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ISSN 2292-9754

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09.02.2014


गलियारे

उपन्यास : गलियारे
लेखक : रूप सिंह चन्देल
प्रकाशक : भावना प्रकाशन
ए-109 , पटपड़गंज दिल्ली – 110091

वरिष्ठ कथाकार रूपसिंह चन्देल का नवीनतम उपन्यास ’गलियारे’ सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार का न केवल बहु-आयामी चित्रण प्रस्तुत करता है बल्कि अफसरशाही तानाशाही को जिस जीवन्तता के साथ उद्घाटित करता है, वह हमें ब्रिटिश हुकूमत की याद दिला जाता है। मेरे अनुसार हिन्दी का यह पहला उपन्यास है जिसमें अब तक अछूते और आम-व्यक्ति के लिए अज्ञात इस क्षेत्र को सूक्ष्मता और गहनता से विवेचित किया गया है। यद्यपि कथाकार का इससे पूर्व का उपन्यास –’गुलाम बादशाह’ भी सरकारी-अफसरशाही को केन्द्र में रखकर लिखा गया एक चर्चित उपन्यास था, जिसे गत वर्ष आचार्य निरंजननाथ सम्मान से नवाजा गया था, लेकिन उसका कथानक विशेषरूप से अफसरशाही तक ही सीमित था, जबकि ’गलियारे’ भ्रष्टाचार के तमाम पहुलओं पर विचार करता है।

उपन्यास की कथा अफ़सरशाही के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती हुई जिज्ञासा, महत्वाकांक्षा, प्रशासन के विभिन्न पदों पर आसीन ब्यूरोक्रेट्स, स्थितियों के अनुसार अपने स्वार्थ और हित के लिए सरकारी सुविधाओं का अनुचित प्रयोग, उच्च और निम्न वर्ग में भेद-भाव, ग्रामीण और महानगरीय परिवेश का अंतर आदि दिखाती हुई आगे बढ़ती है।

कहानी ग्रामीण परिवेश के गरीब युवक सुधांशु दास और एक उच्च-पदस्थ सम्पन्न अफ़सर की महानगर में पली -पढ़ी बेटी प्रीति मजूमदार के प्रेम के साथ प्रारंभ होती है। सुधांशु अपनी मेहनत के बलबूते पर आई. ए. एस. अफ़सर बन जाता है। दोनों का विवाह होता है। शादी के पश्चात कुछ समय तक सब ठीक चलता है। लेकिन प्रीति के भी आई ए एस अफ़सर बन जाने के बाद किस तरह उनकी प्रेम कथा सरकारी तंत्र की दूरव्यवस्था, हर स्तर पर शोषण, वर्ग-भेद, नैतिक पतन और मौकापरस्त राजनीति से चौतरफ़ा घिरती हुई लहूलुहान हो जाती है-- उसका बेबाक वर्णन उपन्यास में हमें प्राप्त होता है। ज़िंदगी इतने उतार-चढ़ाव से होकर गुज़रती है कि पूरी किताब को एक स्ट्रेच में पढ़ने का लोभ बना रहता है। उपन्यास की विशेषता भाषा की सहजता और क़िस्सागोई शैली है। क़िस्सागोई शैली ने इस कथाकार को एक अलग पहचान प्रदान की है।

अफ़सरशाही का यदि अपना एक रुआब होता है तो कुछ मजबूरियाँ भी होती हैं। इन सबके चलते ज़िंदगी किस प्रकार प्रभावित होती है और रिश्ते कैसे दरकते हैं, उन्हें सम्भालना और निभाते रखना कितना मुश्किल हो जाता है, इसका सार्थक वर्णन उपन्यास करता है । यहाँ भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहराई तक समाई हुईं हैं कि ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और उसूलों पर टिके रहने वाले अफ़सरों के लिए ये किसी जंग से कम नहीं। उन्हें मुश्किलों, अपमान, अवहेलना और घुटन के साथ जीने के लिए कितना मजबूर होना पड़ता है कहानी के नायक सुधांशु के मार्फ़त समझा जा सकता है, सुधांशु जो इस उपन्यास का एक ऐसा पात्र है जिसकी ईमानदारी उसके बॉस पाल के लिए चुनौती बन चुकी है। पाल ही नहीं रिश्वतखोर छोटे अधिकारियों की दृष्टि में भी वह खटकता है और सुधांशु के विरुद्ध जिस प्रकार के षडयंत्र होते हैं वे आम पाठक को चौंकाते हैं।

प्रीति इस सिस्टम के रंग में रंगने लगती है। ब्यूरोक्रेसी का हिस्सा बनती जाती है। इस दौड़ में बने रहने की कोशिश में वह इस कदर उलझ जाती है कि अहंकार, लोभ और दम्भ से भरी बात-बात पर सुधांशु को उसके ग्रामीण होने और पिछड़ेपन के ताने देने लगती है। कुछ उदाहरण दृष्टव्य हैं।

"यार सुधांशु अब तुम किसान नहीं हो…… क्लास वन अफसर हो। उसी प्रकार बातें सोचा और किया करो।“

या फिर - "क्लास वन अफसर होकर भी तुम्हारी सोच अभी गाँव वाली ही है"

वह अपना घर-बार, रिश्ते सब दाँव पर लगा देती है। मीणा जैसे अफसर प्रीति को बरगलाने....सुधांशु के विरुद्ध भड़काने में सफल हो जाते हैं। अफसरशाही के अहं में डूबी प्रीति सुधांशु को कदम-कदम पर प्रताड़ित करती है। परिणाम - सुधांशु से उसका विलगाव और अंततः व्यवस्था और पत्नी की प्रताड़ना और उपेक्षा से टूटा सुधांशु शराब और अन्य प्रकार के आत्मघाती ड्रग्स की शरण में जीवन का सुकून खोजने का असफल प्रयास करता हुआ मृत्यु की ओर अग्रसर होने के लिए अभिशप्त हो जाता है। यहाँ लेखक का यह कथन उल्लेख्य है -

"हिंदुस्तान की ब्यूरोक्रेसी की यही तो ख़ूबी है कि वो रिश्तों को पनपने से पहले ही उसे जड़ से काट फेंकती हैं"

उलझनों और राजनैतिक दांव -पेंचों का ताना -बाना रचते गिलयारे भीतर ही भीतर कहाँ खुलते हैं और कहाँ पहुँचते हैं बखूबी समझाने की कोशिश में लेखक पूर्ण रूप से सफल रहा है। बेहद ईमानदारी के साथ कहना चाहती हूं कि 'गलियारे' ’मस्ट रीड’ की लिस्ट में बहुत ऊपर रखा जाने योग्य ही नहीं है बल्कि यह विषय की मौलिकता, सहज कथनात्मकता और शिल्प वैशिष्ट्य के कारण हिन्दी के शीर्षस्थ उपन्यासों में स्थान पाने योग्य उपन्यास भी है।


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