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ISSN 2292-9754

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04.30.2016


"फरिश्ते निकले" - नारी शोषण का वीभत्स आख्यान

समीक्ष्य पुस्तक : फरिश्ते निकले"
लेखिका : मैत्रेयी पुष्पा
प्रथम संस्करण : 2014
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, 1 बी, नेताजी सुभाष मार्ग
दरियागंज, नई दिली 110002
पृ : 251
मूल्य : 395/-

मैत्रेयी पुष्पा कृत सद्य: प्रकाशित उपन्यास "फरिश्ते निकले" बुंदेलखंड अंचल में रहने वाली लोहा पीटने वाली जनजाति के शोषणयुक्त यातना और संघर्षमय जीवन की दर्दनाक कहानी है। उपन्यास में मूल कथा अनेकों अंतर्कथाओं को जन्म देती है, जिसमें "बेला बहू" मुख्य पात्र है। बेला बहू अपने जीवन संघर्ष और शोषण की दुर्दांत कथा बिन्नी यानी लेखिका को सुनाती है। लेखिका ने इस अंचलों में बसने वाले ख़ानाबदोश और अन्य हाशिये के समुदायों का समाज-शास्त्रीय अध्ययन प्रस्तुत किया है। बेला बहू के जीवन में जो घटनाएँ हैं और जिन व्यक्तियों के साथ उसका वाद-विवाद-संवाद होता है उनका मन में उतर जाने वाला वर्णन मैत्रेयी पुष्पा ने किया है। जीवित रहने और आज़ाद रहने के अर्थ को व्यापक अर्थ में समझाती बेला बहू हिंदी उपन्यास साहित्य के कुछ अविस्मरणीय चरित्रों में अपना स्थान बनाती है। हाशिये के समाजों के जीवन संघर्ष को अपने उपन्यासों के माध्यम से पहचान दिलाने में मैत्रेयी पुष्पा ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अपने कथा साहित्य और विमर्श के द्वारा मैत्रेयी पुष्पा ने किसान, मज़दूर, स्त्री और दलित जीवन की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सच्चाईयों को मुखर किया है। "फरिश्ते निकले" में उन्होंने "बेला बहू" का वृत्तान्त रचा है। यह वृत्तान्त बुंदेलखंड अंचल के जटिल और कई परतों में बदलते "ग्रामीण और आंचलिक" भारत का दस्तावेज़ बन गया है। लेखिका ने इस उपन्यास की रचना के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा है-

"यह मेरे ही घर के वासवादत्ता, अल्मा और सिताब जैसे बड़े होते बच्चों की उम्मीदों के लिए है और उन जैसे हज़ारों-लाखों किशोर-वय बच्चों तथा उनके माता-पिताओं के वास्ते, जो समझेंगे कि समाज में अभी भी वे लोग बचे हुए हैं जो ज़िंदगी में स्वाभिमान को मनुष्य की सबसे बड़ी दौलत मानते हैं। वे अपनी हिम्मत, आन-बान और इंसानियत को सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं। मैंने ऐसे ही लोगों की छोटी-छोटी कहानियों से इस उपन्यास का ताना-बाना बुना है कि कैसे वे मामूली लोग "बड़े और बड़ों" के अन्यायों, अत्याचारों और ख़ुद पर लादी हुई ग़ुलामी के ख़िलाफ़ लड़े ताकि मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत का सपना सच हो सके।"

इस उपन्यास की नायिका एक नहीं अनेकों हैं क्योंकि एकाधिक कथा-सूत्रों को लेकर लेखिका ने बेला बहू के संग अनेक अंचलों की यात्राएँ कीं। इन अंचलों में बसे विभिन्न वर्गों और जातियों के श्रमिक और निम्न वर्गों के शोषित जीवन की गाथाओं को विभिन्न स्तरों में "बेला बहू" नामक कथा वाचक से कहलवाया है।

बेला-बहू उपन्यास की प्रथम नायिका है जो स्वयं अपने ग्रामीण रीति-रिवाज़ों और पिता की मृत्यु के बाद माता की दरिद्रता के बहाने से अनिच्छित ब्याह रचने के लिए विवश की जाती है ताकि परिवार को पुरुष का संरक्षण प्राप्त हो सके। बेला बहू अपनी आपबीती लेखिका को इसलिए सुनाती है ताकि इस हाशिये पर के समाजों की व्यथा-कथा, जिसमें प्रमुख रूप से स्वच्छंद यौन शोषण, स्त्रियों की तिजारत और स्त्रियों की ग़ुलामी की त्रासद स्थितियों पर से पर्दा हट सके। इन स्थितियों को तथाकथित सभ्य एवं सुसंस्कृति समाज देख सके। दरिद्र और दलित स्त्रियों के प्रति समाज के बाहुबली वर्ग के अन्याय और अराजकतापूर्ण अत्याचार की घिनौनी तस्वीर को बदलने की पहल की जा सके। निम्न वर्गीय समाजों में संतानोत्पत्ति में विफलता के लिए स्त्री को अपराधी घोषित कर प्रताड़ित करने के प्रसंग आज भी सामान्य हैं। इस स्थिति में घिरी बेला बहू का दांपत्य जीवन बिखर कर धराशाई हो जाता है लेकिन उसके बाद का जीवन और अधिक नारकीय सिद्ध होता है। बेला-बहू पुरुष आश्रय और स्वच्छ प्रेम की चाह में पुरुषों के छल-कपट और दारुण यौन शोषण की असामान्य स्थितियों का शिकार हो जाती है। प्रेम और संरक्षण के बहाने "भारत सिंह" जैसे नर रूपी राक्षस के हाथों बेला बहू का पाँच-पाँच पुरुषों द्वारा निरंतर यौन शोषण और फिर उसे राजनीति का मोहरा बनाकर बाहुबली राजनेताओं को मुहैया कराने का षडयंत्र पुरुषों के हिंसात्मक पाशविक मानसिकता को पुष्ट करता है। ऐसी स्थिति में शोषित, बलात्कारित और छली गई बेला बहू का स्वाभिमान और अस्तित्व की रक्षा के लिए राजनेताओं के अतिथिगृह में आग लगाकर उसे लाक्षागृह में बदल देना, स्त्री के साहसपूर्ण प्रतीकार और संघर्ष को संवेदनशील रूप से चित्रित करता है। असहाय बेला एक नहीं अनेक पुरुषों की काम वासना का शिकार होती है। बेला को अंत में यही लगता है कि जब-जब औरत को इस सभ्यता में डालकर तौला-मापा जाएगा, तब-तब मरदाना जकड़बंदी कसती चली जाएगी और जब इस जकड़न के ख़िलाफ़ दासी जैसी रंभाओं की लड़ाई जन्म लेगी तब-तब औरत के लिए पुरुषों में नफ़रत का भाव जागेगा क्योंकि औरत की जवानी को अपने फ़ायदे में निचोड़कर मालिक बने रहने की कोशिश में रहते हैं। मगर यह "सभ्यता" कब तक रहेगी? बेला पकड़ी जाती है, उसे सज़ा होती है। लेकिन बेला का अपना अनुभव बताता है कि जेल में ठूँसे गए, सज़ाओं से गुज़ारे गए कितने लोग असलियत में अपराधी होंगे? उसने तो ज़्यादातर को रसूख़ वालों की बर्बरता, दरिंदगी और नाइंसाफ़ी झेलते देखा है जिनकी गुहार पुकार को भी कहीं जगह नहीं मिलती। बेला मुजरिम थी। हत्या का जुर्म उसके वज़ूद पर चिपका दिया गया। वह सोचा करती जिस तरह उसके वज़ूद पर "हत्यारी" लिख दिया गया है ऐसे ही उनके (बलात्कारियों) माथे पर अत्याचारी, बलात्कारी और धोखेबाज़, औरतबेचा बेला के जुर्म से पहले ही क्यों नहीं लिख दिया था, जिनके नाम भारत सिंह, जोरावर और सहदेव आदि थे।

उपन्यास में लेखिका ने बहुत ही कौशल के साथ बेला बहू के स्त्री-शोषण के संघर्ष और बग़ावत को फूलन देवी की बग़ावत से जोड़ कर प्रस्तुत किया है, जो कि लेखिका के आख्यान को अधिक असरदार बनाता है। बेला और फूलन की पुरुष जाति के ख़िलाफ़ की गई बग़ावत एक जैसी थी। फूलन भी बेला की तरह ही उच्चवर्णीय बाहुबली मर्दानगी का शिकार हुई थी। जेल की सलाखों के पीछे बेला और फूलन देवी की भेंट का चित्रण काल्पनिक होते हुए भी उपन्यास के कथ्य को प्रामाणिकता प्रदान करता है। मैत्रेयी पुष्पा ने फूलन के शोषण का ज़िक्र भी उसी अंदाज़ में किया है जैसे कि बेलाबहू का। फूलन के प्रतिहिंसात्मक कारनामे बेला बहू के प्रतिशोध को उचित ठहराते हैं। बेला बहू का प्रतिशोध एक यौन शोषित औरत का कामुक पुरुष समुदाय के ख़िलाफ़ इंक़लाब का शंखनाद बन जाता है। इसीलिए बेला, फूलन देवी की कहानी में "यौन क्रिया" का ज़िक्र आते सहमती नहीं कि बाबू गूजर पूरे गिरोह के सामने फूलन को नंगा करके ज़मीन पर लेटने के लिए मजबूर करता था। जोरावर भी तो बेला के साथ यही करता था। उपन्यास में बेला, फूलन की ज़िंदगी के साथ साथ चलने लगती है। भारत सिंह, जोरावर और सहदेव जैसे कामुक बलात्कारियों को बेला और फूलन ही सबक सीखा सकते हैं किन्तु इसके लिए उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ती है।

इन भयानक त्रासदियों से निकलकर बेला बहू एक अलग जीवन शुरू करती है। इस उपन्यास में मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी अभिव्यक्तियों को धारदार बनाने के लिए पुरुषवादी समाज-भाषिक प्रयुक्तियों को गढ़ा है, जो इस उपन्यास के नेरेटिव को चमका देती है। यह शैली मैत्रेयी पुष्पा की सृजनात्मकता की मौलिकता को रेखांकित करता है। इस उपन्यास में महिला लेखन को भाषा के स्तर पर मैत्रेयी पुष्पा ने एक नई अनछुई ऊँचाई पर स्थापित किया है। "वेदों में लिखा है कि पूरे शरीर में देशी घी मलकर औरत से.... मैंने वे जड़ी-बूटियाँ वैद्यजी से ले ली हैं जो मर्द को सनसनी में उतार देती है। तुम देखती जाओ बेलारानी, यहाँ आदमी में घोड़ा, बकरा, मेंढ़ा जैसी ताकत तुम्हें पस्त करके डाल देगी। इसके आगे बहुत-से-बहुत कुछ ... वह नहीं सोचना चाहती कुछ भी ... उसने अपने जन्म में औरत होने की सज़ा पाई है। यह बात औरत ही जानती है कि मर्द उसे किस-किस तरह से रौंदते हैं। इसलिए औरत के माथे पर लाज चिपका दी कि पुरुष के इस मवेशी जैसे व्यवहार को किसी से कहे नहीं ... सहती रहे।" (पृ: 86)

उपन्यास में फूलन, बेला को ऐसे मर्दों को ठिकाने लगाने के लिए प्रोत्साहित करती है। लेखिका को अपनी कहानी सुनाते हुए बेला को फूलन के शब्द याद आ जाते हैं - "बेला अपने समाज को बागी औरतें ही बदल सकतीं हैं, "भली" औरतों को तो मर्द गन्ने की तरह पेरते रहते हैं और मूँछों पर ताव देते हैं। भली औरतें, बेचारी, अपने "भोलेपन" को ढोती हुई तड़पती रहती हैं।" (पृ: 87)

मैत्रेयी पुष्पा नारी के यौन शोषण के विरोध में एक बहुत साहसी विमर्श प्रस्तुत करती हैं। देश भर में हाल में घटित रोमांचक हृदयविदारक बलात्कार की घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में इस उपन्यास की रचना हुई है। बेला अपने बाल सखा बलवीर की सूझ-बूझ भरी वकालत के परिणामस्वरूप जेल से रिहा तो हो जाती है लेकिन इसके बाद का उसका जीवन उसके लिए पहेली बन जाता है। जेल में फूलन देवी से मुलाक़ात उसके लिए यादगार बन जाती है। बेला बहू अपनी आगे की ज़िंदगी को ऐसी ही शोषित स्त्रियों और हाशिये पर के समुदायों के जीवन की अमानवीय त्रासदियों की खोज में निकल पड़ती है। बुंदेलखंड और मध्यप्रदेश के बियाबानों में ऐसे अनेक जनजातीय समुदाय सामाजिक हिंसा, यौन शोषण, अन्याय और अत्याचार से लड़ते हुए बेला को मिलते हैं जिनकी कहानियाँ बेला अपने भीतर छिपाए रखती है। इन त्रासद कथा सूत्रों को वह केवल बिन्नू अर्थात लेखिका के ही सम्मुख उद्घाटित करना पसंद करती है जिससे कि ये करुण कथाएँ काग़ज़ के पन्नों पर लेखिका द्वारा उकेरी जाएँ और इन पात्रों को सामाजिक पहचान के साथ-साथ सामाजिक न्याय भी उपलब्ध हो सके।

इसके आगे कुख्यात डाकू अजय सिंह और उसके गिरोह की कथा भी बेला की जुबानी लेखिका सुनती है। अजय सिंह आगे चलकर समर्पण कर गाँव वालों की सेवा में लग जाता है। ग्रामीण अंचलों में उच्च वर्ग और ज़मींदारी अत्याचार और शोषण से छुटकारा पाने के लिए जिस तरह भोलेभाले ग्रामीण युवक और युवतियाँ बंदूक थामकर बीहड़ों में पनाह लेते हैं, इसकी करुण कथा बेला लेखिका को सुनाती है। गुलाब, लिली, बसंती जैसी दिलेर स्त्री पात्रों के शोषण और संघर्ष की त्रासदियों को लेखिका ध्यान से सुनती है। ये सभी पात्र अलग-अलग आंचलिक परिवेश में बाहुबलियों की वासनापूर्ण अन्याय का शिकार होकर मुक्ति का मार्ग तलाशती हैं। इनमें बसंती एक अलग तरह की पात्र है जो अपनी दिलेरी से बीहड़ों में छिपे डाकुओं के गिरोह को गाँव से रोटियाँ पहुंचाने का काम करती है। इसके मुख से भी शोषण के कई क़िस्से बेला के माध्यम से लेखिका तक पहुँचते हैं। पहाड़पुर से विदा लेकर बेला सिंध के उस पार के घने जंगलों में जा पहुँचती है। जहां एक नई कहानी शुरू होती है। लेखिका को कुछ और पात्र और उनका शोषित जीवन समाजशास्त्रीय अध्ययन के लिए हासिल हो जाता है। उपन्यास के इस हिस्से में "उजाला" की कहानी शोषण कि पराकाष्ठा को उजागर करता है। उजाला "लोहापीटा" (लोहा पीटकर औज़ार बनाने वाला समुदाय) ख़ानाबदोश समुदाय की युवती है। उजाला, अपने ही प्रेमी के बाहुबली पिता द्वारा बिछाए जाल में फँस जाती है। उसे दरिंदगी से सामूहिक बलात्कार कर काटकर फेंक दिया जाता है जिसे "बेला बहू" किसी तरह बचा पाती है। उजाला की यौन शोषण की दास्तान करुणा और पीड़ा की सभी सीमाओं को पार कर लेता है। मैत्रेयी पुष्पा की लेखनी ने औरत की उस दारुण दैहिक यातना को जिस संवेदना के साथ अभिव्यक्त किया है वह कठोर से कठोर व्यक्ति को भी द्रवित और विचलित कर देगा।

उजाला की मरणासन्न हालत देखकर बेला बहू का अपना याद आ जाता है - "सूली पर चढ़ने वाले लाखों बार आँखें खोलने के लिए कहेंगे, अपना शिश्न लड़की के होठों पर रगड़ेंगे और होंठों के बीच घुसाने की ज़िद ठानेंगे। अगर लड़की नहीं संभव होने देगी तो उसकी योनी की चीरफाड़ जैसी दर्दनाक क्रियाएँ करने लगेंगे। बलात्कार जिसके साथ हुआ हो ... ऐसी बेला बहू ने लेटी हुई लड़की की पीठ को सहारा देते हुए उठाया और अपने सीने से लगा लिया।" (पृ: 140)

उजाला की अपनी अभिव्यक्ति लेखिका के शब्दों में पाठक के रूह को कंपा देती है - "उजाला कब समझती थी कि यही ख़ानाबदोश जिंदगी का हासिल है। वह बड़ी हो गई तो सज़ा भी अपना रूप बदलने लगी तभी तो उसकी देह टुकड़े-टुकड़े और किर्च-किर्च के रूप में छितरा दी। देह के भीतर ऐसा कौन-सा ज़हर प्रवेश कर गया कि नस-नस ऐसे सुलग रही है जैसे भट्टी पर लोहे की सलाखें सुलग कर लाल हो जाती हैं। अंतड़ियों में खौलता सीसा उतार दिया जिसकी नुकीली गाँठें बनती जा रही हैं। इसमें भयानक अगर कुछ है तो वह यह कि बार-बार वे परछाइयाँ आँखों के आगे आती जाती हैं जिनकी आँखों में इस देह के लिए लपक-टपक रही थी।"

"क्या हर लड़की के लिए यही विधान है?" उजाला का सवाल कुछ इसी तरह का था। यह सवाल हर औरत का है। क्या औरत का जन्म यही सहने के लिए होता है? किसी न किसी रूप में औरत में केवल देह ही शेष रह गया है। इस देह का ऐसा विध्वंस कि उसकी आत्मा भी कराह उठे और मर जाए? लेखिका ने यह सवाल आज के तथाकथित संभ्रांत समाज से किया है। लेकिन उपन्यास में ऐसी मृतप्राय औरतें भी समाज से लड़ने के लिए पुन: उठ खड़ी होती हैं और शेष जीवन को सकारात्मक ढंग से जीने के लिए नई राह चुनती हैं। लेखिका ने उपन्यास के अंत को निश्चित ही नाटकीय-भावुकता में ढाल दिया है। अकस्मात उजाला का बिछुड़ा और पिता का बंधक प्रेमी "वीर" उजाला को तलाशता हुआ आखिर में उजाला की ही शरण में आकर पिता के अत्याचार के लिए पश्चाताप व्यक्त कर शर्मसार होता है।

बेला बहू इन सारे पीड़ितों और शोषितों के समुदायों को एकत्रित करके सुधार के लिए एक स्कूल खोलती है। यह स्कूल सुधारगृह का प्रतीक है। जहाँ ऐसे पीड़ित और वंचित समुदाय के लोग शरण ले सकें। बेलाबहू का इंक़लाबी और बग़ावती तेवर अंत में पीड़ितों और शोषितों के पुनरावास के प्रयासों में विश्राम पाता है।

मैत्रेयी पुष्पा ने इस सत्य को अपने उपन्यासों में हर बार सिद्ध किया है कि मर्द औरत की देह को इस कदर रौंद-रौंदकर कुचल देता है कि उसकी आत्मा भी हमेशा-हमेशा के लिए मर जाए। लेखिका सिद्ध करना चाहती है कि इसी उत्पीड़ित जन समूह से ही मानवता के "फरिश्ते निकलेंगे।" "फरिश्ते निकले" उपन्यास की पीडिताएँ अग्नि पक्षी (फीनिक्स) की तरह विध्वंस और विनाश की राख़ में से निकलकर पुन: अनंत आकाश में उड़ान भरते हैं। सरल और व्यंजक भाषा में रचित यह उपन्यास लेखिका की रचनाशीलता का आगे बढ़ा हुआ क़दम तो है ही, हिंदी उपन्यास की नवीनतम उपलब्धि भी है।


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