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01.16.2009
 
 जब से गई है माँ मेरी रोया नहीं
कवि कुलवंत सिंह

जब से गई है माँ मेरी रोया नहीं
बोझिल हैं पलकें फिर भी मैं सोया नहीं

ऐसा नहीं आँखे मेरी नम हुई न हों
आँचल नहीं था पास फिर रोया नहीं

साया उठा अपनों का मेरे सर से जब
सपनों की दुनिया में कभी खोया नहीं

चाहत है दुनिया में सभी कुछ पाने की
पायेगा तूँ वह कैसे जो बोया नहीं

इंसा है रखता साफ तन हर दिन नहा
बीतें हैं बरसों मन कभी धोया नहीं

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