओ अप्रस्तुत श्रोता‘ शीर्षक एक अन्य छोटी कविता में देखने को मिलता है। ‘विक्षुब्ध बुद्धि के मारक स्वर‘ भी एक छोटी कविता है, जिसमें पूँजीवादी व्यवस्था में ‘आदमी के बदल जाने की भयानक प्रक्रिया‘ का वर्णन किया गया है। इस व्यवस्था में लोग अपने स्वार्थ और अपने आपसे प्रेम करने के अलावा किसी चीज़ को महत्त्व नहीं देते। वे जैसे जन्मोपरांत ही एक मर्कट द्वारा चुरा लिए जाते हैं और मानव-जगत से दूर जंगल में विकृत रूप में उसी के द्वारा पाल-पोसकर बड़े किए जाते हैं ! ‘हर चीज़, जब अपनी‘ शीर्षक कविता में व्यक्ति और समाज पर पड़ने वाले पूँजीवाद के प्रभाव, अलगाव और व्यक्तित्व-विभाजन का चित्रण और गहराई से किया गया है। पूँजीवादी सत्ता पर जनता के धावा बोलने का एक सरल अथवा सरलीकृत चित्र मुक्तिबोध की ‘लकड़ी का बना रावण‘ शीर्षक कविता में मिलता है। इसमें ‘जनतंत्री वानरों ‘ के समूह को अपने सुरक्षित स्थान की तरफ़ बढ़ते देखकर लकड़ी का बना रावण, जो कि ह्रासोन्मुख पूँजीवादी सत्ता का प्रतीक है, लड़खड़ा उठता है।

मुक्तिबोध ने अपनी राजनीतिक टिप्पणियों की तरह अपनी कविताओं में भी भारत को शेष विश्व से अलग करके नहीं देखा। ‘जन-जन का चेहरा एक‘ शीर्षक कविता में वे कहते हैं –

एशिया के, यूरोप के, अमेरिका के
भिन्न-भिन्न वासस्थान;
भौगोलिक, ऐतिहासिक बंधनों के बावजूद
सभी ओर हिंदुस्तान, सभी ओर हिंदुस्तान !

एक देश में चलने वाला मुक्ति संग्राम दूसरे देश के मुक्ति संग्राम को प्रभावित करता है; एक देश में क्रान्ति की विजय दूसरे देश के क्रांतिकारी आंदोलन को बल पहुँचाती है; एशिया, अफ़्रीका और लातीनी अमेरिका के देशों की परिस्थितियों में बहुत कुछ समानता रही है, आज भी है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि अपनी विशेषताएँ नहीं, अपनी परिस्थितियाँ और उनकी क्रान्ति की अपनी अवस्थाएँ नहीं। भारत की भी अपनी विशेष स्थिति है, जिसे मुक्तिबोध ने हमेशा ध्यान में रखा है। भारत जब गुलाम था, उन्होंने ‘गुलामी की जंजीरें टूट जाएँगी‘ शीर्षक कविता में उसे संबोधित कर कहा था : ‘तेरे साथ घूमूँगा गलियों में राहों पर/फटे चिथड़ों में भी रहूँगा मैं बादशाह ‘।

उसके आज़ाद होने के क़रीब एक दशक बाद शासन से निराश होकर ‘चकमक की चिनगारियाँ’ शीर्षक कविता में उन्होंने भारतीय क्रान्ति के स्वरूप और परिणाम को लेकर चिंता प्रकट की। उससे स्पष्ट है की उनके पास क्रान्ति का कोई सार्वभौम फ़ार्मूला न था और वे इसके प्रति उत्सुक थे कि वह भारतीय जनता के जीवन और समाज को उच्चतर सांस्कृतिक स्तर पर पहुँचाने वाली राजनीतिक कार्यवाही होगी। भारतीय जनता उनके लिए ‘फटेहाल ‘ भी थी और ज़िंदादिल भी, यह उन्होंने ‘सूरज के वंशधर‘ शीर्षक कविता में बहुत ही सशक्त ढंग से कहा है। इस कविता में आज़ादी के बाद के भारत की बहुत ही सही तस्वीर अंकित है। उससे भारतीय जनता की आर्थिक स्थिति का पता चलता है, उसके स्वभाव का भी, उसके जीवन–संघर्ष का भी और उसकी क्रांतिकारिता का भी। उसकी क्रांतिकारिता आज़ादी की लड़ाई के दौरान भी सिद्ध हुई थी, आज़ादी के बाद अनेक जनसंघर्षों और जनतान्त्रिक आंदोलनों से सिद्ध हुई है। आज़ादी के बाद उसकी हालत लगातार बिगड़ती गई है। ‘इस नागरी में‘ शीर्षक कविता में मुक्तिबोध ने शासक-वर्ग के नेताओं का चित्र खींचा है, जिनका सबसे बड़ा सहारा गांधीवाद था :

‘इस नगरी के प्रहरी पहने हैं धुएँ के लंबे चोगे/साजिश के कुहरे में डूबी /ब्रह्म-राक्षसों की छायाएँ/गांधीजी की चप्पल पहने घूम रही हैं।‘

मुक्तिबोध की सर्वाधिक उल्लेखनीय राजनीतिक कविता ‘अंधेरे में ‘ है, जो फ़ासिज़्म की आशंका से ग्रस्त होकर रची गई है। फ़ासिस्ट हुकूमत में न केवल जनता के सारे जनतान्त्रिक अधिकार छीन लिए गए हैं, बल्कि और बड़े पैमाने पर उसका क्रूरतापूर्ण शोषण और दमन आरंभ हो जाता है। ‘अंधेरे में ‘ में जो यह हुकूमत क़ायम हुई है और उसकी तरफ़ से मार्शल लॉ लगाया गया है, उसकी वजह मुक्तिबोध ने पूँजीवाद – विरोधी क्रान्ति की शुरुआत बतलाई है : ‘किसी जन-क्रान्ति के दमन –निमित्त यह/मार्शल लॉ है!!’ इस मार्शल लॉ में चारों ओर आतंक का वातावरण है। रात में एक जुलूस दिखलाई पड़ता है, जो प्रकारांतर से शासक वर्ग की खूंखार फौजी ताक़त का तो प्रदर्शन करता है, वस्तुत: यह दिखलाता है कि उसके साथ अपराधकर्मियों से लेकर मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी तक हैं। ये सब उसकी रक्षा में पंक्तिबद्ध हैं। लेकिन इस सबसे अंतत: जन-क्रान्ति दबती नहीं है और वह फूट पड़ती है : ‘यह कथा नहीं है, यह सब सच है, हाँ भई !! कहीं आग लग गई, कहीं गोली चल चल गई !!

‘अंधेरे में‘ मुक्तिबोध की सर्वाधिक जटिल कविता भी है, इसलिए इसमें राजनीति सपाट रूप में नहीं आई। इसे जटिल बनाने वाले इसके दो चरित्र हैं, जो इसमें फ़ासिस्ट हुकूमत के संदर्भ में उपस्थित होते हैं। उनमें से पहला चरित्र है वह व्यक्ति, जिसके आत्मसंघर्ष से कविता शुरू होती है और जो कविता को आगे ले चलता है। आलोचकों ने उचित ही उसे ‘अंधेरे में‘ का काव्य-नायक कहा है। वह एक प्रगतिशील मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी है, जो देश में कायम हुई फासिस्ट हुकूमत के कारणों और परिणामों से परिचित है। यह चीज़ उसे बेचैन कर देती है और उसके भीतर गहन दायित्व–बोध जागृत कर देती है। उसे महसूस होता है कि इस राजनीतिक दुर्घटना के लिए कहीं न कहीं अपनी निष्क्रियता के कारण वह भी ज़िम्मेदार है। भयानक आत्मसंघर्ष से गुज़रते हुए और सैनिकों द्वारा दी गई यातना बर्दाश्त करते हुए वह जन-क्रान्ति में शामिल हो जाता है और इस तरह देश के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह करता है। इस प्रक्रिया में उसका व्यक्तित्व रूपांतरित होता जाता है। जनता से तादात्म्य उसे मध्यवर्गीय संस्कारों और सीमाओं से मुक्त कर देता है, यद्यपि इसमें उसे कल्पित क़िस्म की कोई पूर्णता नहीं प्राप्त होती। दूसरा चरित्र एक ‘रक्तालोक-स्नात पुरुष‘ है, जो रहस्यमय ढंग से कविता में प्रकट होकर काव्य-नायक को प्रेरित करता है कि वह अपने मध्यवर्गीय घेरे से निकलकर सारे ख़तरे उठाते हुए जन-साधारण और उसकी क्रांतिकारी कार्यवाहियों से अपने को जोड़े। यह रक्तालोक-स्नात पुरुष और कोई नहीं, सर्वहारा की संगठित शक्ति का प्रतीक है, उस सर्वहारा की, जिसने पूँजीवाद-विरोधी क्रान्ति शुरू की थी और जिसे फ़ासिस्ट हुकूमत में सबसे अधिक शोषण और दमन का शिकार होना पड़ा है। सर्वहारा होने के कारण ही उक्त पुरुष एक तरफ फटेहाल है, उसके सीने पर बड़ा ज़ख़्म है, वह जेल में बंद है और दूसरी तरफ़ उसके होठों पर मु्स्कुराहट है, वह प्रचंड शक्तिमान है ! इस तरह ‘अंधेरे मे’ फ़ासिज़्म-विरोधी और सर्वहारा–वर्ग से एकता–स्थापन के द्वारा मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी के व्यक्तित्व-परिवर्तन की कविता है, जो अपने उद्देश्य में पूर्णत: राजनीतिक है। यह फ़ासिज़्म के आतंक को भी बहुत ही सशक्त रूप में उपस्थित करती है और जनता की क्रांतिकारी कार्यवाही से उसे ख़त्म भी कर देती है।

मुक्तिबोध की राजनीतिक कविताओं की एक विशेषता यह है कि ये उनकी राजनीतिक इतिहास और अर्थ-व्यवस्था के ज्ञान से असंपृक्त नहीं है। इस ज्ञान ने ही उनकी राजनीति को गहनता प्रदान की है और इसी की बदौलत उनमें वे साधारण पत्रकार न रहकर ‘वास्तविकता के मूलगामी निष्कर्षों‘ से परिचित ‘सौ सौ भीतरी आँखों वाले अख़बारनवीस‘ नज़र आते हैं। उनकी कविता राजनीतिक है, क्योंकि ‘गहन गंभीर छाया आगमिष्यत की/लिए, वह जन-चरित्री है।‘ आज की तेज़ी से बदलती दुनिया में, संभव है, उनकी कविताओं में वर्णित कुछ घटनाएँ और उनमें अभिव्यक्त कुछ अवधारणाएँ अप्रासंगिक हो गई हों, लेकिन उनकी गहन और ज्वलंत मानवीय अंतर्वस्तु हमेशा प्रासंगिक बनी रहेगी। राजनीतिक कवि के रूप में उन्हें केवल भारतीय जनता की नहीं, बल्कि विश्व की सभी शोषित-पीड़ित जनता की चिंता थी। वे वस्तुत: एशिया, अफ़्रीका और लातीनी अमेरिका के पिछड़े हुए नव स्वतंत्र और अपनी स्वतन्त्रता के लिए लड़ते हुए देशों के कवि थे। स्वभावत: उनकी राजनीतिक कविताओं में पूरा युग प्रतिबिम्बित है,जिसमें मानवता संघर्ष करते हुए स्वतन्त्रता और समानता की दिशा में अग्रसर है। भारत उनके लिए जैसे विश्व का अविभाज्य अंग है, वैसे ही विश्व भी उनके लिए भारत के बिना पूरा नहीं होता। गहन मानवीय संवेदना और इस व्यापक दृष्टि ने ही उनकी राजनीतिक कविताओं को क्लासिकी गरिमा और उदात्तता प्रदान कर दी है। इसके अलावा एक बात यह है कि उनकी प्राय: सभी कविताओं में उन्हीं के शब्द लेकर कहें तो ‘गीतात्मक संवेदन के कोमल पारिजात’ बिखरे हुए हैं। ‘अंधेरे में‘ से ही उदाहरण लेना हो, तो उसकी ये पंक्तियाँ देखिए

‘रात्रि के श्यामल ओस से क्षालित
कोई गुरु गंभीर महान अस्तित्वमहकता है लगातार‘
और
‘कमरे में सुबह की धूप आ गई है
गैलरी में फैला है सुनहरा रवि-छोर ‘।

मुक्तिबोध की कविताओं की प्रभावोत्पादकता का एक रहस्य यह भी है कि वे स्वप्न का वर्णन यथार्थ की तरह और यथार्थ का वर्णन स्वप्न की तरह करते हैं। रोमानी आवेग और दृढ़ यथार्थ-चेतना उनकी एक विरल विशेषता है।

राजनीति के बाद मुक्तिबोध की कविता का दूसरा मुख्य विषय मध्यवर्ग है, जिसके वे स्वयं सदस्य थे। अन्य प्रगतिशील कवियों ने जहाँ मार्क्सवाद की प्रचलित मान्यता के अनुरूप मज़दूरों और किसानों को अधिक महत्त्व दिया है, वहाँ उन्होंने मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों और दफ़्तर के कर्मचारियों को। कारण यह है कि पूँजीवाद के विकास के कारण भारत में मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों और दफ़्तर के कर्मचारियों की संख्या में बहुत वृद्धि हुई है, जिससे समाज में, सामाजिक संघर्ष में उसका महत्त्व बढ़ गया है। मुक्तिबोध ने इस बात को समझा और मध्यवर्ग को उसके दायित्व का बोध कराने का भरसक प्रयास किया। निश्चय ही यह मध्यवर्ग निम्न-मध्यवर्ग है, जिसकी मानसिकता निम्न-पूँजीवादी होती है। इसी कारण उससे आने वाले लोग पूँजीपति-वर्ग की तरफ़ भी जाते हैं और मज़दूर–वर्ग की तरज़ भी और राजनीतिक दृष्टि से उनमें एक अस्थिरता होती है। मुक्तिबोध का आत्मसंघर्ष भी मध्यवर्ग की ही देन है। उनकी ‘ब्रह्मराक्षस‘ शीर्षक कविता विद्वानों द्वारा ‘अंधेरे में‘ के बाद उनकी दूसरी महत्त्वपूर्ण कविता मानी गई है। इसका नायक एक पिशाच है। क्योंकि मरने के बाद उसे मोक्ष-लाभ नहीं हुआ, कारण यह कि उसके व्यक्तित्व में तीन कमियाँ थीं। एक तो यह कि वह कर्म से विरत रहकर अपने विचार और कार्य में सामंजस्य स्थापित करना चाहता था, दूसरे वह अतिरेक के बिन्दु पर जाकर भव्य नैतिक मानों को आत्मसात करते हुए पूर्णता प्राप्त करना चाहता था और तीसरे वह अपने व्यक्तित्व के बिलकुल निषेध के पक्ष में था। ये तीनों कमज़ोरियाँ अपरिपक्व चिंतन की देन हैं, जो मध्यवर्ग की विशेषता है। ब्रह्मराक्षस की आकांक्षाओं से सहानुभूति रखते हुए कविता के प्राय: अंत में कवि कहता है –

‘पिस गई भीतरी
औ बाहरी दो कठिन पाटों के बीच
ऐसी ट्रेजडी है नीच !! ‘

अंत में मुक्तिबोध ने बहुत मार्मिकता के साथ यह कहा है कि वे उस ब्रह्मराक्षस का शिष्य होना चाहते हैं, उसकी त्रासदी से द्रवित, जिससे कि वह जिस कार्य को अधूरा छोड़ गया है, उसे तर्कसम्मत परिणति तक पहुँचा सकें । उसकी वेदना का स्रोत उसका अधूरा कार्य या उद्देश्य ही है। इसी से वह हमेशा बेचैन बना रहता है और असामान्य व्यवहार करता है। निष्कर्ष यह कि मुक्तिबोध की आकांक्षा अपनी निजता को सुरक्षित रखते हुए कर्म-क्षेत्र में उतरकर अपने व्यक्तित्व का सामाजिक रूपान्तरण करती है।

संदर्भ ग्रंथ :

1 चाँद का मुंह टेढ़ा है : मुक्तिबोध
2 मुक्तिबोध साहित्य में नई प्रवृत्तियाँ : दूधनाथ सिंह
3 आधुनिक हिंदी कविता का इतिहास : नंदकिशोर नवल
4 अंतस्तल का पूरा विप्लव – अंधेरे में : सं निर्मला जैन


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