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01.16.2009
 
 खेल कुर्सी का है यार यह
कवि कुलवंत सिंह

खेल कुर्सी का है यार यह,
शव पड़ा बीच बाज़ार यह ।

कैसे जीतेगी भुट्टो भला,
देते हैं पहले ही मार यह ।

नाम लेते हैं आतंक का,
रखते हैं खुद ही तलवार यह ।

रात दिन हैं सियासत करें,
करते बस वोट से प्यार यह ।

भूल कर भी न करना यकीं,
खुद के भी हैं नहीं यार यह ।

दल बदलना हो इनको कभी,
रहते हर पल हैं तैयार यह ।

देख लें घास चारा भी गर,
खूब टपकाते हैं लार यह ।

पेट इनका हो कितना भरा,
सेब खाने को बीमार यह ।

अब करें काम हम अपने सब,
छोड़ बातें हैं बेकार यह ।

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