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ISSN 2292-9754

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05.13.2017


पूर्वांचल भारत के पारंपरिक नाट्य रूप

Manipuri Shumang leelaसांस्कृतिक रूप से बिहार, बंगाल, उड़ीसा, असम तथा त्रिपुरा के भू-भाग को पूर्वाञ्चल भारत के रूप में जाना जाता है। राजनीतिक तथा प्रशासनिक दृष्टिकोण से यह अलग राज्य हैं, जिसमें बिहार, बंगाल, उड़ीसा वृहत्तर बंगाल के रूप में जाना जाता था। 1905 में बंगाल विभाजन हुआ और पूर्वी बंगाल (बांग्लादेश का हिस्सा) और पश्चिम बंगाल अस्तित्व में आया। अब तक बिहार और उड़ीसा सयुंक्त था, जिसका विभाजन 1936 में हुआ। त्रिपुरा और आसाम पूर्वोत्तर सीमांचल प्रदेश के अंतर्गत था। वर्तमान में यह पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में गिना जाता है।

पूर्वाञ्चालीय संस्कृति के पीछे मुख्य दो स्थापनाएँ हैं-

  •  सांस्कृतिक

  • भौगोलिक तथा ऐतिहासिक

सांस्कृतिक स्थापना के पीछे मत है कि इन राज्यों की भाषाएँ यथा मैथली, मगही, भौजपुरी, बांग्ला, सूर्यापुरी तथा असमियाँ अर्धमागधी से विकसित है। प्राचीनकाल से ही प्रायः एक ही शासक से शासित होने के कारण एक विशेष प्रकार के राजनीतिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है। इन प्रदेशों की संस्कृति नदी मातृक है।

पूर्वोत्तर भारत के इतिहास पर गौर करें तो यह राज्य प्राचीन काल से ही व्यापक गतिविधियों का केंद्र रहा। पूर्वाञ्चल के बारे में अपना मत प्रकट करते हुए विश्वेशर जी कहते हैं :

"सरयू, सोन से बंगसागर तक तथा पूरी से हिमगिरि तक, तथा नेपाल उपत्यका से असम अधिपत्य का तक जो भी जंगल, पहाड़, जल स्थल, भाव, विचार परंपरा प्रचलित है, अपने प्रकृति परिवेश से एक विलक्षण पूर्वाञ्चालिय परिधि प्रस्तुत करता है"। {सिंह,विश्वेश्वर,'पूर्वाञ्चालिय नाटक और रंगमंच', पृष्ठ 56)

इन राज्यों में आदिम संस्कृति की प्रधानता है जहाँ बाहरी या सभ्य समाज की परंपरा और संस्कृति का प्रभाव कम ही पड़ा। लेकीन पूर्वाञ्चालिय संस्कृति से हम आदिम 'जनजातीय संस्कृति' को अलग नहीं मान सकते, क्योंकि पूर्वाञ्चल के अन्य भागों में आदिवासी जनजाति रहती है। इस प्रकार पूर्वाञ्चल संस्कृति के निर्माता आदिम तथा सभ्य दोनों समाज के लोग थे। एक ही सांझा संस्कृति से कारण लोक उत्सवों में भी समानता है। सम्पूर्ण पूर्वाञ्चल किसी न किसी नदी के किनारे बसा हुआ है अतः नदियों को लेकर भी एक साँझी संस्कृति यहाँ मिलती है। कहा जा सकता है कि भाषिक विविधता होने के बावजूद इन राज्यों में सांस्कृतिक एकता है। कला पूर्वाञ्चालिया समाज का एक अभिन्न हिस्सा है यहाँ की विशाल प्रकृतिक सम्पदा ने भी कलाओं ने भी कलाओं को सहेज कर रखा है यहाँ कई कला रूप गीत नृत्य आदि के रूप में मौजूद है। कोई भी कला उस समाज का प्रतिबिंब होती है धार्मिक विचारधारा की दृष्टि से भी पूर्वाञ्चल प्रमुख है। यहाँ कला रूपों पर कई धार्मिक आंदोलनों का प्रभाव देखने को मिलता है, जिसमें वैष्णव धर्म ने मध्यकाल में आकार कई कला रूपों को जन्म दिया जिसमें नाट्यकला प्रमुख थी यह कारण उस पृष्ठभूमि को तैयार करते हैं, जिनसे एक साथ सम्पूर्ण पूर्वाञ्चल में वैष्णव धर्म पैर पसार सका तथा कई लोक नाट्यों का प्रादुर्भाव हुआ। वैष्णव आंदोलन की पृष्ठभूमि तथा उसके प्रचार में इन लोक नाटकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इन सभी राज्यों में बिहार सारथी की भूमिका निभाता है। डॉ. विलियम स्मिथ ने मिथिला बिहार की ऐतिहासिकता पर लिखते हैं :

"Drama was being written in Mithila in the early 14th centuary as can be seen in such a play, the ‘dhurttsamagama’ of jyotirishvara from about 1325. This makes it not onle the oldesht Maithili drama but perhaps even the oldest- varnnacular work of northan india .( natkam muktisadhkam, edit by budheshwar saikia, shankardeva’s dramas : the golden mean – article written by William Smith, University of Stockhom (Smith,William,’natkam muktisadhkam, edit by budheshwar saikia, shankardeva’s dramas : the golden mean’page no 18)

मिथिला में नाटक लिखने की शुरुआत 14वीं शताब्दी में हुई। ज्योतिरीश्वर ठाकुर का धूर्तसमागम 1325 ईस्वी में लिखा गया ऐसा नाटक है जो ना केवल मिथिला अपितु सम्पूर्ण उत्तर भारत में लिखा गया पहला नाटक है।

बिहार कला एवं कलाकारों का मुख्य केंद्र रहा है, महाजनपद काल में अंग, मिथिला और मगध कलाकारों का संरक्षण स्थल था। रामायण और महाभारत के अन्तः साक्ष्य के अनुसार यहाँ के आंजनों का गणतन्त्र से गहरा संवाद था। अतः लोककला रूपों को गणतन्त्र ने पर्याप्त संरक्षण दिया।

इतिहास में देखें तो तुर्क-पठान आधिपत्य हो जाने पर मिथिला अपने सांस्कृतिक मार्ग पर आगे बढ़ता रहा। इस समय में मिथिला में जो शासक थे वो कर्णाट्वंशी थे। लेकिन उन्होंने संस्कृत के अलावा मैथिली, भाषा को भी प्रोत्साहित किया। (राधाकृष्ण चौधरी,' बिहार का इतिहास', पृष्ठ 141)

मिथिला गेय काव्य का केंद्र था। उमापति ने अपने नाटक 'पारिजातहरण' में मैथिली में ही गीत लिखे हैं। ज्योतिरीश्वर ने वर्णरत्नाकर में ‘लोरिक’ नाम के लोकगीतों का उल्लेख किया है, जो मिथिला में आज भी लोकप्रिय है।(ठाकुर,ज्योतिरीश्वर,'वर्णरत्नाकर',बिहार) मिथिला में जो दर्शन का विकास हुआ और साहित्य में जो नई धारा प्रवाहित हुई उसने आसपास के प्रदेशों को प्रभावित किया। राधाकृष्णन चौधरी ने डॉ॰दिनेशचन्द्र का हवाला दिया जिनका विचार था कि 'बंगाल को अपनी सभ्यता मिथिला से प्राप्त हुई'। (सेन,दिनेशचन्द्र,वही पृष्ठ 1401-141)

मिथिला के नाटकों और संगीत का प्रभाव बंगाल, उड़ीसा, असम और पश्चिम में हिन्दी प्रदेश के शेष भाग पर काफी हुआ। इस प्रभाव और विस्तार का प्रमाण यह है की विद्यापति की रचनाओं की पाण्डुलिपियों नेपाल, बंगाल आदि प्रदेशों में भी मिलती है। (शर्मा,रामविलास,'हिन्दी साहित्य की भूमिका',पृष्ठ 190)

सर्वप्रथम जयदेव का गीतगोविंद तत्पश्चात विद्यापति वैष्णव मत को प्रचारित करने में मील का पत्थर साबित हुए। गीतगोविंद गीतिनाट्य है। विभिन्न चरित्रों के मध्य जैसे श्रीकृष्ण, राधा और सखियों के बीच यत्र तत्र गेय संवाद है। श्री कृष्ण कीर्तन भी एक लोकनाट्य है। गीतगोविंद में राधाकृष्ण के लौकिक प्रेम या मिलन की कथावस्तु के चारों और बुने गए प्रगीतों का सतत क्रम है, जो मुक्तक होते हुए भी कथात्मक भी है। उसी तरह विद्यापति के कृष्ण विषयक पदावलियाँ सम्पूर्ण पूर्वी भारत में गायी जाती है।

वैष्णव आधारित कथानकों में बिहार के कीर्तनियाँ तथा बिदापत नाच लोकनाट्य है। कीर्तनियाँ देशव्यापी सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का परिणाम था। कीर्तनियाँ के कथानकों में उषाहरण, कृष्णकेलिमला, श्रीकृष्ण जन्मरहस्य, माहावानन्द, गौरी स्वयंवर कृष्ण विषयक थे।(चौधरी,राधाकृष्णन,'द ड्रमैटिक ट्रेडिशन ऑफ मिथिला: द बिहार थिएटर जनरल, पृष्ठ 40-41) कीर्तनियाँ नाट्य परंपरा में उमापति ने पारिजातहरण नाटक की रचना की। यह नाटक भाषा और शिल्प के स्तर पर न केवल मिथिला बल्कि पूर्वाञ्चल भारत के कई रूपों को प्रभावित किया। पारिजातहरण का कथानक हरिवंशपुराण (अध्याय 124 -135), विष्णु पुराण (अध्याय 5, श्लोक 30 - 31) और श्रीमदभागवत गीता के पारिजात पुष्प के लिए कृष्ण और इन्द्र के बीच हुए विवाद और युद्ध के प्रसंग पर आधारित है। त्रिपुरा का 'ढब जात्रा', बंगाल की 'जात्रा', बिदापत में ‘पारिजातहरण’ का कथानक कई दिनों तक मंचित होता रहा।

मध्यकालीन वैष्णव भक्ति आंदोलन की पृष्ठभूमि में एक नाट्य रूप सामने आता है:

बिदापत

बिदापत में आज भी गीतगोविंद की नाच गान पद्धति तथा ब्रज की रास परमपरा के अवशेष देखे जा सकते हैं जगदीश चंद्र माथुर ने बिदापत को विद्यापति से प्रेरित माना है।(माथुर,जगदीशचंद्र,'परम्पराशील नाट्य', पृष्ठ 77) बिदापत के पूर्वरंग में विद्यापति की पदावलियाँ गाई जाती है। विद्यापति के राधा–कृष्ण विषयक पदावली में कथा तत्व जुड़ने से बिदापत जैसे नाट्य रूप अस्तित्व में आया।

बिदापत मंच पर कृष्ण के जीवन से जुड़े कथानकों या लीलाओं को प्रदर्शित किया जाता है। 'बंसीलीला', 'नागलीला', 'मानलीला' आदि प्रमुखता से प्रस्तुत होते हैं। कभी बिदापत मंच पर ‘पारिजातहरण’ और ‘कालियदमन’ का मंचन भी होता है।

वैष्णव भक्ति नाट्य परंपरा की सशक्त नाट्य परंपरा हमें बंगाल में मिलती है, जहाँ वैष्णव भक्ति आंदोलन के पुरोधा चैतन्य ने वैष्णव भक्ति का प्रचार प्रसार किया। यहाँ का प्रसिद्ध लोक नाट्य :

जात्रा

मध्ययुगीन बंगाल में लोक नाटक का एक रूप विकसित हुआ, जो 'कृष्ण- यात्रा' जात्रा के नाम से जाना जाता है। यह संगीत नाटक का एक रूप है। इसके सभी संवाद कंठ-संगीत में हैं। कृष्ण, राधा और दो सेविकाओं के चरित्र इसमें थे। जयदेव का गीतगोविंद बंगाल के वैष्णवों में अत्यधिक लोकप्रिय था। अतः यह स्वाभाविक ही है कि लोक नाटक का रूप जयदेव के गीतगोविंद पर आधारित है।(वात्स्यायन,कपिला,'गीतगोविंद',पृष्ठ 28)

पंद्रहवीं शताब्दी में भक्ति आंदोलन का बंगाल के जनजीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा। भक्त देवता की आराधना के लिए जुलूसों में नाचते-गाते थे। इसमें धार्मिक विषयक कथानक मंचित होते हैं। चैतन्य देव इसके प्रेणता माने जाते हैं। वैष्णव मत को प्रचारित करने में जात्रा का अधिक प्रयोग हुआ। इसमें कीर्तन, नृत्य, गीत शैली का प्रादुर्भाव होने के कारण समृद्ध हुआ। (भारती,ओमप्रकाश,'लोकनाट्य विश्वकोष', पृष्ठ 74-75)

अंकिया

अंकिया आसाम का जनप्रिय पारंपरिक नाट्य रूप है। इसे वैष्णव नाटक भी कहा जाता है। इसे आदि प्रणेता प्रसिद्ध वैष्णव संत शंकर देव को माना जाता है। शंकर देव ने अपने शिष्यों सहित ब्रजमंडल की यात्रा की। वहाँ उन्होने कृष्ण के जीवन पर आधारित लीलाओं को देखा वहाँ से वह पूर्वाञ्चल भारत की यात्रा पर गए। वहाँ उन्होने बंगाल में जात्रा तथा बिहार में कीर्तनियाँ (उमापति रहित पारिजातहरण) आदि देख असम लौटने के बाद अनुभव से ब्रजबूली की रचना की। (भारती,ओमप्रकाश,'असम का पारंपरिक नाट्य : अंकिया',पृष्ठ 11)

शंकरदेव कालीन आसाम राजनैतिक दृष्टि से पूर्णतः असुरक्षा, अमर्यादित, आक्रमण के अमानवीय व्यवहार का क्षेत्र बना हुआ था। अतः विखंडित और हताश राजनैतिक स्थिति ने समानी जनता को शांति और सुरक्षा के लिए मानवतावादी शंकरी भक्ति के प्राप्ति के योग्य वातावरण तैयार करने में सहयोग दिया। शंकरदेव ने वैष्णव मत के द्वारा वहाँ की त्रस्त जनता को एक मार्ग दिखाया। घोर कर्मकांडी, तंत्र साधना से युक्त कामरूप के लिए वैष्णव पाठ एक विकल्प के तौर पर उभरा व जातिवादी रूढ़ियों को तोड़ने के कारण भी आसाम में यह व्यापक तौर पर प्रसारित हुआ।

पूर्वोत्तर भारत के संतों ने कृष्ण को अपना नायक बनाया। जिसमें मणिपुर के लोक नाट्य भी शामिल है।

गोड़ लीला

मणिपुर की गोड़ लीला के केंद्र में कृष्ण ही है। यह एक लोकनृत्य है तथा इसका प्रदर्शन वैष्णव धर्म के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से आरंभ हुआ। गौरलीला का स्वरूप दो सांस्कृतिक धाराओं के संयोग से निर्मित हुआ। इनमें से एक मैते परंपरा थी तो दूसरी गौड़िय वैष्णव चिंतन धारा। यह माना जाता है कि सन् 1470 में कीपाम्बा महाराज के काल में वैष्णव उपासना शुरू हुई थी। मणिपुर राजनीतिक दृष्टि से काफी अस्थिर रहा। 100 वर्षों में 20 राजाओं ने शासन किया इन वर्षों में यहाँ कई कला रूपों का जन्म हुआ। गरीबनिवास के समय रमानन्दी ने वैष्णव संप्रदाय को राजधर्म घोषित किया। इस समय मणिपुर में गौड़िय संप्रदाय के अनुनायी भी थे। भाग्यचन्द्र के काल में यहाँ वैष्णव धर्म को प्रश्रय मिला। गौड़लीला में मुख्यतः चैतन्यदेव की बाल लीलाएँ अभिनीत की जाती है और गौड़ लीला के परयोक्ताओं ने चैतन्य देव ने चैतन्यदेव को कृष्ण रूप तथा ईश्वरीय गुण से स्थापित करने की कोशिश की है।

शुमाङ्ग लीला

मणिपुर का ही एक और लोक नाट्य है शुमाङ्ग लीला। शुमाङ्ग अर्थात आँगन, आँगन में होने वाली लीला। यह एक सामाजिक लोक नाट्य है। इष्ट कला रूपों में प्रस्तुत विषय वैष्णव भक्ति से जुड़े हैं, जिसका आधार, रामायण, महाभारत, तथा अन्य पौराणिक आख्यान है। शुमाङ्ग लीला के कथानक सामाजिक संदर्भों से जुड़े होते हैं।

ढब जात्रा

पूर्वोत्तर का एक राज्य है त्रिपुरा। त्रिपुरा भी राजनीतिक, सांस्कृतिक स्थितियों में काफी उतार चढ़ाव वाला रहा है। वैष्णव लोक नाट्य की परंपरा यहाँ भी रही जिसमें ढब जात्रा प्रमुख है। ढब जात्रा कृष्ण विषयक रंगमंच की देन है। वैष्णव भक्ति की चेतना छाया में इन नाट्य रूपों का जन्म हुआ।
भारत के इतिहास में 'मध्यकाल' व्यापक बदलाव का संकेत लेकर आता है। एक ऐसे वैचारिक आंदोलन का जन्म इस युग में होता है, जिसने कई सांस्कृतिक धारणाओं को जन्म दिया। इससे निकली शाखाओं ने सामाजिक परिवर्तन की नई बयार को बहाया। राजनीतिक उथल पुथल से त्रस्त जनता के लिए यह आंदोलन विकल्प के तौर पर उभरा। जनता ने आशाहीन दृष्टि से अपने अतीत के नायकों को वर्तमान में स्थापित किया। संतों ने ईश्वर का मानविकीकरण कर उसे जनमानस के मन में बसाया।
जनमानस ईश्वर की लीलाओं को देखकर स्वयम की पीड़ा भुला जाता है वह उसे अपने जीवन के अनुभव के रूप में स्वीकार्य करता है, वह ईश्वर को कष्टहरता के रूप में स्वीकार्य करता है। इसी आंदोलन की देन वैष्णव आंदोलन जिसने दक्षिण से होते हुए उत्तर तथा पूर्व में पैर पसारा। कर्मकांड, जातिवाद के विरुद्ध प्रचारित इस मत को भारतीय जनमानस ने खुली बाँहों से स्वागत किया।

पूर्वाञ्चल भारत में जब राष्ट्रवाद की पूर्वपीठिका तैयार हो रही थी तो इसकी भावनात्मक और सामाजिक पृष्ठभूमि वहाँ के लोक गायक तैयार कर रहे थे। भक्ति आंदोलन के बाद यही एक समय था जब मानव को श्रेष्ठ बताया गया। मानवतावाद भक्ति आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। (भारती,'ओमप्रकाश,'लोकायन-लोककला रूपों पर एकाग्र',पृष्ठ 76)

कहा जा सकता है कि लोक जनमानस में प्रचलित लोक कथाओं का अपने आंदोलन के साथ समन्वय संतों ने किया। जिस प्रकार राम लोकजनमानस में पहले से मौजूद थे। मिथिला का लवहेर- कुशेर तथा कुषान गान प्राचीन काल से ही राम कथा के रूप में मौजूद है। उसी तरह कृष्ण कई उपनामों के साथ लोक में प्रचलित थे। वैष्णव आंदोलन ने इन ईश्वरीय चरित्रों का समाजीकीकरण किया तथा आलौकिक से लौकिक धरातल पर उनको स्थापित किया। लोक में इन दो रूपों के पूर्व प्रचलित होने के कारण ही वैष्णव आंदोलन सम्पूर्ण देश में फ़ैल सका तथा राष्ट्र एक सांस्कृतिक सूत्र में जुड़ा।
• सन्दर्भ सूचि
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10. माथुर ,जगदीशचन्द्र,दशरथ ओझा : प्राचीन भाषा नाटक संग्रह
11. माथुर, जगदीशचन्द्र : ‘परम्पराशील नाट्य’, , राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, 2006
12. मिश्र, भुवनेश्वरनाथ, ‘वैष्णव साधना और सिद्धान्त’, हिन्दी ग्रंथ अकादमी, बिहार, 1973


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