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05.31.2008
 
चाँद हर रोज़
कुसुम सिन्हा


चाँद हर रोज़ मीठे ख़्वाब दिखाता क्यों है?
उसे सच मान लूँ फिर दिल को बहकाता क्यों है?

हरदम रहता है वह डाले हुए रुख़ पर नक़ाब
बार बार बनक ख़ुदा मुझको डराता क्यों है?

मुद्दत से आँधियों में चिराग़ों सा जला हूँ
हवा बनकर मुझे फिर कोई डराता क्यों है?

अबके कोई फूल न बच पाया है ख़िज़ाओं में
अभी सावन है मुझे कोई बताता क्यों है?

जो भी मिलताहै मुझे दर्द देके जाता है
वही लोगों से मुझे ग़लत बताता क्यों है?

मैंने तो सोच लिया करेंगे न शिक़वा किसी से
याद आ आ के मुझे कोई रुलाता क्यों है?

रात के सन्नाटे में जब कोई पंछी बोलता है
कोई संदेश देता है ऐसा लगता क्यों है?
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